चंद्रबिंद : एक उम्मीद और आशा के कवि । बिहार कृति कथा । सुनील सिंह ।
चन्द्रबिंद : एक उम्मीद और आशा के कवि
सुनील सिंह
कहते हैं कि बारीकी और संश्लेष को सर्वोत्तम रूप में पाना हो तो कविता के पास जाइये, युग-जीवन का वैविध्य और धारणा-क्षमता का वैभव देखना हो तो उपन्यास के पास जाइए।यह बारीकी और संश्लेष एक कवि के रूप में चंद्रबिंद में पाते हैं।इसका एक उदाहरण इन पंक्तियों के माध्यम से समझा जा सकता है:
दुख भी तरल होता है
पानी जैसा……
निराकार
वह जिसमें प्रवेश करता है
उसी का रूप लेता है
यह है किसी की चीज को बारीकी से देखना और फिर उसे बृहत् रूप में देना।अपनी 47 कविताओं का कविता संग्रह ‘फल्गु संग्रह’ के माध्यम से चन्द्रबिंद अपने आपको प्रेम, प्रतिरोध और मनुष्यत्व के कवि के रूप में आते हैं।यह बात और कोई नहीं जनकवि आलोक धन्वा लिखते कहते हैं,”चंद्रबिंद प्रेम कविताएँ अधिक लिख रहे हैं।” इसके पीछे जो कारण है उसके बारे में आलोक जी लिखते हैं,” एक ऐसा समाज है जहाँ यौन हिंसा की बर्बर एवं मध्ययुगीन घटनाएँ घट रही हैं।ऐसे में इनकी प्रेम कविताएँ यौन हिंसा के विरूद्ध खड़ी हो रही हैं।”लड़कियाँ’, ‘खाप की लड़कियाँ ‘,’ पीली छतरी वाली लड़की ‘,’ एक लड़की की डायरी से ‘,’स्त्री ‘,’ हम कठपुतलियाँ ‘, ‘क़ब्रगाह की प्रेम कविताएँ ‘, ‘अकथ कहानी प्रेम की ‘,’ एक टुकड़ा प्रेम की ‘,’ एक टुकड़ा प्यार ‘,‘सिर्फ़ प्यार ‘,’जो बचा रह जाता है ‘ आदि कुछ ऐसी ही कविताएँ हैं जो आलोक जी द्वाराइस पुस्तक के ब्लर्ब पर लिखे भाव को स्पष्ट करता है।’ ’ एक लड़की की डायरी से ‘ कविता इस बदलते समय को चित्रित करते हैं।वह लिखते हैं:
मैं तरसती रही
उस प्यार के लिए
जिसे तलाशती
नदी सागर से मिलती है
‘ पर… ‘
हर बार
मुझे मिला
बस ‘ एक पुरूष ‘
जो ज़िद पर अड़ा था
और ‘ प्यार ‘
उसके सामने
घुटनों केबल खड़ा था।
चंद्रबिंद जी भोजपुर ज़िले के किसान परिवार से आते हैं और वर्तमान में केन्द्रीय विद्यालय में स्नातकोत्तर शिक्षक के पद पर कार्यरत हैं।पूर्व में वह शिक्षा मंत्रालय भारत सरकार द्वारा ‘संभागीय प्रोत्साहन पुरस्कार ‘ तथा बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा ‘युवा साहित्य सम्मान प्राप्त है।इनकी हिन्दी कविताएँ अलग-अलग समयों पर पत्रिकाओं में छपती रही है।अपने स्वभाव एवं लेखनी के कारण बौद्धिक जगत में पहचान बना चुके हैं।
एक ऐसे समय जब पूंजीवाद की हवस की वजह से पर्यावरण, मनुष्यत्व और प्रेम नष्ट होने की कगार पर है।चारों ओर विनाशलीला जारी है।नदियों का सूखना, इसके पानी का मिठास ख़त्म होना , धीरे-धीरे प्रकृति की विविधता का लुप्त होना जिस तेज़ी जारी है ।लेकिन चंद्रबिंद आशावादी हैं और उनके द्वारा लिखित कविता ‘फल्गु किनारे ‘ की ये पंक्तियाँ प्रासंगिक हो जाती है:
एक दिन लौटेंगे वृक्ष
और पूछेंगे
जंगल के बारे में
एक दिन लौटेंगे पक्षी
और पूछेंगे
पहाड़ों के बारे में
इसी प्रकार फसलें , आदमी आदि सभी लौटेंगे और अन्त में उस परम्परा का ज़िक्र करते हैं:
हर चीज़ लौटकर
आती है एक दिन
एक दिन लौटेंगे
हमारे पुरखे भी
पितृपक्ष में
फल्गु किनारे
और हमसे पूछेंगे
उन सब के बारे में
जिन्हें वे छोड़,
चले गए थे।
जब आज बाज़ारवाद इस कदर हावी है ऐसे में अपनी कविताओं को पाठकों और साहित्यकारों तक पहुँचाने का यही रास्ता है कि आप स्वयं बीड़ा उठायें।अपनी मेहनत और लगन के द्वारा चंद्रबिंद ने यह साबित करने की कोशिश की कि कविता से कवि जाना जाता है न कि कवि से कविता।एक कवि के रूप में वह अपनी प्राथमिकताएँ भी तय करते हैं।अपनी कविता ‘कवि को क्या चाहिए ‘ वह लिखते हैं:
कवि को क़तई नहीं चाहिए
कविता की दलाली करने वाले
ऐसे प्रकाशकों, संस्थानों और रचनाकारों का साथ
जो भाषा की तमीज़ को
अपने बाप दादा की जागीर समझते है।
बुद्धिजीवियों में घर कर रही चुप्पी और निराशा को लेकर वह चिंतित हैं।बुद्धिजीवियों से उसके बुद्धिजीवी होने पर सवाल उठाते है।अपनी कविता में ‘बुद्धिजीवी ‘ लिखते हैं:
क्योंकि मुझे बुद्धिजीवी बनना है
इस नाते
यह जानना ज़रूरी है कि
अगर कोई हिंदू है
तो वह कितना हिंदू है?
अगर कोई मुसलमान है
तो वह कितना मुसलमान है?
आगे वह इसी कविता में लिखते हैं :
क्योंकि मुझे बुद्धिजीवी ही बनना है
इस नाते
मैंने सीख लिया है
सत्य-असत्य
सही-ग़लत
नैतिक-अनैतिक
उचित-अनुचित
जैसे शब्दों से बचना।
चूँकि मुझे बुद्धिजीवी बनना है
इस नाते मैंने
गढ़ लिए हैं
ढेर सारे
नए मुहावरे और लोकोक्तियाँ।
यहीं नहीं।अपनी कविता ‘रक्तबीज ‘में इन बुद्धिजीवियों के पुरुषार्थ और सामर्थ्य पर सवाल खड़ा करते हैं।
नहीं कृष्ण, नहीं
मैं नहीं मानता
तुम सब जानते थे
तुम जानते थे कि …
गंगा-पुत्र भीष्म एक ऐसी आत्मा को ढो रहे थे
जो क्षत-विक्षत, घायल और जर्जर थी।
कृष्ण!क्या यह सच नहीं?
कि शरीर का मरना
उतना ख़तरनाक नहीं होता
जितना आत्मा का मर जाना।
कवि अपने समय से मुठभेड़ करते हैं।कवि आज के समसामयिक सवाल को उठाने से नहीं कतराते हैं।पिछले दिनों जब किसान आंदोलन चल रहा था पूरा देश इनके साथ खड़ा था।भला जनवादी कवि चंद्रबिंद कैसे चुप रह सकते हैं।अपनी कविता ‘बादशाह के दरबार में ‘ लिखते हैं:
हुजूर …
सूना खेत खलिहान है
सड़कों पर बैठा किसान है।
ऐसे ही एक कविता है ’ बापू का चश्मा ’।मौजूदा निजाम में जिस प्रकार गांधी पर हमला हो रहा है और गांधी की जो हालत है उसका वर्णन करते हुए लिखते हैं:
बेबस प्रस्तर बन पड़ा हूँ
उपेक्षित साक्षी-सा खड़ा हूँ
रैलियों का रेला का
जातियों के मेला का
क़दमताल करते अधिकारी
राजनैतिक मृदंग पर
बाट जोहते बुद्धिजीवी
निष्ठा है दांव पर
डूब चूकी है व्यवस्थाएँ
अशिक्षा बदहाली में
भीख माँगता बचपन
कुछ नहीं है थाली में,
मर चुकी है आत्मा
मीरा और रसखान की
नहीं चौंकाता अब हमें
कुकृत्य किसी हैवान का।
बापू एक सहारा है
लव जिहाद का नारा है
यह भारतवर्ष हमारा है।
चंद्रबिंद की कविताएँ किसी यथार्थ से मुठभेड़ करती दिखाई देती है।इनकी कविताएँ इस हिंसक और लोमहर्षक समय में तमाम तरह की असंगतियों और विद्रूपताओं के बीच हमारी नागरिक चेतना को जानने, समझने और उसे संरक्षित करने का काम करती हैं।आज के समय की प्राथमिकताओं को दर्ज करती है।
आज इनका पहचान एक कवि के रूप में है इसलिये इनके जन्मदिन पर इनकी लिखी कविता से इनका परिचय कराना आवश्यक समझा। मैं कोई आलोचक नहीं हूँ।एक पाठक की हैसियत से इस पुस्तक से गुजरने के बाद मैंने अपना विचार रखा है।
आज इनके जन्मदिन ( 20 फरवरी ) पर हार्दिक बधाई एवं उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ।
सुनील सिंह
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