एक यात्रा अपनापन संकोच और स्नेह का / Ek Yatra Apnapan Sankoch Aur Sneh Ka । हिमांशु कुमार शंकर।
एक यात्रा अपनापन संकोच और स्नेह का जिंदगी की रफ़्तार भी अजीब होती है, हम दौड़ते तो भविष्य की ओर हैं, लेकिन जड़ें अतीत की गलियों में ही कहीं छूट जाती हैं। मेरा रेलवे कंट्रोलर का परीक्षा केंद्र 'इंट्रेपिड साइबरट्रॉनिक्स' पटना के भूतनाथ क्षेत्र में पड़ा था। मैं दरभंगा में बैठा केंद्र की दूरी और अपरिचित रास्तों के गणित सुलझा ही रहा था कि अचानक पल्लवी दी की याद आई। वे एम.जे.एम.सी. (MJMC) में मेरी सीनियर थीं और उनका घर पटना में ही था। मन में एक झिझक थी—सालों बीत गए थे। पिछली बार जब उनके घर गया था, तब अंकल जीवित थे। उनके देहांत की खबर ने मन को कचोटा जरूर था, लेकिन वक्त की कमी और इस भागदौड़ भरी जिंदगी ने कभी शोक जताने या आंटी से मिलने का मौका ही नहीं दिया। अब जब मौका मिला, तो एक नया संकोच सामने खड़ा था—मध्यमवर्गीय परिवारों में अतिथि का सत्कार 'खिलाने-पिलाने' के बिना पूरा नहीं होता, और मैं किसी को कष्ट नहीं देना चाहता था। ...