दफ़्तर की एक छोटी सी दुनिया / Daftar Ki Ek Chhoti Si Duniya । कहानी । रूचि रूह ।
दफ़्तर की एक छोटी सी दुनियां
रूचि रूह
हर सुबह वही रोज़ दफ़्तर के लिये चले जाना, कई बार मन से तो कई बार बेमन से, चित परिचित लोगों का रोज़ मिलना। आपा धापी के इस जीवन में अपने लिये वक़्त ना निकाल पाना और कहना कि - " अपनों की जरूरतों और जीवन यापन को अच्छे से पूरा करने के लिए काम तो करना ही है। "
कभी तनावों का साथ तो कभी मुस्कुराहटों की बौछार का संग
कुछ लोगों को क़रीब ला रहा था।
दफ़्तर की फाइलों के बीच कुछ और भी था जो दब सा रहा था।
औपचारिकताओं ने अनौपचारिकता को ढकना शुरू कर दिया था, और एक जरूरत से ज्यादा दिखावटी और व्यवहारिक इंसान बनना शुरु कर दिया था।
उसी दफ़्तर के हजारों लोगों में से कुछ लोग आज भी थोड़ा जिंदा थे, जहाँ रोबोट बनी जिंदगी में से कुछ पल निकालकर वो परिवार की बाते कर लिया करते थे।
दफ्तर के उन दोस्तों के झुंड से खुद के लिये वक़्त निकाल ही लिया और एक सफ़र तय किया। "अंजान से अपनेपन तक का सफ़र । " रातों को जगना, खूब बातें करना, नए नए नामों से एक दूसरे को बुलाना और ठहाके लगाकर फिर हंस जाना। सबकी अपनी अलग एक जिंदगी है जहाँ के वो मजबूत स्तम्भ हैं, पर वहां वो बच्चों की तरह मदमस्त हैं।
सब अपने अपने हिस्से की जिम्मेदारियों में असल जिंदगी में फंसे हुए हैं। उन में से एक दोस्त नए रास्ते की ओर अग्रसर है। सात फेरों की तैयारी में ख़ुश हैं तो कई और नयी जिम्मेदारियों को निभाने के लिये बेताब है। सब उसको अपना अपना अनुभव साझा कर रहे हैं जीवन का।
किसी के घर आई है एक नन्ही परी, तो कोई एक बहुत अच्छी बहु की बहुत सी जिम्मेदारियों को निभाते हुए। वक्त निकालकर चली आई, तो किसी की मुस्कराहट ठहाके वाली बेमिसाल है, तो कोई अपने हमसफर के संग एक यादगार जन्मदिन मनाने की खातिर अगले दिन आ पाता है, तो एक परिवार की खातिर कुछ जिम्मेदारियों को निभाने दो दिन पहले ही जा चुकी है तो एक मन से बैचैन है। ना जा पाने के लिये क्यूंकि उसकी गोद में एक और आगमन हुआ है नयी जिम्मेदारी का।
कितनी ही जिम्मेदारियों को हम चुपके से निभा ले जाते हैं, कब हम समझदार बन जाते है, कब हम सच में बड़े हो जाते हैैं पता ही नहीं चलता। परिवार की जिम्मेदारियों को निभाते निभाते अपने हिस्से की ख़ुशीयों को निभाना भूल जाते हैं हम।
मेरा हमसफर भी है एक उस झुंड में जो बहुत सी जिम्मेदारीयों को बखूबी निभाता है, वो भी दो दूनी चार और चार दूनी आठ में हर वक़्त फसा रहता है।
मैं भी चाय के साथ धीरे धीरे हर बात उससे उस दुनियां की पूछती हूँ जिसे आम भाषा में "दफ़्तर" कहा जाता है।
कहीं ना कहीं में भी जानना चाहती हूँ कि उसके आसपास का माहौल कैसा है, क्यूंकि वो कई पहर वहां पर रहता है। वो हफ़्ते के पांच दिन एक पहर का खाना उन सब के संग खाता है।
अब कुछ निश्चिंत हूं मैं, थोड़ा बहुत ही सही लोगों को जान चुकी हूँ मैं। वहां कोई अल्हड़ नासमझ नहीं , सब कई जिम्मेदारियों से घिरे हैं, तो सब अपने अपने हिस्से की कमाई को जोड़ने के लिये खड़े हैं। किसी को अपना आशियाना बनाना है तो किसी को अपनी आंख के तारे को सबसे अच्छे स्कूल में डालना है। हर किसी के पास है अपने अपने हिस्से का आसमां तो अपनी जिम्मेदारियां।
कुछ जगहों को चित्रों में कैद कर तो अपनी काली काली आँखों की पुतलियों में सहेज़ कर पहाड़ो की उचाईयों के बीच, नदियाँ, झील और चिड़ियों की चहचहाटों की मदमस्त मत्रमूँघ आवाजों के संग एक और नयी सीख जिंदगी जीने की। जिस तरह परिवर्तन ज़रूरी है प्रकति में सुबह से शाम का होना, कोहरे की चादर वाली सुबह के साथ ओस वाली बूंदो का पत्तियों में ठहरना और फ़िर तेज़ धूप की मार को सहना, कभी पतझड़ का आना तो कभी फूलों की चादरों का बिछ जाना। इस बात को बतलाता है के बंधनों के संग जिया नहीं जाता है, निजी रिश्तो में भी परिवर्तन आवश्यक सा हो जाता है जब जिम्मेदारियों का बोझ कंधे पर जरूरत से ज्यादा आ जाता है।
अब मेरी बारी कुछ जिम्मेदारियों को चुपके से निभा ले जाने की।
वो जो हमसफर है मेरा।
उसके हिस्से की दुनिया को जीने की दी मैंने भी आजादी -
जा.... , जी लो तुम अपने हिस्से की जिंदगानी।
मगर क्या करें, दिल बैचैन है। दिल है की मानता नहीं। तभी तो एक बार फ़िर से बेसब्री से इंतजार है तुम्हारे घर लौटने का, और फ़िर से एक बार नयापान अपने रिश्ते में पाने का।
ये आग्रह उन सब के तरफ़ से जिनके साथी गये हैं रोबोट भरी जिंदगी को छोड़ खुद को पाने के लिये।
रूचि रूह
बहुत सारा धन्यवाद 🙏🏻
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार
हटाएंSuperbly written 👏👏
जवाब देंहटाएंThanks 😊
हटाएंthanku
हटाएंशानदार वर्णन
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद
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