चलो चांद के पार चलें / Chalo Chand Ke Paar Chalen । कविता । कुमार सरोज ।
चलो चांद के पार चलें
कुमार सरोज
इस ज़ालिम दुनिया को छोड़
अब हम दोनों
चलो चांद के पार चलें।
विशाल नीले गगन तले
स्वच्छंद आसमां के नीचे
प्यार के दो पल जीने
चलो चांद के पार चलें।
जहां किसी को जलन नहीं
ना ही किसी से भय
उन्मुक्त पंछी बन जहां उड़ें
चलो चांद के पार चलें।
इयां यकीं किस पर करें
अपने ही सब दुश्मन हैं
दिल टूटा मन है कुंठित
चलो चांद के पार चलें।
एक अलग नई दुनिया बसाएं
प्रेम के अंकुर फिर से उगाएं
फिर से इक नई श्रृष्टि रचें
चलो चांद के पार चलें।
जहां प्रेम गगन के कण कण में हो
जलन द्वेष जैसी कोई शब्द न हो
बस इंसानियत सबके रूह में बसे
चलो चांद के पार चलें।
कुमार सरोज
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