एक यात्रा अपनापन संकोच और स्नेह का / Ek Yatra Apnapan Sankoch Aur Sneh Ka । हिमांशु कुमार शंकर।
एक यात्रा
अपनापन संकोच और स्नेह का
जिंदगी की रफ़्तार भी अजीब होती है, हम दौड़ते तो भविष्य की ओर हैं, लेकिन जड़ें अतीत की गलियों में ही कहीं छूट जाती हैं। मेरा रेलवे कंट्रोलर का परीक्षा केंद्र 'इंट्रेपिड साइबरट्रॉनिक्स' पटना के भूतनाथ क्षेत्र में पड़ा था। मैं दरभंगा में बैठा केंद्र की दूरी और अपरिचित रास्तों के गणित सुलझा ही रहा था कि अचानक पल्लवी दी की याद आई। वे एम.जे.एम.सी. (MJMC) में मेरी सीनियर थीं और उनका घर पटना में ही था। मन में एक झिझक थी—सालों बीत गए थे। पिछली बार जब उनके घर गया था, तब अंकल जीवित थे। उनके देहांत की खबर ने मन को कचोटा जरूर था, लेकिन वक्त की कमी और इस भागदौड़ भरी जिंदगी ने कभी शोक जताने या आंटी से मिलने का मौका ही नहीं दिया। अब जब मौका मिला, तो एक नया संकोच सामने खड़ा था—मध्यमवर्गीय परिवारों में अतिथि का सत्कार 'खिलाने-पिलाने' के बिना पूरा नहीं होता, और मैं किसी को कष्ट नहीं देना चाहता था।
लेकिन कहते हैं न कि आशीर्वाद की खींच और पुराने रिश्तों की डोर बहुत मजबूत होती है। अगली सुबह जब पाटलिपुत्र ट्रेन से उतरकर मैं सेंटर पहुँचा, तो अभी समय काफी शेष था। एक घंटा शांत बैठकर खुद को समझाया। आखिर आंटी का आशीर्वाद भी तो लेना था! सारे संकोच को किनारे रख पल्लवी दी को फोन किया। कुछ ही देर में दी आईं और मुझे अपने घर ले गईं। सोफे पर आंटी और दी के भाई बैठे थे। मैंने बढ़कर दोनों के चरण स्पर्श किए। उस स्पर्श में एक अजीब सी शांति थी, जैसे बरसों का कोई कर्ज उतर रहा हो। औपचारिक हाल-चाल के बाद जब चाय की बात आई, तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "पानी तो पी लिया है, पर चाय आज मैं अपने हाथ से बनाऊंगा।" रसोई की महक और चाय की चुस्कियों ने घर की दहलीज को 'अपनेपन' में बदल दिया। उन्होंने मुझे एक कमरा दिया जहाँ मैंने इत्मीनान से अपने दस्तावेज सहेजे, नाश्ता किया और फिर परीक्षा की जंग लड़ने निकल गया। परीक्षा कठिन थी। गणित के सौ सवालों के चक्रव्यूह में से मैं सत्तर हल कर पाया था। वापस लौटा तो दी और आंटी प्रतीक्षा कर रही थीं। उन्होंने बड़े प्यार से चूड़ा-मटर की 'भुगनी' और चाय परोसी। मैं चाय का प्रेमी ठहरा, सो हर चुस्की के साथ परीक्षा की थकान मिटती गई। बातों-बातों में भैया से भी संवाद हुआ। वे पढ़े-लिखे हैं पर फिलहाल संघर्ष कर रहे हैं, उन्हें अपने अनुभव से कुछ समझाया। उस घर की आबोहवा में अब कोई परायापन नहीं था, बस एक सोंधी सी आत्मीयता थी। जाने का वक्त आया तो पैर भारी होने लगे। आंटी के फिर से चरण स्पर्श किए। उन्होंने मुस्कुराते हुए विदा किया और एक मीठा अधिकार जताते हुए कहा, "अगली बार आओगे, तो मिठाई लेकर आना।" बाहर हाजीपुर जाने के लिए रैपिडो वाला इंतजार कर रहा था। मैंने भैया और दी को अलविदा कहा। ट्रेन पकड़ने की जल्दी तो थी, पर मन के किसी कोने में वह चूड़ा-मटर का स्वाद और आंटी का वह आशीर्वाद सदा के लिए दर्ज हो गया था। कुछ सफर सिर्फ परीक्षा देने के लिए नहीं, बल्कि रिश्तों को फिर से जीने के लिए तय किए जाते हैं।
आपकी यह यात्रा वाकई दिल को छू लेने वाली है।
हिमांशु कुमार 'शंकर'
मंझौल, बेगूसराय (बिहार)
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