एक थी मां / Ek Thi Maa । कहानी । कुमार सरोज ।

               एक थी मां

                         कुमार सरोज

             

               मैं अपने बेडरूम में लगे आदम कद शीशे के सामने खड़ी, अपने आप को निहार रही थी। मेरे चेहरे पर खुशी और गम के मिश्रित भाव आ -  जा रहे थे। पता नहीं क्यों, आज मेरा अतीत मुझे बार-बार याद आकर परेशान कर रहा था। कमरे के बाहर से शादी में बजने वाले शहनाई के धुन की मधिम आवाज आ रही थी। 

    एक बात बताऊं, शादी किसी और की नहीं बल्कि मेरी ही हो रही थी।







               घर में अभी मेरी ही विदाई की तैयारी चल रही थी। सभी उसी में व्यस्त थे। मैं भी अभी दुल्हन के वेश में ही शीशे  के सामने खड़ी थी।

               शादी से पहले लगभग सभी लड़कियां अपने ससुराल एवं पति के बारे में ढेर सारे ख्वाब एवं सपने संजोती  है। मगर मैं आजतक कभी कुछ नहीं सोची थी । अगर मैं कुछ ख्वाब संजोती भी तो कितना। वैसे भी मेरी जैसी बदनसीबी लड़की को ख़्वाब देखने का हक कहां होता है। फिर भी मैं जितना ख्वाब देखती उससे सैकड़ों नहीं, लाखों नहीं बल्कि हमें तो करोड़ों गुना ज्यादा अच्छा परिवार एवं पति मिलने जा रहा था।  मेरे होने वाले पति किसी फिल्मी हीरो से कम दिखने में नहीं थे। अच्छी सरकारी नौकरी भी थी। पिता के इकलौते बेटे थे। पूरा परिवार सुखी संपन्न था।

                ऐसा पति और परिवार पाने के बावजूद भी मैं आज अंदर से खुश नहीं थी,  जबकि मुझे खुशी से पागल होकर खूब नाचना चाहिए था। मगर मैं अभी अपनी पुरानी यादों के भंवर में ही उलझी बुझी बुझी खुद से ही बातें करने में लगी थी। 

                आप  को एक बात बताऊं, सुन आप भी चौंक जाएंगे। मैं जिस घर में अभी दुल्हन बनी शीशे के सामने खड़ी हूं, उस घर की मैं नौकरानी हूं - नौकरानी कश्मीरा।  मगर आज तक मेरे मालिक एवं मालकिन ने कभी मुझे घर की नौकरानी नहीं समझे थे। वे दोनों हमेशा मुझे अपनी बेटी मानते थे। 

             मैं आई थी तो इस घर में 14 साल पहले नौकरानी बनकर ही। लेकिन आज इस घर की बेटी बनकर  शादी के सुर्ख लाल जोड़े में विदा होने जा रही थी। 14 साल तक सीता माता वन में वनवासिनी बनकर रही थी, और मैं इस घर में 14 साल तक नौकरानी।  है न आपके लिए बड़ी विचित्र बात ?

              मगर अब मैं जो बात आपको बताने जा रही हूं, उसे सुनकर तो आपके पैर तले की जमीन खिसक जाएगी। आपको पता है मेरी अपनी मां जिसने मुझे जन्म और यह नाम दिया था, वह भी अभी जिंदा थी। 

                  मेरी बात सुनकर आपके होश उड़ गए ना ? जरा सोचिए, मैं कैसे - कैसे और किन - किन हालातों से गुजर रही होऊंगी ?

                 मैं आज आपको अपनी पुरी कहानी सुनाती हूं, शायद आपको बताने से मेरे दिल का भी बोझ कुछ कम हो जायेगा।  

                बात आज से 35 साल पहले की है। उस समय मेरे पिता यानी गणेश गिरी की उम्र 10 साल की थी। परिवार में मेरे दादाजी यानी दीनानाथ गिरी एवं मेरे पिता जी के अलावा कोई और नहीं था।   दादी जी 5 साल पहले ही मर गई थी। 

              मेरा परिवार उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के एक छोटे से शहर  सिकंदरपुर में रहता था। यह बलिया से करीब 30 - 35 किलोमीटर दूर है।  मेरे दादाजी को धर्म ग्रंथ एवं हस्त विज्ञान का अच्छा ज्ञान था। वे पूजा पाठ एवं लोगों का हाथ देखकर उनका भविष्य बताने का काम करते थे। सभी उनका बहुत सम्मान करते थे।

           मेरे दादाजी की प्रबल इच्छा थी कि मेरा बेटा यानी मेरे पिताजी भी पढ़ लिख कर धर्म ग्रंथों का अच्छा  ज्ञाता बने, एवं मुझसे भी बड़ा विद्वान बने । मगर मेरे दादाजी की सोच के एकदम सब उल्टा हो रहा था। मेरे पिताजी को संस्कृत कौन कहे, उन्हें तो पढ़ने लिखने में ही मन नहीं लगता था। दादा जी बहुत डांटे समझाते मगर कोई फायदा नहीं होता था।  मेरे पिताजी दिन भर अपने दोस्तों के साथ सिर्फ मटरगश्ती करने में लगे रहते थे। और अंत में वही हुआ जिसका मेरे दादाजी को अंदेशा था।  मेरे पिताजी मैट्रिक में फेल हो जाते हैं । 

       एक, दो बार नहीं बल्कि चार - चार बार दादाजी ने पिताजी को मैट्रिक का परीक्षा दिलवाया था, मगर सभी बार पिताजी फैल ही होते थे। मेरे दादाजी ने गुस्से में आकर यह सोच कर कि शायद शादी करने से वह संभल जाएगा, मेरे पिताजी की शादी करवा देते हैं।

        पूरे सिकंदरपुर में मेरे दादाजी की अच्छी खासी प्रसिद्धि थी।  जिसके कारण एक अच्छे परिवार में मैट्रिक फेल होने के बावजूद भी मेरे पिताजी की शादी हो जाती है। मेरी मां पुष्पा गिरी दुल्हन बनकर मेरे पिता जी के घर आ जाती है। वह देखने में बहुत सुंदर और पढ़ी लिखी थी।

             दादा जी ने जिस सोच के साथ मेरे पिता जी का विवाह कराया था, वह सफल नहीं हुआ। मेरे पिताजी ने पढ़ाई लिखाई तो छोड़ ही दिया था, वो अब भी कोई काम धंधा नहीं करते थे। सिर्फ दिन भर दोस्तों के साथ घूमा करते थे ।  

 शादी के एक साल बाद ही मेरा यानी की इस कश्मीरा गिरी का धरती पर अवतरण हुआ। और ठीक 2 साल बाद मेरे छोटे भाई अमर गिरी का। अब हम परिवार में पांच सदस्य हो गए थे। मगर कमाने वाला अभी भी सिर्फ मेरे दादा जी ही थे। नतीजा घर चलाने में अब बहुत कठिनाइयां होने लगी थी।

           पहले सिर्फ दादाजी ही मेरे पिताजी को उनके हरकतों पर डांटा करते थे, मगर अब मां भी बात बात पर पिताजी को ताना देने लगी थी। फलस्वरुप घर में अब आए दिन पति पत्नी, बाप - बेटा में पारिवारिक झगड़े शुरू हो गए थे। नतीजा यह निकला की कमाने वाले दादाजी भी अब चिंता में अस्वस्थ रहने लगे। 

          मुझे आज भी वो दिन याद थे,  क्योंकि तब तक मैं 5 साल की हो गई थी। पिताजी दादाजी से किसी बात को लेकर बहस कर रहे थे। पहली बार मेरी मां ने भी पिताजी के पक्ष में होकर दादा जी को कुछ बोली थी। मां का साथ पाकर पिताजी का जोश और बढ़ गया, और नतीजा यह हुआ कि मेरे दादाजी गुस्से में अपने खुद के बनाए घर को सदा के लिए छोड़ कर चले गए। मेरे पिताजी मना करना तो दूर उल्टे उन्हें तुरंत घर से जाने को कह दिया।

       सिकंदरपुर से कुछ ही दूरी पर एक शहर है मऊ ।  वहां मेरी बुआ रहती थी। वह दादाजी को हमेशा अपने पास बुलाती थी, वो अभी तक मना करते आ रहे थे। मगर उस दिन मेरे पिताजी के रवैये से ऊब कर वहीं रहने के लिए सदा के लिए चले गए थे। 

        मेरे दादाजी के घर छोड़कर जाने से सबसे ज्यादा खुशी शायद मेरी मां को हुई थी।  क्योंकि दादा जी के जाते ही मेरी मां का व्यवहार एवं चाल- चलन एकदम बदल गया था।  जहां पहले घर में भी वह घूंघट निकाले रहती थी, वहीं अब समीज - सलवार और जींस टीशर्ट पहने लगी थी।  पिताजी कभी मना करते तो उल्टे मां उन्हें ही उनकी औकात याद दिलाने लगती थी। पिताजी चाहकर भी कुछ बोल नहीं पाते थे। आखिर मेरे पिता जी अभी तक अपने पिता के कमाए धन पर ही तो जीते आ रहे थे। 

         अब हम दोनों भाई बहन स्कूल जाने के लायक तो हो गए थे, मगर पैसे की तंगी एवं मां - पिताजी के आपसी झगड़े के कारण स्कूल नहीं जा पा रहे थे। 

          पिताजी से जब मां के रोज का ताना और झगड़ा सहा नहीं गया तो उन्होंने घर के नजदीक वाले मंदिर के पास ही एक पूजा सामग्री एवं फूल माला की दुकान खोल लिऐ थे। दुकान के लिए पिताजी ने अपने कुछ जान पहचान वालों से ही पैसे उधार में लिए थे।

       दुकान खोलने के बाद  पिताजी अब अपने काम में जी ज्यादा व्यस्त रहने लगे थे।  चोरी के डर से रात में भी वो दुकान पर ही सो जाते थे। 

        इधर मां का रहन - सहन और चाल - ढाल बहुत तेजी से बदलते जा रहा था।  अब वह एक मोबाइल भी खरीद ली थी। पिताजी ने जब मोबाइल के बारे में पूछा था तो अपने मायके से मिला हुआ बता कर पिताजी को डांट कर चुप करा दी थी।          मां अब दिन भर खुद कमरे में सोई रहती और घर का सारा काम हम दोनों भाई बहन से ही करवाने लगी थी। स्कूल जाने की उम्र में हम दोनों भाई बहन अब हमेशा घर के कामों में उलझे रहने लगे थे। अब तो बात - बात पर मां हम दोनों को पीटने भी लगती थी।

           एक रात की बात है।  मैं और मेरा भाई अमर साथ ही सोए हुए थे। हम दोनों बचपन से ही साथ सोते आ रहे थे। अचानक आधी रात को मेरे भाई के पेट में दर्द होने लगा था। मुझसे जब उसका दर्द देखा नहीं गया, तो मैं मां के कमरे की ओर उन्हें बुलाने चल पड़ी थी, यह सोचकर कि शायद उनके पास कोई दवा होगी। 

         बहुत बार दरवाजा खटखटाने एवं चिल्लाने के बाद मां ने गुस्से में दरवाजा खोली थी। जब मैंने उन्हें अमर के पेट दर्द के बारे में बताया तो वह उल्टी मुझे ही गाली देने लगी थी । उसकी एक एक बात मुझे आज भी याद है, जो मां ने अपने बेटे के लिए कही थी - " तुम्हारा भाई पेट दर्द से मर नहीं जाएगा। दिन भर चोरी कर - कर के तो खाता ही रहता है। फिर पेट दर्द तो उसका करेगा ही न । "   

मैं चाह कर भी कुछ बोल नहीं पाई थी। आखिर कैसी मां थी वो ?

         मैं चुपचाप अपने नसीब को कोसती हुई अपने कमरे की ओर जाने के लिए अभी मुड़ी ही थी कि तभी मैंने मां के कमरे में एक अजनबी आदमी को देखा था। मैं ठीक से चेहरा नहीं देख पाई थी। मां भांप गई कि मैंने कमरे के अंदर के आदमी को देख लिया था। वह उस समय बोली कुछ नहीं सिर्फ तेजी से दरवाजा बंद कर ली। 

           भाई के दर्द के कारण मैं बहुत परेशान थी, इसीलिए उस ओर मैं उस रात ज्यादा ध्यान नहीं दी थी।

       अमर अभी भी कमरे में ज़मीन पर लेटा पेट पकड़े दर्द से कराह रहा था। पिताजी तो दुकान पर ही रात में सोते थे, इसीलिए मैं उनको भुला भी नहीं सकती थी।

      मैं अमर को पेट के बल लिटा कर उसके पीठ को सहलाने लगी। मेरे ऐसा करने से उसे राहत मिलने लगी,  और कुछ ही देर के बाद उसका पेट दर्द कम हो गया था।  

     अगले दिन सुबह जब पिता जी घर आए, तो वो पहली बार बहुत खुश दिखाई दे रहे थे। उन्होंने दुकान के लिए लिया हुआ कर्ज को चुकाने के लिए पुरा पैसा जमा कर लिया था। वे कल ही जाकर महाजन को पैसा देने की बात कर रहे थे। अब वो हम दोनों भाई बहन को भी स्कूल में नाम लिखवाने के लिए बोल रहे थे। पता नहीं क्यों उस समय मां पिताजी की बात को सुनकर भी अनसुना करते हुए कहीं और खोई हुई थी। वह थी तो पास में ही बैठी पर कुछ बोल नहीं रही थी।

           उसी दिन पहली बार पिताजी ने हम सभी को होटल में ले जाकर खाना खिलाया था। उस रात पिताजी हम दोनों भाई बहन के पास ही सो भी गए थे। हम तीनों ने उस रात बहुत सारे ख्वाब देखे थे।

         मगर शायद नियति को तो कुछ और ही मंजूर था। सुबह जब उठे तो एक मनहूस खबर को सुनकर हम सबों के पैर तले की जमीन खिसक गई थी। पिताजी के दुकान में रात में आग लग गई थी। सारा सामान जलकर राख हो गया था। महाजन को देने के लिए रखा हुआ पैसा, जिसे पिताजी अपनी मेहनत से एक - एक पाई जोड़ कर जमा किए थे, वह भी आग में जल गया था।  मां भी उस दिन बहुत रोई थी। मगर शायद वह उसका दिखावा ही था। 

         पिताजी फिर से टूट गए थे । हम सबों का देखा हुआ सारा सपना एक ही बार में बिखर गया था।

       दुकान जलने के कुछ ही दिन के बाद मां ने मुझे अपने दूर के एक रिश्तेदार के कहने पर बलिया एक साहब के यहां घर का काम करने एवं उनके 4 साल के बच्चे की देखभाल करने के लिए भेज दी थी। पिताजी ने मां को बहुत समझाया कि अभी वह 10 साल की बच्ची है, भला कैसे किसी के यहां नौकरानी का काम कर पाएगी। मगर मां एक न सुनी और मैं कश्मीरा बलिया अपने मालिक साकेत भारद्वाज के यहां नौकरानी बन कर आ गई। 

        मेरा भाई मुझसे दूर नहीं होना चाहता था। वह भी मेरे साथ ही बलिया आने की जिद पर अड़ गया था। मगर मां उसे कमरे में बंद कर दी थी, तब जाकर वह माना था। 

        मैं भी यह सोच कर कि मेरे कमाए पैसे से शायद पिताजी द्वारा लिया हुआ दुकान का कर्जा जमा हो जाएगा, बलिया आ गई थी। 

           मेरे मालिक साकेत सर एवं मालकिन मेघना मैडम का बलिया में खुद का घर था। साहब एक ऑफिस में बड़े पद पर कार्यरत थे। मैडम भी एक प्राइवेट कंपनी में अच्छे पद पर नौकरी करती थी। दोनों का एक 4 साल का बेटा था - गौरव भारद्वाज। जिसे प्यार से सभी गोलू कहते थे।  पहले साहब की अपनी बहन साथ में रहती थी। वही बच्चे की देखभाल भी करती थी। मगर उसकी इसी साल शादी हो गई और वह यहां से चली गई थी। जिसके कारण ही इस घर में अब मुझे लाया गया था।

   पहले ही दिन से साकेत सर के यहां इतना प्यार मिला कि मुझे अपने घर से भी अच्छा यह घर लगने लगा। मैं सर और मैडम के कहने पर ही उन्हें अंकल और आंटी कहने लगी थी। गोलू भी मुझे दीदी कहने लगा था। वह तुरंत मुझसे घुल मिल गया था। वह हमेशा मेरे पास ही रहता था। मेरे आते ही गोलू का पास के ही एक नर्सरी स्कूल में एडमिशन करा दिया गया था।  गोलू को स्कूल छोड़ने और लाने में ही जाती थी। वह जब मुझे प्यार से अपनी आवाज में कश्मीरा दीदी कहता था, तो सुनकर मुझे बहुत अच्छा लगता था। मगर गोलू को देख बार - बार मुझे मेरे अपने भाई अमर की भी याद आते रहती थी। पता नहीं अब वह घर में अकेले कैसे रहता होगा ?

        साकेत अंकल गोलू को घर पर पढ़ाने के लिए एक टीचर को रख लिए थे। आंटी के कहने पर वह टीचर मुझे भी पढ़ाने लगा था। मैं भी मन लगाकर पढ़ने लगी थी। 

 समय बीतता रहा। कैसे 2 साल बीत गए कुछ पता ही नहीं चला। अब तो मुझे कभी एहसास भी नहीं होता था, कि मैं इस घर की नौकरानी हूं। मैं भी घर के एक सदस्य की तरह रह रही थी।

             मैं सिर्फ रक्षाबंधन के दिन ही प्रत्येक वर्ष अपने घर जाती थी, और भाई को राखी बांध कर वापस आ जाती थी।  मैं हर वर्ष गोलू को भी राखी बांधी थी। 

         देखते-देखते अंकल के यहां 6 साल गुजर गया। अब गोलू 10 साल का हो गया था। इसी साल अंकल एक सरकारी स्कूल से मुझे मैट्रिक का परीक्षा दिलवा दिए थे, और मैं अच्छे अंक से पास भी कर गई थी।

           सिकंदरपुर में अब मेरा भाई भी पड़ने लगा था। इतने साल में अंकल के द्वारा दिए हुए पैसे से पिताजी ने अपना कर्जा चुका दिया था। अब वो एक ठेला पर फल बेचने लगे थे। मां अभी भी पहले जैसे ही अपनी ही दुनिया में मग्न रहती थी। उसे किसी का कोई परवाह नहीं था। इसी बीच मेरे दादाजी इस दुनिया से चल बसे थे। 

         सब कुछ अब ठीक से चल रहा था। मगर अचानक एक दिन मुझे एक ऐसी मनहूस खबर मिली कि सुन मेरे प्राण पखेरू उड़ गए। मेरे मासूम भाई अमर को किसी ने मार कर सड़क किनारे फेंक दिया था। सुबह में सड़क किनारे उसकी लाश मिली थी। 

         मैं खबर सुन मरणासन्न हो गई थी। मगर मेरे मुंह बोले भाई गोलू एवं अंकल आंटी के प्यार के कारण मैं अपने आपको किसी प्रकार संभाल पाई थी। 

               अमर के मरने के बाद अब मेरा अपने घर जाना भी बंद हो गया था। पिताजी जब कभी बलिया आते तो मुझसे मिल लेते थे। कभी कभार फोन करके भी बात कर लेते थे।  पर अपनी मां के लिए तो मैं कब की पराई हो गई थी।

          धीरे-धीरे सब कुछ पहले जैसा होते जा रहा था। इसी बीच में इंटर भी पास कर गई थी। भले मैं स्कूल या कॉलेज कभी गई नहीं थी, मगर घर पर ही पढ़ - पढ़ कर मैं सभी परीक्षा अच्छे नंबर से पास करते जा रही थी। अंकल ने अब मेरा स्नातक में भी एडमिशन करा दिया था। मैं अपने आप को बहुत खुशनसीब समझती थी कि मुझे अपने मां बाप से भी ज्यादा चाहने वाले पराये मां बाप मिले थे।

          मैं कभी कभी अपने नसीब पर बहुत खुश होती थी। मगर मेरी खुशी को तो किसी की नजर लगी हुईं थी। तभी तो एक दिन सुबह एक और  दिल को दहला देने वाली खबर मुझे मिली। पिताजी को भी किसी ने रात में घर के अंदर ही सोये अवस्था में खून कर दिया था। 

                सुनते ही एक बार फिर मेरे ऊपर तो पहाड़ टूट कर गिर पड़ा। पता नहीं क्यों कोई मेरे अपने को धीरे - धीरे सदा के लिए मुझसे दूर करते जा रहा था। पहले भाई और अब पिताजी को भी किसी ने जान से मार दिया था। आखिर मेरे भाई या पिताजी ने किसी का क्या बिगाड़ा था ?  कौन था जो ये हत्याएं कर रहा था ? आख़िर कोई क्यों पहले भाई को तो अब पिताजी को भी मार दिया था ? 

                  कहते हैं न कि पाप का घड़ा एक न एक दिन तो भरता ही है, और जब भरता है तो वह किसी न किसी दिन फूटता भी है। ऐसा ही कुछ हुआ इस बार। 

          पिताजी के खून करने वाले गुनाहगार के गुनाह की काली करतूत का काला चिट्ठा इस बार पुलिस ने खोल दिया था। खून किसी और ने नहीं बल्कि मेरी अपनी मां ने ही अपनी अय्याशी को छिपाने के लिए अपने प्रेमी के साथ मिलकर की थी। इतना ही नहीं जिस रात मैंने मां के कमरे में एक अनजान आदमी को देखा था, अपनी उसी पोल को खुलने के डर से मां चाल चल कर मुझे घर से दूर नौकरानी बनाकर बलिया भिजवाई थी, ताकि मैं किसी को कुछ बता न सकूं। मां ने ही दुकान में आग लगवाकर मुझे घर से दूर करने की चाल चली थी। यही नहीं मेरी उस अपनी मां ने ही अपनी हवस की आग को जलाए रखने के लिए अपने ही हाथों से अपने बेटे को भी गला दबाकर हत्या को थी। जन्म देने वाली मां की हकीकत का पता सबको चल गया था।

     वह तो ऊपर वाले का शुक्र था कि मुझे अपनी मां ने सिर्फ घर से दूर ही भिजवाई थी। नहीं तो शायद मेरी भी अपने भाई या पिताजी के जैसे ही कहीं लाश मिलती। 

       मेरी जन्म देने वाली मां एवं उसके प्रेमी को कोट से आजीवन कैद की सजा मिली थी।  सुन मेरे सीने में अपनी मां के प्रति धधकती आग को कुछ ठंडक प्राप्त हुई थी।

               मैं किसी प्रकार एक बार फ़िर से अपने मुंह बोले भाई गोलू एवं पराये माता पिता के प्यार के कारण बीती सभी बातों को भुलाकर पहले जैसे ही होने की कोशिश करने लगी थी। 

              अब मैंने स्नातक पास कर लिया था।  गोलू भी बारहवी पास कर गया था। अब वह आगे की पढ़ाई करने के लिए दिल्ली जाने वाला था। इसी बीच मेघना आंटी ने अपनी नौकरी छोड़ दी थी।

             साकेत अंकल के ऑफिस में काम करने वाला एक लड़का पंकज हमेशा किसी न किसी काम से मेरे घर आया करता था। वह देखने में बहुत सुंदर था।  मैं भी अब 24 साल की खूबसरत और बला की सुन्दर लड़की दिखने लगी थी। 

         अचानक एक दिन मैं अंकल और आंटी के साथ बैठी बातें कर रही थी कि आंटी ने मेरे सामने पंकज के साथ शादी की बात रख दी।  मुझ जैसी अभागन एवं बदनसीब भला अपने भगवान समान अंकल और आंटी के बातों को कैसे टालती, और वह भी पंकज जी जैसे खूबसूरत लड़के के साथ शादी की बात को। मैं भी हां कर दी थी।

           अंकल जी ने पंकज जी को मेरी सारी सच्चाई बता दिया था।  सुनकर पंकज जी या उनके परिवार वालों ने भी कोई आपत्ति नहीं जताई थी। और आज हमारी यानी की आपके कश्मीरा की शादी पंकज जी से ही हो रही थी। 

     मैं अभी अपने बेडरूम में शीशे के सामने खड़ी अपनी जिंदगी के उतार-चढ़ाव रूपी भंबर में गोते लगा ही रही थी कि अचानक पीछे से किसी के स्पर्श ने मेरी तंद्रा भंग कर दी। मैं जब ख्यालों की दुनिया से हकीकत में आई तो देखी कि सामने मेरा मुंह बोला भाई गोलू और मुंह बोली मां मेघना खड़ी थी।  दोनों के आंखों में मेरे इस घर को छोड़कर अब नए घर में जाने का टीस आंसू के रूप में साफ झलक रहे थे। मैं दोनों से लिपट कर जोर जोर से रोने लगी।

                जिन्दगी में पहली बार आज मुझे अपनी मां से न ही सही, मगर एक पराई मां से ही ममतामई ममत्व के कोमल स्पर्श से अथाह सुख की अनुभूति हो रही थी। 

             एक वो थी मां, मेरी अपनी मां, जो अपने ही बेटे और पति के खून के इल्जाम में जेल में आजीवन सजा काट रही थी। और एक ये थी मां, पराई मां, जो अपनी मां न होकर भी अपनी मां से कहीं ज्यादा ममत्व की छांव दे रही थी। 

 काश ….. इस पराई मां की जैसी ही भगवान सबको अपनी मां दे।          

                           कुमार  सरोज


टिप्पणियाँ

  1. सुरेन्द्र सिंह भोजनवंबर 15, 2021 4:53 pm

    लाजवाब कहानी लिखी आपने बधाई।

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  2. सुरेंद्र सिंह भोज जी आपके बहुमूल्य टिप्पणी के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

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  3. आपकी कहानी बहुत अच्छी है,दिल को छू गई।

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  4. बहुत सुंदर कहानी

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  5. उत्तर
    1. बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार

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