मुनिया / Muniya । कहानी । कुमार सरोज ।
मुनिया
कुमार सरोज
मूसलाधार बारिश हो रही थी। शहर से बाहर जाने वाली सड़क किनारे एक खाली जगह पर कुछ मिट्टी एवम् फूस की झोपड़िया बनी हुई थी। तेज बारिश की बूंदे झोपड़ी के जीर्ण शीर्ण छप्पर को बेधती हुई अंदर तेजी से गिर रही थी।
एक झोपडी में करीब 18 - 20 बच्चे बैठे बारिश की पानी से बचने की नाकामयाब कोशिश कर रहे थे। पानी से बचन के लिए सभी दुबक कर बैठे थे। फिर भी सभी पानी से भीग ही जा रहे थे। बच्चों में आधे से अधिक लड़के थे। सभी की उम्र 12 साल से कम ही था।
अब तक सभी पानी से पूरी तरह भीग गए थे। मगर सभी अभी भी भींगने से बचने की कोशिश करने में लगे थे। सभी बहुत डरे डरे से लग रहे थे। तभी तो सभी भेड़ बकरी की तरह बैठे थे।
इन लोगों के रहने के लिए बगल में ही दो झोपड़ी और बना हुआ था। मगर उन दोनों झोंपड़ी का हाल इससे भी खराब था। जिसके कारण ही उसमें अभी कोई नहीं था। उन दोनों झोपड़ियों में तो बारिश का पानी अंदर तक भरा हुआ था।
सभी बच्चों में से एक बड़ा लड़का जिसका नाम मोनू था, सभी लड़के एवम् लड़कियों को बार-बार दिलासा दे रहा था। वहां जितनी लड़की थी, उसमें से सबसे बड़ी लड़की थी - फुलवा। वह 12 साल की थी। वह भी मोनू के बातों में हां में हां मिलाते हुए बीच-बीच में सभी को समझा रही थी।
फुलवा के गोद में करीब 15 माह की एक बच्ची थी, जिसका नाम उसी ने चांदनी रखा था, जो इस समय उसी के गोद में लेटी हुई थी। चांदनी भी पूरी तरह से पानी में भीग गई थी।
इन सभी अनाथ बच्चों का यही सिर्फ़ तीन झोपड़ी ही अपना आशियाना था। जो पिछले 2 दिन से हो रहे लगातार बारिश के कारण अब नर्क बन गया था। अब तो यह झोपड़ी बैठने के लायक भी नहीं था।
ये सभी बच्चे अपनी जन्म देने वाली मां के द्वारा त्याग किए हुए अनाथ बच्चे थे। इन सभी बच्चों का इस दुनिया में केवल मुनिया दीदी ही एकमात्र सहारा थी। सभी मुनिया दीदी के साथ ही इस झोपड़ी में रहते थे।
मुनिया अभी वहां नहीं थी। वह सभी के लिए खाने की व्यवस्था करने सुबह में ही कहीं गई थी।
अब शाम होने को आई थी, मगर मुनिया अभी तक नहीं आई थी। उसी के कारण अभी सभी बच्चे और चिंतित थे।
मुनिया । करीब 20 साल की एक अपाहिज अनाथ लड़की थी। उसके माता-पिता ने उसे अपाहिज जानकर जन्म देते ही सड़क किनारे छोड़ गए थे। वह तो संजोग था ऊपर वाले का, कि मुनिया पर एक भिखारी मंगरू की नज़र पड़ गई थी, और वह उसे अपने साथ इसी झोंपड़ी में ले आया था।
मंगरू मुनिया को मां बाप का प्यार देते हुए भीख मांग मांग कर पालने लगता है। वह उसे पढा लिखा कर बडा आदमी बनाना चाहता था।
मुनिया बचपन से ही पढ़ने लिखने के साथ साथ ही सभी काम करने में भी बहुत तेज थी। भले हीं वह अपाहिज थी, लेकिन सभी काम बड़ी फुर्ती से कर लेती थी।
पास के ही एक सरकारी स्कूल में मंगरु ने मुनिया का नाम भी लिखवा दिया था।
मगर शायद मुनिया के नसीब में तो कुछ और ही लिखा था। तभी तो बचपन में जन्म देने वाले मां बाप ने उसे उसके नसीब पर छोड़ सड़क किनारे लावारिस फेंक दिया था और अब पालने वाले पिता को भी ऊपर वाले ने अपने पास बुला लिया था।
बेचारा मंगरू अचानक एक दिन मर जाता है। उस समय मुनिया की उम्र मात्र 10 साल की थी। मुनिया पर तो मानों दुखों का पहाड़ ही टूट पड़ता है। मगर फिर भी वह अकेली अनाथ बच्ची हिम्मत नहीं हारती है।
वह बचपन से ही निडर और साहसी थी। अपने पालने वाले पिता के मर जाने के बाद भी वह हिम्मत नहीं हारती है।
उसका पढाई छूट गया था। अब वह अपने पालने वाले पिता के जैसे ही भीख मांग - मांग कर अपना जीवन गुजारने लगी थी।
मुनिया जब 12 साल की थी तो उसे एक दिन भीख मांग कर झोपड़ी में लौटते समय सड़क के किनारे एक बच्चा मिला था। वह बोल नहीं पा रहा था, मगर जिंदा था। शायद नहीं बोलने के कारण ही जन्म देने वाले मां बाप ने उसे लावारिस हालात में मरने के लिए सड़क किनारे फेंक दिया थे। मुनिया तो स्वयं अनाथ थी ही वह एक अनाथ के दुख दर्द को अच्छी तरह से समझती थी। वह बिना देर किए उस बच्चे को उठाकर अपनी झोपड़ी में ले आती है। वह बच्चा कोई और नहीं मोनू ही था। तभी से मोनू मुनिया के साथ रहने लगा था।
मुनिया के झोंपड़ी के आस पास रहने वाले दूसरे भीखारी उसे बहुत समझाते हैं कि वह यह क्या कर रही है। बच्चे पालना उसके बस की बात नहीं है। वह तो स्वयं ही अभी बच्ची थी। मगर 12 साल की मुनिया किसी की एक नहीं सुनती है। फिर क्या था उसके बाद तो मुनिया को अब जो भी बच्चा कहीं लावारिस हालत में मिलता वह उसे अपने पास ले आती थी।
देखते ही देखते इन 8 सालों में मुनिया के पास 20 बच्चे हो गए थे। चांदनी सबसे छोटी मात्र 15 महीने की थी। उसे भी किसी ने शायद अभागन लड़की समझकर सड़क किनारे फेंक दिया था। मुनिया अपनी झोपड़ी के बगल में ही सभी बच्चों के लिए दो और झोंपड़ी बना ली थी।
मुनिया के साथ-साथ अब कुछ बच्चे भी भीख मांगने लगे थे। जिससे सभी का गुजारा चल जा रहा था। मदद के लिए वह बहुत बार स्थानीय नेता एवं हाकिम के पास भी गई थी। मगर किसी ने आज तक कभी कोई मदद नहीं किया था। बस सभी झूठी आश्वासन दे देते थे।
थक हार कर मुनिया अब किसी हाकिम या नेता के आगे हाथ फैलाना ही छोड़ दी थी। वह अभी तक भीख मांग कर ही सभी बच्चों का देख भाल करते आ रही थी।
शाम होने को आई थी, मगर अभी तक बारिश थमने का नाम नहीं ले रहा था। सभी आज दिन भर कुछ खाये भी नहीं थे। झोपड़ी में पानी भरा था जिसके कारण खाना नहीं बन सका था। इसीलिए सभी सुबह में सिर्फ बिस्किट बाजार से लाकर खाए थे। लगातार बारिश होने के कारण भीख भी अभी बहुत कम मिल रहा था।
खाने और कुछ पैसों के जुगाड़ में ही मुनिया आज सुबह ही अपने साथ मोहन जो कि सभी के साथ ही रहता था को लेकर कहीं गई थी।
सभी अभी भूख से व्याकुल एवं बारिश के पानी से भीगते हुए परेशान ही थे कि तभी मुनिया लाठी के सहारे चलती हुई मोहन के साथ वहां आ जाती है। दोनों पूरी तरह से भीगे हुए थे। दोनों के कपड़े एवं पैर भी कीचड़ में सने थे।
सभी बच्चे दोनों के हाथ में खाना देख अपना सभी दुःख दर्द भूला कर खुश हो जाते हैं।
एक भले आदमी के यहां आज उनके बेटे का जन्मदिन था। मगर बारिश के कारण मेहमान कम आए थे। जिसके कारण खाना बहुत बच गया था। इसीलिए उस भले आदमी ने मुनिया को बहुत सारा खाना दे दिया था।
सभी को खाते-खाते रात हो जाती है। अभी बारिश भी बंद हो गई थी। झोपड़ी में पानी भरा होने के कारण धनिया सभी को लेकर सोने के लिए पास के ही एक निर्माणाधीन पुल की ओर चल देती है। पास में ही एक फ्लाईओवर बन रहा था। उस पुल के नीचे अभी बारिश का पानी जमा नहीं था। इसलिए बारिश में रात बिताने का उससे अच्छा जगह शायद मुनिया को कहीं नजर नहीं आया था। वह सभी को लेकर वही चली जाती है।
फुलवा चांदनी को लेकर वहां नहीं जाती है। चांदनी को बारिश में भीगने के कारण बुखार लग था। इसीलिए फुलवा चांदनी के साथ ही झोपड़ी में अकेले रूक जाती है ताकि वह उसे यहां अच्छी तरह से देखभाल कर सकें।
झोपड़ी में लकड़ी का एक टूटा हुआ चौकी था। उसी पर फुलवा चांदनी के साथ सो जाती है।
उधर बाकी के सभी बच्चे भी मुनिया के साथ पास के पुल के नीचे आकर सो जाते हैं।
अभी रात के 12 ही बजे थे कि अचानक फिर से जोरों की आंधी एवं बारिश शुरू हो जाती है।
आंधी इतना तेज था कि पुल के नीचे सो रहे सभी बच्चे एवं मुनिया भी बारिश की तेज फुहारों से भींगने लगते हैं। सभी उठकर बैठ जाते हैं। तेज आंधी और बारिश देख मुनिया को फुलवा एवं चांदनी की चिंता सताने लगती है। पता नहीं इतनी तेज बारिश एवं आंधी में वह कैसे झोपड़ी में रह रही होगी।
मुनिया से जब रहा नहीं जाता है, तो वह गोलू और मोहन को यहां के बच्चों को देखभाल करने के लिए कह कर स्वयं अकेली लाठी के सहारे चलती हुई झोपड़ी की ओर चल देती है। सभी बच्चों में गोलू ओर मोहन ही सबसे बड़े और समझदार थे।
एक तो रात और ऊपर से तेज़ आंधी और बारिश के कारण उस समय कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। फिर भी मुनिया अपनी लाठी के सहारे धीरे-धीरे झोपड़ी की ओर चिंतित चली जा रही थी। पता नहीं क्यों उसे आज फुलबा और चांदनी की चिंता ज्यादा सता रही थी।
इधर झोपड़ी में फुलवा और चांदनी अभी सो ही रही थी कि अचानक बारिश की तेज़ बूंदे जब शरीर पर गिरने लगी तो दोनों की नींद टूट गई। फुलवा चांदनी को पानी से बचाने के लिए उसके ऊपर झुक कर ढाल बन जाती है। मगर तभी तेज़ आंधी में झोपड़ी का छप्पर उड़ जाता है। छप्पर विहीन झोपड़ी में बारिश की तेज़ बूंदे दोनों के ऊपर गिरने लगती है। दोनों पानी से भींगने लगते हैं।
फुलवा पानी से बचने के लिए अभी कोई उपाय सोच ही रही थी कि तभी चांदनी के ऊपर झोपड़ी के छप्पर वाला एक मोटा लकड़ी गिर जाता है। उसके सिर पर जोरों की चोट लगती है। बेचारी 15 माह की चांदनी का सिर लकड़ी के चोट से फट जाता है। खून माथे से बारिश की बूंदों के जैसे ही तेजी से बाहर निकलने लगता है। चांदनी की ऐसी हालत देख फूलवा बिलख उठती है। उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि ये सब कैसे हो गया।
अचानक वह चांदनी को गोद में उठाकर बदहवास उसी पुल की ओर दौड़ पड़ती है जिधर मुनिया सहित सभी बच्चे सोने गए हुए थे।
आसपास के झोपड़ी में भी उस समय कोई नहीं था। बरसात का पानी सभी झोपड़ी के अंदर भी भरा हुआ था, जिसके कारण वहां रहने वाले सभी लोग रात को सोने के लिए इधर उधर कहीं गए हुए थे।
फुलवा चांदनी के लहूलुहान शरीर को हाथों में लिए जैसे ही झोपड़ी से कुछ ही कदम आगे जाती है कि तभी सामने से मुनिया भी वहां आ जाती है।
चांदनी की हालत को देखकर तो उसके पांव तले की जमीन खिसक जाती है। वह भी तड़प उठती है। वह भले अभी 19 साल की एक लड़की थी। मगर एक मां के ममत्व की छाव अभी से ही उसके रग रग में रच बस गया था।
मुनिया जैसे ही चांदनी को अपनी गोद में लेना चाहती है कि उसके शरीर के स्पर्श होते ही उसका खून मानों सूख जाता है। चांदनी का पुरा शरीर ठंडा पड़ा हुआ था। वह मर चुकी थी।
सुबह मुनिया और उसके साथ रहने वाले सभी अनाथ बच्चे झोपड़ी के बाहर ही उदास बैठे थे। चांदनी के मरने का दुख सभी को था। सभी उससे तोतली आवाज में बात करके बहुत खुश होते थे।
फुलवा के लिए तो चांदनी ही उसकी दुनिया थी। और अब उसकी वही दुनिया लुट गई थी।
मुनिया के जीवन में बहुत सारी कठिनाइयां आईं थी। मगर उसे इतना हताश और निराश आज तक किसी ने कभी नहीं देखा था। चांदनी उसके झोपड़ी में रहने वाली पहली अनाथ बच्ची थी, जिसने उसके सामने अपना दम तोड़ी थी। नहीं तो आज तक वह यमराज से लड़कर भी सारे दुख तकलीफों से सभी को अकेले ही बचाते आ रही थी।
मुनिया चांदनी को रात में ही पास के नहर में ले जाकर दफना आई थी।
सभी अभी झोपड़ी के आगे उदास, गमगीन, चुपचाप बैठे ही थे कि अचानक मुनिया स्थानीय विधायक रमदहिन सिंह से मिलने के लिए चल देती है। मोहन साथ चलने को कहता है, मगर उसे वहीं पर सभी के पास रहने को बोलकर वह अकेले ही विधायक जी से मिलने के लिए उनके घर की ओर चल देती है। मुनिया के झोपड़ी से कुछ ही दूरी पर विधायक जी का घर था।
विधायक रमदहिन सिंह से मिलने की वह बहुत बार कोशिश की थी। मगर आज तक उसे कभी किसी ने मिलने नहीं दिया था। क्योंकि वह रहती तो विधायक जी के ही क्षेत्र में थी, मगर वह उनकी वोटर नहीं थी। मगर इसमें भी उसका क्या दोष था। किसी ने उसका वोटर कार्ड अभी तक बनवाया ही नहीं था, और न ही कोई कभी पुछने आया था।
मुनिया तो अब सभी से मदद की उम्मीद भी छोड़ दी थी। मगर आज चांदनी के साथ घटी घटना ने उसे फिर से मदद मांगने को विवश कर दिया था।
आज वह मन में किसी भी हालत में मिलने को ठान कर अपनी लाठी के सहारे तेज़ी से विधायक जी के घर की ओर बढ़ी चली जा रही थी।
पिछले कई दिनों से हो रहे लगातार बारिश के कारण आज विधायक जी के घर पर भी बहुत कम भीड़ थी। बस उनके कुछ खास लोग ही इस समय घर के बाहर बरामदे में बैठे थे। अभी भी आकाश में बादल छाए हुए थे।
मुनिया जब वहां पहुंचती है तो वहां भीड़ नहीं देख मन ही मन बहुत खुश हो जाती है। आज वह विधायक जी से जरूर मिलेगी।
मगर उसकी खुशी आज भी धरी की धरी रह जाती है, जब उसे गेट के पास ही एक सिपाही रोक देता है। वह लाख विनती करती है कि "- विधायक जी उसके साथ रह रहे बच्चों के रहने की कहीं व्यवस्था एवम् कुछ आर्थिक मदद कर देंगे तो कम से कम सभी को बरसात में रहने के लिए छत एवम् खाने के लिए भोजन मिल जाता।"
मगर गेट पर खडा सिपाही एवम् पास में ही बैठे विधायक जी के लोग उसकी एक नहीं सुनते हैं। उल्टे विधायक जी का सबसे खासम खाश धीरज के मन में मुनिया को अकेले देख उसके जिस्म को नोचने की मंशा जागृत हो जाती है।
धीरज उसे यह बोलकर कि " - विधायक जी अभी सो रहे हैं, जब उठेंगे तो मिला देंगे।" उसे झूठी दिलासा देकर रुकने को मजबूर कर देता है।
बेचारी उस अपाहिज, लाचार एवम् अनाथ मुनिया को क्या पता था कि आज के सभ्य समाज के समाजसेवी का चोला पहनने वाले ये ठेकेदार उसकी इज्जत को नोच खाने के लिए मन ही मन योजना बना लिए थे।
बेचारी मुनिया विधायक जी से मिलने की आस में गेट के पास ही बैठ जाती है।
दोपहर से अब शाम हो गई थी। मगर विधायक जी से मुनिया अभी तक नहीं मिल पाई थी। पूछने पर उसे बार बार यही जवाब मिलता था कि अभी तक विधायक जी सो ही रहे हैं।
अब धीरे-धीरे फिर से बारिश भी होने लगी थी। मुनिया को बच्चों की चिंता भी अब सताने लगी थी। पता नहीं सभी ने आज कुछ खाया भी था या नहीं। वैसे तो वह आते समय गोलू और मोहन को बोल कर आई थी कि सभी को बाजार से कुछ लाकर खिला देना। फिर भी उसका मन रह रहकर उधर ही चला जा रहा था।
इंतजार करते करते जब मुनिया से रहा नहीं गया, तो वह निराश वापस अपनी झोपड़ी की ओर जाने का मन बना लेती है। बारिश भी अब धीरे-धीरे और तेज होते जा रही थी।
मुनिया गेट से अभी 10-15 कदम ही दूर गई होगी कि दौड़ता हुआ धीरज वहां आ जाता है। वह मुनिया को विधायक जी से मिलाने के बहाने घर के अंदर की ओर लेकर चल देता है।
इधर मुनिया विधायक जी से मिलने की खुशी में फूली नहीं समा रही थी, और उधर धीरज मुनिया के अनछुई बदन को नोचने का अभी से ही आनंद उठाता हुआ मन ही मन मुस्कुरा रहा था। वह मुनिया को लेकर घर के पिछले हिस्से में बने गार्ड रूम की ओर चल देता है।
मुनिया थी भले अपाहिज, मगर उसका दिमाग बहुत तेज था। वह धीरज को घर के पिछले हिस्से में बने गार्ड रूम की ओर ले जाते देख चौंक जाती है। वह धीरज की मंशा तुरंत भाप लेती है।
धीरज की मंशा भापते ही वह तुरंत अपनी लाठी के सहारे तेजी से वापस मुख्य दरवाजे की ओर चल देती है।
मगर कहां अपाहिज मुनिया और कहां धीरज जैसा हट्टा कट्टा तंदुरुस्त आदमी। वह उसे तुरंत पकड़ लेता है। वह मुनिया के मुंह को बंद करके जबरदस्ती खींचते हुए एक कमरे की ओर ले जाने लगता है।
मुनिया तो थी भले अपाहिज मगर वह कमजोर या डरपोक नहीं थी। वह धीरज को एक तरफ ढकेल कर बिना लाठी के ही अपनी पूरी ताक़त लगा कर तेज़ी से बाहर की ओर दौड़ पड़ती है।
पीछे से धीरज भी उठ कर अपने गंदे कपड़े को साफ करता हुआ दौड़ पड़ता है। उस समय तक शाम हो चली थी। बारिश भी अब तेज होने लगी थी।
एक अपाहिज अबला और एक तंदुरुस्त आदमी के उस भागम भाग में आखिर कार हमेशा की तरह हार अबला की ही होती है। मुनिया हार कर भी जीते जी अपने ऊपर एक खरोच तक नहीं आने देती है।
मुनिया भागते भागते अचानक एक गहरे गड्ढे में जो पुल बनाने के लिए किया गया था गिर जाती है। बारिश के पानी से गढढा पूरी तरह से भरा होने के कारण उसे दिखाई नहीं दिया था। मुनिया……. बेचारी वो अपाहिज अनाथ मुनिया.... सदा के लिए उसी पानी की होकर रह जाती है, क्योंकि उसे तैरना नहीं आता था।
धीरज भी पसीना पोछता हुआ अपने जिस्म के अंदर के वासना रूपी कीड़े को शांत नहीं कर पाने के गम में उदास विधायक जी के घर की ओर वापस चल देता है। उसे देख ऐसा लग रहा था मानो अभी यहां कुछ हुआ ही नहीं था।
आखिर आज का कलयुगी इंसान इतना निर्दय, क्रूर और संवेदनहीन कैसे हो गया है। उसे तो जरा भी आभास नहीं होगा कि मुनिया के मरने के बाद उन 18-20 अनाथ बच्चों पर अब क्या बीतने वाली थी। उन लोगों के लिए तो मुनिया ही उनकी ज़िंदगी थी।
वाह रे कलयुगी इंसान ! धन्य हो आप और आपकी समाज सेवा की दिखावटी दिव्य स्वरूप।
मुनिया के देखभाल में पल रहे सभी बच्चों ने उसके इंतज़ार में किसी तरह रात तो गुजार दिए थे। मगर सुबह होते ही सभी अपनी भगवान स्वरूप मुनिया दीदी को खोजने के लिए निकल पड़ते हैं।
पास के निर्माणाधीन पुल के नजदीक एक गहरे गड्ढे में तैरती अपनी मुनिया दीदी की लाश को देखकर सभी सन्न रह जाते हैं। किसी ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उन्हें ऐसा दिन भी देखने को मिलेगा।
सभी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि अब वे लोग क्या करें, उनके लिए तो मुनिया ही सब कुछ थी।
किसी को कुछ समझ में नहीं आया तो अंत में सभी चुपचाप आंखों में आंसू लिए मुनिया के मृत शरीर को घेर कर वहीं बैठ गए।
आखिर वे अनाथ, लावारिस बच्चे रोते भी या कुछ कहते भी तो उसकी बात को सुनने वाला यहां था कौन ? तभी तो भारत में आज भी लाखों गरीब लावारिस बच्चे फुटपाथ पर जीने एवं रहने को मजबूर थे।
कुछ देर के बाद ही पहले कुछ आम आदमी तो फिर कुछ पुलिस वाले भी वहां आ जाते हैं।
आम आदमी अपने स्वभाव अनुसार मुनिया के मरने के बाद उसे इंसाफ दिलाने के लिए हंगामा करने लगते हैं।
सभी अनाथ बच्चे अभी भी चुपचाप आंखों में आंसू लिए वैसे ही बैठे थे।
आम आदमी की भीड़ बढ़ते ही जा रही थी। अंत में एक अपाहिज भिखारी अबला के मरने के बाद उसे इंसाफ दिलाने के लिए सभी उग्र भी हो जाते हैं।
हंगामा बढ़ने पर एसपी एवम् डीएम साहब को भी वहां आना पड़ता है।
मौके का फायदा उठाने के लिए पीछे से स्थानीय वही विधायक जी भी आ जाते हैं, जिनसे मिलने मुनिया कल गई थी।
धीरज भी विधायक जी के साथ ही आया था। उसके चेहरे पर किसी तरह का कोई अफ़सोस का भाव नहीं था। वह इस समय चकाचक सफेदी वाला सफेद कुर्ता पायजामा पहने हुए था।
विधायक जी को अब उसी मुनिया की लाश पर राजनीति करने से फायदा दिखने लगा था, जो कल तक उनकी वोटर नहीं थी।
आज मुनिया सभी को मर कर बता गई थी कि अपाहिज वह नहीं थी, बल्कि अपाहिज तो हमारा सिस्टम, हमारा समाज और हमारी सोच हो गई थी। तभी तो आज भी उसके जैसे न जाने कितने अपाहिज़ बच्चे लावारिस सड़क किनारे आए दिन मिल रहे थे।
कोई मुनिया जैसी अपाहिज़ लडकी समाज के लिए कोढ़ या दाग नहीं होती है, बल्कि आज कोढ़ या दाग तो हम जैसे सभ्य समाज मैं रह रहे तंदुरुस्त लोगों की मानसिकता में है।
कुमार सरोज
शानदार कहानी
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद आपका
हटाएंBahut hi achchi kahani
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत धन्यवाद
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