बेगाने इश्क / Begane Ishaq । गजल । हिमांशु कुमार 'शंकर ' ।

            बेगाने इश्क

                    हिमांशु कुमार शंकर 




बड़े मीठे थे तुम , 
शायद उसी मिठास ने ,
तुम्हें ज़हर बना डाला ,
अपनो को छोड़कर ,
पराया घर बसा लिया।


उम्मीद किया था तुमसे ,
अब नई दुनिया बसाऊंगा ,
तूने तो दिलों को ही ,
मंजर बना डाला।






लिया था मैंने भी दुआ ,
मंदिर मस्जिद जाके ,
तू मुझसे ही दूर हुई ,
दूजा के घर जाके।


तेरी वो गुजरी यादें ,
वो पल वो इरादे ,
बैठा सोचता हूं ,
कहां गए अब तेरे वादे।


भूलूं तो कैसे तेरे वादे ,
आख़िर याद आता है ,
वो पिछले सारे वादें ,
खैर वो थे तेरे ईरादे।


भूलना जब भी चाहता ,
तो फ़िर से तेरी पुरानी ,
जुल्फों में फंस जाता ,
आख़िर कहां गए तेरे वादे।


चांद की रोशनी में ,
मैंने भी दिल का टुकड़ा ,
भेजा था तेरे खातिर ,
अब तुम नई दुनिया ,
ठीक - ठीक से बिताना ,
भूल जाना पुरानी यादे ,
क्योंकि अब हम हैं अब बेगाने।



               हिमांशु कुमार 'शंकर'

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