साथ तुम्हारा / Sath Tumhara । कविता । निधि नितिमा ।

          साथ तुम्हारा

                    निधि नितिमा 



नहीं चाहिए सोना चांदी ,
नहीं चाहिए हीरे मोती
ना ही कोठी गाड़ी 
चाहत बस तेरे साथ की।

शाल दुशाला किसने चाहा
चाहत तेरे बाहों के नर्म घेरे की
नहीं चाहिये कोई मौज मस्ती, 
या कोई सैर सपाटे 
बस तेरे साथ बैठी रहूं नदी किनारे।






नहीं है चाहत छप्पन भोग की 
दो निवाले तू प्यार से खिला दे 
तेरे प्यार के दो मीठे बोल में 
छिपी हुई है जन्नत इस जहां की।

दूर होने का मतलब दूरी नहीं 
मुझे तो हर वक़्त महसूस होता है एहसास तुम्हारा, 
कट जाएगा ये जीवन सारा 
ग़र मिल जाये बस
साथ तुम्हारा साथ तुम्हारा।


                      निधि नितिमा 

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