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एक यात्रा अपनापन संकोच और स्नेह का / Ek Yatra Apnapan Sankoch Aur Sneh Ka । हिमांशु कुमार शंकर।

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                    एक यात्रा        अपनापन संकोच और स्नेह का                       जिंदगी की रफ़्तार भी अजीब होती है, हम दौड़ते तो भविष्य की ओर हैं, लेकिन जड़ें अतीत की गलियों में ही कहीं छूट जाती हैं। मेरा रेलवे कंट्रोलर का परीक्षा केंद्र 'इंट्रेपिड साइबरट्रॉनिक्स' पटना के भूतनाथ क्षेत्र में पड़ा था। मैं दरभंगा में बैठा केंद्र की दूरी और अपरिचित रास्तों के गणित सुलझा ही रहा था कि अचानक पल्लवी दी की याद आई। वे एम.जे.एम.सी. (MJMC) में मेरी सीनियर थीं और उनका घर पटना में ही था। मन में एक झिझक थी—सालों बीत गए थे। पिछली बार जब उनके घर गया था, तब अंकल जीवित थे। उनके देहांत की खबर ने मन को कचोटा जरूर था, लेकिन वक्त की कमी और इस भागदौड़ भरी जिंदगी ने कभी शोक जताने या आंटी से मिलने का मौका ही नहीं दिया। अब जब मौका मिला, तो एक नया संकोच सामने खड़ा था—मध्यमवर्गीय परिवारों में अतिथि का सत्कार 'खिलाने-पिलाने' के बिना पूरा नहीं होता, और मैं किसी को कष्ट नहीं देना चाहता था। ...

स्कूल की यादगार सजा / School Ki Yadgaar Saja । संस्मरण । हिमांशु कुमार शंकर ।

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        स्कूल की यादगार सजा                मंझौल, बेगूसराय के उस सरकारी मिडिल स्कूल की यादें आज भी ताजा हैं जब पढ़ाई से ज्यादा हमारा मन स्कूल की चहारदीवारी लांघने में लगता था। एक रोज दोपहर की चिलचिलाती धूप में मैंने और मेरे साथियों ने तय किया कि गणित की क्लास से पहले 'मैदान छोड़' भागना ही सबसे बेहतर इलाज है।                     हम दबे पांव स्कूल के पीछे वाली छोटी दीवार के पास पहुंचे और एक-दूसरे को सहारा देकर ऊपर चढ़ने की कोशिश करने लगे। जैसे ही मैंने दीवार फांदकर बाहर छलांग लगाई, मेरा दुर्भाग्य देखिए कि नीचे कीचड़ था और मैं सीधे उसमें जा गिरा। अभी मैं संभल ही रहा था कि ऊपर दीवार पर अटके मेरे दोस्तों को देख सामने से खैनी मलते हुए हेडमास्टर साहब प्रकट हो गए। उन्होंने बड़े प्यार से मेरा हाथ पकड़ा और बोले "हिमांशु बाबू, बड़ी जल्दी में लग रहे हो, आपका घर तो पास में ही है घर भागा जा रहा है क्या?" अगले ही पल मैं और मेरे दोस्त स्कूल के बरामदे में एक कतार में 'मुर्गा' बने हुए...

" साजन का घर प्यारा लगे " डायरेक्टर अभिषेक तिवारी की अगली भोजपुरी फिल्म का हुआ शुभ मुहूर्त

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  पटना में भव्यता के साथ संपन्न हुआ फिल्म ‘साजन का घर प्यारा लगे’ का शुभ मुहूर्त    रिश्तों की अहमियत और जज्बातों के द्वंद्व की कहानी होगी ‘ साजन का घर प्यारा लगे’ : *अभिषेक तिवारी* पटना, 16 जनवरी 2026: राजधानी पटना के किदवईपुरी के ठाकुर कम्युनिटी हॉल में शुक्रवार की शाम एक भव्य समारोह के दौरान आगामी भोजपुरी फीचर फिल्म ‘साजन का घर प्यारा लगे’ का शुभ मुहूर्त विधि-विधान के साथ संपन्न हुआ। निर्माता डॉ. एन होडा और सुबीर कुमार द्वारा निर्मित इस फिल्म का निर्देशन युवा निर्देशक अभिषेक तिवारी कर रहे हैं। अभिषेक तिवारी मूलतः भोजपुर जिला के चरपोखरी प्रखण्ड के निवासी हैं ।  पटना में फिल्म के मुहूर्त के दौरान निर्देशक अभिषेक तिवारी ने फिल्म की कहानी पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह सिनेमा आम ढर्रे से हटकर होगा। उन्होंने कहा, "यह फिल्म मुख्य रूप से दो महिलाओं के अंतर्मन और अंतर्द्वंद्व की कहानी है। इसमें रिश्तों की अहमियत, विश्वास और अपनों के बीच पनपते दुराव (अलगाव) की भावना के द्वंद्व को बेहद संजीदगी से दिखाया जाएगा। यह एक ऐसी फिल्म होगी जिससे हर परिवार जुड़ाव महसूस करेगा।" हर किस...

रेलवे क्वार्टर का वो आखिरी कोना / Railway Quarter Ka Vo Aakhiri Konaa । संस्मरण । हिमांशु कुमार शंकर ।

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 रेलवे क्वार्टर का वो आखिरी कोना                  दरभंगा की उमस भरी दोपहर और दूर से आती ट्रेन की सीटी... ये दोनों हिमांशु के जीवन का वो बैकग्राउंड म्यूजिक बन चुके थे, जो कभी बंद नहीं होता। जीजा जी को रेलवे की तरफ से जो सरकारी आवास मिला था, वो बाहर से देखने में जितना शांत लगता, अंदर उतना ही शोरगुल भरा था। उस घर में हिमांशु कहने को तो 'दीदी का भाई' था, लेकिन उसकी हैसियत उस घर की दीवारों पर लगी पपड़ी जैसी थी—मौजूद, मगर अनचाही। दिन की शुरुआत सूरज से नहीं, दीदी की तीखी आवाज़ से होती थी। "हिमांशु! देव का टिफिन अभी तक पैक क्यों नहीं हुआ? तू पढ़ने में लगा है या घर भी देखेगा?" हाथ में 'लूसेंट' की किताब और दूसरे हाथ में चाय की छलनी—यही हिमांशु की दिनचर्या थी। वो जब पन्ने पलटता, तो डर रहता कि कहीं चाय उबलकर गिर न जाए, और अगर चाय गिरी, तो दीदी का पारा चढ़ जाएगा। दीदी को 'हाई बीपी' था, यह वो ढाल थी जिसे वो हर बार अपनी बदजुबानी के आगे लगा लेती थीं। हिमांशु जब भी अपने स्वाभिमान को कुचले जाने पर चिल्लाना चाहता, उसे दीदी की बीपी की दवाई की शीशी याद आ जात...

सच्चा मित्र / Sachcha Mitra ।कहानी । हिमांशु कुमार शंकर ।

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                            सच्चा मित्र                        सूरज और रितेश बचपन के गहरे मित्र थे, जहाँ सूरज एक साधारण और भावुक इंसान था, वहीं रितेश की आँखों में बड़े सपने थे। रितेश शहर जाकर बड़ा कारोबार करना चाहता था, लेकिन उसके पास फूटी कौड़ी नहीं थी। अपने मित्र की बेबसी सूरज से देखी नहीं गई, उसने रितेश की कामयाबी के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाने का फैसला किया। सूरज ने न केवल रितेश का मानसिक रूप से हौसला बढ़ाया, बल्कि अपनी मेहनत की कमाई और पुश्तैनी जमीन बेचकर रितेश को शहर भेजा। सूरज गाँव में दिन-रात जी-तोड़ मेहनत करता रहा ताकि शहर में रितेश को किसी चीज़ की कमी न हो। सूरज के इसी त्याग और समर्पण की बदौलत रितेश का कारोबार चल निकला और वह शहर का एक नामी रईस बन गया।                 वर्षों बाद, जब रितेश अपनी चमचमाती गाड़ी से गाँव आया, तो सूरज की आँखों में खुशी के आँसू थे। वह दौड़कर अपने जिगरी यार को गले लगाने आगे बढ़ा, ल...

अधूरी यात्रा /। Adhoori Yaatra । हिमांशु कुमार शंकर ।

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      अधूरी यात्रा - चकाई घाटी का वो खौफनाक मंजर      (एक सच्ची घटना पर आधारित)           आश्विन का पवित्र महीना था। सीतामढ़ी के रहने वाले शिवरत्न अपने भाई, भतीजा-भतीजी, दोस्त और दो छोटे बच्चों (नेहा और हिमांशु) के साथ बाबा बैद्यनाथ धाम (देवघर) के लिए निकले थे। मन में अपार श्रद्धा थी और गाड़ी में 'बोल बम' और जय ठाकुर बाबा के भजन और नारे लग रहे थे। शिवरतन ने सोचा था कि सुबह होते-होते वे बाबा का जलाभिषेक कर लेंगे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। रात के करीब 1 बज रहे थे जब उनकी गाड़ी जमुई पहुंचने वाली थी, तो बिल्ली ने रास्ता काट दिया, मगर फिर भी बिना ब्रेक लगाए जा रहे थे। तभी कुछ किलोमीटर के बाद कुछ लोग गाड़ी रोकने का इशारा किया, लेकिन कोई समझ नहीं पाया। कुछ और आगे जाने के बाद करीब 60-70 ट्रक कतार में लगी थीं। अब जमुई पार करते हुए चकाई घाटी के घुमावदार और सन्नाटे भरे रास्तों में प्रवेश कर गई। जंगल बहुत घना था और अंधेरा इतना गहरा कि गाड़ी की हेडलाइट के अलावा कुछ नजर नहीं आ रहा था।            ...

लव डे / Love Day । गजल । कुमार सरोज ।

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                  लव डे                         कुमार सरोज  मत पूछो हाल - ए - दिल,                       ये इज़हार का दिन है।  मेरे आँखों में छुपे,                  हज़ारों ख़्वाबों का दिन है।  मेरे लब खामोश हैं,                       मगर धड़कनें गाती हैं।  गोलू तेरी मोहब्बत का,                        ये इकरार का दिन है। फूलों से सजी हैं राहें,                     हवाएँ भी गुनगुनाती हैं। आज तेरी बाहों में,                        सिमटने का दिन है। चाँद भी शरमा रहा है,                  ...

लेखक का भूत / Lekhak Ka Bhoot / कविता / चंद्रबिंद /

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                     लेखक का भूत                                     चंद्रबिंद    क्या आप जानते हैं एक लेखक की मृत्यु कैसे होती है ! तो सुनिए  पहले उसकी  दोनों आँखें कमजोर हो जाती हैं  मुश्किल हो जाता है उसका दूर तक देख पाना  जिसे मेडिकल की भाषा में  मायोपिया कहते हैं । परिणाम स्वरुप  वह भूलता चला जाता है  एक एक कर  अब तक  की देखीं तमाम चीजें ।  फिर उसके कान कमजोर होते हैं  जिससे  असमर्थ हो जाता है वह  सुनने में  समय की करवट से उत्पन्न ध्वनि को। चूँकि देखने और सुनने का  सीधा संबंध लिखने से है  इसलिए मुश्किल हो जाता है उसका एक शब्द भी आगे बढ़ना। मैं बहुतेरे ऐसे लेखकों को जानता हूँ जो मरने से नहीं मरे वे इसलिए मर गए क्योंकि वे एक नियत तिथि से भूल गए थे  खुली हवा में साँस लेना। वे भूल गए थे कि कविता का संबंध किसी वाद या मुल्क से नहीं मनुष्यता...

मैं भी हूं / Main Bhi Hoon । कहानी । कुमार सरोज ।

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                 मैं भी हूं                              कुमार सरोज                गली के मोड पर लगा स्ट्रीट लाइट जल रहा था। खड़ा था एक लड़का नीचे। कपड़ा तन पर - सिर्फ एक फटा पैंट।  पेट पीठ में था धंसा। हाथ पेट पर था बंधा। बेचारा ! शांत ! एक दम मौन। खड़ा था। उस काली निशा सी ही।                वह बार बार पोल पर जल रहे बल्ब की ओर देखता। देखकर शायद कुछ देर के लिए वह ठंड से छुटकारा पा जाता। आखिर करता क्या बेचारा ! अकेला जो था वह इस दुनिया में ! इतनी बड़ी दुनिया और वह अभागा मगर अकेला ! अच्छी बात है न.... ? इस बात की चिंता है किसे ?  बहुत से लोग हैं उसके जैसे। फ़िर हम आप फिक्रमंद क्यों ?  मगर सोचना चाहिए !               लो, वह वैसे ही जमीन पर बैठ गया। शायद पैर ठंड के कारण जवाब दे दिया था। बड़ा ही निष्ठुर होता है ठंड। आदमी यह बहुत पहचा...

पगली आंटी/ Pagali Aunty । कहानी । अंजू ओझा ।

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          पगली आंटी                            अंजू ओझा              " पगली आंटी .... पगली आंटी .... ओ पगली आंटी  कहकर बच्चे मजाक बनाते रहते। बिचारी अपने कमजोर कंधे पर एक झोला लटकाए रहती वो भी मटमैला सा। उसपर काले रंग के गंदगी की परत चढ़ी थी और दूसरे बाजू में एक गठरी पकड़े रहती । दिनभर इधर उधर भटकने के बाद पार्क के पास बने फुटपाथ पर बैठ जाया करती और लोगों द्वारा दिए गए बासी खाना को बड़े चाव से खाती । वहीं पार्क में शाम को कॉलोनी के बच्चेे जब खेलने आते तो उस समय उसे देख पगली आंटी कहकर चिढ़ाते हुए पार्क में घुस जातेे। फिर भी बिचारी खामोशी से चुपचाप खाती और वहीं फटी चादर बिछा कर सो जाती ।              शारदा बहुत दिनों से पार्क में संध्या भ्रमण को आती थी। रोजाना उसे देखती कि वो मासुम महज पैंतीस साल की होगी। गेंहुवा रंग, कद काठी पांच फुट चार इंज का होगा , बाल घुंघराले से , नाक नक्श तीखे , कुल मिलाकर भारतीय अक्श थी इसमें। ल...