अब लौट चलें/ Ab Laut Chalen । कहानी । कुमार सरोज ।

             अब लौट चलें 

                             कुमार सरोज



                   मैं पिछले अठारह साल से अपने गांव को छोड़कर पटना में रह रहा हूं। पहले तो साल में दो तीन बार गांव चला भी जाता था, मगर अब तो बस यदाकदा कभी कभार भूला भटका ही जाता हूं। मेरे जैसे बहुत सारे लोग हैं जो एक बार गांव से दूर क्या गए फिर वापस कभी लौटकर भी नहीं आते हैं। पता नहीं क्यों गांव के लोगों में अब बडे़ शहरों में बसने की होड़ लगी हुई थी। पटना में जहां मैं रहता हूं वहां पहले चार मंजिले अपार्टमेंट ही थे। मगर धीरे धीरे चार से सात और अब तो बारह मंजिले अपार्टमेंट बनने लगे थे। एक एक अपार्टमेंट सोसाइटी में तीन तीन सौ फ्लैट बने हुए थे। तीन सौ फ्लैट मतलब तीन सौ घरों का एक बड़ा सा गांव। मेरे गांव में तो अभी भी मात्र दो सौ ही घर है। शहर का यह अपार्टमेंट कल्चर भी बड़ा अजीब होता है। लोग अपने बगल वाले पड़ोसी के बारे में भी कुछ विशेष नहीं जानते हैं। जबकि गांव में तो लोग सभी का नाम और किधर उसका घर है वह भी जानते थे। मर्द की कौन कहे औरतों के नाम से भी लोग उसे पहचान जाते थे। शहर में कहने को तो अपने बहुत होते हैं, मगर समय पर कोई अपना नहीं होता है। हम सब अपनों के बीच में बेगाने थे। 

                आज मुझे अपने गांव की याद इसीलिए आ रही थी, क्योंकि अभी मैं अपनी ही लिखी एक कहानी पढ़ रहा था, जिसे मैं पांच साल पहले लिखा था। यह कहानी मेरे ही गांव के पृष्टभूमि पर लिखा हुआ था। उस समय मैं गांव छुट्टी में अकसर जाता था। 

              आज जब मैं उस पुरानी कहानी को पढ़ने लगा तो मुझे अब शहर से कहीं ज्यादा अच्छा मेरा गांव लग रहा था। एक बार फिर से मैं उस कहानी को पढ़ने लगा।

                  भारत में हजारों लाखों गांव हैं जितने गरीब भारतीयों के बच्चे। जिसमें से कुछ का नाम बड़ा ही असाधारण होता है। जो अपने पीछे गरीब कृषक के ही घिसे पीटे कपड़ों जैसे कुछ न कुछ कहानी छुपाए रहते हैं। कुछ का नाम तो बड़ा ही अटपटा सा सुनने में लगता है। वैसे ही अटपटे ढंग से जीवन बसर करते हैं, वहां के ग्रामीण लोग। गरीबी की हालत में भी उनका जीवन कितना सुखमय एवं शालीन होता है। न छल न कपट। केवल निस्वार्थ होता है उनके मन में। 

                         वैसे ही एक गांव सिकरिया में मैं आज जा रहा था। पहले मैं भी इसी गांव में रहता था। लेकिन शहर के चकाचौंध में पड़कर अब हम भी शहर में बस गए थे। 








                 मगर मेरा लगाओ बचपन से ग्रामीण परिवेश की ओर ज्यादा था। इसी लगाव के कारण मैं हर साल फसल के दिनों में गांव जाता था। गांव के निराले खेल कबड्डी, गुली डंडा, मछली मारना, मटर छिमियों की चोरी करके भागने में बड़ा मजा आता था। अभी भी जब वो दिन याद आते हैं तो मन बरबस बचपन में पहुंच जाने की कोशिश करने लगता है।

                    मैं पैदल ही बस स्टैंड से चलते चलते कब गांव आ गया मुझे पता ही नहीं चला। बस स्टैंड से मेरा गांव तीन किलोमीटर दूर था। 

            एक - दो दिन तो गांव के लोगों से मिलने जुलने में ही गुजर गया। कहां शहर में भाग दौड़ के कारण दिन-रात की चैन हराम हो जाती है, और यहां तो हमेशा चैन ही चैन था। 

                 किस तरह दो दिन गुजर गए इसका कुछ पता ही नहीं चला। मैं दिन भर बच्चों के साथ बच्चा बनकर आवारा लड़कों के तरह घूमा करता था।  

              आज बंसी से मछली मारने का प्रोग्राम बना था। मैं भी पांच बंसी बनाकर लड़कों के साथ मछली फंसाने निकल पड़ा। आज मुझे ऐसा लग रहा था मानो फ़िर से मेरी बचपना लौट आई थी।

                चलते चलते सभी बच्चे एक छोटी सी तालाब के पास रूक गए। मगर मेरा पास वाली बड़ी तालाब में जाने का मन कर रहा था, इसलिए मैंने सभी को वहां चलने को कहा। मगर कोई भी वहां जाने को तैयार नहीं हुआ। लाख पुछने पर जब एक लड़के ने बताया कि रास्ते वाले पीपल के पेड़ पर एक भूत रहता है तो मैं उन बच्चों की अंधविश्वास भरी भावना पर भरपूर हंसा। 

               अंततः मैं अकेले ही बड़े तालाब की ओर जाने का निश्चय कर लिया। 

           मगर रास्ते में मेरा मन भी भूत के डर से घबराने लगा। लड़कों के सामने तो मैं शहरिया शेखी झाड़ गया था, मगर अब मैं भी मन ही मन डर रहा था। 

            मगर मैं शहरिया भला पीछे कैसे हटता, अपनी आन, वान और शान बचाने के लिए चलता रहा चलता रहा।

               मगर जैसे - जैसे पीपल का पेड़ नजदीक आ रहा था, वैसे वैसे डर के मारे मेरे शरीर से पसीना निकलने लगा। आस पास भी कोई आदमी नजर नहीं आ रहा था। मैं इतना डरा हुआ था कि क्या बताऊं ! अगर मेरी जगह पर कोई दूसरा इस दास्तान को लिखता तो पूरा लिख देता। मगर भला मैं अपनी कमजोरी को कैसे लिखता। 

               शुक्र है भूत देवता का कि मैं हिम्मत करके सही सलामत पीपल के पेड़ को पार कर गया। मगर जैसे ही हमारी नजर बड़ी तालाब के किनारे गई, हमारी पतलून ढील्ली हो गई। वहां पर लंबी दाढ़ी वाला तथा जीर्ण शीर्ण लंबा लवादा पहने, एक बूढ़ा आदमी बैठा बीड़ी पी रहा था।

                 मैं भूत से तो पहले से ही डरा हुआ था। उसे देखते ही मेरे प्राण पखेडू उड़ गए। मैं डर के मारे भाग खड़ा हुआ।

               भागते समय भी मैंने बंसी को नहीं छोड़ा। एक दो बार मैं गिर भी गया। जिसके कारण मेरी बंसी भी टूट गई। मगर मैं बिना किसी की परवाह किए भूत के डर से गांव के लड़कों की ओर भागता जा रहा था। 

                  जब मैं छोटी तालाब के पास पहुंचा तो मुझे देखकर सभी लड़के जोर जोर से हंसने लगे। उन लोगों के हंसी को सुनकर मैं मन ही मन झेप गया। 

             मुझे उन लड़कों पर बहुत गुस्सा आ रहा था। वास्तव में वहां पर कोई भूत नहीं था। उन लड़कों ने मुझे बुद्धू बनाया था। 

                  वह बूढ़ा आदमी तो गांव का ही था। लड़कों से ही पता चला कि वह पिछले साल से ही इस गांव में आकर रह रहा है। गांव वालों को वह बहुत चाहता है। गांव वाले भी उसे बहुत प्यार देते हैं। वह दिन भर मछली मारता और शाम को अपनी छोटे से मकान में लौट आता था। 

                शर्मिंदगी से बचने के लिए एक बार फिर मैं बड़ी तालाब की ओर अकेले ही चल पड़ा। आज गांव के लड़कों ने मुझ जैसे शहरी को यह बता दिया था कि गांव के बच्चे भी कितने तेज दिमाग के होते हैं। मैं मन ही मन अपने आप को कोसते हुए चलता जा रहा था। 
 
                   रास्ते में मैंने इस बार देखा कि कुछ बच्चे गड्ढे में झोला बस्ता लेकर स्कूल जाने के डर से छुपे हुए थे। सभी को देखकर मैं बस मुस्कुराकर रह गया। 

                  तालाब के पास पहुंचकर जब मैं वहां देखा तो इस बार वह बूढ़ा आदमी वहां नहीं था।

             मैं बची हुईं अपनी तीन बंसी में मछली के लिए चारे डाल कर बंसी को पानी में डाल दिया। 

                 अभी भी मैं काफी नर्वस था। गांव के लड़कों ने मेरे जैसे नौजवान लेखक को आज मूर्ख बना दिया था। ईधर मछली भी हमें परेशान किए हुए थी। जब तक मैं एक बंसी को बाहर की ओर खींचता, तब तक दूसरे बंसी को मछली खींचने लगती। जब मैं दूसरे को खींचने की कोशिश करता, तो मछली तीसरी बंसी को खींचने लगती। मैं सिर्फ इधर से उधर हाथ मार रहा था। धीरे-धीरे मेरे सारे मछली के चारे भी खत्म हो गए।

              अंत में मैं यूं ही खाली हाथ निराश वापस अपने घर की ओर चल पड़ा। वैसे भी अब शाम हो चली थी। 

                 पुरी कहानी पढ़कर एक बार फिर में शहरी और ग्रामीण परिवेश के अन्तर के द्वंद में उलझ गया। अब तो मेरे गांव में बिजली भी आ गई थी और सड़क भी बन गई थी। बस स्टैंड से गांव अब पैदल नहीं जाना पड़ता था। जीप और टैंपो चलने लगे थे। वहां भी अब घर घर टेलीविजन और होम थिएटर की आवाज़ गूंजने लगी थी। फिर भी लोग अब भी शहर की ओर ही अपनी पुरखों की घर और जमीन बेचकर जा रहे थे। गांव का बोझ शहरों में अंधाधुन बढ़ता जा रहा था। जबकि शहर के पुराने लोग अब यहां से ऊब चुके थे। वे एक बार फिर से गांव में बसने को सोच रहे थे। 

           अब तो मेरा भी मन बार बार यही कह रहा था - अब लौट चलें .... गांव की ओर, जहां प्रकृति का सानिध्य प्राप्त होता है। लोग दिखावे के नहीं, दिल से आपके अपने होते हैं। 


                        कुमार सरोज 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अधूरी यात्रा /। Adhoori Yaatra । हिमांशु कुमार शंकर ।

उसकी मां / Usaki Maa । कहानी । कुमार सरोज ।

लव डे / Love Day । गजल । कुमार सरोज ।