बेचारा आशिक / Bechara Aashiq । कहानी । कुमार सरोज ।
बेचारा आशिक
कुमार सरोज
" मेरा बाप पगला गया है। मैं तुमसे प्यार करती हूं फिर भी वो तुमसे मेरी शादी नहीं करेगा। क्योंकि तुम अभी बेरोजगार हो और मेरी जात का नहीं हो। मेरा बूढ़ा बाप मेरी शादी एक डॉक्टर से करने वाला है। वह उसे साठ लाख रुपया दहेज भी देगा। तुम भी करोड़पति बाप के बेटे तो हो फिर भी मेरा बाप तुमसे मेरी शादी नहीं करेगा। "
काजल गुस्से में सामने बैठे अपने प्रेमी जयंत से बोली।
" तुम इतना गुस्सा मत करो बाबू। मैं कोई न कोई रास्ता जरुर निकाल लुंगा। मगर यार दहेज के लिए तुम्हारा बाप इतना पैसा लायेगा कहां से ? "
जयंत काजल के हाथ को अपने हाथ में लिए उसे धीरे धीरे सहलाते हुए बोला।
" घर के नीचे वाला फ्लोर बेच रहा है। उसका एक करोड़ रुपया मिलेगा। उसी से दहेज और शादी का सारा खर्च अरेंज करेगा। "
" तुम्हारा बाप सच में पागल है यार। दहेज और शादी में एक करोड़ खर्च कर देगा, मगर उसे अपनी बेटी की खुशी का जरा भी ख्याल नहीं है। तुम चिंता मत करो मैं जल्द कुछ करता हूं। "
" तुमसे कुछ नहीं होगा। मैं तो तुम्हारे साथ घर से भाग भी जाती। मगर मैं इकलौती वारिश हूं अपने बाप के पुरे जायदाद की। इसीलिए मैं अपनी करोड़ों की संपति छोड़कर भाग भी नहीं सकती। "
दोनों अभी पटना के गांधी मैदान के पास के एक रेस्टोरेंट में बैठे आपस में बातें कर रहे थे।
काजल का घर पटना के राजेंद्र नगर में था। जबकि जयंत का घर पटना के ही कंकड़बाग में था। दोनों मोहल्ला पास में ही था। काजल के पिता राजनाथ सिंह का घर के पास ही एक किराने की दुकान थी। वही जयंत के पिता कामता प्रसाद एक बिल्डर थे। काजल के घर में उसके पिता के अलावा कोई और नहीं था। मां दस साल पहले ही मर गई थी। उसके पिता ने ही मां बाप दोनों का प्यार देकर उसकी परवरिश किया था।
काजल और जयंत एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे। मगर काजल के पिता दोनों की शादी नहीं करवाना चाहते थे। क्योंकि जयंत उसके जात बिरादरी का नहीं था। वह अभी तक अपने बाप के पैसों पर ही निर्भर था।
जयंत दो भाई था। बड़ा भाई विवेक की शादी हो गई थी और वह अपने पिता के साथ ही अब बिल्डर का काम करता था। जबकि जयंत दिन भर दोस्तों के साथ सिर्फ आवारागर्दी करते रहता था। इसीलिए काजल के पिता उससे नफरत करते थे। क्योंकि जयंत के साथ उन्हें काजल का भविष्य अंधकारमय लग रहा था। मगर काजल तो अभी जयंत के प्यार में ऐसे पागल थी कि उसे उसके सिवा कुछ और दिख ही नहीं रहा था। अभी तो उसे उसका पिता ही उसके लिए दुनिया का सबसे बड़ा दुश्मन लग रहे थे। जबकि उसके पिता अपनी जगह पर ठीक थे। डॉक्टर दामाद के साथ उन्हें अपनी बेटी का भविष्य उज्जवल दिखलाई दे रहा था। तभी तो अपना आधा घर बेचकर भी शादी करने को तैयार थे।
कुछ देर के बाद काजल और जयंत रेस्टुरेंट से अपने घर की ओर चल देते हैं। जयंत के पास एक महंगी स्पोर्ट्स बाईक थी, उसी पर काजल उससे चिपककर बैठ जाती है।
कंकड़बाग और राजेंद्र नगर पास में ही था। जिसके कारण जयंत हमेशा काजल को कहीं भी जाना आना होता था तो वह ही उसे अपनी बाईक से ले जाता था। काजल के पिता तो अपने दुकान में ही व्यस्त रहते थे। जिसका काजल खुब फ़ायदा उठाती थी।
राजेंद्र नगर में जहां पर काजल का घर था, उसके आस पास बहुत सारे लड़के पढ़ने के लिए किराया पर कमरा लेकर रहते थे। जिसमें से अधिकांश दूसरे शहर के या गांव देहात से आए लड़के थे। सभी के माता पिता बड़े ही अरमान से अपने बेटों को पटना पढ़ने के लिए भेजते हैं।
काजल के घर के ठीक सामने ही एक कमरा में रवीश भी रहता था। वह गया जिला के एक गांव धरनई का रहने वाला था। वह पटना रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता था।
रवीश काजल को सिर्फ एक दो बार ही घर से बाहर आते जाते देखा था। फिर भी वह उसके रुप लावण्य का दीवाना था। वह अपने कमरे से जब भी बाहर निकलता तब एक सरसरी निगाह काजल के घर की ओर जरुर डालता था, ताकि उसके छलकते हुस्न का दीदार हो सके। मगर कभी उसके मन की मुराद पुरी नहीं होती थी। फिर भी वह उसे देखने की मन में ख्वाब पाले भगवान से बार बार देखने की मन्नत मांगते रहता था। काजल घर के अन्दर भी बहुत कम ही दिखती थी।
जब हम किसी चीज को देखना चाहते हैं, और वह दिखाई नहीं देता है तो हमारी देखने की ललक और बढ़ जाती है। कुछ ऐसी ही हालत थी रवीश की।
एक दिन की बात है। सुबह का समय था। रवीश जैसे ही अपने कमरे से निकलता है कि अपने घर के छत पर काजल दिख जाती है। वह सुबह सुबह ही नहाकर धूप में बाल सुखा रही थी। काजल को देखते ही रवीश के मन में खुशी के मारे हजार वॉट का बल्ब टिमटिमाने लगता है। आज उसका दिन बन गया था। पहली बार वह काजल के रुप लावण्य का जी भरकर दीदार करता है। काजल को देखते ही बरबस वह एक रोमांटिक गाना गुनगुनाने लगता है।
तभी काजल की नजर भी उस पर पड़ जाती है। वह भी उसे देखकर मुस्कुरा देती है।
काजल को मुस्कुराते देख रवीश का खुशी का ठिकाना नहीं रहता है। खुशी के मारे उसका कलेजा धक धक करने लगता है। उसने तो कभी सोचा भी नहीं था कि काजल जैसी बड़े घर की खूबसूरत और मॉडर्न लड़की उसके जैसे गांव के गवार लड़के को देखकर मुस्कुराएगी। वह सड़क पर ही खुशी के मारे उछलने लगता है।
रवीश गांव का सीधा साधा लड़का था। अभी वह पुरी तरह शहरी रंग में रंगा नहीं था। मगर अब वह भी अपने दोस्तों के देखा देखी में किसी के प्यार के रंग में रंगना चाहता था। आज काजल को यूं मुस्कुराते देखकर उसे प्यार के पथ पर बढ़ने के लिए एक जोरदार टॉनिक मिल गया था।
काजल की एक झलक पाकर ही अब वह दिन रात उसी के ख्वाबों में जीने लगता है।
ऊपर वाला भी शायद अब रवीश पर मेहरबान हो गया था। तभी तो अब जब भी वह अपने कमरे से निकलता तो काजल का दीदार हो जाता था। वह उसे देखकर मुस्कुरा देती थी। इधर रवीश का दिल बार बार काजल के मुस्कुराहट की पैनी चोट से चोटिल होता जा रहा था।
और एक दिन तो रवीश को मानो जन्नत ही नसीब हो गई। वह जैसे ही अपने कमरे से बाहर निकलता है कि काजल अपने घर के दरवाजे पर खड़ी नजर आ जाती है। वह उसे देखकर मुस्कुराते हुए एक तरफ जाते ही रहता है कि काजल उसके पास आ जाती है और एक कागज उसके हाथ में देकर अपने घर के अंदर चली जाती है।
रवीश जब मुड़े हुए कागज को देखता है तो देखकर खुशी से झूम उठता है। कागज में मोबाईल नम्बर लिखा हुआ था। शायद यह काजल का मोबाईल नम्बर था।
मोबाईल नम्बर मिलते ही काजल और रवीश के बीच की दूरियां धीरे धीरे सिमटती चली जाती है। अब दोनों दिन रात सिर्फ एक दूसरे के साथ संग जीने मरने का ख्वाब देखने लगते हैं। कल तक जो रवीश प्यार के बारे में सिर्फ ख्वाब देखता था आज प्यार के साथ जीने लगा था।
पुरे दिन तो काजल घर पर अकेली ही रहती ही थी, इसीलिए वह रवीश को अब अपने घर पर भी बुलाने लगी थी। दोनों घंटों एकांत में बैठकर प्यार के अथाह समुद्र में गोता लगाते रहते थे।
एक दिन की बात है। जैसे ही रवीश काजल से मिलने उसके घर आता है कि वह उससेे लिपटकर रोने लगती है।
" क्या हुआ। तुम रो क्यों रही हो ? "
रवीश उसे चुप कराने की कोशिश करते हुए पूछा ।
" मैं तुम्हारे बिना जिन्दा नहीं रह सकती हूं। मगर मेरे पिता जी हम दोनों की शादी नहीं होने दे रहे हैं। आज जब तुम्हारे बारे में उनसे बोली तो मुझे मारने लगे। मैं मर जाऊंगी मगर तुम्हारे सिवा किसी और से शादी नहीं करूंगी। "
" मरे हम दोनों के दुश्मन। तुम चिंता मत करो। हम दोनों भागकर शादी कर लेंगे। "
" मैं भागकर शादी नहीं कर सकती। ऐसा करने से मुझे अपनी सारी संपति से हाथ धोना पड़ेगा। फिर हम दोनों जिएंगे कैसे ? "
" तुम बात तो सही बोल रही हो। पिता जी के बाद तो सारी जायदाद की इकलौती वारिश तो तुम ही हो। घर छोड़कर भागने पर सब खत्म हो जाएगा। "
" यही तो चिंता का विषय है। मुझे तुम्हारा प्यार भी चाहिए और अपना पुरा जायदाद भी। मैं दोनों में से किसी को भी खोना नहीं चाहती हूं। "
" फिर तुम अब क्या करोगी ? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है। "
" अपने प्यार को पाने के लिए मैं अपने बाप का खून भी कर सकती हूं। मुझे तुम्हारा प्यार हर कीमत पर चाहिए। "
काजल के आंख में रवीश को कुछ कर गुजरने का दृढ़ निश्चय साफ दिख रहा था।
" क्या तुम अपने पिता का खून कर दोगी। "
रवीश सुनते ही सिहर उठता था। मगर वह अपने नसीब पर बहुत खुश भी था। उसे काजल जैसी चाहने वाली दिलरुबा मिली थी, जो उसके लिए अपने पिता से टकराने की जिद्द कर बैठी थी।
" हां मैं खून कर दूंगी। हम दोनों के बीच में जो भी आयेगा उसे मैं जान से मार दूंगी। "
" तुम ऐसा कुछ नहीं करोगी। मैं अभी जिन्दा हूं। मेरे रहते तुम्हें कुछ करने की जरुरत नहीं है। "
" तुम से किसी का खून नहीं होगा। ऐसा करो तुम पैसा लेकर किसी का खून करने वाला किसी आदमी का पता लगाओ। अभी मेरे पास एक लाख रुपया है। "
कहते कहते काजल रवीश से रोती हुई लिपट जाती है।
" किसी दूसरे आदमी से यह काम करवाने में रिस्क है। बाद में वही हम दोनों को ब्लैकमेल करने लगेगा। प्यार के लिए अगर तुम इतनी कुर्बानी देने को तैयार हो तो मैं भी तुम्हारे लिए तुम्हारे बाप का खून कर सकता हूं। "
रवीश काजल को अपने से अलग करते हुए धीरे से बोलता है।
रवीश की बात सुनते ही काजल खुशी के मारे उसके चेहरे को जोर जोर से चूमने लगती है।
और उसी रात काजल के पिता राजनाथ सिंह जब अपनी दुकान बंद करके रात में जब घर आ रहे थे तो रास्ते में रवीश उन्हें पकड़कर चाकू से जान से मार देता है।
रवीश तो ठहरा गांव का सीधा साधा लड़का वह अभी प्यार का पक्का खिलाड़ी तो था ही नहीं, फिर किसी के कत्ल का पक्का खिलाड़ी कैसे होता। धटना स्थल से कुछ ही दुरी पर वह रात में खून करके अपने उस गमछा को फेंक दिया था जिससे वह अपना मुंह ढके हुए था। पास में ही चाकू भी पुलिस को मिल गया था।
थोड़ी सी छानबीन के बाद ही रवीश को पुलिस काजल के पिता के हत्या के जुर्म में गिरफ्तार कर लेती है। बेचारा आशिक रवीश अपनी आशिकी को पाने के पहले ही जेल चला जाता है।
रवीश गांव का भोला भाला लड़का तो था ही भले उसने प्यार में अंधा होकर अपना होश खो बैठा था और काजल के पिता का खून कर दिया था। मगर पुलिस के थर्ड डिग्री के डर से वह टूट जाता है और काजल के साथ मिलकर बनाया हुआ पुरा प्लान पुलिस को बता देता है।
पुलिस काजल को भी गिरफ्तार कर लेती है।
और जब पुलिस के मार के डर से काजल जो बात बताती है उसे सुनकर सभी के होश उड़ जाते हैं।
वास्तव में काजल रवीश से प्यार नहीं करती थी। वह तो शुरु से ही जयंत से प्यार करती थी। वह सिर्फ़ अपने पिता को मरवाने के लिए ही रवीश से प्यार का नाटक की थी।
पुलिस जयंत को भी पकड़ लेती है।
जिस प्यार को रवीश अभी तक हीर रांझा का प्यार समझ कर अपने आप को दुनिया का सबसे बड़ा खुशनसीब आशिक समझ रहा था, अब सच्चाई जानकर वह अपने आप को सबसे बड़ा अभागा समझने लगा था। उसने तो आज अपने माता पिता के अरमानों का भी खून कर दिया था।
कुमार सरोज
आज के बदलते प्यार को दर्शाती एक लाजवाब कहानी
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद
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