उसकी मां / Usaki Maa । कहानी । कुमार सरोज ।
उसकी मां
कुमार सरोज
दोपहर के 2 बज रहे थे। केतकी दिल्ली के तिलकनगर के एक पब्लिक स्कूल के आगे खड़ी अपनी पोती निधि का इंतजार कर रही थी। अभिभावक के साथ घर जाने वाले बच्चों की छुट्टी हो गई थी। बहुत सारे बच्चे अपने अपने अभिभावक के साथ वहां से जा भी चुके थे। मगर केतकी की पोती निधि जिसे वह पोती कम और दोस्त ज्यादा मानती थी अभी तक स्कूल के अन्दर से बाहर नहीं आई थी। इसीलिए केतकी मन ही मन स्कूल के गेट के पास खड़ी निधि पर गुस्सा कर रही थी।
अभिभावक के साथ जाने वाले लगभग सभी बच्चे अपने घर जा चुके थे, मगर निधि अभी भी स्कूल से बाहर नहीं आई थी। इधर केतकी का गुस्सा बढ़ते ही जा रहा था। तभी निधि स्कूल के अन्दर से उछलती कूदती आती नजर आ जाती है।
" अरे यार अभी तक तुम कहां थी । इतना देर कर दी आज ? "
केतकी निधि के पास आते ही उसासे पुछ बैठी।
" स्वीट हार्ट तुम टेंशन क्यों लेती हो। मैं बच्ची थोड़े न हूं अब 5th स्टैंडर्ड में पढ़ती हूं। "
" बोल तो तुम ऐसे रही हो डियर, जैसे तुम कॉलेज पास कर गई। मुझे तो लगता है कि मैं नहीं तुम मेरी दादी हो। "
कहती हुई केतकी निधि का हाथ पकड़े पैदल ही अपने घर की ओर चल देती है।
स्कूल से घर पास ही था। इसीलिए निधि अपनी केतकी दादी के साथ स्कूल पैदल ही आती जाती थी।
" अब बोलो स्कूल में आज इतना लेट कैसे हुआ ? "
केतकी चलते चलते निधि से पुछ बैठती है।
" अरे डियर दादी रात में जो तुम रामायण वाली सीता माता की कहानी मुझे सुनाई थी न, मैं वही कहानी क्लास में अपने फ्रेंड को सुना रही थी। बस इसी में लेट हो गया। "
" मगर मैंने तो तुमको अभी पुरी कहानी सुनाई ही नहीं थी ! फिर तुम अपने फ्रेंड्स को कैसे सुनाई ? "
" अरे डियर मैंने भी अपने फ्रेंड्स को पुरी कहानी सुनाई कहां। जितना तुम सुनाई थी उतना ही तो मैं भी उन्हें सुनाई। मगर अभी रास्ते में ही तुम बाकि का कहानी सुनाओ। सीता माता को भगवान राम जब घर से निकल दिए तो फिर क्या हुआ ? "
" रास्ते में मैं कहानी नहीं सुना सकती हूं। रात में ही सुनाऊंगी। तुम चुप चाप अभी घर चलो । "
" चुप चाप नहीं चलूंगी तो तुम क्या कर लोगी। अपनी उम्र का ख्याल करो। पचास साल की ओल्ड वुमन हो, फिर भी किसी दिन गुस्से में पीट दूंगी। "
" अच्छा। छिपकली से डरने वाली इतनी बहादुर ......... । "
केतकी अभी आगे और बोलने ही वाली थी कि सड़क के दुसरी ओर खड़े एक आदमी को देखकर वह चुप हो गई।
उस आदमी को देखते ही केतकी के चेहरे पर की मुस्कान गायब हो गई। उसके ललाट पर चिंता की लकीरें उभर आई। वह तुरंत निधि को मुख्य सड़क से लेकर पास के ही एक दूसरी सड़क की ओर तेजी से चल देती है। वह रास्ता लंबा था, मगर वह भी घर तक जाता था।
निधि थी तो अभी ग्यारह साल की ही मगर वह बहुत समझदार थी। वह रास्ते में केतकी से कुछ नहीं पुछती है। मगर घर आते ही उस आदमी के बारे में पुछ बैठती है।
" दादी, सड़क के उस पार खड़ा आदमी कौन था। जिसे देखकर आप रास्ता बदल कर तेजी से घर आईं ? "
निधि अपने घर के अंदर प्रवेश करते ही पुछ बैठी।
निधि जब भी सीरियस होती थी तभी उसे दादी कहकर या बड़ों के जैसे सम्मान देती हुई बात करती थी।
निधि की बोलने के अंदाज से ही केतकी समझ गई कि आज यह बिना जाने नहीं मानेगी।
" वह कोई खास नहीं था यार। बस मेरा मन किया तो मैं लॉन्ग रास्ता से घर आ गई। वैसे तुम भी न बिना मतलब की सीरियस हो जाती हो। तुम ड्रेस चेंज करो, मैं खाना निकालती हूं। मुझे जोरों की भूख लगी है। "
केतकी कहती हुई किचेन की ओर जाने लगती है। मगर निधि सामने खड़ी हो जाती है।
" दादी, मैं आपकी चेहरे को बहुत अच्छी तरह से पहचानती हूं। मैं आपको इतनी टेंशन में कभी नहीं देखी थी। आखिर कौन था वो ? "
" अरे यार मैं सच्ची बोल रही हूं। मैं बस ऐसे ही रास्ता चेंज करके घर आई । "
केतकी निधि को विश्वास दिलाने की अथक प्रयास कर रही थी। मगर वह मानने को तैयार नहीं थी। वह भी जिद्द पर अड़ी थी।
" दादी, आप मेरी मरी हुई मां की कसम खाकर बोल दीजिए कि आप उस आदमी को नहीं जानती हैं। "
निधि अपना ब्रह्मास्त्र चल दी थी। जिसका काट बेचारी केतकी के पास भी नहीं थी।
" ये तुम क्या बोल गई मेरी बेटी। तुम जानती हो तुम्हारी मां की मैं झूठी कसम तो क्या उसके बारे में कभी सपने में भी मन में गलत ख्याल नहीं ला सकती हूं। "
कहती हुई केतकी निधि को गले से लगा लेती है। उसके आवाज में जमाने भर का गम साफ झलक रहा था। आंखे नम हो गईं थी। केतकी का हृदय जोर जोर से धड़कने लगा था।
" मुझे सब पता है मेरी स्वीट हार्ट , तभी तो मैं ऐसा बोली। अब नन्हें बच्चे के जैसा फटाफट उस आदमी के बारे में बको। "
निधि पास के सोफे पर केतकी को बैठाते हुए बोली।
केतकी को बैठाकर निधि भी खुद सामने के सोफे पर बैठ गई।
केतकी के आंखों से आंसू निकलने को बेताब थे। वह किसी तरह बस उन आसुओं को रोके हुए थी। क्योंकि उसे पता था उसकी आंसू देखकर निधि बहुत परेशान हो जायेगी।
" डियर, अब बता भी दो यार। वैसे वह आदमी कहीं तुम्हारा कोई पुराना बॉयफ्रेंड तो नहीं था ? "
निधि केतकी के आंखों में छलक आए आंसू को देख ली थी। इसीलिए वह उसे हंसाने के लिए मजाक के लहजे में बोली।
कोई और दिन होता तो निधि के इस बात को सुनकर केतकी जी भरकर हंसती। मगर पता नहीं क्यों आज तो उसके चेहरे की हंसी ही गायब हो गई थी। पता नहीं उसके अन्दर कैसा तूफान तबाही मचा रहा था।
" निधि, सड़क किनारे खड़ा वह आदमी तुम्हारे पापा थे। "
केतकी के मुंह से जैसे ही निधि यह वाक्य सुनी कि वह चौंकते हुए सोफे पर खड़ी हो गई। सुनकर उसके पैर तले की जमीन खिसक गई थी।
' तो क्या उसके पापा जिन्दा थे ' बार बार यही वाक्य निधि के मन में हिलौर मारने लगा था।
" दादी यह आप क्या कह रही हो। तो क्या मेरे पापा अभी जिंदा हैं ? "
निधि वापस सोफा पर बैठती हुई बोली। सुनकर तो उसके दिमाग की बत्ती ही फ्यूज हो गई थी।
" वह जिंदा सिर्फ अपने लिए है, तुम्हारे या तुम्हारी मां के लिए वह इंसान बारह साल पहले ही मर गया था । "
केतकी अपने जज्बातों पर काबू करती हुई बोली।
" दादी , मैं आपकी बात सुनकर पागल हो जाऊंगी। तुम पुरी बात डिटेल में मुझे बताओ। मैं यह भी रामायण की एक कहानी समझकर सुन लुंगी। "
" निधि बेटा, मैं तुम्हारी दादी तो क्या रिश्ते में कुछ भी नहीं लगती हूं। मैं तो तुम्हारी मां के घर काम करने वाली एक बाई हूं। "
" यह तुम क्या कह रही हो दादी। मुझसे तुम्हारी यह पहेली समझ से बाहर है। तुम पुरी कहानी बताओ न प्लीज। "
पहली बार निधि की आवाज भी रुआंसी लगी थी। आज तो उसके सामने ऐसे ऐसे भेद खुल रहे थे कि सुनकर उसके होश उड़ गए थे। जिसे अभी तक वह दुनिया में अपना सबकुछ समझती थी वह दादी उसकी कोई अपनी नहीं थी बल्कि उसके घर में काम करने वाली बाई थी।
" निधि तुम्हारी मां सौम्या जौनपुर की थी। वहां अच्छा खासा सुखी परिवार था तुम्हारी मां का। तुम्हारी मां बनारस के एक बड़े विश्वविद्यालय में पढ़ती थी। उसी कॉलेज में राज भी पढ़ता था। "
केतकी निधि को उसकी मां सौम्या की पुरी कहानी विस्तार से बताते जा रही थी और वह चुपचाप ध्यान से सुन रही थी।
" राज का परिवार तुम्हारी मां जितना सुखी संपन्न नहीं था। फिर भी तुम्हारी मां ने पहले राज को पसंद किया और फिर अपने परिवार के लाख मना करने पर भी उसी से शादी कर ली। जिस समय दोनों ने शादी किया था, उस समय दोनों ने बनारस के उस विश्वविद्यालय से एमए पास कर लिया था। शादी के बाद तुम्हारी मां सौम्या और पापा राज बनारस में ही रहने लगे थे। तुम्हारी मां के माता पिता ने उससे रिस्ता खत्म कर लिया था। सौम्या भी राज के साथ बहुत खुश थी। "
केतकी एक लंबी सांस लेती हुई फिर से आगे की कहानी सुनाने लगती है। कमरे में अभी सिर्फ केतकी की आवाज ही सुनाई दे रही थी।
" नौकरी के लिए राज बनारस में ही इधर उधर हाथ पैर मार रहा था, मगर कहीं मिल नहीं रहा था। तुम्हारी मां भी नौकरी करना चाहती थी, मगर तुम्हारे पापा उसे नोकरी करने देना नहीं चाहते थे। मगर जब बहुत दिनों तक तुम्हारे पापा को कोई नौकरी नहीं मिली तो अंत में तुम्हारी मां ने जबरदस्ती नौकरी करने की ठान ली। तुम्हारी मां सुन्दर और अच्छी पढ़ी लिखी तो थी ही उसे तुरंत एक बड़े प्राईवेट कम्पनी में रिसेप्शनिस्ट का काम मिल गया। उस समय पैसों की तंगी तो था ही इसीलिए तुम्हारे पापा चाहकर भी मना नहीं कर सके। समय बिताता गया। दोनों की जिंदगी अब अच्छे से गुजरने लगी थी। मगर तुम्हारी मां को क्या पता था कि उसे जिस कम्पनी के मैनेजर ने अच्छा खासा पैसा देकर काम पर रखा था, उसकी गंदी नीयत उसके जिस्म पर थी। एक शाम कम्पनी ने सभी स्टॉफ के लिए एक पार्टी रखा था। तुम्हारी मां भी उस पार्टी में गई थी। उसी पार्टी में धोखे से नशीली दवा कोल्ड्रिंक में मिलाकर कम्पनी का मैनेजर तुम्हारी मां की इज्जत लूट लेता है । "
कहते कहते केतकी इस बार चाहकर भी अपनी आंसू नहीं रोक पाई।
जबकि निधि खामोश आंखे बंद किए सारी बाते सुन रही थी। इसीलिए वह केतकी की आंसू नहीं देख पाई।
" तुम्हारी मां चाहती तो इस बात को छिपा लेती। मगर उसने ऐसा नहीं किया। वह स्वाभिमानी और जिद्दी लड़की थी। उसने घर आकर तुम्हारे पापा को सारी बातें बता दी। वह पुलिस में भी शिकायत करना चाहती थी। मगर तुम्हारे पापा सुनते ही उसे मदद करने की जगह पर उलटे उसे ही घर से निकल देते हैं। तुम्हारी मां लाख गिड़गिड़ाई लाख रोई मगर उसके ऊपर कुछ असर नहीं होता है। राज उसे आधी रात को ही घर से और अपनी जिंदगी से भी सदा के लिए निकाल देता है। तुम्हारी मां उस समय गर्भवती थी। उस समय तुम मां की पेट में सिर्फ 3 महीने की ही थी। "
अपनी मां की उस समय के हालात की कल्पना करके ही निधि के आखों में भी आंसू भर गए। मगर वह उस आंखू को बहाकर शायद अपनी मां की कुर्बानी की बेइज्जती नहीं करना चाहती थी, इसीलिए आंसू आंखों के अंदर ही समेटे रही।
उधर केतकी अपनी धुन में सौम्या की सारी दास्तान सुनाने में लीन थी।
" तुम्हारी मां ने उस रात बनारस के रेलवे स्टेशन पर ही बिताई। वह चाहती तो जौनपुर अपने घर मम्मी पापा के पास जा सकती थी। मगर वह भी एक नम्बर की जिद्दी और स्वाभिमानी लड़की थी। बनारस के स्टेशन पर बिताए उस रात ने उसे नए सिरे से जिंदगी को समझने और सोचने का मौका दिया। वह बनारस में ही एक कमरा किराए पर लेकर फिर से सरकारी नौकरी के लिए पढ़ाई शुरु कर दी। तभी तुम्हारी मां ने मुझे काम करने के लिए अपने यहां रखा था। मेरा भी इस दुनिया में कहने को तो सब था, 2 बेटा एक बेटी। मगर सबने मेरे पति के मरते ही मुझसे मुंह फेर लिया था। इसीलिए जिंदा रहने के लिए मैं दूसरे के घरों में काम करती थी। तुम्हारी मां अपने कुछ जमा पैसे और गहने को बेच कर पढ़ाई करती रही। मैं जिंदगी में किसी को इस कदर पढ़ाई के पीछे पागल नहीं देखी थी। दिन रात सिर्फ किताबों में खोई रहती थी। उसने पढ़ाई के आगे अपना बिता हुआ कल भी बहुत ही आसानी से भूला दिया था। तभी तुम्हारा जन्म होता है। तुम्हारे जन्म के बाद मुझे तुम्हारी मां की दशा देखी नहीं गई, इसीलिए मैंने बाकि के दूसरे घरों का काम छोड़कर सिर्फ तुम्हारी मां के यहां काम करने लगी। मैं अब दिन रात तुम्हारी मां के साथ ही रहती थी। तभी उसने मेरे पुछने पर एक दिन अपनी जिंदगी की सभी राज बताई। मैं सुनकर दंग रह गई। कितना बड़ा बोझ लेकर तुम्हारी मां जी रही थी, और इसका किसी को जरा भी अहसास नहीं होने देती थी। उसके बाद ही तुम्हारी मां को जब मैं भी अपनी कहानी बताई तो सुनकर वो मुझे काम वाली बाई से अपनी मुंह बोली मां बना ली। "
कहते कहते केतकी इस बार भी अपनी आंसू फिर से नहीं रोक पाई। उसके रोने की आभास निधि को भी हो गई थी। फिर भी वह कुछ नहीं बोली।
" तुम्हारे जन्म के ठीक 2 महीने बाद ही तुम्हारी मां को बनारस विश्वविद्यालय में ही अध्यापक की नौकरी लग गई। वह दिन उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी का दिन था। तुम्हारी जैसी बेटी, एक अच्छी सरकारी नौकरी मिल गई थी, इसके अलावा और भला अब उसे क्या चाहिए था। अब हम तीनों बहुत खुश थे। तभी तुम्हारी मां के जीवन में फिर से शनि का प्रकोप आ गया। उस दिन तुम्हारी पहला जन्म दिन था। मैंने और तुम्हारी मां सौम्या ने तुम्हारे जन्म दिन की घूम धाम से तैयारी की थी। लेकिन उसी दिन दोपहर में ही तुम्हारे पिता राज तुम्हारी मां को अपने पास रखने के लिए लेने आ गया। वह अभी तक बेरोजगार ही था। किसी तरह उसे तुम्हारी मां की नौकरी वाली बात उसे पता चल गई थी। बस इसीलिए वह पैसे के लोभ में तुम्हें और तुम्हारी मां को लेने आ गया था। मगर तुम्हारी मां ने उसके साथ जाना तो दूर उसे दरवाजे पर से ही दुत्कार कर भगा दिया। राज भी एक नम्बर का कमिना इंसान था। दोनों का अभी तक तलाक तो हुआ ही नहीं था, इसीलिए उसने तुम्हारी मां को पाने के लिए कोर्ट में केस कर दिया। लेकिन सच्चाई की हमेशा जीत होती है। तुम्हारी मां ही केस जीत जाती है। उसे कोर्ट ने राज से तलाक भी दिलवा दिया। राज ने जैसा कर्म किया था उसे उसका फल मिल गया। तुम्हारी मां केस जीतकर बहुत खुश थी। मगर शायद उसके जीवन में खुशी थी ही नहीं। वह शादी के बाद अभी तक सिर्फ दुःख और पीड़ा ही झेलते आ रही थी। अभी तो उसके हिस्से का दुख शायद और बचा हुआ ही था। तभी तो एक दिन कॉलेज से पढ़ाकर घर आते समय रास्ते में एक ट्रक ने उसे स्कूटी सहित कुचल दिया। डॉक्टर के लाख कोशिश के बाबजुद भी वह नहीं बच सकी और अंत में वह मर गई। उस समय तुम मात्र दो साल की थी। मरते समय तुम्हारी मां ने ही मुझे बनारस छोड़कर दिल्ली जाकर रहने को बोली थी। इसीलिए मैं उसके बाद ही बनारस से तुम्हें लेकर दिल्ली इस घर में आ गई। मुझे आज भी लगता है कि तुम्हारी मां मरी नहीं थी बल्कि उसे राज ने ही मरवाया था। इसीलिए आज जब मैं उसे अचानक देखी तो तुम्हें उसके नजरों से बचाकर घर ले आई। वह तुम्हें तो नहीं लेकिन मुझे देखकर पहचान जाता, इसीलिए मैं डर गई थी। "
एक बहुत ही लंबी सांस लेती हुई केतकी ने निधि की मां सौम्या की कहानी खत्म करती है ।
पुरी कहानी सुनकर निधि भी सोच में डूब गई। वह अपनी मां के संघर्ष को याद कर कर के ही विचलित हो रही थी। सच में त्याग की प्रतिमूर्ति थी उसकी मां ।
कुमार सरोज
लाजवाब कहानी
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत धन्यवाद
हटाएंBahut badhiya
हटाएंबहुत बहुत धन्यवाद
हटाएंजबरदस्त कहानी। नारी शायद तेरी यही कहानी ।
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार
हटाएं