पीली छतरी वाली लड़की / Pili Chhatari Wali Ladaki । कविता । चंद्रबिंद ।

पीली छतरी वाली लड़की

                         चंद्रबिंद 


एक अधूरा सवेरा
धीरे-धीरे खिसक रहा है।

आज समंदर थोड़ी जल्दबाजी में है
वह उछलकर 
चूम लेना चाहता है 
उसके लाल - लाल होठों को
अंतिम बार।

पहाड़ के पीछे छुपा सूरज
अब और
ऊपर आ चुका है।






शहर अखबार के पन्नों पर
धीरे - धीरे 
अपनी आंखें खोल रहा है।

अरसे  बाद
फुलुआ की माई
फ़िर निकल पड़ी है
जलावन की तलाश में।

कचरे वाली गाड़ी
रोज़ की तरह गा रही है
गाड़ी वाला आया है
तू कचरा निकाल।

आँख मलता हुआ बचपन
खड़ा है
पीली बस के इंतज़ार में।

रूखिया आज फिर
खेला रही है
तेतरी माता को।

देर रात से ही
सुगन भगत कह रहा है
यह लोकतंत्र की हत्या है ।

ठीक उसी वक्त
किसी चैनल पर
एक  बाबा
यह बता रहे हैं कि
आपका आज का दिन कैसा होगा ?

मंटू को बस तलाश है
एक अदद गुलाब की
उस पीली छतरी वाली
गोरी लड़की के लिए।

अब सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच
सिर्फ़ एक पहाड़ है
एक नंगा पहाड़
जहाँ अब न गुलाब है
न समंदर
न ही पीली छतरी वाली 
वह गोरी लड़की ।


                     चन्द्रबिन्द  

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