कावर झील । कविता । हिमाशु कुमार ' शंकर ' ।
कावर झील
हिमांशु कुमार ' शंकर '
धरती में अम्बर देखूँ ,
झील में कमल देखूँ ,
पानी में जलधर देखूँ ,
आग में शिखी ध्वज देखूँ ,
यह कावर है हमारा ।
रंग-बिरंगे पक्षी को देखूँ ,
बंदरों की उथल पुथल देखूँ ,
कावर में किसानों की ,
मेहनत करते देखूँ।
थकता जब भी कोई ,
कावर की मीठी पानी ,
जी भर के पीते मनमानी ,
यही है कावर का पानी।
कावर झील के वनों में ,
नहीं चलती किसी की मनमानी ,
दूर - दराज से आते दर्शक ,
करते हैं मां जयमंगला का दर्शन।
बेटा नेता सब आते ,
आशीर्वाद ले कर सब जाते ,
हो अगर उनका पूरा कामना ,
भूल जाते है दुबारा आना।
झील की कहानी सबको प्यारी ,
लेते आना मां जयमंगला की प्रसादी ,
लड्डू केला बहुते खाएं ,
सुख शांति का अब प्रसाद लाना ,
क्योंकि अब है देश को बचाना।
हिमांशु कुमार 'शंकर'
मंझौल
बेगुसराय
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