अधूरी यात्रा /। Adhoori Yaatra । हिमांशु कुमार शंकर ।
अधूरी यात्रा - चकाई घाटी का वो खौफनाक मंजर
(एक सच्ची घटना पर आधारित)
आश्विन का पवित्र महीना था। सीतामढ़ी के रहने वाले शिवरत्न अपने भाई, भतीजा-भतीजी, दोस्त और दो छोटे बच्चों (नेहा और हिमांशु) के साथ बाबा बैद्यनाथ धाम (देवघर) के लिए निकले थे। मन में अपार श्रद्धा थी और गाड़ी में 'बोल बम' और जय ठाकुर बाबा के भजन और नारे लग रहे थे। शिवरतन ने सोचा था कि सुबह होते-होते वे बाबा का जलाभिषेक कर लेंगे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
रात के करीब 1 बज रहे थे जब उनकी गाड़ी जमुई पहुंचने वाली थी, तो बिल्ली ने रास्ता काट दिया, मगर फिर भी बिना ब्रेक लगाए जा रहे थे। तभी कुछ किलोमीटर के बाद कुछ लोग गाड़ी रोकने का इशारा किया, लेकिन कोई समझ नहीं पाया। कुछ और आगे जाने के बाद करीब 60-70 ट्रक कतार में लगी थीं। अब जमुई पार करते हुए चकाई घाटी के घुमावदार और सन्नाटे भरे रास्तों में प्रवेश कर गई। जंगल बहुत घना था और अंधेरा इतना गहरा कि गाड़ी की हेडलाइट के अलावा कुछ नजर नहीं आ रहा था।
घाटी के बीचों-बीच अचानक शिवरतन और ड्राइवर ने देखा कि सड़क पर बड़े-बड़े पत्थरों का चट्टान रखा हुआ है। मजबूरन उसे ब्रेक लगाना पड़ा। गाड़ी रुकते ही जंगल की झाड़ियों से बड़े-बड़े पत्थर गाड़ी की ओर फेंकने लगे और आवाज दी कि, "गाड़ी की लाइट बंद करो।" करीब 8-10 हथियारबंद लोग बाहर निकल आए। उनका हुलिया बता रहा था कि वे नक्सलवादी गुट के सदस्य थे।
इससे पहले कि शिवरतन कुछ समझ पाते, उन लोगों ने गाड़ी को घेर लिया। "दरवाजा खोलो!" एक भारी आवाज गूंजी। डर के मारे सभी के हाथ कांपने लगे। जैसे ही उसने शीशा नीचे करने की कोशिश की, एक नक्सली ने अपनी पत्थर की नोक से वार कर गाड़ी का साइड ग्लास चकनाचूर कर दिया। पत्थर के टुकड़े से शिवरतन का सिर फूट गया था और ड्राइवर को इतना पीटा कि वो गाड़ी चलाने लायक नहीं था।
उन लोगों ने गाली-गलौज करते हुए सबको बाहर निकलने का आदेश दिया। शिवरतन और उनके बुजुर्ग भाई यशवंत ने जब हाथ जोड़कर विनती की कि वे तीर्थयात्रा पर हैं, तो नक्सलियों ने उनकी एक न सुनी। उन्होंने शिवरतन और उनके भाई को बोला कि मोबाइल, पैसा सब निकाल दो। यहां तक कि उसी गाड़ी में एक डीलर था, जिनका नाम भोला था, वो देवघर में घी दान में देने जा रहे थे, वो भी ले लिया। पूरा परिवार रहम की भीख मांग रहा था, लेकिन लुटेरों की आँखों में दया नहीं थी। उन्होंने डंडों से मारकर गाड़ी की हेडलाइट्स और विंडशील्ड भी तोड़ दी।
तभी, गाड़ी के पीछे रामल्ला, हिमांशु ने अपने दोनों बहनों को नीचे झुकने को बोला। जब वो नीचे झुके, तो हिमांशु ने ऊपर से अपना पैर रख दिया और ऊपर से तौलिया बिछाकर अपना पैर ढक लिया, जिससे वो दोनों छिप गए। एक नक्सली बंदूक तानते हुए पिछली सीट की तरफ बढ़ा। तभी उनके लीडर ने कड़क आवाज में कहा, "रुको! बच्चों को हाथ मत लगाना। हम बच्चों को नहीं मारते।" वह नक्सली पीछे हट गया। बच्चों को छोड़ दिया गया, लेकिन उनकी आँखों के सामने उनके परिवार लहुलुहान हालत में थे।
करीब 10 मिनट के उस तांडव में नक्सलियों ने उनका सारा पैसा और मोबाइल लूट लिया और जंगल की ओर जाने लगे। पुनः लुटेरों ने बोला कि 10 मिनट रुको, मैं फिर आ रहा हूं। शिवरतन अपने परिवार के साथ वहां 5 मिनट रुके, लेकिन कोई भी नहीं आया। उन्होंने सोचा उसे लूटना था, लूट लिया, अब क्या आयेगा। रामल्ला का फोन हिमांशु अपने जेब में डाल रखा था, उसी फोन के जरिए घरवालों से बात हुई। ड्राइवर को ज्यादा चोट की वजह से गाड़ी नहीं चलाई। उन्हीं के परिवार से उनके भतीजे टिप्पू, जो थोड़ा बहुत गाड़ी चलाना जानते थे, उन्होंने गाड़ी को बैक कर ही रहे थे कि तकरीबन 12 अंगुली से उनका सारा परिवार बच गया, नहीं तो गाड़ी उसी खाई में गिर जाती।
किसी तरह से वहां से सभी निकले। शिवरतन ने थाने में मदद की गुहार लगाई, मगर थाने में गेट भी नहीं खुला। फिर से निकलने लगे। रास्ते में देखा कि एक दर्जी कपड़ा सिलाई कर रहे थे। उनकी मदद से सभी लोग डॉक्टर तक पहुंचे। सभी को इलाज करवाया और फिर क्लीनिक के बाहर तथा सभी की रात बीती। सड़क पर सन्नाटा फिर से पसर गया, लेकिन अब वहां सिर्फ उस परिवार की सिसकियाँ थीं।
अगली सुबह उनके घरवाले एक ड्राइवर को और एक गाड़ी लेकर आए और सुरक्षित घर लाएं। अंततः, परिवारवालों ने उन्हें घर वापस जाने की सलाह दी। शिवरतन ने नम आँखों से अस्पताल की खिड़की से उस दिशा में देखा, जिधर देवघर था। इतनी दूर आकर, इतनी श्रद्धा लेकर भी वे बाबा के चौखट तक नहीं पहुँच सके। परिवार को अपनी जान बचाने के लिए, बिना दर्शन किए ही वापस लौटना पड़ा। उस दिन चकाई घाटी की उस काली रात ने उनकी आस्था की यात्रा को हमेशा के लिए अधूरा बना दिया।
हिमांशु कुमार शंकर
मंझौल, बेगूसराय बिहार
Bihar ka durbhagya
जवाब देंहटाएंजी
हटाएंअफसोस
हटाएंधन्यवाद महोदय 🙏🏻
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