लूट भाई लूट / Loot Bhai Loot । कहानी । कुमार सरोज ।

                    लूट भाई लूट 

                               कुमार सरोज




                 पानी की  धाराएं इतनी तेज थी कि उस पर चलने वाली नावें भी बार - बार हिचकोले खा रही थी। उस पर सवार सभी लोग एक दूसरे को कसकर पकड़े हुए थे। स्त्री - पुरुष, युवक - युवती, बूढ़ा - बूढ़ी, अपने हो या पराया किसी से कोई भेदभाव नहीं था। सभी अपने एक हाथ से सामने वाले को तो अपने दूसरे हाथ से अपनी नाक को बंद किए हुए थे। मगर जब नाक बंद किए असहाय हो जाता तो हाथ हटा देते। एक तीव्र दुर्गंध नथुनों से टकराती। जी मचल उठता। सांसे थम जाती। हाल बेहाल हो जाता। नाक पर रुमाल भी बांध लेते, मगर सभी कपड़े तो मोबिल जैसे काले पानी से भीगे हुए थे। 

            आज तक लोगों ने सिर्फ नर्क मात्र की कल्पना ही किया था, मगर आज उससे साक्षात दर्शन हो रहे थे। चारों ओर तबाही और बर्बादी का आलम था। कोई घरों के नीचे दबे हुए कराह रहा था, तो कोई पानी के साथ बहते हुए चिल्ला रहा था। कहीं पर नावे पलटी हुई थी, तो कहीं पर झोपड़ी गिरी हुई थी।  





    


         कम पानी रहने के बावजूद भी लोग तेज धाराओं में बहते चले जा रहे थे। कोई बचाने वाला नहीं था। सारा क्षेत्र जलमग्न था। ज्वार भाटा से भी बदतर धाराएं प्रवाहित हो रही थी 

                सड़े गले वस्तुओं की बदबू से संपूर्ण वातावरण प्रदूषित था। सभी को जान के लाले पड़े थे। ऊंचे अट्टलियों में रहने वाले लोग मूक दर्शक बने सिर्फ तमाशा देख रहे थे।

          ये सब पिछले 10 -15 दिनों से हो रही लगातार बारिश का परिणाम था। कब राते आ रही थी। कब दिन हो रहा था। किसी को कुछ पता नहीं चल रहा था। मृत निर्जीव शरीर पर भी कोई दया दिखाने वाला नहीं था। जो जिंदा थे उनका भी चूल्हा चक्की कब का बंद हो चुका था। देवी शक्तियों का बड़ा ही भीषण प्रकोप था यह बाढ़। 

            आज बारिश थमे 5 दिन हो गया था। गलियों में यत्र तत्र पानी जमा था। मगर सड़े गले वस्तुओं के कारण अनेकों बीमारियों का प्रकोप छा गया था। एक तरफ जहां श्मशान में लाशों का ढेर लगा था, वहीं दूसरी तरफ अस्पतालों में मरीजों की रैली लगी थी। शहर का कोई अस्पताल खाली नहीं था। 

              छोटे कस्बों से लेकर शहर तक का सभी अस्पताल मरीजों से भरा हुआ था। कुछ लोग तो अपने मरीजों को लेकर उनके जान बचाने के लिए इधर - उधर भाग दौड़ कर रहे थे।

            अब तक सरकारी लोग भी अपनी कुंभकरनी नींद से जाग बिस्तरों पर बैठे अपनी आंखें मलने लगे थे। अब बाढ़ राहत कार्य के लिए बड़ी - बड़ी राशि की घोषणा होने लगी थी। 

               हमारे छोटे से जिले को भी 100 करोड़ 70 लाख की राशि राहत कार्य के लिए दिया गया था। अब बहुत सारे सामाजिक संस्थाएं भी राहत के नाम पर चंदा इकट्ठा करने लगी थी। 

          जहां एक तरफ सरकारी ऊंचे महकमों के लोग राहत कार्य के लिए वादे पर वादे करते जा रहे थे। वहीं दूसरी तरफ बाढ़ पीड़ित लोगों को कीड़े लगे हुए चूड़ा - मीठा एवं पाव रोटी बांटे जा रहे थे। राहत के नाम पर 100 करोड़ 70 लाख की राशि और बदले में कीड़े लगे चूड़ा - मीठा एवं पाव रोटी। वाह रे राहत कार्य! पैसों की लूट मची थी बाढ़ के नाम पर चारों तरफ। जिसे जितना बन पा रहा था बस लूटने में लगा था। 

                दूसरी तरफ जहां कुछ सामाजिक संस्थाएं जो बाढ़ राहत कार्य के लिए चंदा इकट्ठा कर रही थी, वे लोग भी बस दिन - रात सिर्फ़ शुल्क संग्रह में ही लगी हुई थी। कोई इस ओर ध्यान नहीं दे रहा था। तभी तो प्रखंड स्तर पर ऐसा नेक काम हो रहा था फिर भी सभी शांत थे।

            मैं बार - बार यही सोच रहा था कि इन सब के लिए जिम्मेदार कौन है ?  जनता, समाज उत्थान के लिए बनाई गई सामाजिक संस्थाएं या स्वयं सरकार। बड़ा ही यक्ष प्रश्न था यह !

            आज के वर्तमान परिवेश में बाढ़ राहत कार्य जैसे सैकड़ों मदों में जो पैसा आता है उससे सिर्फ़ सरकार के चाटुकार लोगों की ही पौ बारह होती हैं।

                 इसी बाढ़ राहत कार्य हेतू जिले को एक बड़ी राशि मिली थी। 8 - 10 लाख की आबादी वाले छोटे से जिले के लोगों को अगर दाल भात सब्जी भी बांटी जाती तो लोग महीनों आराम से खाते। मगर अफसोस तो यही था कि लोगों को सड़ी गली चीजें बांटे जा रहे थे। वह भी प्रखंड में बुलाकर। जिन्हें घर से निकलना दुर्लभ हो रहा था वो भला इतनी दूर चलकर कैसे आते। वाह रे अंधरी लंगड़ी सरकार की वे सिर - पैर वाली नीति। राहत कार्य चलाओ पीड़ितों के लिए, और निगल जाओ खुद। 

               भ्रष्ट राजनीति के सरपरस्त लोगों की जेबें ही सिर्फ़ भरती भर्ती है ऐसे समय में। चाहे नेता हो या अधिकारी, चाहे क्लर्क हो या चपरासी, सब सिर्फ अपनी मतलब की रोटी सेकने में लगे हुए थे। तभी तो इतनी बड़ी राहत कार्य के बावजूद भी लोगों में भुखमरी का आतंक फैला हुआ था।

               पहले बाढ़ की विभीषिका, फिर महामारी की, और अब भुखमरी की। एक तरफ जहां लाचार जनता विभीषिकाओं के प्रकोप से त्रस्त था, तो दूसरी ओर सरकार एवं अधिकारियों के चाटुकारों की शामे रंगीन हो रही थी।

             जब किसी देश के गौरवमयी पदों पर आसीन लोग ही जब भ्रष्टाचार और घोटालों जैसे कृत्यों में लिप्त हो तो भला उस राष्ट्र का क्या होगा, समझ में नहीं आता है ? 


  " नमस्ते ! "    

 

   मैं अपने क्षेत्र एवं प्रदेश की वर्तमान समस्याओं का लेखा - जोखा लिखने में मग्न था कि तभी एक मधुर स्वर ने मेरी तंद्रा भंग कर दी।

             मैं लिखना छोड़ कर दरवाजे की ओर देखा तो वहां 35 - 40 साल की एक महिला हाथ जोड़े खड़ी थी।

 

  " कहिए। क्या काम है ? " 

      मैं तुरंत पुछ बैठा।


  " मैंने आपका बहुत नाम सुना है, कितने दिनों से आपसे मिलने की तमन्ना थी, आज नसीब ने आपसे मिला ही दिया।  " 


   " मगर बात क्या है ?  " 

    उसके चुप होते ही मैं पूछ बैठा।


 " सर,  मैं एक सामाजिक संगठन की सदस्य हूं, और आपके पास बहुत बड़ी उम्मीद लेकर आई हूं। मैं बाढ़ राहत कार्य के लिए चंदा मांगने आई हूं । "

  वह सकुचाते हुए बोली । 


" सामाजिक संस्था……  बाढ़ राहत कार्य….. ! "   

   मैं कुछ सोचते हुए बुदबुदाया।


" हां सर। आज हजारों लोग बेघर हो गए, कितनों का संपूर्ण परिवार खत्म हो गया। चारों तरफ बड़ी ही विचित्र एवं भयावह स्थिति उत्पन्न हो गई है। फिर भी सरकार मूकदर्शक बनी हुई है। आखिर हम लोगों का भी तो कुछ फर्ज बनता है न । "


     " बहुत अच्छी बात कही आपने। फ़र्ज़ तो सचमुच का बनता है हम लोगों का। तभी तो 100 करोड़ 70 लाख की राहत राशि के बावजूद भी लोगों को कीड़े लगे चूड़ा मीठा एवं पाव रोटी बांटे जा रहे हैं। आखिर कोई सामाजिक संस्था या संगठन इसके लिए आवाज क्यों नहीं उठा रही है ?  "

  " सर हम लोगों ने आवाज उठाई थी ………. । "


" हां आवाज उठाई थी ! मगर सिर्फ राहत राशि के लिए, न की आज जो हो रहा है उसके लिए। अब क्यों नहीं किसी को इसकी परवाह है। क्या कोई जवाब है आपके पास ?  "


"................. । "


      " मैं जानता हूं आपके पास कोई जवाब नहीं है। क्योंकि आज समाज कल्याण कार्यों के लिए बनाई गई आपकी संस्था जैसी ना जाने कितनी ऐसी संस्थाएं एवं संगठन है जो बांटने के लिए मिली राहत राशि का कुछ हिस्सा नजराने के तौर पर पाकर चुप हो जाती है। जहां लेने की बात आती है वहां राहत राशि की आवश्यकता नहीं रहने के बावजूद भी तोड़फोड़ एवं आंदोलन करके मुहैया करवाती है। ताकि उन्हें भी एक बड़ी राशि नजराने में मिले।  "


  " नहीं, यह सब झूठ है। " 


 " यही सच है मैडम। वर्तमान समय को ही आप ले लीजिए। पता नहीं कितनी सामाजिक एवं जन कल्याण संस्थाएं चंदा कर रही है। आप एक - आध ऐसा काम बता दीजिए जो इन संस्थाओं के द्वारा बाढ़ पीड़ितों के लिए किया जा रहा है। "


 " मैं मानती हूं कि अभी तक हम लोगों ने कुछ नहीं किया है, मगर एक - दो दिन के अंदर ही हम लोग राहत कार्य का शुभारंभ तेजी से करने जा रहे हैं।  "


 " कुछ नहीं होगा। जिस तरह से सरकारी रकम को सरकारी लोग चट कर जाते हैं, उसी तरह से निजी संस्थाएं भी अपनी पॉकेट को भरने के सिवा कुछ नहीं करेगी। बस सभी लूटने में व्यस्त हैं । " 


 " आखिर, आपका ऐसा विचार क्यों है ? " 

   पहली बार वह महिला झल्लाकर बोली।


           उसे देख कर मैं मन ही मन मुस्कुरा उठा।


" यह सिर्फ मेरा ही विचार नहीं है, बल्कि उन तमाम लोगों का ऐसा विचार है जो उन चाटुकारों की श्रेणी में नहीं है। अंतर सिर्फ यही है कि वे किसी से कहते नहीं हैं, और मैं आपसे कह रहा हूं। इसका मतलब यह मत समझना कि मैं इन संस्थाओं या संगठनों की बुराई कर रहा हूं बल्कि इसी के कुछ लोगों ने इसे इतना बदनाम कर दिया है कि अब किसी पर विश्वास नहीं होता। " 


        थोड़ा रुक कर मैं अपना चेक बुक निकालते हुए बोला - 


  " यह लो चेक बुक, मन में जो उचित राशि समझो भर लो। " 


 " नहीं मैं आपसे चंदा नहीं लूंगी। बाद में मैं फिर आऊंगी। नमस्ते। "   


      बोलती हुई उठी और बाहर की ओर निकल गई। 

          

                यह सब इतना जल्दी हुआ कि मैं कुछ कह भी नहीं सका। बस उसे जाते देखते हुए उसी के बारे में सोचने लगा। 

             

                              कुमार सरोज

टिप्पणियाँ

  1. बेनामीजून 09, 2022 12:25 pm

    सिस्टम की हकीकत बयां करती कहानी। लाजवाब

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    उत्तर
    1. बहुत बढ़िया
      इसके आगे की कहानी .....

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    2. यह बस एक बाढ़ राहत पर लिखा हुआ है, विषय बड़ा है इसीलिए अभी सिर्फ एक मुद्दा पर लिखा हुआ है शेष बाद में जरुर लिखेंगे । आपका बहत बहुत आभार। 🙏

      हटाएं
  2. बेनामीजून 09, 2022 9:51 pm

    Bahut sundar. Prabhavshaali hai

    जवाब देंहटाएं

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