फुलवा/ Fulava । कहानी । कुमार सरोज ।

                फुलवा
                 
                          कुमार सरोज
                   
                   

            फुलवा एक गरीब, दुखियारी, अभागन, विधवा स्त्री थी। जो शहर के चौक - चौराहों पर भीख मांग कर अपना एवम अपने चार साल के बेटे सोनू की किसी तरह जीवन बसर करती थी।
           यह कहानी या यूं कहें कि फुलवा के साथ घटित यह सच्ची घटना मेरे आंखों के सामने ही आज से करीब एक माह पहले हुई थी। तब से लेकर आज तक जब कभी मैं एकांत में आंखे बंद करता हूं तो मेरे आंखों के सामने उस असहाय, दुखियारी, गरीब मां का बिलखता हुआ चेहरा नाचने लगता है। जो अपने बेटे की जान बचाने के लिए आस पास मूक दर्शक तमाशाबीन बने खड़े लोगों से मदद की भीख मांग रही थी, और कोई मदद को आगे नहीं आ रहा था, और अंत में बेटे के वियोग में ही बिलखती, तड़पती, सदा के लिए निर्जीव होता उसका शरीर ही बार - बार घूमते रहता था। मुझे हमेशा ऐसा लगता था जैसे फूलवा की मृत आत्मा बार - बार मुझसे यही कह रही है कि तुम मुझे इंसाफ मत दिलाओ, क्योंकि मेरे जैसी गरीब स्त्री की आज किसी को प्रवाह नहीं है, मगर उन सभी को जो मेरे और मेरे बेटे के मौत का तमाशा देख रहे थे, उन्हें अपनी गलती का जरुर अहसास कराओ। उन्हें यह अहसास होना ही चाहिए कि वे लोग ही मेरे और मेरे बेटे के मौत के कारण थे।              
 
                आज भी जब मैं उस दिन की सारी घटनाओं को लिखने बैठा हूं तो मुझे ऐसा लग रहा है कि फूलवा की रूह मेरे आस पास ही खड़ी मुझे ही टकटकी लगाए देख रही है। 
                मैं आज भी फुलवा की हृदय वेदना और तड़प को सिर्फ महसूस करके ही सिहर उठ रहा हूं।
 काश ! भगवान कभी किसी मां को ऐसी पीड़ा न देता तो कितना अच्छा होता।
                  मुझे आज भी एक माह पहले का वो दिन अच्छी तरह से याद है। 







             स्थान - बिहार की राजधानी पटना का डाक बंगला चौराहा। समय - संध्या 4 बजे, 14 अक्टूबर 2022. 
                डाक बंगला चौराहा पटना के सबसे व्यस्त चौराहों में से एक चौराहा था। अभी शाम के 4 बज रहे थे। ज्यादा भीड़ होने के कारण सड़क पर इस समय गाड़ियां धीरे - धीरे रेंग रही थी। चौराहे पर सभी तरफ जाम लगा हुआ था। 
              मैं भी अपनी बाइक से जैसे ही डाकबंगला चौराहे पर पहुंचा कि तभी सामने का सिग्नल रेड हो गया। मैं तुरंत रुक गया। कुछ लोग शायद बहुत जल्दी में थे, तभी तो वो सिग्नल रेड होने के बावजूद भी अपनी गाड़ी बढ़ाते चले जा रहे थे।
                    चौराहे के एक किनारे दो तीन पुलिस वाले खड़े आपस में गप्पे लगा रहे थे। मगर किसी ने गाड़ी वालों को जो रेड सिग्नल तोड़ कर जा रहे थे, उसे रोकने या टोकने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहे थे।
                     मैं अभी चौराहे पर आकर रुका ही था कि तभी मेरे बगल में एक कार भी आकर रूक जाती है। कार के खडा होते ही एक लड़का हाथ में खिलौना लिए पास आ जाता है। वह कार वाले के आगे खिलौना लेने के लिए गिड़गिड़ाने लगता है। मगर कार वाला साफ मना कर देता है। जबकि कार की पिछली सीट पर बैठा बच्चा खिलौना की ओर ललचाई नजरों से ही देख रहा था।
                  उस समय चौराहे पर सामान बेचने वाले और भी बहुत से लड़के एवं बुजुर्ग महिलाएं नजर आ रही थी। चौराहे पर कुछ बच्चे एवम महिलाएं भीख भी मांग रहे थे। भीख तो बहुत कम लोग ही दे रहे थे, मगर उसे मुफ्त का प्रवचन जरुर सुना दे रहे थे। प्रवचन ! यही तो आज सबसे सस्ता मिलता है हिंदुस्तान में ! तभी तो जिसे देखो वह मुफ्त की सलाह एवं प्रवचन रूपी ज्ञान देते रहते हैं।
 
           मेरे ठीक सामने चौराहे के दूसरी तरफ 30 - 32 साल की एक महिला गोद में अपने 4 साल के बच्चे को लिए एक महंगी स्पोर्ट्स बाइक वाले युवक के पास खड़ी उसी से भीख मांग रही थी। वह महिला जीर्ण शीर्ण फटी साड़ी पहने हुए थी। गोद में जो बच्चा था उसका भी शर्ट फटा हुआ था। नीचे तो वह बच्चा कुछ पहने हुए भी नहीं था। दोनों के चेहरे देखने से ही यह साफ पता चल रहा था कि दोनों बहुत भूखे थे।
                        महंगी बाइक पर बैठा रईसजादा भीख में 5 रूपया भी तो देता नहीं है, मगर 5 हजार का प्रवचन उस भिखारिन महिला को मुफ्त में अभी तक वह सुना ही रहा था। वैसे भी जिसके पेट में खुद्दी रहती है तो उसकी बुद्धि तो निकलता ही है।
                  तभी हमारे बाएं तरफ का सिग्नल ग्रीन हो जाता है। उस तरफ खड़े वाहन वाले अपने गंतव्य को जल्दी पहुंचने के चक्कर में गाड़ी को स्टार्ट करते ही फुल स्पीड में आगे बढ़ाने लगते हैं।
              उधर उस भिखारिन महिला को महंगी बाइक वाला रईसजादा अभी तक प्रवचन सुना ही रहा था, कि तभी जिधर का सिग्नल ग्रीन हुआ था, उधर से एक बाइक वाला गाड़ियों को ओवरटक करता हुआ तेजी से दूसरी तरफ आगे निकलने की होड़ में उस महिला से एकदम सटकर जैसे ही आगे निकलने लगता है कि बाइक के हैंडल से उसके उसी हाथ में ठोकर लग जाती है जिस हाथ से वह बच्चा पकड़े हुए थी। महिला के हाथ से बच्चा छूट कर सड़क पर गिर जाता है। बाइक वाला बिना बच्चे की परवाह किए सरपट भागता चला जाता है। वह तो शुक्र था उपर वाले का कि बच्चे के ऊपर एक गाड़ी चढ़ते चढ़ते रह गई थी। 
               बच्चे की मां को तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि यह आखिर हो क्या गया था। वह अपने जिगर के टुकड़े को सड़क पर गिरा लहूलुहान देख तड़प उठती है। वह मदद की आस लगाए चौराहे पर खड़े सभी लोगों के आगे गिड़गिड़ाने लगती है। मगर कोई मदद को आगे नहीं आते हैं।
                    चौराहे पर कुछ देर के लिए अफरा तफरी का माहौल बन जाता है।
             अभी तक पुलिस वाले भी सिर्फ गाड़ियों को इधर-उधर भेजने की अपने ड्यूटी में ही लगे हुए थे। किसी ने उस अभागन गरीब महिला की ओर ध्यान भी नहीं दिया था। वैसे तो हमारे देश की पुलिस राजनेताओं एवम पूंजीपतियों के कुत्ते भी ढूंढने के लिए गली गली की खाक छानते फिरती है। 
                  यही तो आज हमारे देश का दुर्भाग्य था, कि यहां गरीबों के साथ आज भी सौतेला व्यव्हार होताû था।
                  सभी पुलिस वालों की कार्यशैली से लग रहा था, कि शायद इस चौराहे से किसी राजनेता का काफिला गुजरने वाला था।
               उस चौराहे पर बहुत सारे गाड़ी वाले खड़े थे। कोई भी घायल बच्चे को अस्पताल पहुंचा सकता था। मगर ऐसा किसी ने नहीं किया। हां उल्टे कुछ लोगों ने अपने पॉकेट से मोबाइल निकाल कर उस महिला की बेबसी का वीडियो बनाने लगे थे। 
                क्या समय आ गया था ? उस महिला का मदद तो कोई नहीं कर रहा था, मगर उसकी लाचारी और बेबसी को देखकर मनोरंजन सभी कर रहे थे। 
         आज का इंसान आखिर इतना संवेदनहीन कैसे हो गया था ? शायद मैं भी हो गया था। तभी तो मैं भी सभी के साथ मिलकर तमाशा ही देख रहा था।
                    जब मदद की गुहार लगाते - लगाते महिला थक जाती है, तो अंत में वह अपने घायल बेटे को गोद में उठाकर पैदल ही एक तरफ तेजी से चल पड़ती है।
 
               आज तक सड़क तो उस बच्चे का साथी ही था। उसी पर तो वह सोता, खेलता और हमेशा रहता भी था। मगर आज उसके उसी सड़क साथी ने दगा देकर उसे लहूलुहान कर दिया था।
             महिला के पीछे - पीछे चौराहे के पास खड़े सभी लोग भी चल पड़ते हैं। वहां का नजारा देख कर ऐसा लग रहा था मानो आगे आगे कोई तमाशा दिखाने वाला चल रहा है, और पीछे से दर्शकों का हुजूम !
                    वाह रे आज के सभ्य समाज के बुद्धिमान लोग, तुम्हें तो उस मां की पीड़ा भी बंदर के तमाशा जैसा खुशी दे रहा था। तभी तो कोई उसकी मदद को आगे नहीं आ रहा था, मगर पीछे - पीछे सभी उसकी बेबसी का दीदार करते हुए मजा लेते चल रहे थे। यही नहीं कुछ लोग तो अभी भी अपने मोबाइल से उस महिला का वीडियो बनाने में लगे थे, उन्हें तो शायद ऐसा लग रहा था, जैसे वो अपने प्रिय दोस्त की शादी का वीडियो बना रहे हैं।
                 वह महिला का नाम फुलवा था। उसका अपने बेटे सोनू के अलावा इस दुनिया में और कोई नहीं था। वह चौराहे से कुछ ही दूरी पर बने एक फ्लाईओवर पुल के नीचे रहती थी। वहां पर और बहुत से भिखारी रहते थे। फुलवा के पति रिक्शा चलाते थे। मगर 2 साल पहले ही एक कार की चपेट में आने से वो मर गए थे। फुलवा के पास उसके पति ही मात्र एक जमा पूंजी थे। इसीलिए पति के मरते ही फुलवा एकदम अकेली हो गई थी।
             जब उसे कुछ समझ में नहीं आता है तो वह अपने आसपास रहने वाले भिखारीयों को देख कर ही अपना पेट और मासूम बेटे को पालने के लिए भीख मांगने लगती है।
                 उसके पति जब जिंदा थे तब भी वह इसी फ्लाईओवर पुल के नीचे रहती थी। वहां पर और बहुत से रिक्शा एवं ठेला चलाने वाले लोग रहते थे। खुले आसमान ही सबका बसेरा था।
                फुलवा अपने घायल बेटे को लेकर चौराहे से कुछ ही दूर जाती है कि उसकी नजर एक बड़े प्राइवेट हॉस्पिटल के ऊपर पड़ जाती है। वह अपने बेटे के जान बचाने के ललक में उस महंगे हॉस्पिटल की ओर चल देती है। वैसे भी सरकारी अस्पताल वहां से अभी चार - पांच किलोमीटर दूर था। लोगों की भीड़ भी अभी तक तमाशबीन बन पीछे पीछे चली ही आ रही थी। 
                    फुलवा बेटे को लेकर उस प्राइवेट हॉस्पिटल में तो आ गई थी। मगर कंपाउंडर एवं और दूसरे स्टाफ बिना पैसा जमा किए उसके बेटे के इलाज करने से साफ मना कर देते हैं। इलाज से पहले उसे 50 हजार रुपया जमा करने को कहा जाता है। सुन फूलवा तड़प उठती है। वह आज तक कभी एक हजार रुपया भी इकट्ठे नहीं देखी थी, और यहां तो पचास हजार अस्पताल वाले इलाज के पहले ही जमा करने की जिद्द पर अड़े थे।
                  वह अपने बेटे की जान बचाने के लिए अस्पताल के कंपाउंडर, डॉक्टर एवं अन्य दूसरे स्टाफ के आगे गिड़गिड़ाने लगती है। मगर किसी के ऊपर जूं तक नहीं रेंगता है।
                  अंत में वह अपने घायल बेहोश बेटे को अस्पताल के फर्श पर रखकर अभी तक पीछे - पीछे आ रहे भीड़ के सामने अपनी फटी साड़ी के आंचल को फैलाकर बेटे की जिंदगी की भीख मांगने लगती है। 
उस समय हजारों की संख्या होगी वहां पर, मगर कुछेक को छोड़कर कोई मदद नहीं करता है। 
                   मैं भी अपने पॉकेट की कुल पूंजी 500 रुपया फूलवा को दे देता हूं। भला मेरे जैसे एक गरीब लेखक से और उम्मीद ही क्या किया जा सकता था। 
                मुश्किल से बेचारी फूलवा को 4 - 5 हजार रूपए ही भीख में मिल पाता है। शायद आज के आम आदमी को फोकट में ही तमाशा देखने में ज्यादा मजा आता था।
               फूलवा हार नहीं मानती है। वह भीख में मिले पैसों को लेकर फिर से डॉक्टर के पास जाती है। उसे उम्मीद था कि शायद अब तक डॉक्टर का मन बदल गया होगा।
             मगर बिना 50 हजार रूपए जमा किए तो यहां कोई बच्चे को छूने को भी तैयार नहीं था। 
              डॉक्टर तो भगवान के रूप होते हैं। मगर आज के इस युग में शायद यह सिर्फ एक कहावत बनकर रह गया था। तभी तो शायद फुलवा के साथ ऐसा हो रहा था। नहीं तो अभी तक डॉक्टर बच्चे के सिर से लगातार निकल रहे खून को तो कम से कम पट्टी बांधकर बंद ही कर सकते थे। 
                अंत में फुलवा को जब किसी से कोई मदद की उम्मीद नहीं दिखती है, तो वह थक हार कर वहां से अपने बेटे को उठाकर सरकारी अस्पताल में जाने का मन बना लेती है। 
                  बेटे को गोद में उठाते ही उस अभागन दुखियारी मां का कलेजा धक से रह जाता है। अब तक उसके बेटे की सांसे थम चुकी थी। 
               फुलवा के ऊपर तो दुखों का पहाड़ ही टूट कर गिर जाता है। उसके शरीर का सारा खून सूख जाता है। उसका बेटा ही तो अब उसका एक मात्र सहारा था। 
                 फुलवा चुपचाप मूर्तिवत बन अपने मरे हुए बेटे को गोद में लिए वही जमीन पर बैठ जाती है। अब उसे किसी से कुछ कहने को बचा ही नहीं था। कहती भी तो किसके लिए। उसकी दुनिया, उसका बेटा तो अब मर गया था।
                   फुलवा के पीछे - पीछे तमाशाबीन बने चले आ रहे आज के बुद्धिमान इंसानों के अंदर का इंसानियत उसके बेटे के मरते ही जागृत होने लगती है। सबों की अंतरात्मा खून की बलि लेकर करवट बदलने लगी थी। तभी तो वहां पर उपस्थित सभी लोग फुलवा के बेटे के मरते ही उसे इंसाफ दिलाने के लिए अब उतावले हो जाते हैं। 
                   देखते ही देखते आज के सभ्य एवम बुद्धिमान लोग अपने स्वभाव अनुसार उस प्राइवेट हॉस्पिटल में तोड़फोड़ शुरू कर देते हैं। अस्पताल में भगदड़ मच जाती है।
              उधर फुलवा अभी भी वैसी ही बैठी अपने मृत बेटे को अपलक निहार रही थी। उसके आंखों से आंसू निकलना अब बंद हो गया था। शायद अब उसके आंसू सुख गए थे।
                   आज के इस कलयुगी इंसानों के बदलते रंग रूप को देखकर शांत चित बैठी फुलवा के अंदर का गुस्सा भी अब धीरे धीरे धधकने लगा था। 
              जब उससे रहा नहीं जाता है तो वह अचानक अपने मृत बेटे को फर्श पर रखकर अपने सीने की धधकती आग की लपटों को प्रज्वलित कर सभी पर अपनी भड़ास निकालने लगती है। 
                    जहां अभी सभी तोड़ फोड़ कर रहे थे, वहीं अब फूलवा के रणचंडी रूप को देखकर शांत हो जाते हैं। 
                 फुलवा कहते जा रही थी - " मैं पूछती हूं तुम सबो के अंदर का इंसानियत उस समय कहां थी, जब मेरा बेटा घायल बीच सड़क पर लेटा था। उस समय किसी ने मदद की एक छोटी पहल तक नहीं किया। अब जब मेरा बेटा मर गया है तो आप लोग सहानुभूति दिखाने के लिए इस अस्पताल में तोड़फोड़ कर रहे हैं। मैं पूछती हूं यह आप सबों की यह कैसी नैतिकता है। जब मुझे मदद की दरकार थी तब आप सभी तमाशाबिन बन मेरी बेबसी पर हंसते हुए मेरा वीडियो बना रहे थे। 10 - 20 रूपए की मदद ना सही, कम से कम उस समय कोई सरकारी अस्पताल तक भी अपनी गाड़ी से पहुंचा देता तो मेरा बेटा आज जिंदा होता। हत्यारा इस अस्पताल वाले नहीं हैं, हत्यारा तो तुम सब हो। अस्पताल वाले तो व्यापार के लिए ही खोल कर बैठे हैं, फिर मुफ्त में किसी का इलाज क्यों करेंगे ? मगर तुम सब तो देश और समाज के रचयिता कहलाने वाले आम आदमी हो, फिर तुम लोगों ने भी तो मुफ्त में मेरी मदद नहीं की........ । "    
               फुलवा बोलते बोलते बीच बीच में रोने लगती थी। फिर कुछ देर के बाद वह अपनी आंसू पोंछ कर बोलने लगती - " वैसे भी आज यहां हम गरीबों की किसकी चिंता है। हम गरीबों के अपने मां बाप भी ऐश मौज में हमें पैदा करके अनाथ छोड़ देते हैं कीड़े मकोड़ों के जैसे। तभी तो हम जिन्दगी भर कीड़े मकोड़े बनकर ही जीने के लिए संघर्ष करते हुए जमीन पर ही रेंगते रहते हैं। हम गरीबों की चिंता न कभी हमारे मां बाप ने किया, ना ही कभी इस देश ने, ........... "।  
                   फुलवा बोलते रहती है और वहां पर खड़े लोग अब सभ्य दर्शक बनकर सिर्फ सिर झुकाए सुनते रहते हैं। सभी के सीने में शायद अब फूलवा की तीखी बातें नुकीले तीर की तरह चुभ रही थी।
               उधर फुलवा बोलते बोलते अचानक चक्कर खाकर अपने बेटे के बगल में ही गिर जाती है। गिरते ही उसका शरीर भी निर्जीव हो जाता है। बेचारी अभागन मां फुलवा भी मर गई थी।
                 फुलवा के मरते ही सभी लोग लज्जा वश अपनी सिर झुकाए चुप चाप अपने अपने गंतव्य की ओर चल पड़ते हैं।
               जमाने के रंग में तो मैं भी रंगा हुआ था ही, मैं भी चुप चाप अपने निवास स्थान की ओर चल पड़ता हूं।
                  मेरे कदम भी अब बोझिल हो गए थे। मैं चल तो रहा था, मगर ऐसा लग रहा था मानों किसी ने पैरों में जंजीर बांध दिया था। मेरे आंखों के सामने फूलवा और उसके बेटे का मृत शरीर ही नाच रहा था। 
                     उस रात मैं ठीक से सोया नहीं था। अगले दिन सुबह उठते ही मैं उस पुल की ओर चल पड़ा था जहां फूलवा रहती थी। वहां जाने पर ही मुझे फुलवा के बारे में एवम उसके नाम के बारे में पता चला था। 
                  यह एक फुलवा के साथ की घटित घटना नहीं है, आज आए दिन सड़क पर कहीं कोई न कोई दुर्घटना में घायल होकर पड़ा नजर आ ही जाता है, मगर परेशानी से बचने के लिए कोई आदमी उसकी मदद को आगे नहीं आता है।
                 यह बहुत चिंता का विषय है। अब हमें इस पर सोचना होगा। ताकि फिर किसी फुलवा या उसके बेटा सोनू के साथ ऐसा नहीं हो। 


                    कुमार सरोज

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