वक़्त की पुकार /। Vakt Ki Pukar । कविता । निधि नितिमा ।

            वक़्त की पुकार

                             निधि नितिमा 



आजकल क्या हो रहा है ,
यह हमारे पड़ोस में ?
सभी रक्तरंजित हैं ,
एक दूजे के खून के
प्यासे हो रहे हैं।

भाई , भाई के दुश्मन हो रहे,
क्या यही है हमारी,
मानवता का संदेश,
अमन का पैगाम।






लोग क्यों नहीं समझते,
इस कत्लेआम से कुछ नहीं होगा,
जाति, धर्म , मज़हब के नाम पर,
लोगों को लड़ाने वाले,
आज अपने ही धर्म के लोगों को,
आतंकवाद के बल पर मार रहे हैं।

क्या यही है हमारा वसुधैव कुटुंबकम ?

आज कहां हैं वे लोग,
जो धर्म का पाठ पढ़ाते थे,
और कहां हैं वो विश्व के नेता,
जो ख़ुद को सर्वोच्च समझते हैं।

कोई तो आख़िर पहल करे,
कोई तो बच्चों और महिलाओं की रक्षा करे।
उनकी चीत्कार से क्यों किसी का,
दिल नहीं पसीजता है ?

मेरी यही गुजारिस है सभी से,
अमन और सौहार्द की पहल हो,
सरफिरों को शांति का पाठ पढ़ाएं ,
ताकि हमारी वसुधा फिर से,
एक बार जीवंत हो सके,
और जग में फिर से,
वसुधैव कुटुंबकम कायम हो जाए।

और यही शायद आज के,
वक्त की पुकार है।



                     निधि नितिमा 

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