मैं भी हूं / Main Bhi Hoon । कहानी । कुमार सरोज ।
गली के मोड पर लगा स्ट्रीट लाइट जल रहा था। खड़ा था एक लड़का नीचे। कपड़ा तन पर - सिर्फ एक फटा पैंट। पेट पीठ में था धंसा। हाथ पेट पर था बंधा। बेचारा ! शांत ! एक दम मौन। खड़ा था। उस काली निशा सी ही।
वह बार बार पोल पर जल रहे बल्ब की ओर देखता। देखकर शायद कुछ देर के लिए वह ठंड से छुटकारा पा जाता। आखिर करता क्या बेचारा ! अकेला जो था वह इस दुनिया में ! इतनी बड़ी दुनिया और वह अभागा मगर अकेला ! अच्छी बात है न.... ? इस बात की चिंता है किसे ? बहुत से लोग हैं उसके जैसे। फ़िर हम आप फिक्रमंद क्यों ? मगर सोचना चाहिए !
लो, वह वैसे ही जमीन पर बैठ गया। शायद पैर ठंड के कारण जवाब दे दिया था। बड़ा ही निष्ठुर होता है ठंड। आदमी यह बहुत पहचानता है।
अरे.... यह क्या ! वह तो वैसे ही सो गया। शायद उस गरीब से हार गया निष्ठुर ठंड ! क्या...... यह नई बात है आपके लिए। अरे भाई, ऐसा तो रोज़ होता है ऐसे जगहों पर। जहां रहता है गरीब, बसता है भूखे इंसान।
इस 8 साल के इस बच्चे का कोई नाम नहीं है। जिसके मन में जो आता है उसी नाम से पुकार लेता है। सोनूआ .... छोटूआ ...... अबे साला ..... फलतूआ .... धरती का बोझ .... अभागा ..... और भी बहुत से नाम थे उसके। आज हम भी एक नाम रख देते हैं उसका - राजा .... । राजा इसलिए क्योंकि वह बहुत स्वाभिमानी है। वह भूखे - नंगे रह लेता था मगर कभी किसी से कोई चीज मांगता नहीं था। किसी के आगे हाथ फैलाना उसकी आदत नहीं थी। क्योंकि उसे पता था मांगने पर लोग उसे कुछ देंगे नहीं, देंगे तो सिर्फ़ गाली या जोरदार थप्पड़।
तो राजा अभी ठंड को हराकर सो गया। ठंड की रात को ही नहीं बल्कि भूख को भी। क्योंकि वह आज दिन भर कुछ खाया नहीं था। सड़क किनारे फेंका हुआ खाना आज मिला नहीं तो वह भूखा रह गया। कचड़े के ढेर पर फेंका हुआ हमारे घर का फालतू और बासी खाना ही तो उसका स्वादिष्ट खाना था। कभी कभार शादी के मंडप के बाहर उसे फेंके हुए ताजे खाना मिल जाता था। उस दिन वह अपने आप को दुनिया का सबसे खुशकिस्मत इंसान समझता था।
राजा कौन था ? कहां से आया था ? किसी को क्या, उसे भी नहीं पता था ! कितनी विचित्र बात है न, हम - आप के लिए। मगर ऐसे बहुत सारे बच्चे हैं इस देश के अन्दर। वो किस मां के कोख से कब जन्म लेता है और कब कहां मर जाता है किसी को भी पता नहीं चलता है।
सुबह हुई। हमारी .. आपकी .. पुरे शहर की। और राजा की भी। ओस की बूंदों से उसका शरीर भींग गया था। समझिए यही उसका ठंड वाला गंगा स्नान था। नहीं तो हम लोग जैसा नहाना उसका नसीब कहां ? कभी कभी नगर निगम के पानी का पाइप कहीं टूटा हुआ मिल गया तो उस दिन वह उस टूटे हुए पाइप के फुहारे में जी भर कर नहाता था, वैसे जैसे कोई दुल्हा अपनी दुल्हिनियां को लाने जाने से पहले नहाता है।
वह कल से ही भूखा था। भूख जोरों की लगी थी। सो कर वह भूख को कुछ कम तो कर लिया था, मगर जागते ही फिर भूख बढ़ गई थी। वह खाने के तलाश में वहां से बाजार की ओर चल पड़ा।
सुबह सुबह सड़क किनारे बहुत सारे नाश्ते की दुकान ठेला पर सजी थी। कोई पूड़ी जलेबी बेच रहा था तो कोई लिट्टी चोखा। कोई पाव भाजी बेच रहा था तो कोई छोला भटूरा। आजकल के कामकाजी लोग नाश्ता बाहर ही ज्यादा करते थे। तभी तो इतनी दुकानें सजी हुई थी।
राजा भी ललचाई नज़रों से नाश्ता बेचने वालों एवं खाने वालों की ओर देखता हुआ धीरे धीरे चलता जा रहा था। शायद कोई उसकी हालत पर तरस खाकर कुछ खाने को दे दे। मगर उसकी फिक्र किसे थी ! सभी आज के भागम भाग जिन्दगी से खुद परेशान बहुत जल्दबाजी में थे।
राजा को न ही कोई खाने को कुछ देता है और न ही कहीं फेंका हुआ उसे खाना ही मिलता है। वह उदास अपनी भूख को किसी तरह शांत करने की भरपूर कोशिश करता हुआ एक पूड़ी जलेबी वाले ठेका के पास खड़ा हो जाता है।
सामने खाना दिख रहा हो जोरों की भूख भी लगी हो, मगर खाने को नहीं मिले तो पेट में भूख रूपी चूहे और कोहराम मचाने लगते हैं। जरा सोचिए राजा की दशा अभी क्या होगी ?
राजा वैसे ही बहुत देर तक खड़ा रहता है इंतजार में एक निवाले का, इन्तजार में एक दयालू इंसान का। मगर पेट की भूख नहीं मिटती है।
बहुत ही अजीबोगरीब स्थिति अभी थी राजा की। वह किसी से अपनी भूख मिटाने के लिए खाना भी नहीं मांग सकता था। खाना तो उसे कोई देता नहीं मगर उल्टे उसे हजारों गालियां और सुबह सुबह 4 - 5 थप्पड़ लग जाता सो अलग। यही सोचकर वह शांत बस वहां पर खा रहे लोगों का मुंह निहार रहा था।
जिस ठेला पर पूड़ी जलेबी बिक रहा था, वहां इतनी भीड़ थी कि ठेला वाला सभी को नाश्ता का प्लेट देने में ही बहुत व्यस्त था। जल्दबाजी में उससे एक पूड़ी नीचे ज़मीन पर गिर जाती है। व्यस्तता के कारण ठेले वाला नीचे गिरे पूड़ी की ओर ध्यान भी नहीं देता है।
तभी एक किनारे खड़े राजा की नज़र जमीन पर गिरे पूड़ी पर पड़ जाती है। हम आप सोच सकते हैं उसकी हालत उस गिरी हुई एक पूड़ी को देखकर कैसी हुई होगी ! उसके आंखों की चमक देखकर ही ऐसा लग रहा था जैसे उसे कोई बहुत बड़ा खज़ाना हाथ लग गया था।
राजा अपनी ओठों पर जीभ फेरते हुए। ललचाई नज़रों से इधर उधर देखते हुए। धीरे से ठेला के पास जाकर पूड़ी उठा लेता है।
वह अभी पूड़ी उठाता ही है कि ठेला से कुछ दूरी पर बैठे एक लड़का जो नाश्ता का जूठा प्लेट साफ कर रहा था उसकी नज़र राजा पर पड़ जाती है। फिर क्या था। देखते ही वह वही से जोर जोर से चोर ..... चोर ..... चोर चिल्लाने लगता है।
ठेला वाला आव देखता है न ताव आवाज सुनते ही झट राजा को पकड़कर भद्दी भद्दी गालियां देते हुए अपने हाथ में लिए बेलन से राजा को दनादन मारने लगता है। देखते ही देखते आस पास खड़े लगभग सभी लोग भी बिना कुछ सोचे समझे अपनी मन की भड़ास और गुस्सा उसी पर निकालने लगते हैं। किसी को बीबी से हुए झगड़ा का गुस्सा था तो किसी को बॉस के डांट का गुस्सा। किसी को नौकरी नहीं मिलने का गुस्सा था तो किसी को प्रेमिका से बात नहीं होने का गुस्सा। किसी को व्यापार में नुकसान का गुस्सा था तो किसी को पड़ोसी का गुस्सा। सभी के गुस्से का कोपभाजन बेचारा राजा बन जाता है।
तभी भीड़ के पीछे से किसी की जोरदार आवाज गूंजती है -
" मारो स्साला डाकू को । यही कल महा डाकू बनेगा। स्साला डाकू को मारो। जिंदा नहीं रहने देना। डाकू कहीं का । "
क्या सच में राजा डाकू था ? महा डाकू ..... ?
आज देश का अरबों - खरबों रुपया घोटाला करके भी कुछ लोग शान से इज्जत की जिंदगी जी रहे थे और एक राजा, सिर्फ एक पूड़ी के लिए बेवजह मार खा रहा था।
वाह रे महान देश के महान बुद्धिजीवी लोग ! पैसे वाले ताकतवर लोगों को तो एक शब्द भी बोलते नहीं हो। मगर इस गरीब अनाथ मासूम बच्चा को कितनी शान से मार रहे हो। वह भी इसी मुल्क का नागरिक था। फिर उसके साथ ऐसा व्यवहार क्यों ? क्या यह देश उसका नहीं है ?
यह किसी एक राजा की कहानी नहीं है। आज देश के हरेक चौक चौराहे पर ऐसे कितने ही राजा रोज मार खाते मिल जायेंगे ।
कुमार सरोज
लाजवाब कहानी
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद आपका
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