जान जानू जानेमन / Jaan Janu Janeman । कहानी । कुमार सरोज ।

                     जान जानू जानेमन 

                              कुमार सरोज 



                  पटना बोरिंग रोड में एक बहुत ही फेमस रेस्टोरेंट है कपल क्वीन। शहर के प्रेमी जोड़े ही ज्यादातर यहां अपना समय व्यतीत करने आते हैं। वीकेंड में तो यहां कपल की भीड़ लगी रहती थी। सभी को बैठने के लिए अलग अलग केविन बने हुए थे। यहां आकर सभी दुनिया एवं समाज से बेफिक्र होकर जिंदगी के चंद हसीन पलों का जी भरकर मजा लेते थे। ऐसा नहीं था कि सिर्फ कुंवारे प्रेमी युगल ही यहां इंजॉय करने आते थे। यहां शादी शुदा स्त्री पुरुष भी अपने अपने जान जानू जानेमन के साथ मस्ती करने आते थे।

   





              अभी शाम के सात बज रहे थे। रेस्टोरेंट के मैन गेट के ठीक सामने वाले केबिन में एक जोड़ा बैठा आपस में बातें कर रहा था। लड़का दुबला पतला और लंबा था। उसका रंग भी सांवला ही था। उसके गाल भी पिचके हुए थे। उसे देखने से ऐसा लगता था कि वह तेज हवा के झोंको में भी उड़ जायेगा। वहीं उसके साथ वाली लड़की भरे भरे बदन वाली हुस्न की मल्लिका लग रही थी। लड़का लड़की की तुलना में दोयम दर्जे का लग रहा था। मगर था पैसे वाला। हाथ में महंगी घड़ी, महंगे मोबाईल और गले में सोने की मोटी चैन पहने हुए था। 

                    रेस्टोरेंट में आने के कुछ देर बाद ही उस दुबले पतले आशिक लड़के ने जिसका नाम नवीन था लड़की को एक महंगा मोबाईल गिफ्ट में देता है। दिखावटी खुशी से झूमती हुई लड़की उस हवा पहलवान आशिक नवीन के गोद में बैठकर उसके गले से झूल जाती है।
  
           नवीन भी मौका का फ़ायदा उठाकर झट उस लड़की जिसका नाम श्रुति था को बाहों में भर कर उसके लबों को चूम लेता है। 

             श्रुति नवीन से अलग होकर उसके सामने के कुर्सी पर बैठ जाती है। उस समय गेट की ओर श्रुति का पीठ था। वह कुछ सोचती हुई अपना मोबाईल निकालकर किसी को वीडियो कॉल पर गिफ्ट वाला मोबाईल दिखाती हुई उसी से बाते करने लगती है।  

                    नवीन चुम्बन से मिली ऊर्जा से प्रफुल्लित होकर चेहरे पर विजयी मुस्कान लिए सामने बैठी श्रुति के रुप लावण्य का दीदार करने लगता है। उसे श्रुति के स्पर्श मात्र ने ही मोबाइल का पैसा वसूल करा दिया था। 

               जब श्रुति बहुत देर तक मोबाईल पर वीडियो कॉल में व्यस्त ही रहती है तो नवीन से रहा नहीं जाता है। 


  "  क्या कर रही हो जान। इतना देर से जिससे बात कर रही हो। मैं साथ हूं तो मुझसे बात करो ना।  "


 " अरे यार रानी है। उसका बॉयफ्रेंड भी उसे एक डायमंड रिंग दिया है। वही दिखा रही है। उसे उसका बॉयफ्रेंड एक बहुत अच्छा ड्रेस भी दिया है।  " 

        मोबाइल से कुछ देर के लिए अपनी नजरे हटाकर श्रुति साफ झूठ बोलती है। वह किसी रानी नाम के लड़की से नहीं बल्कि अपने दूसरे बॉयफ्रेंड प्रणव से लड़की जैसी बात कर रही थी। पास का कोई भी सुनता तो उसे ऐसा ही लग रहा था मानो वह अपनी किसी सहेली से बात कर रही है 


" अच्छा रानी है, तो ठीक है बात कर लो। " 

             रानी ही नवीन को श्रुति से मिलवाई थी, इसीलिए वह ज्यादा कुछ नहीं बोला। 

              श्रुति पहले के जैसे ही अपने दूसरे बॉयफ्रेंड प्रणव से बात फिर से करने लगती है। 

              तभी रेस्टोरेंट के मैन गेट से एक बेमेल जोड़ा एक दूसरे के कमर में हाथ डाले प्रवेश करता है। बेमेल इस लिए क्योंकि साथ वाला आदमी पचपन साल का तो लड़की पच्चीस साल की होगी। 


 "  श्रुति देखो उस बूढ़े को, तुम्हारी उम्र की लड़की के साथ इश्क फरमाने आ रहा है।  "


      "  तो क्या हुआ। जो लड़की की इच्छाओं और जरूरतों को पुरा करेगा उसी से प्यार होगा न। वैसे भी प्यार के लिए उम्र नहीं विचार मिलना चाहिए।  "

         श्रुति उस ओर बिना देखे ही बोली। अब वह मोबाईल से बात करना बंद कर दी थी। 

              तभी एक वेटर आकर खाने की कुछ चीजें टेबल पर रख जाता है। 

  " फिर भी बूढ़ा तुम्हारे बाप के उम्र का है जान, और लड़की तुम्हारे उम्र की।  " 

               नवीन खाना एक प्लेट में निकालते हुए बोला। 
 
              श्रुति बिना कुछ बोले पीछे मुड़कर देखने लगती है।

                 इधर तब तक दोनों रेस्टोरेंट के अन्दर आकर एक कपल केविन की ओर जाते रहते हैं। 


  "  उस केविन में चलो जानू। मैंने तुम्हारे लिए पहले से ही उसे बुक करवाया है।  "

                तभी बाहर से आवाज़ आती है।  


 "  श्रुति जान, देखो कैसे बूढ़ा लड़की को जानू बोल रहा है। " 

     नवीन धीरे धीरे बुदबुदाया। 

                 इधर तब तक लड़की के साथ वाले इंसान को देखकर श्रुति दंग रह जाती है। वह आदमी कोई और नहीं बल्कि उसके पिता धीरज अग्रवाल थे। पटना के जाने माने बिल्डर। वह लड़की नेहा थी। उसके पिता के ऑफिस में ही काम करती थी। 

              केविन में शीशा ऐसा लगा हुआ था कि अंदर से बाहर तो सब कुछ दिखता था, मगर बाहर से अंदर बैठा व्यक्ति नहीं दिखता था। 

                दोनों को देखकर भी श्रृति ऐसा रिएक्ट करती है जैसे वह उनको जानती नहीं है। 


 "  ज्यादा इधर उधर ताक झांक मत करो। जल्दी से खाना खाओ और यहां से चलो।  " 

    कहती हुई श्रुति भी खाने लगती है। 

                नवीन श्रुति के माता पिता को पहचानता नहीं था। सिर्फ नाम से जानता था। वैसे भी उसका और श्रुति का प्यार तो अभी सिर्फ एक महीना पुराना वाला ही था। 

           श्रुति तो जानती थी कि उसके पिता आज शहर से बाहर गए हैं और देर रात लौटेंगे, इसीलिए तो उसने आज नवीन से मिलने की योजना बनाई थी। मगर अब वह सारा माजरा समझ गई थी। बाहर जाने के बहाने तो उसके पिता अपने ऑफिस के स्टॉफ के साथ यहां रंगेलियां मनाने आए थे। 

           नवीन अभी 2 - 3 निवाला ही खाया था कि रेस्टोरेंट के अन्दर आते एक और जोड़े को देखकर उससे फिर रहा नहीं जाता है। इस बार पैतालीस साल पार की एक महिला पच्चीस साल के एक युवक का हाथ थामे अन्दर आ रही थी। महिला देखने से ही पैसे वाली लग रही थी। जबकि लड़का साधारण घर का दिख रहा था। मगर लड़का हटा कट्टा और तंदुरस्त लग रहा था। वह देखने में भी बहुत सेक्सी था। 


   " श्रुति जान ये देखो ! ये औरत तो अपने से आधे उम्र के लड़का के साथ यहां आई है। हे भगवान क्या जमाना आ गया है !  " 


    " तुम दूसरे को इतना क्यों निहार रहे हो। " 

                 श्रुति खाती हुई उस ओर बिना देखे ही बोली। उसे अब अपने आप पर बहुत गुस्सा आ रहा था।


 " अरे जान प्यार करने का भी उम्र होता है। ऐसे थोड़े न कोई किसी भी उम्र में जान जानू जानेमन कहते फिरेगा।  " 

      नवीन खाना खत्म करते हुए बोला। 

             नवीन से श्रुति भले टाईम पास करने एवं अपनी जरूरतों को पुरा करने के लिए प्यार का नाटक करती थी। मगर नवीन उसके इस नाटक को ही सच्चा प्यार समझता था। भले उसके पास पुरखों का बहुत सारा धन दौलत था, मगर फिर भी वह बहुत सीधा साधा लड़का था। 


 "  चलो। बहुत उपदेश हो गया।  " 

   उठती हुई श्रुति बोली। 

                   मगर जैसे ही श्रुति की नजर केविन से बाहर अंदर आती हुई महिला पर पड़ती है तो वह फिर से दंग रह जाती है। जिस महिला के बारे में अभी नवीन बोल रहा था वह कोई और नहीं बल्कि उसकी अपनी मां नयना थी। उसकी मां के साथ वाला लड़का प्रमोद उसका पड़ोसी था। प्रमोद किसी प्राइवेट कंपनी में काम करता था। 


 " जानेमन उधर नहीं जाओ। मैंने मैनेजर को बोलकर अपने लिए स्पेशल केविन बुक करवाया है। इधर चलो जानेमन।  " 

          बाहर से तभी श्रुति की मां नयना की धीमी आवाज सुनाई देती है। 

               नयना प्रमोद के साथ अब दुसरी ओर जाने लगी थी। 


"  जान, ये औरत तो उस लड़के को जानेमन बोल रही है।  " 

              श्रुति कुछ नहीं बोलती है। उसे तो अपने माता पिता के करतूत को देखकर पता नहीं क्यों अब अंदर ही अंदर घुटन महसूस होने लगी थी। 


  "  बहुत दिन बाद आज मौका मिला है। मेरे पति टाऊन से बाहर हैं, और मेरी बेटी अपने फ्रेंड के यहां स्पेशल क्लास करने गई है। आज दोनों लेट नाईट ही घर आएंगे।  " 

        नयना प्रमोद का हाथ पकड़े जाती हुईं कह रही थी। 

                जैसे ही श्रुति की मां एक केविन के अंदर जाती है, झट श्रुति नवीन के साथ रेस्टोरेंट से बाहर निकल पड़ती है। उसका दिल अब जोर जोर से धड़कने लगा था। 

                नवीन के दिलो दिमाग में भी अभी रेस्टोरेंट में बेमेल कपल को देखकर उथल पुथल मचा हुआ था। 


                             कुमार सरोज 

टिप्पणियाँ

  1. बेनामीजून 28, 2022 12:14 pm

    लाज़वाब कहानी, आज के समय का सही चित्रण

    जवाब देंहटाएं
  2. आज समाज में सभ्य बननेवाले लोग कितना नीचे गिरे हुऐ हैं, पैसा जो न करा दे!

    जवाब देंहटाएं
  3. बेनामीमई 04, 2023 10:26 pm

    आजादी के सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत किया आपने धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. जी आपके बहुमूल्य टिप्पणी के लिए बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार

      हटाएं

एक टिप्पणी भेजें

आपके बहुमूल्य टिप्पणी एवं सुझाव का स्वागत है 🙏

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अधूरी यात्रा /। Adhoori Yaatra । हिमांशु कुमार शंकर ।

उसकी मां / Usaki Maa । कहानी । कुमार सरोज ।

लव डे / Love Day । गजल । कुमार सरोज ।