बिन पत्नी बेचारा पति / Bin Patni Bechara Pati । कहानी । कुमार सरोज ।

                 बिन पत्नी बेचारा पति

                              कुमार सरोज 


          

     " मेरे लाख समझाने पर भी तुम नहीं मानती हो, उसी का नतीजा है यह चोट। बहुत केयरलेस हो गई हो तुम।  " 

     सुबोध रूबी के पैर में लगी चोट वाली जगह को गर्म पानी में कपड़ा भींगो कर सेंकते हुए प्यार वाले गुस्सा से बोला। 


   " तुम इतना गुस्सा क्यों करते हो मेरे बाबू। बस जरा सी चोट लगी है। एक दो दिन में सब ठीक हो जाएगा। " 

  रूबी बेड पर लेटी हुई मुस्कुराते हुए प्यार से बोली।



   "  यह कोई पहली बार कोई तुम्हें चोट नहीं लगी है, हमेशा ऐसा ही होता है तुम्हारे साथ। तुमको पता है पंद्रह दिन बाद ही बिहार पुलिस का शारीरिक परीक्षा होने वाली है। " 


  " पता है मुझे। तुम मेरे साथ हो तो हम सब कुछ हासिल कर लेंगे। " 

  दोनों बहुत देर तक बातें करते रहते हैं। 

             रूबी और सुबोध नवादा में रहकर बिहार पुलिस के लिए शारीरिक दक्षता परीक्षा की तैयारी करते थे। लिखित परीक्षा में दोनों पास कर गए थे। अब शारीरिक परीक्षा पास करने के बाद दोनों की नौकरी पक्की थी। इसी लिए दोनों अपने घर से दूर रहकर कड़ी मेहनत से तैयारी कर रहे थे।

                दो महीना पहले तक दोनों एक दूसरे से एकदम अनजाने थे। रूबी अपने गांव मथुरापुर में अपने माता पिता के साथ रहती थी, तो सुबोध अपने गांव श्रीपुर में अपनी विधवा मां के साथ रहता था। मगर जब बिहार पुलिस के लिखित परीक्षा का परिणाम निकला और इन दोनों ने भी पास कर लिया तो संयोग से शारीरिक दक्षता परीक्षा की तैयारी करने के लिए दोनों नवादा आ जाते हैं। गांव में दौड़ने एवं तैयारी के लिए कोई मैदान नहीं था। नवादा से दोनों का गांव भी पास में ही था। 







               गांव में रूबी अपनी माता चिंता देवी और पिता यमुना प्रसाद के साथ रहती थी। उसका एक छोटा भाई भी था मनोज। वह अभी गांव के पास के ही एक हाई स्कूल में पढ़ता था। 

                सुबोध के पिताजी अब जीवित नहीं थे। चार साल पहले ही उनकी मृत्यु हो गई थी। उसके घर में सिर्फ उसकी विधवा मां मंजू देवी ही थी। 

              सुबोध के पिताजी भी पहले बिहार पुलिस में ही नौकरी करते थे। नौकरी से सेवा निवृत होने के दो साल ही वो अचानक एक दिन दिल का दौरा पड़ने के कारण मर गए थे। 

             नवादा आने के बाद सुबोध शहर के गांधी मैदान में ही सुबह शाम बिहार पुलिस के शारीरिक परीक्षा की तैयारी करने लगता है। रूबी भी वहीं प्रतिदिन तैयारी करने आती थी। इन दोनों के अलावा और भी बहुत सारे लड़के एवं लड़कियां गांधी मैदान में तैयारी करने आते थे। 

             पहली बार सुबोध और रूबी का गांधी मैदान में ही मुलाकात होता है। सुबोध दिखने में सुंदर तो था ही इकलौता भाई होने के कारण घर का मालिक भी वही था। पिता के रिटायरमेंट के पैसे एवं मां के मिलने वाली पेंशन के पैसों की वजह से घर की माली हालत अच्छी थी। घर में अकेला होने के कारण सुबोध को पैसों की कमी नहीं थी। 

             रूबी शुरू से ही महत्वकांक्षी थी। शायद इसीलिए वह सुबोध को देखते ही तुरंत उससे प्रभावित होकर उसके करीब आ जाती है।

            सुबोध भी रूबी को देखते ही उसके हुस्न का एक पल में ही दीवाना हो जाता है।

               पास में पैसा हो तो शायद हुस्न बहुत जल्द ही गुलाम बन जाता है, और हुस्न भी पैसा वाले के करीब आने को मचल उठता है। 

              अब सुबोध ही रूबी के सारे खर्च का वहन करने लगता है। दोनों रहने के लिए किराए पर अलग अलग पास में ही दो कमरा भी ले लेते हैं। भले जमाने को दिखाने के लिए दोनों का दो अलग अलग कमरा था, मगर रहना दोनों का ज्यादा अब एक ही कमरा में होता था। 

                  दोनों की गहरी दोस्ती या यूं कहें पनपते प्यार के बारे में परिवार को भी पता चल जाता है। दोनों दो विभिन जाति  के थे, फिर भी दोनों के परिवार को कोई आपत्ति नहीं होती है। 

               रूबी तो नहीं मगर सुबोध एक - दो बार उसके गांव भी जा चुका था। रूबी के माता पिता तो उसमें अभी से ही अपने दामाद की झलक देखने लगे थे। 

              निश्चित तिथि को रूबी और सुबोध का बिहार पुलिस का शारीरिक परीक्षा भी हो जाता है। दोनों सफल भी हो जाते हैं। बस अब अन्तिम मेधा सूची निकलना बाकि रह गया था, जो अगले महीने निकलने वाला था। 

              इसी बीच रूबी और सुबोध के परिवार वाले दोनों की शादी नवादा के ही एक मंदिर में करवा देते हैं। सुबोध का रूबी के गांव आने जाने के कारण गांव में लोगों के बीच अब तरह तरह की बाते होने लगी थी। 

                 शादी हो जाने के कारण रूबी और सुबोध बहुत खुश थे। दोनों का देखा स्वप्न पुरा हो गया था। 

                 शादी के कुछ ही दिनों के बाद बिहार पुलिस का अंतिम मेधा सूची भी निकल जाता है। रूबी महिला थी और अन्य पिछड़ा वर्ग से भी थी, जिसके कारण उसे आरक्षण का फायदा मिल जाता है और उसका फाइनल रिजल्ट निकल जाता है।

                 मगर सुबोध जो सामान्य वर्ग का और पुरुष था, इसीलिए सब कुछ बढ़िया होने के बावजूद भी उसका रिजल्ट अंतिम मेधा सूची में नहीं निकलता है। 

               सुबोध को पहले तो दुख बहुत होता है, मगर यह सोच कर कि  ' चलो कम से कम पत्नी को तो सिपाही की नौकरी मिल गई ' वह खुश हो जाता है। 

               रूबी की नियुक्ति पटना जिला में सिपाही के पद पर होती है। सिपाही के पद पर नियुक्त होते ही वह ट्रेनिंग के लिए भागलपुर चली जाती है। 

             इधर सुबोध अपने गांव में ही मां के पास रहकर फिर से नए तरीके से अगले सिपाही भर्ती परीक्षा की तैयारी करने लगता है। 

              रूबी से ट्रेनिंग के बीच में सुबोध दो - तीन बार भागलपुर जाकर उससे मिलता भी है। मगर मुलाकात ज्यादा देर तक नहीं होती थी। बस रुबी पांच - दस मिनट के लिए ट्रेनिंग कैंप से बाहर आकर मिलती और फिर चली जाती थी।
      
             सुबोध रूबी की ट्रेनिंग में हो रही परेशानियों को समझता था, इसीलिए वह भी कुछ नहीं बोलता था। आखिर छः महीने की ही तो बात थी। फिर तो उसके बाद दोनों साथ ही रहने वाले थे। 

                 छः महीने बाद रूबी की ट्रेनिंग खत्म हो जाती है। वह वापस पटना आ जाती है। 

              जैसे ही सुबोध को रूबी की ट्रेनिंग खत्म करके वापस पटना आने की बात की जानकारी मिलती है, वह झट उससे मिलने पटना आ जाता है। 

                  मगर पटना आने के बाद सुबोध जब रूबी से मिलता है तो वह उसे पहचानने से साफ इंकार कर देती है। सुनकर उसके पैर तले की जमीन खिसक जाती है। जिसके लिए उसने क्या नहीं किया। खुद से ज्यादा तैयारी करवाने में उसका ध्यान रखा। रहने सहने से लेकर खाने पीने तक में किसी चीज की कमी कभी नहीं होने दिया।  वही आज उसे अपना पति तो दूर पहचानने से भी इंकार कर रही थी। आखिर कोई इतना बदल कैसे सकता था ? क्या सच में आज प्यार या शादी मात्र एक जरूरत पूर्ति की वस्तु बनकर रह गई थी। किसी की भावना या विश्वास आहत होने से किसी को कोई मतलब नहीं था ! 

                सुबोध जब इस सिलसिले में अपने सास ससुर से बात करता है तो वे दोनों भी उसे अपना दामाद मानने से मुकर जाते हैं।

               सुबोध समझ जाता है कि रूबी के इस रिश्तों के मजाक वाले खेल में उसके माता पिता भी शामिल हैं। 

                     अंत में थक हार कर निराश सुबोध अपने घर वापस आ जाता है।

          घर आकर सुबोध को अब कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह अपनी मां को बताए तो क्या बताए। किस मुंह से वह अपनी मां को कहे कि उसकी पत्नी अब उसकी पत्नी नहीं रही और वह अब बिन पत्नी पति हो गया है। बस एक बेचारा पति बनकर रह गया था वह।



                              कुमार सरोज 

टिप्पणियाँ

  1. लाजवाब कहानी, आज के रिश्तों की पोल खोलती कहानी

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  2. आगे की कहानी पति दरोगा हो गया पत्नी वापस आ गयी

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