आधी विधवा / Aadhi Vidhawa । कहानी । कुमार सरोज ।
आधी विधवा
कुमार सरोज
बरसात का मौसम था। पिछले चार पांच दिन से लगातार मूसलाधार बारिश हो रही थी जिसके कारण चारों ओर जलमग्न था। सभी नदियां भी उफान पर थी।
सुबह का समय था। कुछ जरूरी काम से मैं अभी अपने घर चतरा से हजारीबाग अपनी कार से जा रहा था। बारिश होने के कारण सड़क पर जगह जगह बने गढ्ढों में पानी भरा हुआ था, जिसके कारण मैं कार धीरे धीरे चला रहा था। मैं एक एनजीओ में काम करता था। मेरी संस्था गरीब एवं असहाय बच्चों की देखभाल करती थी, एवं उनके रहने एवं खाने पीने से लेकर पढ़ाई तक की सारी व्यवस्था करती थी। अभी भी मैं अपनी उसी संस्था के काम से सुबह सुबह ही घर से हजारीबाग जाने के लिए निकल गया था।
चतरा से चलकर मैं अभी निरंजना नदी के पास ही पहुंचा था कि अचानक कुछ देखकर मैं चौंक गया। नदी किनारे बने पुल के पास एक औरत अपने दो बच्चों के साथ खड़ी थी। दूर से ही उसे देखने से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वह नदी में बच्चों सहित कुदकर जान को सीच रही थी
मैं झट कार रोककर उस औरत की ओर तेजी से दौड़ पड़ा। वह अभी अपने बच्चों सहित उस उफनती नदी में कूदने ही वाली थी कि उससे पहले ही मैं वहां आकर उसे पकड़ लिया।
वह पहले तो मुझसे छुटने की भरपुर कोशिश की मगर तुरन्त ही वह शिथिल पड़ गई। शायद वह भी आत्महत्या करना नहीं चाहती थी। मगर शायद किसी मजबूरी के कारण वह न चाहकर भी आत्महत्या करने जा रही थी। वैसे भी मासूम बच्चों के साथ भला शौक से कोई आत्महत्या थोड़े न कर सकता है !
मैं उस औरत को समझाते हुए उसे एवं उसके बच्चों को लेकर अपनी कार की ओर चल पड़ता हूं।
उस औरत का नाम तेतरी था। वह मुश्किल से अभी तीस साल की होगी, मगर गरीबी ने उसे चालीस साल का बना दिया था। उसके साथ उसके दो बच्चे थे। बड़ी बेटी थी जिसका नाम शोभा तो दुसरा लड़का था जिसका नाम पवन था। शोभा दस साल की थी तो पवन आठ साल का था।
मैं तेतरी और उसके दोनों बच्चों के साथ अपनी कार में बैठकर हजारीबाग की ओर चल पड़ा। मैं उसे अपनी संस्था में रखने की मन ही मन सोच चुका था। बस मुझे एक बार उसके आत्महत्या की वजह जानना था। मैं वजह जानने के लिए धीरे धीरे गाड़ी चलाते हुए बहुत उत्सुक हो रहा था।
मेरे पुछने पर जब तेतरी अपनी आपबीती सुनाती है तो सुनकर मेरे होश उड़ जाते हैं। आख़िर कोई इंसान इतना गिर कैसे सकता था !
दुनिया से हताश और उदास तेतरी मेरे जोर देने पर अपनी कहानी कहते जा रही थी और मैं कार चलाता हुआ सुनते जा रहा था।
तेतरी का घर पास के ही एक गांव मांडू में था। बात आज से सात साल पहले की थी। उस दिन तेतरी बहुत खुश थी। क्योंकि उसका पति सुरेश अपने परिवार और बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए गांव से बहुत दूर एक बड़े शहर में दो पैसा कमाने गया था। अभी वह गांव से बाहर के बस स्टैंड से ही अपने पति सुरेश को छोड़कर आ रही थी। तेतरी की सुरेश से पांच साल पहले ही शादी हुई थी। शादी के एक साल बाद बेटी शोभा की तो उससे डेढ़ साल बाद बेटा पवन का जन्म हुआ था। उस समय शोभा चार साल की तो पवन ढाई साल का था।
तेतरी के घर में उसके पति और बच्चों के अलावा उसके चचेरे ससुर भी थे, जिनका नाम मंगल था।
घर आते ही तेतरी पवन को गोद में ले लेती है, क्योंकि वह अकेले रहने के कारण रो रहा था। जबकि पास बैठी शोभा अपने छोटे भाई को चुप कराने की अथक प्रयास कर रही थी।
सुरेश का गांव में थोड़ा बहुत खेत था, मगर उससे अब घर का दाना पानी नहीं चलता था। इसीलिए वह शहर जाकर पैसा कमाना चाहता था। घर पर परिवार की देख भाल करने के लिए उसके चचेरे ससुर मंगल थे ही।
तेतरी पहले तो अपने जवान पति को बाहर शहर कमाने भेजना नहीं चाहती थी, मगर बहुत सोच विचार करने के बाद उसने निर्णय लिया की सुरेश का बाहर कमाने जाना ही अच्छा रहेगा। जबकि गांव की कुछ औरते उसे अपने पति को बाहर नहीं भेजने देना चाहती थी। इसका भी कुछ कारण था। सुरेश के गांव मांडू से अभी तक बहुत सारे जवान लड़के शहर कमाने गए थे। जिसमें से कुछ एक बार जो गांव से गए वो दुबारा वापस फिर गांव नहीं आए थे। इसीलिए तेतरी को गांव की औरते सुरेश को बाहर जाने देने के पक्ष में नहीं थी। सुरेश भी अभी हट्टा कट्टा बांके जवान छोरा था। फिर भी तेतरी किसी की एक नहीं सुनती है और अपने सीने पर पत्थर रखकर पति को शहर कमाने जाने देती है।
सुरेश को बाहर गए देखते ही देखते एक महीना बीत जाता है। तभी एक दिन गांव के मुखिया जी के मोबाइल पर उसका कॉल आता है।उस दिन अपने पति से बात करके तेतरी बहुत खुश थी। सुरेश को सुरत के एक कपड़ा फैक्ट्री में काम मिल गया था।
जिस दिन तेतरी की अपने पति से बात होती है ठीक उसके अगले दिन वह मन्दिर जाकर पूजा करती है। ताकि उसका पति ऐसे ही कमाता रहे और उससे कम से कम महीने में एक बार बात करता रहे।
मगर शायद तेतरी के नियति में तो कुछ और ही लिखा हुआ था। सुरेश एक बार जो कॉल करता है उसके बाद फिर दुबारा कभी कॉल नहीं करता है। उसका कोई चिठ्ठी पाती भी नहीं आता है।
तेतरी अपने पति को लेकर अब परेशान रहने लगती है। वह कभी अपने चाचा से तो कभी मुखिया जी से सुरेश के बारे में पुछते रहती है।
देखते ही देखते सुरेश को गए छः महीने हो जाता है। इन छः महीने में उसका सिर्फ एक ही बार कॉल आता है। उसके बाद न दुबारा कोई कॉल आता है और न ही कोई चिठ्ठी या मनीऑर्डर आता है।
तेतरी के घर का जमा पूंजी अब धीरे धीरे खत्म हो गया था। अकेले उसके चाचा खेत में क्या क्या करते। नतीजा यह हुआ कि खेती भी अब ढंग से नहीं हो रही थी। जिसके कारण खाने के लिए भी अब तेतरी और उसके बच्चों को आफत आ पड़ी।
इसी बीच तेतरी के साथ एक हादसा हो जाता है। वह अपने पति के फोन के बारे में मुखिया जी से उनके घर जाकर हरदम पुछते रहती थी कि ' उसके पति का कोई कॉल आया था या नहीं। '
शायद आज के इस युग में एक अकेली असहाय अबला की उसके मजबूरी का फायदा, इंसानियत और सराफत का चोला ओढ़े मर्द उठाने से कभी नहीं चुकते हैं। तभी तो गांव का वह मुखिया एक दिन धोखे से चाय में नशा की दवाई मिलाकर तेतरी की इज्जत लूट लेता है। शायद मुखिया को अब आभास हो गया था कि उसका पति अब गांव लौटकर आने वाला नहीं है। वैसे भी आज एक अकेली अबला को देखकर पुरुषत्व का दंभ भरने वाले मर्द हमेशा उसकी इज्जत लुटने के लिए लालायित रहते हैं।
तेतरी मुखिया की गंदी हरकत के बारे में अपने चचेरे ससुर को बता देती है। मगर कोई फायदा नहीं होता है। उलटे उसके चचेरे ससुर भी उसी रात धोखे से उसकी इज्जत लुट लेते हैं। रिश्ता और विश्वास का एक और चीरहरण होता है उस रात तेतरी के साथ।
जब साथ में अपना मर्द नहीं रहता है तो कैसे अपने भी एक औरत की अस्मत को नोच खाता है यह तेतरी को अब समझ में आ गया था। मगर वह चाहकर भी अब किसी को बता नहीं बता सकती थी। वह बताती भी तो किसे ? सुनने वाला तो मुंह मोड़कर घर से रिश्ता नाता तोड़कर चला गया था।
तेतरी की अस्मत लुटने के बाद से मुखिया और उसके चचेरे ससुर उसके लिए एवं उसके बच्चों के लिए खाने की जरूरी सामान देने लगा था। मगर बदले में दोनों अब आए दिन उसे अपनी बिस्तर की शोभा बनाने लगे थे। चाहकर भी तेतरी कुछ नहीं कर पा रही थी। उसे बस अपने बच्चों का फिक्र था।
इधर सुरेश को शहर गए धीरे धीरे दो साल हो जाता है। उसका इन दो सालों में कोई अता पता नहीं चलता है। तेतरी को भी अब विश्वास हो गया था कि उसका पति भी गांव के अन्य मर्दों के जैसे ही शहर जाकर वही का होकर रह गया है।
शोभा अब छः साल की हो गई थी। पवन भी साढ़े चार का हो गया था। दोनों स्कूल जाने के लायक हो गए थे। मगर तेतरी के पास पैसे नहीं थे। जिसके कारण वह अब परेशान रहने लगी थी। बच्चे ही तो उसके अंतिम उम्मीद थे।
थक हारकर तेतरी पैसों के लिए गांव के ही एक बड़े किसान जयराम के खेतों में काम करने का मन बना लेती है। आखिर मरता भला क्या न करता।
तेतरी खेत में काम करने तो लगती है मगर वहां भी ताक में बैठे अस्मत के लुटेरे मौका मिलते ही लुट लेते हैं। भला एक अकेली असहाय अबला अब जाती तो जाती कहां ? चारों ओर तो अस्मत के लुटेरे ताक में बैठे थे। यहां हर मर्द तो अब उसकी बेवसी और लाचारी का फायदा उठाकर उसकी इज्जत को लुटना ही चाह रहा था।
अब किसी तरह तेतरी का दिन कट रहा था। वह रोज मर मरकर जीने को सिर्फ अपने बच्चों के खातिर बाध्य थी। नहीं तो उसका शरीर तो अब सिर्फ़ जिंदा लाश था।
धीरे धीरे सुरेश को कमाने शहर गए पांच साल हो गया था। इन पांच सालों में मुखिया, उसके चचेरे ससुर और जयराम के अलावा अब तक गांव के दस बारह मर्दों ने तेतरी को अपने हवस का शिकार बना लिया था। वह गांव के मर्दों के लिए एक हाड़ मांस की खिलौना बनकर रह गई थी। जिस मर्द के शरीर में वासना के कीड़े हिलौर मारते वह उसके साथ अपना जोश ठंडा कर लेता था।
आज समाज के सभ्य लोग कितने मतलबी हो गए थे और उनका कितना नैतिक और चारित्रिक पतन हो गया था। तभी तो तेतरी के मजबूरियों का फायदा उठाकर सभी उसके जिस्म और भावनाओं के साथ खेल रहे थे। उसका पति बाहर कमाने क्या गया था कि आज सभी उसके जिस्म को नोच खाने को तत्पर थे।
अब तेतरी की बेटी शोभा भी दस साल की हो गई थी। इस बार तो मुखिया ने हद ही पार कर दिया था। वह उसकी मासूम फूल सी बेटी को भी अपनी हवस का शिकार बनाना चाह रहा था। इसी से हिम्मत हारकर तेतरी अपने जिन बच्चों के खातिर आज तक अपने जिस्म को गांव के मर्दों से नोचवाते आ रही थी, उसी बच्चों के साथ अब मरने जा रही थी।
तेतरी कहते कहते फूट फूटकर कर रोने लगती है। मैं भी आज उसे जी भरकर रोने देना चाहता था। इसीलिए सड़क के किनारे मैंने गाड़ी रोक दी।
तेतरी की पुरी बात सुनकर मेरे अंदर गुस्सा का ज्वार उठने लगा था। मुझे मर्द होने पर अब घिन आने लगी थी। आख़िर कोई इंसान एक अकेली असहाय अबला के साथ ऐसी हरकत कैसे कर सकता था ? क्या सच में आज हमारी नैतिकता का इतना पतन हो गया था !
मुझे बार बार तेतरी के कहे अंतिम वाक्य अन्दर तक झकझोर रहे थे। वह रोते रोते अभी भी वही वाक्य दुहराये जा रही थी -
" बाबूजी, अब न ही मैं सुहागन हूं, और न ही विधवा। मैं तो आधी विधवा हूं ............ आधी विधवा। "
तेतरी शायद सच ही तो कह रही थी। उसका पति तो था मगर अब वह जिंदा था भी या नहीं इसका कोई खबर नहीं था। वह अपने आप को विधवा भी नहीं मान सकती थी, कयोंकि उसके पति के घर वापस लौटने की उम्मीद की एक रौशनी अभी भी उसके हृदय में टिमटिमा रही थी। इसीलिए शायद वह अपने आप को आधी विधवा मानती थी।
कुमार सरोज
लाजवाब कहानी
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद
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