ब्लैकबोर्ड / BlackBoard । कहानी । कुमार सरोज ।
ब्लैकबोर्ड
कुमार सरोज
कुसुम लता बहुत खुश थी, क्योंकि उसका पति आज अपने परिवार और बच्चों की उज्जवल भविष्य के लिए गांव से बहुत दूर एक बड़े शहर में दो पैसा कमाने गया था। अभी वह गांव से बाहर के बस स्टैंड से ही अपने पति सुरेश को छोड़कर आ रही थी। कुसुम लता की सुरेश से तीन साल पहले ही शादी हुई थी। शादी के एक साल बाद बेटी माया की तो उससे डेढ़ साल बाद एक बेटा मनु का जन्म हुआ था। अभी माया डेढ़ साल की तो मनु छः महीने का था।
कुसुम लता के घर में पति और बच्चे के अलावा सिर्फ एक चाचा थे जिनका नाम युगल था।
घर आते ही कुसुम लता मनु को गोद में लेकर दूध पिलाने लगती है, क्योंकि वह अकेले रहने के कारण अब रो रहा था। जबकि पास बैठी माया अपने छोटे भाई को चुप कराने की अथक प्रयास कर रही थी।
सुरेश का गांव में थोड़ा बहुत खेत था, मगर उससे अब घर का दाना पानी नहीं चलता था। इसीलिए वह शहर जाकर पैसा कमाना चाहता था। घर पर परिवार की देख भाल करने के लिए उसके चाचा युगल थे ही।
कुसुम लता पहले तो अपने जवान पति को बाहर शहर कमाने भेजना नहीं चाहती थी, मगर बहुत सोच विचार करने के बाद उसने निर्णय लिया की सुरेश का बाहर जाना ही अच्छा रहेगा। जबकि गांव की कुछ औरते उसे अपने पति को बाहर नहीं भेजने देना चाहती थी। इसका भी कुछ कारण था।
सुरेश के गांव का नाम भिवाड़ी था। भिवाड़ी के बहुत सारे जवान लड़के बाहर शहर कमाने गए थे। जिसमें से कुछ एक बार जो गांव से गए वो दुबारा वापस फिर गांव नहीं आए थे। इसीलिए कुसुम लता को गांव की औरते सुरेश को बाहर जाने देने के पक्ष में नहीं थी। सुरेश भी अभी हट्टा कट्टा बांके जवान छोरा था।
फिर भी कुसुम लता किसी की एक नहीं सुनती है और अपने सीने पर पत्थर रखकर पति को शहर कमाने जाने देती है।
सुरेश को बाहर गए देखते ही देखते एक महीना बीत जाता है। तभी एक दिन गांव के सरपंच साहब के मोबाइल पर उसका कॉल आता है। कुसुम लता उस दिन अपने पति से बात करके बहुत खुश होती है। सुरेश को सुरत के एक कपड़ा फैक्ट्री में काम मिल गया था।
जिस दिन सुमन लता की अपने पति से बात होती है ठीक उसके अगले दिन वह मन्दिर जाकर पूजा करती है। ताकि उसका पति ऐसे ही कमाता रहे और उससे कम से कम महीने में एक बार बात करता रहे।
मगर शायद कुसुम लता के नियति में तो कुछ और ही लिखा था। सुरेश एक बार जो कॉल करता है उसके बाद फिर दुबारा कभी कॉल नहीं करता है। उसका कोई चिठ्ठी पाती भी नहीं आता है।
कुसुम लता अपने पति को लेकर धीरे धीरे परेशान रहने लगती है। वह कभी अपने चाचा से तो कभी सरपंच साहब से सुरेश के बारे में पुछते रहती है।
देखते ही देखते सुरेश को गए छः महीने हो जाता है। इन छः महीने में उसका सिर्फ एक ही बार कॉल आता है। उसके बाद न दुबारा कोई कॉल आता है और न ही कोई चिठ्ठी या मनीऑर्डर आता है।
कुसुम लता के घर का जमा पूंजी धीरे धीरे अब खत्म हो गया था। अकेले उसके चाचा खेत में क्या करते। नतीजा यह हुआ कि खेती भी अब ढंग से नहीं हो रहा था। जिसके कारण खाने के लिए भी अब कुसुम लता और उसके बच्चों को आफत आ गई।
इसी बीच कुसुम लता के साथ एक हादसा हो जाता है। वह अपने पति के फोन के बारे में सरपंच साहब से उनके घर जाकर हरदम पुछते रहती थी कि ' उसके पति का कोई कॉल आया था या नहीं। '
शायद आज के इस युग में एक अकेली असहाय अबला की उसके मजबूरी का फायदा इंसानियत का चोला ओढ़े मर्द उठाने से कभी नहीं चुकते हैं। तभी तो गांव का सरपंच एक दिन धोखे से चाय में नशा की दवाई मिलाकर सुमन लता की इज्जत लूट लेता है। वैसे भी तो आज अकेली अबला को देखकर सभी उसकी इज्जत को लुटने के लिए लालायित रहते हैं।
कुसुम लता सरपंच की गंदी हरकत के बारे में अपने चाचा को बता देती है। मगर कोई फायदा नहीं होता है। उलटे उसके चाचा भी उसी रात उसकी इज्जत लुट लेते हैं। रिश्ता और विश्वास का एक और चीरहरण होता है।
जब साथ में अपना मर्द नहीं रहता है तो कैसे अपने भी एक औरत की अस्मत को नोच खाता है यह कुसुम लता को अब समझ में आ गया था। मगर वह चाहकर भी अब किसी को बता नहीं बता सकती थी। वह बताती भी तो किससे, सुनने वाला तो मुंह मोड़कर घर से रिश्ता नाता तोड़ लिया था।
कुसुम लता की अस्मत को लुटने के बाद से सरपंच और उसके चाचा अब उसके लिए एवं उसके बच्चों के लिए खाने की जरूरी सामान देने लगा था। मगर बदले में दोनों अब आए दिन कुसुम लता को अपने बिस्तर की शोभा बनाने लगे थे।
इधर सुरेश को शहर गए अब दो साल हो गया था। उसका इन दो सालों में कोई अता पता नहीं चला था। अब कुसुम लता को भी विश्वास हो गया था कि उसका पति भी गांव के अन्य मर्दों के जैसे ही शहर जाकर वही का होकर रह गया है।
माया अब साढ़े तीन साल की हो गई थी। वह स्कूल जाना चाहती थी मगर कुसुम लता के पास पैसे नहीं थे। थक हारकर वह पैसों के लिए गांव के एक बड़े किसान जयराम के खेतों में काम करने को ठान लेती है।
कुसुम लता खेत में काम करने तो लगती है मगर वहां भी ताक में बैठे अस्मत के लुटेरे मौका मिलते ही लुट लेते हैं।
भला एक अकेली असहाय अबला अब जाती तो जाती कहां ? पति शहर कमाने गया था तो वह वहीं का बनकर रह गया था। उसके चाचा और गांव के सरपंच तो कब से उसकी आबरू को नोचते आ रहे थे। यहां हर मर्द तो अब उसकी बेवसी और लाचारी का फायदा उठाकर उसकी इज्जत को लुटना ही चाहता था।
इसी बीच कुसुम लता गर्ववती हो जाती है। जैसे ही इस बात की जानकारी उसके चाचा और सरपंच को चलती है दोनों मिलकर डॉक्टर से उसके कोख को ही निकलवा देता है।अब ना रहेगा कुसुम लता की बांस और न बजेगी बांसुरी।
इधर सुरेश को कमाने शहर गए अब पांच साल हो गया था। इन पांच सालों में सरपंच, चाचा और जयराम के अलावा अब तक गांव के आठ दस मर्दों ने कुसुम लता को अपने हवस का शिकार बना लिया था। वह अब जीती जागती एक हाड़ मांस की खिलौना बनकर रह गई थी। जिस मर्द के शरीर में वासना के कीड़े हिलौर मारते वह कुसुम लता के साथ अपना जोश ठंडा कर लेता था। अब कुसुम लता का जिस्म एक ब्लैकबोर्ड बनकर रह गया था। जिसके मन में आता वह उस ब्लैकबोर्ड पर लिख जाता था।
आज समाज के सभ्य लोग कितने मतलबी हो गए थे और उनका कितना नैतिक और चारित्रिक पतन हो गया था। तभी तो कुसुम लता के मजबूरियों का फायदा उठाकर सभी उसके जिस्म और भावनाओं के साथ खेल रहे थे। उसका पति बाहर कमाने क्या गया था कि आज सभी उसके जिस्म को नोच खाने को तत्पर हो गए थे।
एक बेबस और अकेली अबला के जिस्म को ब्लैकबोर्ड बनाकर उस पर मर्दों द्वारा रोज नई इबारत लिखी जाने लगी थी। असहाय और लाचार कुसुम लता सब कुछ सिर्फ अपने बच्चों के खातिर सह रही थी।
यह कहानी राजस्थान के दूर दराज के गांव भिवाड़ी के किसी एक कुसुम लता की नहीं है, बल्कि आज देश के बहुत सारे गावों की ऐसी असंख्य औरतें हैं जिसका पति कमाने जब शहर जाता है और बहुत सालों तक वापस नहीं आता है तो मौकापरस्त मर्द उन औरतों के जिस्म को एक और ब्लैकबोर्ड बनाने से नहीं चुकते हैं।
कुमार सरोज
लाज़वाब कहानी, गांव की हकीकत।
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद
हटाएंबहुत अच्छा
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार
हटाएंBahut sunder har jagah aishi hi sithati bna Diya h pta nhi log jism ke kaarn mnushyta ko v paar deta h.
जवाब देंहटाएं🙏🙏
हटाएंPar ye Suman Lata kaun thi
जवाब देंहटाएंगांव मे रहने वाले एक गरीब की पत्नी
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