फल्गु किनारे / Falgu Kinare । कविता । निधि नितिमा ।
फल्गु किनारे
निधि नितिमा
सोने से पहले
तुमको सोचा करती हूं
और सोचते हुए ही
सो जाया करती हूं ।
फिर जीती हूं सपने में
उन सभी बातों को
उन सभी वादों को
उन मुलाक़ातों को
जो बातें तुमसे करती हूं।
उनको जीवंत कर लेती हूं
तुम्हारे सपनों को
साकार होते देखती हूं
और घूम आती हूं
तुम्हारे साथ
जमीन से अम्बर तक,
मरू से समंदर तक।
पीपल के पत्तों की ओट में
छिपी गिलहरी की कुट कुट
या गौरैया की छुन छुन
कि मधुर ध्वनि
कहीं दूर से आती
मंदिर से शंख और घंटों का नाद
सब सुनाई देता है।
महसूस करती हूं
जब थामे रहती हूं
मैं हाथ तुम्हारा
जी लेती हूं स्वप्न में ही
सुकून के वो चंद पल
जब बैठी रहती हूं
साथ तुम्हारे फल्गु किनारे
फल्गु किनारे साथ तुम्हारे।
निधि नितिमा
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