रेलवे क्वार्टर का वो आखिरी कोना / Railway Quarter Ka Vo Aakhiri Konaa । संस्मरण । हिमांशु कुमार शंकर ।
रेलवे क्वार्टर का वो आखिरी कोना दरभंगा की उमस भरी दोपहर और दूर से आती ट्रेन की सीटी... ये दोनों हिमांशु के जीवन का वो बैकग्राउंड म्यूजिक बन चुके थे, जो कभी बंद नहीं होता। जीजा जी को रेलवे की तरफ से जो सरकारी आवास मिला था, वो बाहर से देखने में जितना शांत लगता, अंदर उतना ही शोरगुल भरा था। उस घर में हिमांशु कहने को तो 'दीदी का भाई' था, लेकिन उसकी हैसियत उस घर की दीवारों पर लगी पपड़ी जैसी थी—मौजूद, मगर अनचाही। दिन की शुरुआत सूरज से नहीं, दीदी की तीखी आवाज़ से होती थी। "हिमांशु! देव का टिफिन अभी तक पैक क्यों नहीं हुआ? तू पढ़ने में लगा है या घर भी देखेगा?" हाथ में 'लूसेंट' की किताब और दूसरे हाथ में चाय की छलनी—यही हिमांशु की दिनचर्या थी। वो जब पन्ने पलटता, तो डर रहता कि कहीं चाय उबलकर गिर न जाए, और अगर चाय गिरी, तो दीदी का पारा चढ़ जाएगा। दीदी को 'हाई बीपी' था, यह वो ढाल थी जिसे वो हर बार अपनी बदजुबानी के आगे लगा लेती थीं। हिमांशु जब भी अपने स्वाभिमान को कुचले जाने पर चिल्लाना चाहता, उसे दीदी की बीपी की दवाई की शीशी याद आ जात...