स्कूल की यादगार सजा / School Ki Yadgaar Saja । संस्मरण । हिमांशु कुमार शंकर ।

        स्कूल की यादगार सजा 



              मंझौल, बेगूसराय के उस सरकारी मिडिल स्कूल की यादें आज भी ताजा हैं जब पढ़ाई से ज्यादा हमारा मन स्कूल की चहारदीवारी लांघने में लगता था। एक रोज दोपहर की चिलचिलाती धूप में मैंने और मेरे साथियों ने तय किया कि गणित की क्लास से पहले 'मैदान छोड़' भागना ही सबसे बेहतर इलाज है।



      
             हम दबे पांव स्कूल के पीछे वाली छोटी दीवार के पास पहुंचे और एक-दूसरे को सहारा देकर ऊपर चढ़ने की कोशिश करने लगे। जैसे ही मैंने दीवार फांदकर बाहर छलांग लगाई, मेरा दुर्भाग्य देखिए कि नीचे कीचड़ था और मैं सीधे उसमें जा गिरा। अभी मैं संभल ही रहा था कि ऊपर दीवार पर अटके मेरे दोस्तों को देख सामने से खैनी मलते हुए हेडमास्टर साहब प्रकट हो गए। उन्होंने बड़े प्यार से मेरा हाथ पकड़ा और बोले "हिमांशु बाबू, बड़ी जल्दी में लग रहे हो, आपका घर तो पास में ही है घर भागा जा रहा है क्या?" अगले ही पल मैं और मेरे दोस्त स्कूल के बरामदे में एक कतार में 'मुर्गा' बने हुए थे और पूरा स्कूल हमें तमाशे की तरह देख रहा था। मास्टर साहब ने सजा के तौर पर हमसे कहा कि आज पूरे स्कूल के चापाकल के आसपास की सफाई तुम भगोड़े ही करोगे। हम बाल्टी और झाड़ू लेकर सफाई में जुटे थे और गांव के लोग आते-जाते हमें देखकर मुस्कुरा रहे थे कि देखो कलेक्टर साहब झाड़ू लगा रहे हैं। सजा के बीच में भी हम दोस्त एक-दूसरे को देख हंस रहे थे क्योंकि भागने का प्लान जितना फ्लॉप था, पकड़े जाने का अंदाज उतना ही फिल्मी था। बेगूसराय की उस मिट्टी में जो सजा मिली, उसने अनुशासन तो सिखाया ही, पर साथ में वो यादें दे दीं जो आज भी खिलखिलाने पर मजबूर कर देती हैं। मिडिल स्कूल की वो टूटी दीवार और मास्टर साहब का वो भारी हाथ आज भी मंझौल की गलियों की याद दिला देता है।



              हिमांशु कुमार 'शंकर'
           मंझौल बेगूसराय (बिहार)

टिप्पणियाँ

  1. 😀 आप तो कीचड़ में गिरे शाला हम तो आदमी का गोबर पर गिरे।

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