सहेली / Saheli । कहानी । कुमार सरोज ।
सहेली
कुमार सरोज
बिहार के औरंगाबाद जिले में एक प्रखंड है रफीगंज। अभी शाम के पांच बज रहे थे। रफीगंज बाजार से निकलकर तीन साईकिल पर सवार छः लड़कियां अपने गांव दयालचक की ओर आपस में बातें करती हुई चली जा रही थी। सभी एक ही गांव की थी और आपस में सभी की गहरी दोस्ती थी। तीन सहेली कजरी, तारा और रजनी अभी साईकिल चला रही थी तो बाकि की तीन सहेली कमला, मुनिया और शोभा पीछे बैठी थी। अभी जो साईकिल चला रही थी वे सभी सुबह में पीछे बैठकर आई थी। इसी तरह बदल बदलकर सभी साईकिल से गांव से स्कूल आते जाते थे। सभी के पीठ पर स्कूल बैग था। सभी रफीगंज के ही हाई स्कूल में दसवीं कक्षा में पढ़ती थी। अभी सभी स्कूल से ही अपने गांव की ओर जा रही थी। अभी सभी के चेहरे पर उदासी एवं गुस्सा का मिश्रित भाव साफ दिख रहा था। इसका कारण कजरी थी। कजरी सभी की लीडर थी। उसी के प्रयास से आज सभी अपने गांव से दूर शहर में पढ़ने आती थी। नहीं तो उसके गांव में अभी भी लड़कियों को लोग बाहर पढ़ने जाने नहीं देना चाहते थे। इसका भी मुख्य कारण अभी तक गांव की बदहाली, गरीबी और अशिक्षा ही था। लोग अभी भी पुराने समय में जीने को बाध्य थे। जहां लड़कियों को बस चूल्हे चौका तक ही सीमित रखा जाता था। मगर कजरी के प्रयास से आज गांव की बहुत सारी लड़कियां रफीगंज पढ़ने आती थी। शायद इसीलिए गांव के वैसे लोग जो आज भी कजरी को गलत समझते थे वे उसे पढ़ाकू गैंग कहते थे। और उसी पढ़ाकू गैंग की लीडर थी कजरी।
स्कूल की छुट्टी तो चार बजे ही हो गई थी। मगर छुट्टी के बाद कजरी एक लड़का मोहन से मिलने चली गईं थी जिसके कारण ही आज इतना देर हो गया था।
मोहन स्कूल में कजरी के कक्षा में ही पढ़ता था। वह कजरी को प्यार करता था। मगर कजरी अपनी हैसियत देखकर उससे दूर रहती थी। कयोंकि जहां मोहन उच्च जाति का था वही कजरी नीच जाति की एक मजदूर गरीब की बेटी थी। फिर भी मोहन उसके पीछे पड़ा रहता था। इसीलिए कजरी आज उसे अकेले में मिलने के लिए बुलाई थी। और अभी उसी से मिलकर सभी सहेलियों के साथ घर जा रही थी।
मैट्रिक परीक्षा के बाद ही कजरी के घर वाले उसकी शादी करने वाले थे। मैट्रिक परीक्षा अभी से दो महीना बाद होने वाला था।
मोहन से जब कजरी अकेले में मिलती है तो उसके सामने शादी का प्रस्ताव रख देती है। क्योंकि वह जिस बिरादरी से आती थी वहां पहले प्यार व्यार नहीं बल्कि शादी होती थी।
मगर मोहन अभी कजरी से शादी करने से साफ इंकार कर दिया था। उसके घर वाले इसके अभी राजी भी नहीं होते और उल्टे दोनों को जिंदा जमीन में गाड़ देते।
मोहन के जवाब को सुनकर कजरी उसे बिना कुछ कहे चुप चाप अपनी सहेलियों के साथ वहां से चल पड़ी थी।
" कजरी तुम एकदम पागल हो। उस कुता मोहन को तो चप्पल से मारना चाहिए था। साला प्यार का ढोंग कर रहा अभी तक। जब शादी की बात आई तो प्यार का सारा नशा उसका उतर गया। "
कमला गुस्से में गालियां देती हुई कजरी से बोली।
" कमला तुम ठीक बोल रही हो। हम उसे तो 2 - 3 थप्पड़ मारने वाले भी थे, मगर यही मैडम रोक दी। "
शोभा कमला के बातों का समर्थन करती हुई बोली।
" तुम दोनों बेकार में गुस्सा कर रही हो। हम लोग गरीब और छोट जात के हैं। हम लोग के साथ सोना तो सभी चाहता है मगर शादी के बंधन में बंधना कोई नहीं चाहता है। हम लोग को पढ़ लिख कर इसी सोच को तो बदलना है। "
कजरी साईकिल चलाती हुई कमला और शोभा से बोली।
" कजरी एकदम सही कह रही है। हम लोगों की औकात ही क्या है। वह तो हम लोगों को गरीब समझकर सिर्फ़ टाईम पास करना चाहता था। मगर हमें भी वैसे लड़कों के जाल में नहीं कभी नहीं फंसना चाहिए । "
अभी तक चुप चाप सभी की बात सुन रही रजनी बोल पड़ी।
" फिर भी मोहन को तो उसके करनी का सबक सिखाना चाहिए था। "
कमला का गुस्सा तो कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था।
" तुम उसके बाप को नहीं जानती हो। हम सब को घर से उठवा लेगा और कोई कुछो न बोलेगा। कजरी जो भी की ठीक की। "
तारा धीरे से सभी को समझाती हुई बोली।
" तारा एकदम सही कह रही है। पिछले महीना ही तेतरी भाभी एक बड़का जात के आदमी को कुछ बोल दी थी और वह सुन लिया था। पता है तेतरी भाभी को वह बहुत मारा था। "
मुनिया भी तारा के बात का समर्थन करती हुई बोली।
सभी आपस में तर्क वितर्क करते हुए अपने गांव की ओर चली जा रही थी।
दयालचक गांव रफीगंज से चार किलोमीटर दूर था। यह करीब सौ परिवारों का एक छोटा सा गांव था। यहां अधिकांश दलित गरीब मजदूर परिवार ही रहते थे। दयालचक गांव में आने जाने के लिए अभी भी कच्ची सड़क ही थी।
दयालचक गांव के बगल में ही एक बड़ा सा गांव था रतनपुर। इस गांव में अधिकांश उच्च जाति के लोग रहते थे।
दयालचक और रतनपुर के बीच में ताड़ का बहुत पेड़ था। जिसके कारण ताड़ी पीने वालों की जगह जगह पर जमघट लगा रहता था।
रतनपुर में ही एक दबंग किसान शालिग्राम सिंह रहता था। वह अभी रतनपुर पंचायत का मुखिया भी था। शालिग्राम सिंह स्थानीय विधायक कन्हैया सिंह का साला था। जिसके कारण ही उनकी रफीगंज में तूती बोलती थी।
शालिग्राम सिंह का एक मुंहबोला इकलौता बेटा था दिनेश। दिनेश अपने बाप के तरह ही धमंडी और अहंकार के मद में चूर रहता था। आज रतनपुर और रफीगंज में क्रिकेट मैच था। रतनपुर का कैप्टन दिनेश ही था। वह आज मैच हार गया था। अभी अपने दोस्त धीरज और गौरव के साथ रफीगंज से मैच हारकर बाईक से अपने घर लौट रहा था। रास्ते में ताड़ी पीने का मन किया तो ताड़ के एक बगान में रुक गया था। मगर उस समय अभी ताड़ के पेड़ से ताड़ी उतारने वाला धनेसर चौधरी वहां पर नहीं था। धीरज के पास उसका मोबाईल नम्बर था।
अभी सभी एक ताड़ के नीचे बैठे उसी का इंतजार कर रहे थे। बैठा बैठा दिनेश अपने मोबाईल में एक बोल्ड फिल्म देख रहा था। बाकि के उसके दोनों दोस्त भी उसके अगल बगल बैठे फिल्म देख रहे थे।
अभी दिनेश ताड़ी उतारने वाला धनेसर का बैठा फिल्म देखते हुए इंतजार ही कर रहा था कि कजरी भी उसी समय रफीगंज से अपनी सहेलियों के साथ वहां आ जाती है।
सभी अपनी घुन में वहां से गुजर ही रही थी कि दिनेश सभी को देखकर गंदा कॉमेंट करने लगता है। इधर सभी सुनकर भी अनसुना करके अपनी राह पर आगे बढ़ते ही जाती है। क्योंकि सभी को पता था कि ये सब अमीर बाप के बिगड़े हुए बदमाश और लफंगे लड़के हैं।
दिनेश अपने बात का किसी के ऊपर कोई असर नहीं होता देख मन ही मन क्रोधित हो जाता है। एक तो जवानी का जोश और ऊपर से बोल्ड फिल्म का नशा। दोनों मिलकर दिनेश के लहू में वासना के कीड़े को पहले से ही जागृत किए हुए थे।
फिर क्या था। दिनेश सबसे पीछे चल रही कमला के साईकिल को दौड़कर पकड़ लेता है और उसे चुम्मा ले लेता है।
सभी सहेलियां यह देखकर दंग रह जाती है। कमला जो अभी कुछ देर पहले कजरी को समझा रही थी मगर अब जब अपने ऊपर यह बीती तो वह शन रह गई। उसे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे।
कजरी थी भले शांत स्वभाव की मगर थी सबसे हिम्मतवाली और निडर। वह आव देखती है न ताव झट साईकिल से उतरकर दिनेश को जोरदार तमाचा जड़ देती है।
दिनेश तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसके साथ दयालचक गांव की कोई लड़की ऐसा कर सकती थी, क्योंकि वहां के आधिकांश आदमी तो उसके यहां ही मजदूरी करते थे एवं सभी उसके ही दिए पैसों से अपना गुजारा कर रहे थे।
दिनेश थप्पड़ खाने के बाद गुस्सा के मारे उबलने लगता है। उसके दोनों दोस्त भी पास आ जाते हैं।
दिनेश गुस्से से दहाड़ता हुआ अपने कमर से कट्टा निकालकर जिसे वह हमेशा अपने पास ही रखता था कजरी के ऊपर तान देता है।
कजरी सहित उसकी सभी सहेलियां डर के मारे थर थर कांपने लगती है।
दिनेश कजरी को भद्दी भद्दी गालियां देता हुआ उसके बाल को पकड़कर उसे घसीटते हुए पास के एक खेत की ओर लेकर जाने लगता है।
कजरी अपने बचाव में चीखने चिल्लाने लगती है। मगर पिस्तौल के डर से उसकी किसी सहेली में इतनी हिम्मत नहीं होती है कि वह बचाने को आगे आए। बस सभी शांत मन ही मन भगवान से कजरी की सलामती के लिए दुआएं मांग रही थी।
जाते जाते दिनेश अपना कट्टा गौरव को दे दिया था। अब वही डराने के लिए सभी के ऊपर कट्टा ताने खड़ा था। धीरज भी पास में रखा हुआ लकड़ी का एक लाठी जैसा टुकड़ा उठा लिया था।
दिनेश कजरी को पास के ही एक खेत में ले जाकर उसकी इज्जत को लूट लेता है। कजरी लाचार बेबस चाहकर भी कुछ नहीं कर पाती है।
कजरी की इज्जत को लुटकर दिनेश दोस्तों के साथ अपनी बाईक पर सवार होकर चला जाता है। जाते जाते वह किसी को बताने पर जान से मारने की धमकी भी देता जाता है।
कजरी भी अपनी लुटी हुई इज्जत को समेटकर घर जाने के बजाय थाने की ओर चल देती है। उसकी सभी सहेलियां भी उसके साथ ही रहती है। वह दिनेश के खिलाफ थाने में केस करने जा रही थी।
सभी को रफीगंज थाना पहुंचते पहुंचते शाम के छः बज जाते हैं। थानेदार रमेश उस समय थाने में ही बैठा था। कजरी जैसे ही उसे दिनेश के बारे में बताती है वह सुनकर चौंक जाता है। कयोंकि उसे पता था कि दिनेश शालिग्राम सिंह का बेटा है।
थानेदार रमेश कजरी को थाने में बैठाकर सबसे पहले शालिग्राम सिंह को फोन करके सारी बात बता देता है। सुनते ही शालिग्राम सिंह उल्टे कजरी को ही भद्दी भद्दी गालियां देने लगता है।
अंत में थानेदार रमेश शालीग्राम सिंह के कहे अनुसार सभी लड़कियों को पुलिस जीप में बैठाकर दयालचक गांव की ओर चल देता है। वह थाने में कोई केस दर्ज नहीं करता है।
दयालचक गांव में जब थानेदार रमेश पहुंचता है तो उसके पहुंचने के पहले से ही वहां शालीग्राम सिंह और दिनेश पहुंचा रहता है। साथ में ही रतनपुर गांव के कुछ और दबंग लोग रहते हैं।
उस समय वहां पर कजरी एवं उसकी सभी सहेलियों के माता पिता भी आए हुए थे।
कजरी एवं उसकी सहेलियों को वहां आते ही शालीग्राम सिंह सभी को डांटने लगता है।
" फेकना हम तुमको पहिले भी बोले थे कि लड़की को ज्यादा खुला मत छोड़ो। मगर तू नहीं माना। उसी का नतीजा है कि ये हमारे बेटा के खिलाफ थाने में केस करने गई थी। इसको पता होना चाहिए कि बिना हमारे इजाज़त के यहां कुछ नहीं होता है। हमारे बेटा ने इसके साथ थोड़ा बहुत मौज मस्ती कर ही लिया तो क्या हो गया। ये तो हमारे खानदान की परंपरा है। पहले हमारे पिता तुम्हारी मां के साथ और अब हम तुम्हारी बीबी के साथ कितना बार सोए हैं। आज तक तो कभी किसी ने कुछ नहीं बोला। समझाओ अपनी बेटी को नहीं तो पुरे गांव के लोगों से नोचवा देंगे। "
शालीग्राम सिंह बोले जा रहा था और वहां पर खड़े सभी लोग सिर्फ सिर झुकाए सुन रहे थे।
अंत में शालीग्राम सिंह चला जाता है। साथ में ही उसके साथ आए सभी लोग भी चले जाते हैं। थानेदार रमेश भी सभी के साथ ही वहां से चला जाता है।
फेकन अपनी बेटी कजरी को डांटते हुए उसे लेकर अपने मिट्टी के घर के अंदर चला जाता है।
धीरे धीरे वहां पर खड़े सभी लोग भी अपने अपने घर की ओर चले जाते हैं।
कजरी शांत बैठने वाली लड़की नहीं थी। वह हर हाल में दिनेश को उसके किए की सजा दिलवाना चाहती थी। कुछ अंधेरा होते ही वह अपनी सभी सहेलियों को लेकर गांव से बाहर शौच के बहाने आ जाती है। कजरी फिर कल थाने में जाकर दिनेश के खिलाफ केस दर्ज करवाना चाहती थी। उसकी सभी सहेलियां भी उसके साथ चलने को तुरंत तैयार हो जाती है। सभी दिनेश को हर हाल में सजा दिलवाना चाहती थी।
अगले दिन जैसे ही कजरी सभी के साथ स्कूल जाने के बहाने थाना जाने को घर से निकलती है कि सामने से शालीग्राम सिंह और थानेदार रमेश आ जाता है। देख सभी चौंक जाती है।
" सुन रहे हैं कि आज फिर तुमलोग थाना जा रही हो। तो हम सोचे की थानेदार साहब को लेकर ही तुम्हारे घर आ जाते हैं। तू लोग काहे का कष्ट करोगी। "
शालीग्राम गाड़ी से उतरते ही कजरी से बोला।
तब तक कजरी के पिता एवं गांव के और दूसरे लोग भी वहां आ जाते हैं।
" थानेदार साहब कजरी का केस दर्ज कीजिए। "
शालीग्राम के कहते ही थानेदार रमेश कागज कलम निकालकर कजरी से पूछताछ करते हुए सारी बात लिखने लगता है।
" अब खुश हो गई न। तुम्हारा काम यही हो गया। "
शालिग्राम थानेदार रमेश को लिखना बंद करते ही बोला।
" दिनेश सभी को गाड़ी से निकालकर ठंडा पिलाओ। खुशी का मौका है। इस दलित बस्ती के एक लड़की ने रतनपुर के मुखिया के बेटे के खिलाफ थाना में केस दर्ज करवाया है। "
अपने पिता के कहते ही दिनेश गाड़ी में से कोल्ड ड्रिंक्स का एक बोतल और कुछ गिलास निकालकर सभी छः सहेलियों को पीने को देता है।
कोई पीना तो नहीं चाहती है मगर शालीग्राम सिंह के बहुत कहने पर सभी पीने लगती है।
तभी कमला एवं शोभा जेसे ही पीना चाहती है कि दोनों का हाथ आपस में टकरा जाता है और गिलास हाथ से छुटकर जमीन पर गिर जाता है।
" दिनेश इन दोनों का गिलास गिर गया। फिर से लाकर दूसरा गिलास में कोल्ड ड्रिंक दे दो। "
दिनेश दुसरा बोतल और गिलास लाकर फिर से दोनों को कोल्ड ड्रिंक पीने को देता है।
शालीग्राम सिंह सभी को कोल्ड ड्रिंक पिलाकर थानेदार के साथ ही चला जाता है।
सभी गांव के सभी लोग भी आपस में काना फूसी करते हुए अपने अपने घर की ओर चले जाते हैं।
समय ज्यादा हो गया था इसीलिए उस दिन स्कूल कजरी या उसकी कोई सहेली नहीं जाती है। सभी चुप चाप अपने अपने घर आ जाती है।
सभी सहेलियों को घर आए अभी एक ही घंटा हुआ था कि अचानक सभी को उल्टी होने लगती है। एक बार उल्टियाँ शुरु होती है वह रुकने का नाम ही नहीं लेती है।
थक हार कर सभी के माता पिता आनन फानन में सभी को रफीगंज के सरकारी अस्पताल में ले जाते हैं। मगर तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
शाम होते होते ही कजरी, मुनिया, तारा और रजनी मर जाती है। कमला और शोभा का भी बुरा हाल था।
किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर यह सब हुआ तो कैसे हुआ !
और अगले दिन जो अखबार
में समाचार प्रकाशित होता है उसे पढ़कर सभी दंग रह जाते हैं।
अखबार में लिखा था -
" प्यार में नाकाम एक सहेली के गम में उसके साथ ही उसकी पांच सहेलियों ने भी जहर खा लिया। चार की मौत। प्रेमी मोहन को पुलिस ने किया गिरफ्तार। "
अखबार में कमला और शोभा का भी बयान छपा था। उन दोनों ने ही मोहन के बारे में पुलिस को बताई थी। कल जहां मिली थी उस जगह को भी पुलिस ने पहचान करवाया था।
मोहन भी सारी बात कबूल कर लिया था। मगर उस बेचारे को क्या पता था कि कजरी या बाकि की उसकी सभी सहेलियां उसकी वजह से जहर नहीं खाई थी, बल्कि उसे तो कोल्ड ड्रिंक में जहर मिलाकर पिलाया गया था।
कमला और शोभा ने डर से तो दोनों का परिवार पैसे के लोभ में बिक गया था।
शालीग्राम सिंह ने अपनी पहुंच और पैसे के दम पर पुलिस और मीडिया को खरीद लिया था। तभी तो पुरी मनगढ़ंत कहानी को सच दिखाया और बताया जा रहा था।
कजरी जिसने अपने गांव के लिए पता नहीं क्या क्या ख्वाब देख रखी थी सब उसके मरते ही टूट गया था। उसकी सबसे प्यारी सहेली जिसके लिए उसने दिनेश से पंगा लिया था उसी ने उसे साथ धोखा दिया था। तभी तो दोनों ने कोल्ड ड्रिंक का गिलास पहली बार गिरा दिया था। काश एक सहेली दूसरे सहेली की दर्द को समझ पाती।
( नोट - इस कहानी के सभी पात्र एवं घटनाएं काल्पनिक है। अगर किसी वास्तविक धटना से यह मिलती जुलती है तो महज यह संयोग होगा। यह लेखक की कल्पना मात्र है। )
कुमार सरोज
लाज़वाब कहानी, सच में आज रिश्ते नाते सिर्फ दिखाने को रह गया है
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद
हटाएंबहुत ही अच्छी कहानी
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार
हटाएंमार्मिक कहानी
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार
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