बेचारा डीओजी / Bechara DOG । व्यंग कहानी । कुमार सरोज ।

             बेचारा डीओजी ( DOG )

                              कुमार सरोज 


   
                 पटना के गांधी मैदान के ठीक बगल में एक बहुत ही रिहायशी अपार्टमेंट है न्यूटन गार्डेन। न्यूटन गार्डेन के ब्लॉक बी के एक फ्लैट में रहता है राकेश सिंह का परिवार। परिवार में उनकी बूढ़ी मां भारती, पत्नी कामिनी, पांच साल की एक बेटी मोनी एवं ढाई साल का एक बेटा मयंक रहता है। 

                   अभी शाम के पांच बज रहे थे। राकेश अपने फ्लैट पर अभी नहीं था। फिर भी उसके फ्लैट पर अभी बहुत गहमा गहमी था। पत्नी कामिनी पूजा की एक थाल सजाएं बैठी थी। उसकी बेटी मोनी बिस्कुट का एक पॉकेट लिए बैठी बार बार उसे ही देख रही थी। बेटा मयंक जिस दूध के बोतल से पहले वह दूध पीता था उसे ही अभी दूध से भरकर हाथ में लिए बैठा था। सभी बार बार हॉल में टंगे घड़ी को देख रहे थे। 

                 यह सभी ताम झाम एक कुत्ते के लिए था। जिसे लाने मयंक के पापा राकेश अभी गए हुए थे। वो गए तो घर से बाहर सुबह में ही थे, मगर अभी तक आए नहीं थे। मगर अब आने ही वाले थे। कुछ देर पहले ही उनका कॉल आया था। ऐसा नहीं था कि एक कुत्ता को लाने में इतना समय लग रहा था। बल्कि वजह कुछ और ही था। राकेश आज पहले अपनी बूढ़ी मां भारती को वृद्धाश्रम में रखने गया था, उसके बाद फिर घर के लिए एक कुत्ता लाने गया था। उसी में समय लग रहा था। घर में अभी कामिनी आने वाले नई मेहमान कुत्ते की आरती उतारने के लिए थाल सजाएं बैठी थी।
           
            कैसी विडंबना थी यह ! अपनी सगी मां को वृद्धाश्रम भेज कर घर में उसके जगह पर कुत्ता लाया जा रहा था। और उसके लिए इतनी खुशियां भी मनाई जा रही थी। कामिनी आरती की थाली तो बच्चे उसे खिलाने के लिए बिस्कुट और दूध का बोतल लिए हुए थे। जिस मां को घर में आज तक एक बूंद दूध पीने के लिए नहीं दिया जाता था, उसी घर में आज एक कुत्ते के लिए बोतल भरकर दूध रखा हुआ था।  







               आज परिवार में रिश्तों की अहमियत इतनी कम हो गई है कि अब बहुत सारे लोग अपने वृद्ध मां बाप को बोझ समझने लगे हैं। जबकि उन्हें भी पता होना चाहिए कि वो भी कल वृद्ध होंगे, और उनके साथ भी उनके दिए अपने संस्कार जाएंगे। फिर भी सभी दिखावती दुनिया में रिश्तों को त्याग कर अकेले जिए जा रहे हैं। 

          
         " मम्मी मैंने अपने डॉगी का नाम भी सोच रखा है - जीनु। " 

       कामिनी की बेटी मोनी उतावली होती हुई बोलती है। 


 " जीनु...... . अच्छा नाम है। पड़ोसी वाली आंटी के बिच ( कुतिया ) का नाम है जीनी। वो बहुत उसका नाम ले लेकर इठलाती है। अब हम भी उसे बताते हैं कि की मेरा डॉगी जीनु आ गया है। " 

               कामिनी अपनी पांच साल की बेटी को पड़ोसन के तरफ इशारा करती हुई बोलती है। 

 " मम्मी, डॉगी मेरे साथ सोएगा। " 

        अभी तक खामोश ढाई साल का मयंक अपनी तोतली आवाज में बोलता है। 

 " वो हम बाद में डिसाइड करेंगे। मगर उसे कोई डॉगी नहीं कहेगा। उसका जीनु नाम फाइनल हो गया। " 

               कुत्ते को लेकर सभी अपने अपने विचार रख रहे थे। जीनु किसके साथ रात में सोएगा। उसे सुबह शाम कौन वॉक पर एवं टट्टी कराने ले जायेगा। इसके अलावा और भी बहुत सारे बिन्दुओं पर सभी बात करते हैं। 


  " फाइनल डिसिशन पापा के आने के बाद ही होगा। " 

  कहकर कामिनी बातचीत को विराम दे देती है। 

               तभी घर का डोर बेल बज उठता है। सभी अपने अपने साजो सामान के साथ मैन गेट की ओर लगभग दौड़ पड़ते हैं। 

              राकेश के हाथ में एक बहुत ही प्यारा सा कुत्ता था। कुत्ता का आधा रंग सफेद और आधा रंग काला था। राकेश हाथ में मिठाई का एक डब्बा लिए हुए था। शायद यह मिठाई का डब्बा मां के वृद्धाश्रम में भेजने के खुशी की थी और घर में नए मेहमान कुत्ता के आगमन के जश्न के लिए। 

               सभी कुत्ता को देखते ही बहुत खुश हो जाते हैं। सच में कुत्ता बहुत प्यारा था। 

                कैसा समय आ गया था। अपनी जन्म देने वाली मां को घर से बाहर भेजकर, उसके जगह पर घर में एक कुत्ता लाकर आज जमाने भर की खुशियां मनाया जा रहा था। 

             राकेश के घर आने के बाद उससे बात करके कामिनी यही डिसाइड करती है कि एक रात जीनु घर के बड़े लोगों के साथ तो दूसरे दिन छोटे बच्चों के साथ उसके बेड पर सोएगा। जीनु को अभी सुबह में राकेश तो शाम में कामिनी वॉक कराने ले जायेगी। 

           उस रात सभी कुत्ते को अपने घर में लाकर बहुत थे। जबकि उधर राकेश की मां भारती वृद्धाश्रम में अपने नसीब को कोसती हुई उदास करवट बदल रही थी। 

          सुबह में जैसे ही राकेश अपने कुत्ते को लेकर फ्लैट से बाहर निकलता है कि सामने उसकी पड़ोसन मधु अपनी जीनी ( कुत्ती ) के साथ मिल जाती है। वह भी उसे बाहर टहलाने एवं उसे टट्टी करवाने ले जा रही थी। 

 " राकेश जी आपने भी डॉगी खरीद लिया क्या ? " 

    राकेश के साथ एक कुत्ता को देखते ही मधु पुछ बैठती है।  

 " हां... । कल ही लाया हूं तीस हजार में। " 

  राकेश शान से बोला। 

  " फिर भी देखने में मेरे वाला से ज्यादा खुबसूरत नहीं है। मेरी जीनी तो मिस वर्ल्ड है। " 

  " मेरा डॉगी जीनु अभी नया है जब मेरे यहां रहेगा तो यह भी मिस्टर वर्ल्ड हो जायेगा। "

               इधर राकेश और मधु आपस में अपनी अपनी शेखी बघारते हुए बातें करने में व्यस्त थे, तभी मौका देखकर जीनी झट जीनु के पास आ जाती है। 


 " कैसे हो हैंडसम। लग तो रहे हो गरीब परिवार के मगर देखने में स्मार्ट हो। " 

  जीनी जीनु से बोली। 

" मैं तो पहली बार अपने मालिक के यहां से किसी के घर में आया हूं। यहां तो बहुत ठाट है। " 

 जीनु धीरे से बोला। 

" हां यार मजे ही मजे है। तुम भी अब ऐश करो। मुझे भी अकेले मन नहीं लगता था अब तुम आ गए हो समय मजे में कटेगा। " 

     जीनी जीनु के पास आकर धीरे से बोली। 

               तभी मधु अपने जीनी को देख लेती है कि वह कामिनी के डॉगी से बात कर रही है। वह झट उसे पकड़कर बाहर की ओर चल देती है। 

                राकेश भी जीनु को लेकर बाहर की ओर चल देता है। 

               उस समय गांधी मैदान के बगल वाली सड़क पर और भी बहुत से कुत्ते अपने अपने मालिक के साथ टहलने आए हुए थे। जीनु के लिए तो यह पहला अहसास था। इसीलिए उसे आज बहुत मज़ा आ रहा था। वैसे भी उसे आज सुबह सुबह जीनी जैसी बाला की खुबसूरत कुतिया का दर्शन हुआ था। जीनी अभी भी उसी के आगे चल रही थी। बीच बीच में प्यार भरी नजरों से वह जीनु की ओर देख भी रही थी। जीनु भी शरमाते हुए चोर निगाहों से जीनी को ही देख रहा था। जीनु के लिए आज का दिन बड़ा ही रोमांचकारी था। 

               उस दिन के बाद से जीनी और जीनु के मिलन का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह धीरे धीरे और गहरा होता गया। अब तो दोनों एक दूसरे को बेहद प्यार करने लगे थे। जीनु राकेश के यहां ढंग का खाना खाकर अब और हैंडसम और खुबसूरत हो गया था। 

             जीनी और जीनु के बीच के प्यार की भनक दोनों के मालिक को भी चल जाती है। फिर क्या था। गुस्से में कामिनी जीनु को बाहर ले जाना ही बंद कर देती है। उसे घर के बाथरूम में ही टट्टी करवाती है। 

              पहले जहां बूढ़ी मां भारती का घर के बाथरूम में पैखाना करना घर को संडास बना देता था। वही अब एक कुत्ते का घर के बाथरूम में टट्टी करना सभी को खुशीयां प्रदान कर रहा था। वाह रे समय !

              जीनु को घर से बाहर नहीं निकलने के कारण उसे जरा भी मन नहीं लग रहा था। उसे जीनी की बहुत याद आ रहा था। 

              उधर जीनी बाहर सुबह शाम टहलने जा रही थी। मगर जीनु को नहीं देखकर वह भी उदास रहने लगी थी। जीवन में पहली बार तो उसने प्यार किया था। मगर अब वह भी शायद बिछड़ने जा रहा था। 

            जीनी से मिलन की आस में जीनु घर के बाथरूम में टट्टी करना बंद कर देता है। नतीजा यह होता है कि उसकी तबियत खराब हो जाती है। 

            जब डॉक्टर से जीनु को दिखाया जाता है तो वह उसे सुबह शाम बाहर ले जाने का राय देता है। नहीं तो बीमारी और बढ़ जाने का खतरा था। 

                राकेश और कामिनी यही निर्णय करते हैं कि जब मधु अपनी जीनी को बाहर से घुमाकर घर वापस ले आएगी, उसके बाद हम लोग अपने जीनु को बाहर घुमाने ले जायेंगे। 

                 जीनु घर के कैद खाने से बाहर आकर बहुत खुश था। मगर उसे बाहर में कहीं जीनी दिखाई नहीं देती है। जिसके कारण पल में ही उसकी खुशी उदासी में बदल जाती है। 

              जीनी और जीनु के मिलने की तड़प दिन प्रतिदिन और बढ़ती ही जा रही थी। जिसके कारण दोनों अपने अपने घर में अब उदास रहने लगे थे।

               जीनु रात में घर से बाहर निकलने की बहुत कोशिश करता था मगर घर का दरवाजा ऐसा बंद रहता था कि वह उसे खोल नहीं सकता था। 

 " मेरे डीओजी (DOG ) तुम इतना उदास आजकल क्यों रहते हो ? " 

    मयंक के साथ एक रात जब जीनु सोया था तो वह पुछ बैठा। वह उसे प्यार से उसे डीओजी ही कहता था। कयोंकि उसकी मां ने उसे डॉग की स्पेलिंग जीनु को दिखाकर ही याद करवाई थी। 

                 मयंक के पुछने पर जीनु इशारों में बाहर जाने को कहता है। मगर बेचारा मयंक उस कुत्ते की इशारा को नहीं समझ पाता है। 

  "  मम्मी मेरा डीओजी आजकल बहुत उदास रहता है। तुम कुछ करो न। " 

          सुबह उठते ही मयंक अपनी मां से बोलता है। 
   
 " कुछ दिन में सब ठीक हो जायेगा। अब यह बाहर टहलने जाने लगा है। " 

     कामिनी समझाती हुई बोली। 

                  संजोग से अगले ही दिन जैसे ही कामिनी अपने जीनु को घर से लेकर सड़क पर आती है कि सामने मधु अपने जीनी के साथ आती मिल जाती है। उस दिन वह भी शायद घर से बाहर लेट ही निकली थी। 

               जीनी और जीनु की नजरें मिलते ही दोनों बिना किसी की प्रवाह किए तेजी से एक दूसरे की ओर दौड़ पड़ते हैं। मधु और कामिनी के हाथ से रस्सी छूट जाती है। 

              दोनों को यह देखकर बहुत गुस्सा आता है। फिर क्या था मधु और कामिनी बीच सड़क पर ही एक दूसरे को ताने देने लगती है। 

              दोनों एक दूसरे के डॉगी पर दोष मढ़ते हुए उसे पकड़कर दोनों को एक दूसरे से दूर ले जाने लगती है। 

              मगर शायद तब तक जीनी और जीनु को भी यह समझ में गया था कि अगर साथ जीना मरना है तो इससे अच्छा मौका भागने का और नहीं मिलने वाला है। फिर क्या था। मन में भगाने का ख्याल आते ही दोनों अपने अपने मालकिन के हाथों से रस्सी छुड़ाकर एक तरफ बदहवास भाग खड़े होते हैं। शायद अब जीनी और जीनु इंसानों के घरों से दूर जहां अब रिश्तों की अहमियत नहीं थी वहां से अपनी नई दुनिया में स्वतंत्र जीना चाहता था। 

               मधु और कामिनी चिल्लाते हुए कुछ दूर तक पीछा तो करती है मगर दोनों के बस में दो पागल प्रेमी को पकड़ पाने का माद्दा नहीं था। 
 
             जैसे ही कामिनी जीनु का जीनी के साथ भाग जाने की बात सभी को बताती है तो सुनकर घर में मातम मच जाता है। बूढ़ी मां भारती के घर से जाने का गम जीतना नहीं था उससे हजारों गुना गम आज एक कुत्ता को भाग जाने से था। 

                उधर बेचारा डीओजी ( DOG ) भी अब एक नई दुनिया में जीनी के साथ बसने का ख्वाब देखते हुए उसके साथ भागता जा रहा था। 


 
                           कुमार सरोज 

टिप्पणियाँ

  1. शानदार कहानी

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  2. बेनामीजून 21, 2023 4:20 pm

    Is ko Kayani kehte hai?

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  3. बेनामीजून 21, 2023 10:08 pm

    आज के लोगों पर उत्कृष्ट व्यंग्य

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  4. आज की वस्तु स्थिति का यथार्थ चित्रण

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    1. जी बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार

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