मेरी ख्वाहिश / Meri Khwahish l कविता । निधि नितिमा ।

            मेरी ख्वाहिश

                          निधि नितिमा 



तुम्हारे साथ
मन उड़ना चाहता है।
खुले आसमां में,
परिंदों की तरह ,
जिसे कोई रोकता नहीं ।

घूमना चाहती हूं दुनियां,
डाल कर हाथों में हाथ,
तुम्हारे साथ।






बंद कमरे में नहीं,
खुली सड़कों पर,
टेढ़े मेढे राहों पर ।

बैठना चाहती हूं,
सांझ सबेरे नदी किनारे,
और सुनूं पक्षियों का कलरव, 
मंदिर के घंटों की मधुर ध्वनि।

चुप रहो तुम,
चुप रहूं मैं,
कोई कुछ न बोले,
बस बैठे रहे एक साथ,
एक दूजे का हाथ थामे।

बस सुनते रहे ,
एक दूजे की धड़कन,
और बिन कहे ही,
 सब कुछ समझ जाए।

अब नहीं रहा जाता,
मुझे तुम बिन,
सुनो चलोगे न,
 तुम साथ मेरे, 
 बैठने नदी के तट पर,
सुनने दिल की,
मेरी ख्वाहिश।


                      निधि नितिमा 

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