पापी पेट / Papi Pet । कविता । कुमार सरोज ।

                          पापी पेट

                               कुमार सरोज



आज कुछ लोग यहां खाने के जुगाड में मीलों पैदल चलते हैं ,
तो कुछ लोग यहां खाना पचाने के लिए मीलों पैदल चलते हैं ।

आज कुछ लोग यहां सिर्फ़ जीने के लिए ही खाते हैं ,
तो कुछ लोग यहां सिर्फ़ खाने के लिए ही जीते हैं । 






आज कुछ घरों में यहां कुत्ते भी ठाट बाट का जीवन जीते हैं ,
तो कुछ घरों में यहां रोज इंसान के बच्चे भी भूखे सोते हैं । 

आज किसी को यहां ताउम्र खाने की चिंता नहीं होती है ,
तो कोई यहां जन्म लेटे ही खाने के लिए कमाने लगता है ।

आज बहुतों के घरों में भोजन डस्टबिन की शोभा बनती है ,
तो बहुतों के घरों में बच्चों को यूं ही भूखे पेट सोना पड़ता है ।  

आज सारे कर्म या कुकर्म इस पापी पेट के लिए ही तो होता है ,
तभी तो पढ़ा जाए या कमाया जाए यह भी पापी पेट ही तय करता है । 



                            कुमार सरोज 

टिप्पणियाँ

  1. बहुत हीं सुंदर कविता है,इस महंगाई के जमाने मे पढ़ने के साथ -साथ यदि डायरेक्ट सेलिंग मे काम किया जाय् तो भूख भी मिटाया जा सकता तो,और पढ़ाई भी।

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