कोख का सौदा / Kokh Ka Sauda । कहानी । कुमार सरोज ।
कोख का सौदा
कुमार सरोज
सुनील पटना के इको पार्क के गेट पर खड़ा बेसब्री से अपनी प्रेमिका सरला का इंतजार कर रहा था। वह एक किनारे खड़ा बार - बार मोबाइल में समय और जिधर से सरला आने वाली थी उस दिशा में व्याकुल होकर देख रहा था। पिछले एक सप्ताह से उससे बात नहीं हो पाई थी, जबकि दोनों बिना बात किए एक दिन भी नहीं रहते थे। एक सप्ताह बाद आज दोपहर में उसकी सरला से बात हुई तो उसी के बहुत कहने पर वह इको पार्क में शाम 5 बजे मिलने आने को बोली थी।
अभी शाम के 5 बज गए थे मगर वह अभी तक आई नहीं थी। इसीलिए वह अभी ज्यादा उतावला और बैचैन था। उसके मन में अभी बहुत सारे सवाल उमड़ रहे थे। आख़िर अचानक उसे क्या हो गया था कि उसने बात करना भी छोड़ दी थी।
सुनील साधारण घर का लड़का था। उसके पिता राधेश्याम एक किसान थे। उसका गांव गया जिला में दौलतपुर था। गांव में ही उसके परिवार के सभी लोग रहते थे। वह पटना में एक मॉल में सेल्समैन का काम करता था। इसीलिए वह पटना में रहता था।
सरला अभी बीस साल की थी। उसके पिता महेश पटना में ही ऑटो चलाते थे। उसकी मां प्रमिला घर के पास ही सड़क किनारे ठेला पर अंडा बेचती थी। उसका एक छोटा भाई भी था राहुल। सरला राजा बाजार में ही किराए के एक मकान में रहती थी। उसका पैतृक घर जहानाबाद जिला में घोसी था।
राजा बाजार से कुछ ही दूरी पर इको पार्क था, जहां खड़ा सुनील सरला का अभी इंतजार कर रहा था।
सुनील भी राजा बाजार में ही सरला के ही मोहल्ला में रहता था। इसीलिए दोनों में जान पहचान हो गई थी। और अब दोनों एक दूसरे के प्यार में बंधकर साथ जीने मरने का ख्वाव भी पिछले एक साल से देखने लगे थे। दोनों का प्यार अभी एक साल पुराना वाला ही था, मगर इतने कम समय में ही अब प्रगाढ़ हो गया था।
सुनील अभी खड़ा सरला का बैचनी से इंतजार कर ही रहा था कि ठीक सवा पांच बजे वह उसके तरफ पैदल आती दिख जाती है। पता नहीं क्यों उसका चेहरा बुझा बुझा सा लग रहा था।
सुनील पहले से ही पार्क के अन्दर जाने के लिए दो टिकट लिए हुए था। सरला के आते ही वह उसके साथ पार्क के अन्दर आ जाता है।
दोनों पार्क के अन्दर आकर किनारे बने एक बेंच पर बैठ जाते हैं। पार्क में उस समय और भी बहुत सारे प्रेमी युगल इधर उधर बैठे बाते कर रहे थे। आज के समय में पार्क ही तो प्रेमालाप का सबसे सुरक्षित आसरा था। जहां प्रेमी जोड़े छिपकर ही सही मगर उन्मुक्त मन से विचरण करते और उन हसीन वादियों में भविष्य के ख्वाब देखते हुए चंद लम्हें बिताते थे। नहीं तो देश में आए दिन हो रहे बलात्कार पर चुप रहने वाले समाज के सभ्य लोग आज भी प्रेम विवाह को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे।
" पहले तुम यह बोलो इतना दिन से कहां गायब थी ? कोई कॉल भी नहीं की। पता है मैं कितना परेशान था। "
सुनील बैठते ही सरला से पुछ बैठा।
" मेरी तबीयत थोड़ी खराब थी, बस। "
सरला सिर झुकाए ही धीरे से बोली।
" तुम नीचे क्या देख रही हो। मेरे तरफ देखकर बात करो। "
सुनील सरला के पास आते एवं उस पर अपना हक जताते हुए बोला।
सुनील की बात सुनकर सरला दूर नीले आसमान में निहारने लगी। पता नहीं उसके दिलों दिमाग में अभी क्या चल रहा था। उस समय आसमान में पंक्षी का एक युगल जोड़ा उड़ते हुए शायद अपने घोंसला की ओर आपस में कलरव करते हुए अपनी धुन में जा रहा था।
" मैंने बता दो दिया। अब मैं ठीक हूं। तुम परेशान मत हो। "
सरला उसके तरफ देखती हुई धीरे से बोली। अभी भी उसकी आवाज में जमाने भर का गम सिमटा हुआ लग रहा था।
" तुम कुछ न कुछ हमसे छिपा रही हो। मैं पिछले एक साल से तुमको जानता हूं। अब मैं तुम्हारी हरेक सांस को पहचानने लगा हूं। तुम सच सच बताओ, तुमको क्या हुआ था। "
जवाब में सरला चुप रहती है।
" बोलो ना। मैं तुम्हारा यूं उदास चेहरा देख नहीं सकता। "
सुनील की आवाज भी अब रुआंसी हो गई थी।
" मैं तुम्हें अभी कुछ नहीं बता सकती। समय आने पर बता दूंगी। "
सरला दूर एक सूखे वृक्ष को देखती हुई धीरे से बोली। शायद वह अपनी तुलना उसी सूखे वृक्ष से कर रही थी।
" तुमको अभी बताना होगा। तुम्हें मेरी कसम। "
सुनील उसकी हालत देखकर झट अपना अन्तिम अस्त्र चल देता है। उसे पुरा विश्वास था कि वह उसकी कसम नहीं तोड़ेगी।
सरला भी सुनील के बात को सुनकर सोच में डूब जाती है। वह सोची भी नहीं थी कि यूं अचानक सुनील उसे अपनी कसम दे देगा। अब वह उसे ही तो अपना सब कुछ मानती थी। मगर सच्चाई कहने के लिए वह हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी।
सुनील सरला को देर तक यूं ही चुपचाप बैठा देख उदास वहां से बाहर जाने को खड़ा हो जाता है।
" ठीक है मत बताओ। चलो अब घर चलते हैं। "
अचानक सरला सुनील को यूं जाते देख तड़प उठती है। वह समझ जाती है कि वह उससे नाराज है। उससे सुनील की बेरूखी देखी नहीं जाती है। वह झट उसके हाथ को पकड़ कर उसे अपने पास बैठा लेती है।
सुनील भी चुपचाप बगल में फिर से बैठ जाता है।
सरला अभी भी पता नहीं क्यों सिर्फ सुनील को अपलक देखे जा रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे वह कहना तो कुछ चाह रही थी मगर अन्दर से उसके बोल ही नहीं निकल रहे थे।
कुछ देर तक दोनों बस एक दूसरे को चुपचाप शांत चित्त निहारते रहते हैं। तभी अचानक सरला सुनील से लिपटकर रोने लगती है।
सुनील उसकी ऐसी दशा देख तड़प उठता है।
" क्या हुआ। रोने क्यों लगी। बताओ न ? "
सरला जवाब देने के जगह पर बस रोते ही जा रही थी।
पार्क में आप पास बैठे दूसरे प्रेमी युगल एवं नयन सुख के लिए बैठे कुछ लड़कों की नजरें भी अब सरला को घूरने लगी थी। सभी के मन मस्तिष्क में एक ही सवाल कौंध रहा था कि - ' आखिर वह अचानक रोने क्यों लगी ! '
सुनील ज्यादा सवाल नहीं करता है वह उसे जी भरकर रोने देता है ताकि रोने से उसका मिजाज़ हल्का हो जाए। वैसे भी तो रोना दिल के दर्द और टीस की सबसे कारगर दवा होती है।
शायद सरला भी रोने से अब पहले से बेहतर महसूस करने लगी थी, इसीलिए वह कुछ देर बाद सुनील के हाथ को पकड़कर शांत हो जाती है।
" अब बताओ क्या हुआ था ? "
सरला के शांत होते ही सुनील पुछ बैठता है।
" मेरे साथ बलात्कार हुआ था। "
सरला बिना कुछ समय गवाए इस बार बोल देती है।
सुनकर सुनील के पैर तले की जमीन खिसक जाती है।
उसके बाद सरला जो अपने साथ घटित कहानी बताती है उसे सुनकर तो सुनील के होश ही उड़ जाते हैं। पिछले पांच सालों से लगातार सरला के साथ बलात्कार हो रहा था। अब तक पच्चीस बार से ज्यादा उसके साथ यह घिनौनी हरकत हुई थी। कभी घर में कोई डेलिवरी बॉय बनकर आता और धोखे से उसकी अस्मत लुटकर चला जाता, तो कभी मां के साथ देर रात बाजार से घर आते समय रास्ते में इज्जत लूट लेता था। मां या पिता लोक लाज के डर से चाहकर भी कुछ नहीं कर पाते थे। उसके पिता तो कई बार पुलिस के पास जाना भी चाहते थे तो उसकी मां ही मना कर देती थी। यह कुकर्म का गंदा खेल हर दो - तीन महीने में एक बार उसके साथ हो ही जाता था। उसकी जिन्दगी नर्क बनकर रह गई थी। वह अभी ऐसी जिन्दगी जी रही थी जिसके बारे में किसी को भी कुछ कह नहीं सकती थी। बस घूंट घूंट कर नसीब को कोसती हुई जिए जा रही थी।
सरला की पुरी बात सुनकर सुनील सोच में पड़ जाता है। आखिर कोई उसके साथ ही बार बार ऐसा घिनौना कृत्य क्यों कर रहा था ! उसके साथ बार - बार बलात्कार फिर उसके दो - तीन दिन बाद उसे मां द्वारा एक ही क्लीनिक में बार बार ले जाना भी उसे पता नहीं क्यों खटक रहा था। सुनील इतना तो समझ गया था कि सरला के साथ सबकुछ अचानक नहीं हो रहा था, कुछ न कुछ तो कहीं गड़बड़ था। उसे ऐसा लग रहा था मानो सरला के साथ सभी घटनाएं पुरी तरह योजनाबद्ध तरीके से घटित हो रही थी।
दोनों के आसपास बैठे सभी लोगों की नजर के साथ साथ अब कान भी सक्रिय हो गया था। सुनील भी इस बात को भांप गया था।
" चलो अब घर चलते हैं। रास्ते में और बात करेंगे। "
कहते हुए सुनील सरला के हाथ को पकड़कर वहां से बाहर जाने को खड़ा हो जाता है।
सरला भी बिना कुछ कहे चुपचाप सुनील के साथ बाहर की ओर चल देती है। अब उसका मन एकदम शांत था। उसे ऐसा लग रहा था मानो एक बहुत बड़ा बोझ उसके दिल से उतर गया हो।
जिस समय दोनों पार्क से निकल रहे थे उस समय शाम के सात बज चुके थे।
उस रात सुनील रात भर सो नहीं पाता है। उसके मन मस्तिष्क में बस सरला के साथ हो रहे कुकर्म की एक एक तस्वीर चलचित्र की भांति चल रहे थे। उसके मन में सरला के मां की तस्वीर और उस क्लीनिक का नाम जिसमें उसे बार बार बलात्कार के बाद ले जाया जाता था कौंधते रहता है। उसे इन्हीं में से कहीं से किसी बड़े षड्यंत्र की बू आ रही थी। जिसकी चुभन की पीड़ा सरला पिछले पांच सालों से भुगत रही थी।
सुबह उठकर सुनील सबसे पहले सरला के बताए हुए क्लीनिक में जाता है। उस समय भी वहां वेटिंग रूम में मरीजों की संख्या में अधिकांश लड़कियां एवं कम उम्र की औरतें ही बैठी थी।
सुनील किसी तरह अपने बातों में अपनी गर्लफ्रेंड का गर्भपात कराने के बहाने पैसा का लोभ देकर वहां के एक कंपाउंडर दयाल को पट्टा लेता है। दयाल पैसे के लोभ में उसकी गर्लफ्रैड की गर्भपात कराने को तो तैयार होता ही है, वहां ईलाज के आड़ में औरत के एग्स एवं पुरुष के स्पर्म की हो रही खरीद बिक्री के धंधा के बारे में भी बता देता है।
सुनील सुनते ही सारा माजरा समझ जाता है। इसका मतलब साफ था कि सरला के साथ भी पहले जान बूझकर उसका बलात्कार करवाया जा रहा था फिर ईलाज के नाम पर क्लीनिक में लाकर उसके एग्स का सौदा किया जा रहा था। उसे अब पक्का विश्वास हो गया था कि यह काम उसकी मां ही कर रही थी।
दयाल को सुनील सरला की मां प्रमिला की फोटो दिखाकर अपने मन की शंका को भी दूर कर लेता है। दयाल प्रमिला को पहचानता था। दयाल ही उसे यह बताता है कि यह प्रमिला जी अपनी बेटी के साथ और भी कई लड़कियों एवं औरतों का एग्स यहां लाकर बेचती है। कोई सरला के जैसी ही धोखे में पड़कर बेच रही थी तो कोई मजबूरी में एवं पैसे के लोभ में अपने मन से भी यह काम कर रही थी। क्लीनिक का डॉक्टर पांडे प्रमिला को प्रति औरत मात्र पच्चीस हजार रूपए देता था। जबकि डॉक्टर पांडे आईवीएफ सेंटर एवं अन्य दूसरे जरूरतमंद लोगों को लाखों में एग्स एवं स्पर्म को बेचता था।
सुनील वहां से अपने एक कमरे के किराए के घर में आ जाता है। वह सरला को अभी सच्चाई नहीं बताना चाहता था। मगर वह अब उसे हर हाल में उस नर्क से निकालना चाहता था। इसीलिए वह मॉल के मैनेजर से बहाना बनाकर एक सप्ताह की छुट्टी ले लेता है।
उस दिन के बाद सुनील साए की तरह सरला की मां प्रमिला के पीछे लग जाता है। वह उसी मोहल्ले में रहता ही था इसीलिए ऐसा करने में उसे जरा भी दिक्कत नहीं होती है।
और वह दिन भी आ जाता है जब प्रमिला की मां एक चालीस साल के आदमी से पैसा लेकर सरला के अकेले होने की तारीख और तिथि बताती है। ताकि वह उसका आराम से इज्जत लूट सके।
सुनील सब छिपकर सुन लेता है। जब वह उस तारीख के बारे में सरला से पुछता है तो वह बताती है कि उस दिन उसके एक चाचा के बेटे का बर्थडे है और वह अपनी मां के साथ वहां जाने वाली है।
सुनील सरला से बात करने के बाद उसकी मां प्रमिला की पुरी योजना समझ जाता है। बर्थडे से लौटते समय ही वह आदमी रास्ते में प्रमिला को पकड़कर उसे जान से मारने का भय दिखाकर सरला की इज्जत लुटने का सौदा किया था।
सुनील को प्रमिला जैसी मां पर घिन आने लगी थी। आखिर एक सगी मां चंद रुपयों की खातिर अपनी बेटी के साथ ऐसी घिनौनी हरकत कैसे कर सकती थी !
प्रमिला की सोची समझी योजना के अनुसार ही बर्थडे वाली रात घर लौटते समय एक आदमी सरला की इज्जत जैसे ही लुटने वाला होता है कि सुनील वहां आ जाता है। उस समय उसके साथ उसका एक दोस्त रमेश भी रहता है।
सुनील और रमेश उस आदमी को पकड़ लेता है और उसे मारने लगता है। प्रमिला सुनील को पहचानती थी। वह अपनी बेटी की बदनामी न हो इसीलिए उसे जाने देने को कहने लगती है। वह हाथ जोड़कर अपनी बेटी के इज्जत की भीख मांगने लगती है।
सुनील उसकी हकीकत नहीं जानता तो प्रमिला के धड़ियाली आंसू और दिखावटी नौटंकी में फंसकर उस आदमी को तुरंत छोड़ देता, मगर वह तो अब उसके रग रग से वाकिफ था। इसीलिए सुनील उस आदमी को नहीं छोड़ता है। उल्टे वह पुलिस को बुला लेता है।
थाना वहां से पास में ही था। थानेदार मयंक सिंह तुरंत ही दलबल के साथ वहां आ जाते हैं। तब तक उस मोहल्ले के और भी बहुत सारे लोग वहां आ जाते हैं।
पुलिस उस आदमी को पकड़ कर अपने साथ लेकर थाना चली आती है।
सुनील भी सरला से बिना कुछ कहे अपने दोस्त के साथ थाना की ओर चल पड़ता है।
मन ही मन बैचेन मगर दिखावे में उस आदमी को गलियां देती हुई प्रमिला भी अपनी बेटी सरला के साथ घर की ओर चली जाती है। वहां से उसका घर ज्यादा दूर नहीं था।
सुबह अभी सरला सोई ही रहती है कि उसकी मां को गिरफ्तार करने पुलिस उसके घर आ जाती है।
रात में ही थाना में सुनील के कहने पर दारोगा मंजय सिंह के आगे वह आदमी प्रमिला को पैसा देने की बात कबूल कर लेता है। सुनील दारोगा को प्रमिला और उस क्लीनिक के बारे में भी सारी बातें बता देता है। सुनकर वे भी दंग रह जाते हैं।
दारोगा मंजय सिंह अहले सुबह में ही उस क्लीनिक पर छापा मारकर डॉक्टर को और प्रमिला को भी गिरफ्तार कर लेते हैं।
जब सरला को सुनील एवं पुलिस से अपनी मां की सच्चाई का पता चलता है तो सुनकर पहले तो उसे विश्वास ही नहीं होता है। मगर जब सारे सबूत सामने आते हैं तो वह भी दंग रह जाती है। उसके पिता को भी इस बात की जानकारी नहीं थी।
सरला के मन में बार बार सिर्फ यही सवाल मंडरा रहे थे कि आखिर मैंने मां का क्या बिगाड़ा था जो वह उसके साथ इतने वर्षों से ऐसा घिनौना कृत्य करवाते आ रही थी। वह जितना सोचती उतना ही ज्यादा और उसका सिर अफसोस एवं ग्लानि से फटा जा रहा था। उसकी अपनी सगी मां ही चंद पैसों के लोभ में पड़कर अभी तक उसके कोख का सौदा करते आ रही थी।
सरला अपनी मां के उसके लिए अब उसके दिल से हजारों बददुआ निकल रहे थे के बारे में सोच में डूबी घर के दरवाजे पर उदास बैठी थी कि सुनील भी वहां आ जाता है।
सुनील आते ही सरला के बगल में बैठ जाता है। वह उदास तो था, मगर सरला को इस नर्क भरी जिंदगी से छुटकारा दिलाकर मन ही खुश भी था।
सरला सुनील को पास बैठते देख एक लंबी सांस लेती हुई उसके हाथ को पकड़ लेती है। अब वह इस हाथ को कभी छोड़ना नहीं चाहती थी।
कुमार सरोज
लाज़वाब एवं मार्मिक कहानी
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद
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