सच्चा मित्र / Sachcha Mitra ।कहानी । हिमांशु कुमार शंकर ।

           
               सच्चा मित्र 



                      सूरज और रितेश बचपन के गहरे मित्र थे, जहाँ सूरज एक साधारण और भावुक इंसान था, वहीं रितेश की आँखों में बड़े सपने थे। रितेश शहर जाकर बड़ा कारोबार करना चाहता था, लेकिन उसके पास फूटी कौड़ी नहीं थी। अपने मित्र की बेबसी सूरज से देखी नहीं गई, उसने रितेश की कामयाबी के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाने का फैसला किया। सूरज ने न केवल रितेश का मानसिक रूप से हौसला बढ़ाया, बल्कि अपनी मेहनत की कमाई और पुश्तैनी जमीन बेचकर रितेश को शहर भेजा। सूरज गाँव में दिन-रात जी-तोड़ मेहनत करता रहा ताकि शहर में रितेश को किसी चीज़ की कमी न हो। सूरज के इसी त्याग और समर्पण की बदौलत रितेश का कारोबार चल निकला और वह शहर का एक नामी रईस बन गया।




                वर्षों बाद, जब रितेश अपनी चमचमाती गाड़ी से गाँव आया, तो सूरज की आँखों में खुशी के आँसू थे। वह दौड़कर अपने जिगरी यार को गले लगाने आगे बढ़ा, लेकिन रितेश ने उसे रुकने का इशारा किया। रितेश के महंगे कपड़ों पर सूरज के मैले हाथ न लग जाएं, शायद इसलिए वह पीछे हट गया। रितेश ने रूखेपन से कहा, "सूरज, अब मेरा दायरा और स्तर बदल चुका है, पुरानी बातें भूल जाओ।"
सूरज सन्न रह गया। जिस दोस्त के लिए उसने अपना तन, मन और धन न्योछावर कर दिया, वह आज उसे पहचानने से भी कतरा रहा था। रितेश अपनी गाड़ी में बैठकर धूल उड़ाता हुआ निकल गया और सूरज वहीं खड़ा रह गया, यह सोचते हुए कि उसने दोस्त तो जिता दिया, लेकिन दोस्ती हार गया। कहते हैं, "वक्त और हालात बदलने पर अक्सर लोग उन सीढ़ियों को भूल जाते हैं, जिनके सहारे वे ऊपर चढ़े थे।" 



          हिमांशु कुमार 'शंकर'
        मंझौल,बेगूसराय (बिहार)

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