सोचो साथ क्या जाएगा / Socho Sath Kya Jayega । कविता । चंद्रबिंद ।
सोचो साथ क्या जाएगा
चंद्रबिंद
लेते–लेते जीवन गुजरा,
देते नहीं बन पाएगा |
अंत समय अब आया फकीरा,
खाली हाथ रह जाएगा|
सोचो साथ क्या जाएगा ,
सोचो साथ क्या जाएगा |
जीवन एक पहेली है ,
यहाँ न कोई सहेली है|
कल तेरी बारी आएगी ,
तो साथ किसे ले जाएगा |
सोचो साथ क्या जाएगा ,
सोचो साथ क्या जाएगा |
जीवन भर बेसुध रहा ,
अब अंत में सब कुछ सूझ रहा |
कोशिश कर पछताएगा,
कोई न साथ निभाएगा |
सोचो साथ क्या जाएगा ,
सोचो साथ क्या जाएगा |
यह दुनिया रंग बिरंगी है ,
पर सत्कर्मों की तंगी है |
यह माया का सब फेर है ,
फिर भी हुआ नहीं देर है |
सोचो साथ क्या जाएगा ,
सोचो साथ क्या जाएगा |
आँखों पर तेरी अंजन है ,
मन ढूंढ रहा कुछ ‘खंजन’ है |
यहाँ हर इंसान अधूरा है ,
फिर भी बना जमूरा है |
कौन तेरा कर्ज चुकाएगा ,
सोचो साथ क्या जाएगा |
चारों ओर अँधेरा है ,
दिखता नहीं सवेरा है |
सबके अंदर द्वंद्व है ,
ज्ञान की आभा मंद है |
तमसो मा ज्योतिर्गमय ,
यह अलख कौन जगाएगा |
सोचो साथ क्या जाएगा ,
सोचो साथ क्या जाएगा |
चंद्रबिंद
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