अविवाहित पिता / Avivahit Pita । कहानी । कुमार सरोज ।

                 अविवाहित पिता

                           कुमार सरोज 


              
                     मानव कॉफी कैफे के पार्किंग में अपनी कार को पार्क करके तेज़ी से कैफे के अंदर की ओर चल देता है। वह बहुत जल्दी में दिख रहा था। अन्दर जाते हुए वह बार बार अपनी घड़ी में समय देख रहा था। उसे यहां आने में दस मिनट देर हो गई थी। वह समय पर आ जाता मगर दिल्ली की सड़कों पर गाड़ियों का इतना रेला लगा रहता है कि वह चाहकर भी समय पर नहीं पहुंच सका।

              मानव कैफे के अन्दर आते ही इधर उधर देखने लगता है। शायद उसकी निगाहें किसी को ढूंढ रही थी।

            अचानक उसकी नजर एक टेबल के पास बैठे एक बुजुर्ग दंपति को देखकर रुक जाती है। वह उसी ओर चल देता है। पता नहीं क्यों दोनों को देखकर मानव के चेहरे पर चिंता की हल्की रेखाएं खींच जाती है। 


    " नमस्ते अंकल ... आंटी। सॉरी मुझे आने में देर हो गई। वैसे कैसे हैं आप दोनों ?   " 

    मानव पास जाकर एक खाली कुर्सी पर बैठते हुए पुछा। 


     " हम दोनों ठीक है मानव। तुम कैसे हो ?  " 

    पहले से वहां बैठे बुजुर्ग आदमी ने कहा। 

                   वहां बैठे बुजुर्ग आदमी जिसका नाम ब्रजेश सिंह था, एवं उनके साथ बैठी महिला उनकी पत्नी मेनका थी। दोनों की मानव से बस एक महीना पुरानी जान पहचान थी।








      "  अंकल आपने मुझे अचानक मिलने के लिए यहां क्यों बुलाया। सब ठीक है न ?  " 

       मानव पास खड़े वेटर को तीन कॉफी लाने के लिए बोलकर ब्रजेश अंकल से पुछ बैठता है। 


      " मानव रश्मि तुमसे कुछ कहना चाहती थी। उसी के कहने पर हम दोनों तुमसे मिलने के लिए यहां आए हैं।  "

   ब्रजेश जी कुछ सोचते हुए बोले। 


            रश्मि ब्रजेश जी की बेटी थी, और उसी से मानव की शादी होने वाली थी। यानि की मानव ब्रजेश जी के होने वाला दामाद था। 


    "  बोलिए न। रश्मि क्या कहना चाहती है ?  " 

   मानव तुरन्त पुछ बैठा। 


     "  मानव वह चाहती है कि तुम पीहू को किसी अनाथालय में पहले छोड़ आओ। तभी वह तुमसे शादी करेगी।  " 

     मेनका अपने पति के बोलने से पहले ही बोल पड़ी। 

 
            पीहू एक साल की अनाथ बच्ची थी। जिसे मानव पिछले एक साल से पिता बनकर पाल रहा था। 

              एक साल पहले तक मानव दिल्ली के एक बड़े प्राइवेट कंपनी में मार्केटिंग हेड था। एक साल पहले की ही बात है। एक दिन सुबह में वह अपनी कार से कंपनी के ही काम से लक्ष्मी नगर अपने घर से तिलक नगर जा रहा था। तभी उसे एक सुनसान जगह पर सड़क किनारे झाड़ियों के बीच कपड़ो में लिपटा एक बच्चा नजर आता है। बच्चा कपड़े में लिपटा छटपटा रहा था।  वह झट अपनी कार रोककर जब बच्चे के पास जाता है तो चौंक जाता है। वह कुछ ही घंटे पहले जन्मी एक अबोध दूधमुही बच्ची थी। जिसे किसी ने शायद यहां फेंक दिया था। बच्ची सूर्य की पहली नर्म किरणों की ताप से बचने के लिए अब कपड़ों से बाहर आने के लिए हाथ पैर चलाने की कोशिश कर रही थी। 

                मानव पहले तो इधर उधर देखता है कि शायद इसकी मां आस पास ही कहीं होगी। मगर उस सुनसान सड़क के किनारे उसे वहां कुछ नहीं दिखाई देता है। शायद किसी मां ने मजबूरी या लाचारी में उस बच्ची को उस सुनसान सड़क किनारे रख कर चली गई थी। 

                 मानव जैसे ही बच्ची की ओर नीचे झुकता है कि उसकी नन्हीं कोमल हाथ का स्पर्श उसके हाथ से हो जाता है। वह अबोध बच्ची अपनी अंगुलियों से मानव के अंगूठे को ऐसे जकड़ लेती है जैसे वह उसे वर्षो से जानती हो। उस नन्हीं सी बच्ची के मासूम स्पर्श से मानव का पुरा बदन भी एक सुखद अपनत्व की अनुभूति से सराबोर हो जाता है। उसे पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा था मानो वह बच्ची उससे कह रही थी  -  ' अंकल, प्लीज आप मेरी मां के जैसे ही मुझे यू सड़क किनारे मरने के लिए छोड़कर मत जाना। '  

               मानव झट बच्ची को गोद में उठाकर अपनी कार की ओर चल देता है। 

            कुछ ही समय के बाद मानव अपनी कार में उस बच्ची को लिटाकर शहर की ओर वापस चल देता है। 

               मानव उस बच्ची को जिसे ही उसने पीहू नाम दिया था, को सबसे पहले अपने एक जान पहचान के डॉक्टर के पास चेकअप के लिए ले जाता है। पीहू स्वस्थ और तंदुरुस्त थी। डॉक्टर के अनुसार वह अभी कुछ घंटे पहले ही जन्म ली थी। 

                 मानव के मन में पहले तो यह ख्याल आता है कि वह पीहू को पुलिस को या किसी अनाथालय में रख आए। मगर उसके पहले स्पर्श की प्यारी मिठास उसे ऐसा नहीं करने के लिए बाध्य कर देती है। 

                मानव पीहू को अपने पास ही रख लेता है। उसकी देखभाल के लिए वह गायत्री नाम की एक महिला को रख लेता है। वह बाई की काम करती थी। 

            मानव चूंकि मार्केटिंग के क्षेत्र में जॉब करता था, इसीलिए उसे किसी भी समय बाहर काम के सिलसिले में जाना पड़ता था। जिसके कारण उसे पीहू के देखभाल करने में काफी दिक्कत होती थी। क्योंकि गायत्री सिर्फ दिन में ही उसके यहां रहती थी। जबकि मानव को कभी कभी रात में भी बाहर जाना पड़ता था। इसीलिए अंत में जब उसे कुछ समझ में नहीं आता है तो वह मार्केटिंग का जॉब छोड़ देता है। 

             जॉब छोड़ने के कुछ ही दिन के बाद मानव को एक दुसरी प्राईवेट कंपनी में ऑफिस का जॉब मिल जाता है। और अभी मानव उसी कंपनी में मैनेजर था। 

              अभी ब्रजेश जी और उनकी पत्नी मेनका जिस बच्ची को अनाथालय में भेजने को बोल रहे थे वह वही अनाथ बच्ची पीहू थी। जो अब मानव के दिल की धड़कन थी।

          एक साल में पीहू मानव को ही अब अपना पिता समझने लगी थी। और मानव भी उसे अपनी बेटी समझने लगा था। दोनों एक दूसरे के लिए अब दो जिस्म एक जान थे। 


    " अंकल, मैं पीहू को अनाथालय नहीं भेज सकता हूं। वो मेरे साथ ही रहेगी। " 
  
      मानव बिना कुछ सोचे तुरंत बोल पड़ता है। 


  "  मानव, तब रश्मि तुमसे शादी नहीं करेगी।  " 


   " कोई बात नहीं अंकल। " 


             इधर तब तक वेटर कॉफी लेकर आ जाता है। 


 " आप लोग कॉफी पीजिए। " 

   मानव दोनों की ओर कॉफी का मग बढ़ाते हुए बोलता है। 


   " मेरी बेटी का शक लगता है सही है। जरुर पीहू तुम्हारी ही बेटी है। तभी तो तुम उसे अनाथालय में रखना नहीं चाहते हो। बस तुम अपना पाप छिपाने के लिए सबसे झूठ बोलते हो। नहीं तो कोई .................  ।  " 

      मेनका मानव को अपनी बेटी के बहाने कोसते जा रही थी, और वह बेचारा सिर्फ चुपचाप सुनता जा रहा था। 

                 आज के सभ्य समाज में इस तरह के ताने तो मानव के लिए अब आम बात हो गई थी। अभी तक इस तरह का लांछन पता नहीं कितनी बार कितने लोगों ने उसपर लगाया होगा। 

              मानव पीहू के मिलने से पहले एक लड़की सुमन से प्यार करता था। दोनों एक दूसरे को बहुत चाहते थे। मगर सुमन भी पीहू के कारण उसे छोड़कर चली गई। वह भी उसे अनाथालय में रखने को कहती थी। जबकि मानव को पीहू से ऐसा लगाव हो गया था कि वह उसे अपने से दूर भेजना नहीं चाहता था। नतीजा यह हुआ कि सुमन उसे छोड़कर उससे दूर चली गई। मानव ने भी उसे जाने दिया। वह वैसी लड़की से शादी करना चाहता था जो पीहू के साथ उसे अपनाए। 

               और आज रश्मि भी अपने माता पिता के माध्यम से शादी तोड़ने का पैगाम भेजी थी। रश्मि कोई पहली लड़की नहीं थी। इसके पहले भी दो तीन लड़की ऐसा कर चुकी थी। 

                 अभी तक मानव को यह समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर किसी लड़की को पीहू को भी अपनी बेटी बनाने में दिक्कत क्यों हो रही थी। वह अपने बच्चों के साथ पीहू को भी तो अपना सकती थी। मगर शायद अब के लड़कियों की सोच बहुत आधुनिक हो गई थी।

               मानव इधर अभी अपने साथ बीते पलो को याद करने में ही लगा था कि उधर रश्मि के माता पिता उसपर अपने मन की भड़ास निकालकर बिना कॉफी पिए ही चले जाते हैं। 

                 मानव सोच की दुनिया से निकलकर वास्तविकता की दुनिया में आकर मुस्कुराते हुए आराम से कॉफी पीने लगता है। 

               मानव का दिल अब अन्दर से एकदम टूट चुका था। शायद उसके सोच से मिलती जुलती सोच रखने वाली कोई लड़की आज के इस आधुनिक युग में थी ही नहीं।

              कॉफी पीते पीते मानव अब अपने आप को अविवाहित रखने का प्रण कर लेता है। अब वह अविवाहित पिता बनकर पीहू के साथ ही अपनी बाकि जिन्दगी जीना चाहता था। अब वह समाज के दोहरे चरित्र से तंग आ गया था। 

                  मन में अविवाहित पिता बनने का दृढ़ संकल्प लिए मानव उस कॉफी कैफे से निकलकर अपने घर की ओर चल देता है। उस समय शाम के पांच बज चुके थे। पीहू की देखभाल करने वाली बाई गायत्री शाम को छः बजे चली जाती थी। उसके बाद से सुबह के सात बजे तक मानव ही पीहू की देखभाल करता था । यही मानव का अब रोज का दिनचर्या था। 

             रश्मि को शादी के लिए मना करने के करीब एक साल बाद एक दिन मानव अपनी बाईक से अपने एक दोस्त के यहां से वापस अपने घर लौट रहा था। उस समय शाम के छः बज रहे थे। वह तेजी से घर की ओर बढ़ता चला जा रहा था, कयोंकि गायत्री को घर जाने का समय हो गया था।  

               मानव अभी रेलवे लाईन के बगल वाली सड़क से गुजर ही रहा था कि अचानक किसी औरत को रेलवे लाईन की ओर तेज़ी से जाते देख वह चौंक जाता है। उस औरत को देखने से ही लग रहा था कि वह उस ओर खुदकुशी करने जा रही थी। 

               मानव झट बाईक रोककर उस औरत के पीछे दौड़ पड़ता है। 

             वह औरत वहां से गुजर रही एक ट्रेन के आगे कूद कर अपनी जान देती उसके पहले ही मानव वहां आकर उसे पकड़ लेता है। 

          मानव जैसे ही उस औरत का चेहरा देखता है वह चौंक जाता है। वह रश्मि थी। 

                 मानव के पुछने पर जब रश्मि सारी बात बताती है तो उसे सुनकर मानव दंग रह जाता है। 

               रश्मि की शादी हुए अभी दो महीना हुआ था जबकि उसके पेट में तीन माह का बच्चा था। इसीलिए उसका पति उसे मार कर अपने घर से निकाल दिया था। जिसके कारण ही वह अभी गुस्से में आत्महत्या करने जा रही थी।

                  रश्मि के पेट में पल रहा बच्चा उसके प्रेमी रमेश का था। वही उसे मां बनाकर भाग गया था। रश्मि अभी तक सभी से यह सच्चाई छिपाकर रखे हुए थी। 


  "  रश्मि आत्महत्या करना ही किसी समस्या का समाधान नहीं होता है। तुम सारी सच्चाई अपने माता पिता और पति को पहले ही बता देती तो शायद आज ऐसी नौबत नहीं आती। इन्सान को हमेशा सच का साथ देना चाहिए। जिंदगी में कभी कभी अपने सामने वाले की बात भी सुनना चाहिए,  क्योंकि यह जरूरी नहीं होता कि हम जो सामने वाले के बारे में सोचते हैं वही सच होता है।  "

            मानव का मन तो और बहुत कुछ कहने को कर रहा था मगर वह कुछ सोचकर फिर शांत हो गया। 


    " मानव मुझे माफ कर देना। मैं एक लड़का रमेश से प्यार करती थी, इसीलिए पीहू के बहाने झूठ बोलकर तुमसे शादी नहीं की। मगर मुझे क्या पता था कि रमेश सिर्फ़ मेरे बदन को पाना चाहता था। जब उसका मन मेरे जिस्म से भर गया तो वह मुझे बीच मझधार में छोड़कर भाग गया। तभी मेरे माता पिता तुम्हारे बाद एक और दूसरे लड़के से मेरी शादी ठीक कर दिए। मैं चाहकर भी शादी के लिए मना नहीं कर सकी। मैं सभी को सच्चाई बताती तो इससे मेरी और मेरे खानदान की बहुत बदनामी होती। इसीलिए मैं नसीब पर सबकुछ छोड़कर मौन रही।  "  

    रश्मि मायूस सिर झुकाए बोलते जा रही थी। 


   " अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है। जैसे मैं अविवाहित पिता बनकर पीहू के साथ रह रहा हूं। तुम भी उसी तरह मां बनकर अपने पेट में पल रहे बच्चे की देख भाल कर सकती हो। जीवन बड़ा ही अनमोल रत्न है, इसे आत्महत्या करके बर्बाद नहीं करना चाहिए।  " 

    मानव कहते हुए अपनी बाईक की ओर चल देता है।

                    पीछे से रश्मि भी सिर झुकाए चल देती है। 


      " मानव मुझे कहना तो नहीं चाहिए, मगर क्या अपने घर में मुझे थोड़ी सी जगह दे सकते हो ?  " 

      रश्मि पीछे पीछे आती हुई पुछ बैठती है। 


" रह सकती हो। वैसे भी अब मेरा क्या है। मैंने तो अपनी पुरी जिंदगी अपनी बेटी पीहू के नाम कर दी है। " 

           मानव चलते चलते बिना पीछे मुड़े ही बोलता है।

             रश्मि मानव के मुंह से अपने घर में रहने देने के लिए हां सुनकर मन ही मन खुश हो जाती है। 


     
                           कुमार सरोज 

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