पगली आंटी/ Pagali Aunty । कहानी । अंजू ओझा ।

          पगली आंटी

                           अंजू ओझा 



            " पगली आंटी .... पगली आंटी .... ओ पगली आंटी  कहकर बच्चे मजाक बनाते रहते। बिचारी अपने कमजोर कंधे पर एक झोला लटकाए रहती वो भी मटमैला सा। उसपर काले रंग के गंदगी की परत चढ़ी थी और दूसरे बाजू में एक गठरी पकड़े रहती । दिनभर इधर उधर भटकने के बाद पार्क के पास बने फुटपाथ पर बैठ जाया करती और लोगों द्वारा दिए गए बासी खाना को बड़े चाव से खाती । वहीं पार्क में शाम को कॉलोनी के बच्चेे जब खेलने आते तो उस समय उसे देख पगली आंटी कहकर चिढ़ाते हुए पार्क में घुस जातेे। फिर भी बिचारी खामोशी से चुपचाप खाती और वहीं फटी चादर बिछा कर सो जाती । 

            शारदा बहुत दिनों से पार्क में संध्या भ्रमण को आती थी। रोजाना उसे देखती कि वो मासुम महज पैंतीस साल की होगी। गेंहुवा रंग, कद काठी पांच फुट चार इंज का होगा , बाल घुंघराले से , नाक नक्श तीखे , कुल मिलाकर भारतीय अक्श थी इसमें। लेकिन अपने घर परिवार से वंचित हो इधर उधर भटकती फिर रही थी। ना जाने इसके जीवन में क्या बवंडर मचा होगा कि मानसिक संतुलन खो बैठी और सड़क में पड़ी रहती थी। वो भी एक औरत , जिसकी दिमागी हालत ठीक नहीं है उसको तो कोई भी नोंच खसोट लेगा ।








            पार्क का गार्ड गेट से रोजाना भगाने का प्रयत्न करता लेकिन वो गेट से सटे फुटपाथ पर पड़ी रहती । ऐसे ही तीन - चार महीने बीत गए। अब शारदा को भी उसकी आदत हो गई थी। आते - जाते उसको देखकर मुस्कान फेंकती ताकि वो बेतकल्लुफ हो सके । इस तरह उसकी नजर भी शारदा को देखकर तनिक चमक का एहसास दिलाती उसे ।

                 छः महीने बाद उसका पेट ऊँचा लग रहा है मानों वो पेट से हो । शारदा उसको सरकारी अस्पताल लेकर जाती है।  वाकई उसके गर्भ में चार महीने का बच्चा था । उसकी मनोदशा पर कुठाराघात किसी नीच ने अपने बीज डालकर उसे गर्भवती बना दिया था । 

              हे भगवान ! पुरुष को कोई भी चाहिए, चाहे वो मानसिक संतुलन ही क्यों ना खो बैठी हो । अब तो पता लगाना होगा कि किसने उसके साथ ऐसा कुकर्म किया है । अब गर्भपात कराना नामुमकिन था क्योंकि पांचवे मास प्रारंभ हो चुका है ।

              रोज उसके पास जाती थी शारदा, जिससे वो आत्मीयता पा खुलने लगी और अपने पास ही बेंच पर बिठाती और उससे बात करने की कोशिश करती ताकि उसे जान सके।

                धीरे धीरे वो शारदा को देखकर मुस्कुराती और अपना नाम भी बताया  - अलका। 

              Bकुछ दिन में वो काफी खुल गई और शारदा को दीदी कहती लगी थी । वह इंटर पास थी और किसी लड़के के साथ भाग गई थी। प्रेमी ने उसे अनजान शहर में अकेला छोड़कर नौ दो ग्यारह हो गया था। अब घर भी किस मुँह से जाती वो। गम और बेबसी में उसकी दिमागी हालत खराब हो गई। वह ऐसे ही सड़क पर या मंदिर में पड़ी रहती थी । इधर कुछ महीनों से घूमते हुए पार्क के पास ठिकाना बना ली थी ।

                  " अच्छा तो ये बताओ ! तुम्हारे पेट में किसका बच्चा है ? " 

        " वो ह वो ह अ ह अ ह ... । " 
कहते कहते हकलाने लगी।


     " हाँ हाँ बताओ अलका।  " 

        उसने अपनी अंगुली से गार्ड की ओर इंगित किया। जैसे ही शारदा की नजर उस पर पड़ी वह सकपका गया। उसका आज पोल खुल गया था। 

            " साला कमीना ! एक बिचारी जिसकी दिमागी हालत असह्य है उसको भी नहीं छोड़ा ? " 

               शारदा तुरंत अपने पति जो एक पुलिस अफसर हैं , उनको बुलाकर गार्ड को अरेस्ट करवा देती है। वह अलका को नारी निकेतन भिजवाया देती है। 

          कुछ महीनों के बाद ही अलका एक बेटा को जन्म देती है। अब वह अपने बच्चे को सीने से लगाए रहती है।

             शारदा उससे हमेशा मिलने जाती रहती थी। अब वह काफी हद तक स्वस्थ और बेहतर हो गई थी। अब उसे कोई पगली आंटी भी नहीं कहता था। 

            

                             अंजू ओझा 

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