बिंदिया और बबलू / Bindiya Aur Babalu । कहानी । कुमार सरोज ।
बिहार के जहानाबाद जिला में एक गांव है मंझार। यह गांव शहर से करीब 12 किलोमीटर दूर दरधा नदी के किनारे बसा हुआ है। नदी में सालों भर तो पानी नहीं रहता है, मगर बरसात के दिनों में नदी पानी से भर जाता है, जिसके कारण गांव वालों को किसी काम के लिए शहर आने जाने में काफी दिक्कत होती है। उन्हें नदी पार करने के लिए नाव का सहारा लेना पड़ता है।
प्रकृति की गोद में बसा यह छोटा सा गांव जो अभी भी बहुत सारे सरकारी सुविधाओं से तो वंचित है, मगर इसके बाबजूद यह गांव बहुत ही सुंदर है।
मंझार गांव में सभी जाति - धर्म के लोग रहते हैं। सभी में आपसी भाईचारा अभी भी कायम है। बिना ऊंच - नीच, जात - पात का भेदभाव किए यहां सभी लोग आपस में मिलजुल कर रहते हैं।
अभी यह गांव शहर के बनावटी आबोहवा से कोसो दूर था।
मंझार गांव में ही इस कहानी के नायक बबलू का भी घर था। मगर वह गांव में नहीं रहता था। वह बचपन से ही अपने माता - पिता के साथ पटना में रहता था। उसके पिता पटना सचिवालय में सरकारी नौकरी करते थे। वह सिर्फ़ अपने माता - पिता के साथ पर्व त्योहार में ही गांव आता था।
गांव में अभी भी बबलू के चाचा यानी उसके पिताजी के छोटे भाई मंगल सिंह रहते थे। दोनों का परिवार अब अलग तो हो गया था, मगर फिर भी मंगल ही बबलू के गांव वाले घर की देखभाल एवं उसकी खेती बाड़ी भी करते थे।
बबलू जब 10 साल का ही था तभी उसकी मां राजमणि मर गई थी। तभी से बबलू के लिए उसके पिता ही सब कुछ थे। बबलू को उसके पिता सहदेव सिंह अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करते थे। वह अपने पिता के आंखों का तारा था।
अपनी मां के मरने के बाद से ही बबलू अपने पिता के अंधे लाड़ प्यार का खूब फायदा उठाने लगा था। वह स्कूल जाने को घर से तो निकलता था, मगर कभी स्कूल नहीं जाता था। वह कभी सिनेमा देखने तो कभी इधर - उधर घुमते हुए मटरगस्ती करने में ही पुरा दिन गुजार देता था। उसे गप्पे हांकने एवं डींगे मारने में बहुत मजा आता था। यही उसका सबसे पसंदीदा काम था।
किसी तरह बबलू अपने पिता के आंखों में धूल झोंक कर स्कूल और उसके बाद कॉलेज की भी पढ़ाई खत्म कर लिया था। मगर वह कभी पढ़ा ही नहीं था, इसीलिए उसे अभी तक पहली कक्षा का किताब भी पढ़ने नहीं आता था। मगर उसके बात करने के निराले अंदाज एवं सिनेमा देख देखकर अपने आप को डींगे हाँकने में इतना एक्सपर्ट कर लिया था कि कोई आज तक उसके वास्तविकता को पकड़ ही नहीं पाया था। उसके पिता जी तो यही समझते थे कि वह अपने स्कूल और कॉलेज का सबसे तेज विद्यार्थी है। जबकि वह ठीक इसके विपरीत था। उसके पास स्कूल और कॉलेज का जो भी सर्टिफिकेट था, वह भी सभी नकली ही था।
बबलू जब भी गांव आता था तो उसके बात करने के तरीके एवं उसकी प्रतिभा को देखकर सभी बहुत प्रभावित होते थे। गांव वाले उसे अपने गांव का सबसे होनहार लड़का समझते थे। सभी यही उम्मीद लगाए हुए थे, कि वह एक न एक दिन अपने गांव का नाम रौशन जरूर करेगा। इसी कारण शायद गांव में सभी बबलू की बहुत इज्जत करते थे। बात - बात पर लोग बबलू की ही मिशाल देते थे।
बबलू अपने बात करने के अंदाज एवं डींगे हाँकने में जो महारथ हासिल किए हुए था, उसी के कारण वह पटना की ही एक पढ़ी लिखी तेज तर्रार एवं सुन्दर लड़की बिंदिया को अपने प्यार के जाल में फंसाकर उससे शादी भी कर लेता है। बिंदिया जैसी तेज तर्रार पढ़ी लिखी लड़की भी बबलू की सच्चाई को नहीं पहचान पाती है।
बबलू के शादी के कुछ ही दिन बाद अचानक एक दिन उसके पिता का हृदय गति रुक जाने से मृत्यु हो जाती है।
बबलू के पिता जी के मरते ही बिंदिया को अपने पति बबलू के अनपढ़ होने की सच्चाई का पता चल जाता है। मगर अब वह कर भी क्या सकती थी ! उसने तो अपने घर वालों से झगड़ा करके खुद ही बबलू से शादी की थी।
बिंदिया बबलू को ही नियती मानकर उसके साथ जिंदगी गुजारने को मन ही मन तैयार हो जाती है।
पिता के मरने के बाद अब बबलू पटना में रहना नहीं चाहता था, वैसे भी वह यहां रहकर अब क्या करता। इसीलिए वह अपने गांव में ही रहने की योजना बनाता है। वह गांव से ही अब कोइ रोजगार करना चाहता था। वैसे भी गांव में उसकी सभी बहुत इज्जत करते थे। वहां उसकी असलीयत भी कोई नहीं जानता था।
बिंदिया को भी बबलू का प्रस्ताव अच्छा लगता है। शहर में रहने पर उसके घर वालों को भी आज नहीं तो कल बबलू की सच्चाई का पता चल ही जाता, और गांव में तो कभी कोई आने वाला था ही नहीं।
उधर मंझार गांव में जैसे ही बबलू को अपनी पत्नी के साथ गांव आने की खबर मिलती है, तो सुन सभी खुशी के मारे फूले नहीं समाते हैं। सभी गांव वाले ढोल बाजे के साथ बबलू और उसकी पत्नी बिंदिया के स्वागत की तैयारी करने में सुनते ही जुट जाते हैं।
गांव में बबलू के चाचा मंगल का एक बेटा था महेश। वह बबलू से एक साल छोटा था। वह भी पांचवी कक्षा तक ही पढ़ा था। उसका रंग भी काला था। जिसके कारण वह अभी तक कुंवारा ही था। जबकि वह शादी के लिए बहुत उतावला था।
बबलू फोन करके महेश को ही गांव आने की बात बताता है।
महेश भी अपने भाई बबलू का पक्का भक्त था। उसके गांव आने की बात सुनते ही वह खुशी से पागल हो उठता है। वह तो अभी से ही अपनी शहरी भाभी बिंदिया को देखने के लिए बैचेन हो उठता है।
महेश ही बबलू के चार दिन बाद आने की खबर पुरे गांव में फैला दिया था।
चार दिन गांव वालों का कैसे बीत जाता है किसी को पता ही नहीं चलता है। जिधर देखो उधर गांव में बबलू और उसकी शहरी मेहरारू बिंदिया के ही चरचे होते रहते थे।
और वो दिन भी आ ही जाता है, जब बबलू अपनी पत्नी के साथ गांव आने वाला था।
महेश उस दिन सुबह से ही अपने पिता के साथ बबलू के बंद पड़े घर की सफाई करने में लग जाता है।
महेश की मां जानकी को अपने भतीजे बबलू का घर आना जरा भी अच्छा नहीं लग रहा था। वह अभी से ही मन ही मन जल भुन रही थी। बबलू के घर आ जाने से अब उसके खेत का अनाज उसे भी देना पड़ेगा, यही सोचकर जानकी चिंतित थी। अभी तक खेत का सारा अनाज वह खुद ही रखते आ रही थी।
उधर दोनों बाप बेटा बबलू के गांव आने से बहुत खुश थे।
" पिता जी, जल्दी जल्दी घर साफ कीजिए न, आज हमें नहाना भी है। शहर वाली भाभी पहली बार गांव आ रही हैं। "
महेश बबलू के घर की सफाई करते हुए अपने पिता से बोला।
बबलू और महेश के घर के बीच में सिर्फ एक दीवार का फांसला था। एक ही घर को बंटवारा के बाद दो हिस्से में कर दिया गया था। जिसमें से आधा भाग बबलू के हिस्से में था तो दुसरा आधा भाग महेश के हिस्से में मिला था।
" मैं जल्दी जल्दी तो कर ही रहा हूं, तुम भी अपना हाथ तेजी से चलाओ। तुम्हारी मां मदद कर देती तो घर की सफाई कब की हो गई होती। मगर मुंह बनाकार पता नहीं क्यों बैठी है। "
महेश के पिता मंगल पास में ही बैठी अपनी पत्नी जानकी की ओर देखते हुए धीरे से महेश से बोले।
" पिताजी आप उसकी बहू ही नहीं ला रहे हैं तो वो बेचारी क्या करेगी। उदास तो रहेगी ही। आप जल्दी से उसकी भी बहू ला दीजिए। "
" अबे पागल, मैं तो तुम्हारे लिए लड़की खोजते खोजते थक गया हूं। कोई तुम्हारी सूरत देखकर शादी करने के लिए तैयार ही नहीं होता है तो मैं क्या करूं। तुम पढ़ा लिखा भी तो बहुत कम ही हो। "
" तो इसमें मेरा का कसूर है। हम बेटा तो आप दोनों का ही है। देखिए बबलू भईया शहरी मेडम से शादी किए हैं। "
दोनों बाप बेटे की बक बक जब जानकी से सुनी नहीं जाती है तो वह मुंह बिचकाकर बोल पड़ती है -
" ज्यादा शहरी भाभी, शहरी भाभी मत करो। शहरी लईकी कैसी होती हैं हमको सब पता है। "
जानकी की बात सुनते ही दोनों बाप बेटे चुप होकर जल्दी जल्दी घर की सफाई करने लगते हैं।
अभी सुबह के 9 बज रहे थे। बबलू अपनी पत्नी बिंदिया के साथ गांव के नदी के उस पार दोपहर 2 बजे आने वाला था। शहर से गाड़ी वही तक आती थी।
गांव वाले नदी के पास से ही दोनों को ढोल बाजे के साथ नाचते गाते हुए गांव में प्रवेश करवाने की पुरी तैयारी कर चुके थे।
गांव वालों को जैसे ही पता चलता है कि उनके गांव का सबसे तेज तर्रार एवं होनहार युवक बबलू अपनी शहरी पत्नी के साथ गांव आ रहा है तो सभी का खुशी का ठिकाना नहीं होता है। सभी बबलू और उसकी पत्नी के स्वागत के तैयारी में लग जाते हैं।
मंझार गांव में एक झोला छाप डॉक्टर रहता था जिसका नाम था सुजीत। सुजीत घर घर जाकर सभी का ईलाज तो करता ही था गांव में ही एक छोटा सा क्लिनिक भी खोले हुए था।
सुजीत के क्लिनिक के ठीक सामने ही उसके एक दोस्त योगेश का गुमटी था। योगेश लाउडस्पीकर, जनरेटर और लाईट रखे हुए था। वह शादी ब्याह या किसी और पार्टी फंक्शन में भाड़े पर सारा सामान देता था। वह अपने गुमटी में ही बल्ब एवं बिजली का और दुसरे सामान भी बेचने के लिए रखता था। वह बिगड़ा हुआ रेडियो एवम टॉर्च भी बनाता था।
सुजीत और योगेश दोनों पक्के दोस्त थे। दोनों की अभी तक शादी भी नहीं हुई थी।
बबलू को अपनी पत्नी के साथ गांव आने की खबर सुनकर योगेश भी बहुत खुश था। वह आज सुबह से ही नहा धोकर नया शर्ट पैंट पहन एवं सेंट लगाकर खुशी के मारे अपने गुमटी के आगे बैठा चहक रहा था।
वह बार बार कभी अपने बालों में कंघी तो कभी कपड़ों पर सेंट छिड़क रहा था।
" हे भगवान, तुम्हारा लाख लाख शुक्र है कि आज शहर वाली सुंदर, और मॉडर्न लड़की को देखने का हमारा सपना पुरा होगा। गांव के गंवार लड़की को देख देख कर मेरा आंख दुख गया था। आज हमारे गांव के सबसे हैंडसम और ब्रिलिएंट लड़का यानि की हमारे बबलू भईया अपनी शहरी मैडम के साथ आ रहे हैं। कितना अच्छा होगा जब हम अब दिन भर अपनी शहरी बिंदिया भाभी का अपने इस गुमटी पर से बैठे बैठे ही दीदार करते रहेंगे। अब शायद उन्हें देख देख कर मेरे उजड़े चमन में भी हरियाली आ जायेगा, और मुझे भी कोई मॉडर्न सुन्दर लड़की मिल जाएगी। हम बहुत पतझड़ देख लिए हैं। "
योगेश अपने गुमटी के बाहर बेंच पर बैठा अपने आप को संवारते एवं इठलाते हुए मन ही मन बुदबुदा रहा था।
तभी योगेश का झोला छाप डॉक्टर दोस्त सुजीत भी एक तरफ से अपनी खटारा साइकिल चलाता हुआ वहां आ जाता है।
वह योगेश को सज धज कर गुमटी के आगे बैठा देख चौंकते हुए गौर से उसे देखने लगता है।
" का बात है मेरे उजड़े चमन, आज ई बिजली गिराने का कहां प्लान है। किसी लड़की के यहां शादी में लाउडस्पीकर बजाने जा रहे हो क्या ? "
सुजीत अपनी साईकिल उसी के बगल में खड़ी करते हुए बोला।
सुजीत की बात सुनकर योगेश क्रोधित हो जाता है।
" तुम न एकदम झोला छाप डॉक्टर ही रहोगे। तुमको पता भी है कि आज बबलू भईया अपनी शहर वाली भाभी के साथ पहली बार गांव आ रहे हैं। "
" अरे हम तो भूल ही गए थे। आज हमारी बिंदिया भाभी आ रही हैं। सुन न भाई तुम अभी कहीं मत जाना, मैं भी नहा धोकर तुरंत आता हूं। "
सुजीत बोलते हुए पैदल ही अपने घर की ओर तेजी से जाने लगता है। मगर तभी उसे योगेश पकड़ लेता है।
" अरे भाई नहा लेना। मगर पहले मेरे आंख में रौशनी बढ़ाने वाला कोई आई टॉनिक डाल दो, ताकि मैं अपनी गुमटी पर बैठे बैठे ही अपनी बिंदिया भाभी का अच्छी तरह से दीदार कर संकू। "
" अभी मेरे पास नहीं है भाई। उसके लिए क्लिनिक खोलना पड़ेगा। "
" तो खोल न , तुम्हारा क्लिनिक कौन बहुत दूर है। समाने ही तो है। नहीं तो लाओ चाभी, मैं खुद निकालकर लाता हूं। "
" अरे यार मैं फिर तैयार कब होऊंगा। मुझे भी तो सजना संवरना है। "
दोनों अभी बाते ही कर रहे थे कि तभी गांव की ही एक लड़की संजू वहां आ जाती है। उसके माथा में दर्द था, और वह दवा लेने के लिए ही सुजीत के पास आई थी।
योगेश उसे आते देख धीरे से सुजीत से बोला -
" लो आ गई बुलेट गन अब जरा फुटानी करके दिखाओ। "
संजू सुजीत के पास आकर रुक जाती है।
" डॉक्टर साहब मेरे सिर में बहुत दर्द हो रहा है, आप कोई अच्छा सा दवा दे दीजिए की मेरा दर्द जल्दी ठीक हो जाए। "
संजू अपने चेहरे पर मायूसी लिए सुजीत से बोलती है।
" अभी दवा नहीं है, कल आना। "
सुजीत संजू को भी टरकाने के मूड में जवाब देता है।
" डॉक्टर साहब दवा आपके झोला में नहीं है तो क्लिनिक में से दे दीजिए। सामने ही तो क्लिनिक है। "
" डॉक्टर साहब का आज रोगी देखने का मन नहीं है। अब जो भी होगा कल ही होगा। "
योगेश भी सुजीत के तरफ से बोल पड़ता है।
दोनों के बक बक को सुनकर संजू के दिमाग का पारा चढ़ जाता है।
" तुम ज्यादा टांय टांय मत करो। डॉक्टर साहब दवा देना है तो दीजिए नहीं तो आपके साइकिल के टायर की हवा खोल दूंगी। फिर हवा भरवाने मेरे यहां ही आयेंगे। फिर आपको समझ में आ जाएगा। "
" जो करना है करो मैं अभी जा रहा हूं। "
कहते हुए सुजीत तेजी से पैदल ही अपने घर की ओर चला जाता है।
सुजीत को बिना उसे दवा दिए जाते देख संजू गुस्से से उसे गाली देने लगती है।
योगेश को संजू द्वारा अपने डॉक्टर दोस्त को गाली देते देख गुस्सा आ जाता है। वह भी गुस्से में उसे डांटने लगता है।
" तुम गाली क्यों दे रही हो। लड़की हो लड़की जैसी ही रहो। "
" तुम ज्यादा टांय टांय मत करो, और अपने डॉक्टर दोस्त को समझा देना। वह ज्यादा डॉक्टर में नहीं फूले। सुने हैं कि हमर शादी में तुम्हीं लाउडस्पीकर और झाड़ फाटक का काम लिया है ? "
" हां लिए हैं तो ? "
" तो ठीक से सब काम करना। दीदी जैसा खराब काम किया न तो समझना। हमरा से बुरा कोई नहीं होगा । "
कहती हुई संजू पांव पटकती हुई वहां से चली जाती है।
संजू मंझार गांव के ही सबसे बुजुर्ग और तेज तर्रार महिला तेतरी चाची की पोती थी। तेतरी गांव के सभी औरतों की मुखिया थी।
संजू के जाते ही योगेश फिर से अपने आप को संवारने में लग जाता है।
उधर संजू की दादी तेतरी चाची अपने घर के आगे बने चबूतरे पर अकेली बैठी कुछ सोचती हुई बार बार इधर उधर देख रही थी। उसे आज अभी तक गांव की कोई औरत नजर नहीं आई थी।
" आज हमारी मंडली की कोई औरत अभी तक नजर क्यों नहीं आ रही है ? आज तक तो ऐसा कभी हुआ नहीं है । जरुर कोई न कोई खास बात है। नहीं तो गांव की औरतें तो हमसे गप्पे लड़ाने और गांव की चटपटी खबर सुनने के लिए हमेशा मरी रहती है। "
तेतरी धीरे धीरे अभी बुदबुदा ही रही थी कि गांव की ही एक औरत चिन्ता वहां आ जाती है।
तेतरी उसे देखते ही उससे तुरंत पुछ बैठती है -
" चिंतवा, आज अभी तक औरत मंडली की कोई महिला नजर नहीं आ रही है। गांव में कुछ हुआ है का ? "
" अरे चाची तुम तो पुरे गांव की खबर रखती हो और आज खुद हमसे पुछ रही हो। तुमको तो पता था न कि आज बबलू अपनी शहरी मेहरारू के साथ गांव आ रहा है। उसे ही देखने आज सभी नदी किनारे गए हुए हैं। सुने हैं सरपंच साहब स्वागत के लिए बैंड बाजा भी ठीक किए हैं। "
" अच्छा.... ! बबलुआ को तो ये सब हीरो ही बना दिए। ठीक है देखते हैं उसकी मेहरारू को भी। आने दो। "
कहती हुई तेतरी अपने घर की ओर चली जाती है।
चिंता भी वहां से गांव के बगल से गुजरने वाली दरधा नदी की ओर चल देती है।
उधर गांव के सरपंच यमुना सिंह भी सज धज कर अपने घर के आगे बैठे थे। पास में ही गांव के कुछ लोग भी बैठे थे। कुछ लोग खडे भी थे। सभी बबलू को लेकर ही बातें कर रहे थे।
तभी अपने घर की ओर से बबलू का चचेरा भाई महेश वहां आ जाता है। वह भी सजा धजा था और बहुत खुश दिखाई दे रहा था।
" सरपंच दादा, आप अभी तक यहीं हैं। हम बैंड बाजा वाले को कब का नदी किनारे भेज दिए। अब तो बबलू भईया और बिंदिया भाभी के आने का समय भी हो गया है । "
महेश आते ही सरपंच साहब से बोला।
" हां.... हां चलो। मैं भी कब से तैयार बैठा ही हूं। "
कहते हुए सरपंच साहब वहां से एक तरफ चल देते हैं। उधर ही नदी थी। नदी तक ही शहर से गाड़ी आती थी।
वहां पर के सभी लोग भी सरपंच साहब के पीछे पीछे चल पड़ते हैं।
महेश भी अपने आप को संवारते हुए सबसे आगे चलने लगता है।
मंझार गांव में ही रंजित भी रहता था। वह गांव के सबसे बड़े किसान हरिहर सिंह का इकलौता बेटा था। कहने को तो वह गांव का सबसे रईस था। मगर एक नंबर का आवारा एवं पियक्कड़ था। बस दिन भर अपने गांव के ही लफंगे दोस्तों के साथ गंजा, ताड़ी और दारू पीने एवं ताश और जुआ खेलने में लगा रहता था।
वह आज भी अपने घर के आगे चौकी पर बैठा दोस्तों के साथ गांजा पी रहा था। उसका घर गांव के एक चौराहे पर था। गांव में सबसे बड़ा उसी का घर था।
आज रंजीत के साथ उसका एक मौसेरा भाई दिनेश भी था। वह कल ही रंजीत से मिलने उसके गांव आया था। दिनेश का घर पटना में ही था।
सभी आपस में बात करते हुए गांजा पी रहे थे। रंजीत गांजा पीते हुए बार बार अपने मोबाईल में एक फोटो देख रहा था।
" दिनेश भईया, आप मेरे सबसे खास भाई हैं। आप उमर में मुझसेबड़े हैं, फिर भी आप मुझे बड़ा भाई का दर्जा देते हैं। इसीलिए आज मैं आपको अपने पहले प्यार के बारे में बताएंगे। हम भी जब कॉलेज में पढ़ते थे न तो मुझे एक लड़की से प्यार हो गया था। मगर वह मुझे भाव नहीं देती थी। मैं उसको जबरदस्ती भी हासिल कर सकता था, मगर नहीं किया। जानते हैं क्यों .... ? क्योंकि मैं भी बहुत जिद्दी इंसान हूं। मैं देखना चाहता था कि उसका पति मुझसे ज्यादा पैसा वाला और हैंडसम मिलता है की नहीं। मिला तो ठीक, अगर नहीं मिला तो उसे सबके सामने ऐसा जल्लील करूंगा कि वह खून के आंसू रोएगी। "
रंजीत पीते हुए अपनी कहानी दिनेश को बता रहा था।
" रंजीत भाई, तुम मुझे आज बता रहा है। पहले बताता मैं उसे उसके घर से उठा लाता। वैसे उसका कोई फोटो है तो मुझे दिखाओ। जरा मैं भी देखूं तुम्हारी दिलरुबा को । "
" लीजिए भईया, आज आप भी देख लीजिए। "
कहते हुए रंजीत दिनेश को अपने मोबाईल में से अपनी कॉलेज वाली प्रेमिका का फोटो दिखाता है, जो वास्तव में बिंदीया ही थी।
सभी गांजा पीते हुए मजा ले लेकर बिंदिया की तस्वीर को देखने लगते हैं।
" लड़की तो सच में कमाल की है भाई। इसका नाम क्या था ? "
दिनेश मोबाईल में गौर से फोटो देखते हुए पुछता है।
" बिंदिया .... । "
रंजीत गांजा का आखिरी कश लगाते हुए बोलता है।
" इसका अभी कुछ अता पता है ? "
" अभी तो नहीं है, मगर पटना जाने पर पता चल जाएगा। हम इसका घर देखे हैं। "
तभी रंजीत के गांव का ही उसका एक और दोस्त मदन वहां एक तरफ से तेजी से चलता हुआ आता है।
" रंजीत भईया, आप यहां बैठकर गांजा पी रहे हैं, और वहां पुरे गांव में बबलू के आने के खुशी में बैंड बाजा बजने वाला है।
" ऐसा कौन सा तीर ऊ साला पागल इस बार गांव में मारने वाला है कि लोग बैंड बाजा बजाने वाले हैं ? "
रंजीत खाली चिलम को एक तरफ रखते हुए बोला।
" भईया उसने शादी कर लिया है, और इस बार अपनी शहरी बीबी के साथ ही गांव आ रहा है। "
" गांव वाला भी पगला गया है। पागल के चक्कर में सब पागल ही बना रहता है। वैसे भी पागल की बीबी पागल ही होगी। "
रंजीत की बात को सुन सभी हंसने लगते हैं।
" ये पागल इंसान कौन है रंजीत ? "
दिनेश अपने पॉकेट से ताश निकालते हुए पुछता है।
" है इसी गांव का। मगर पटना में रहता है। उसकी चिंता हमें नहीं करनी है। चलो हम लोग अब दो चार हाथ ताश खेल लें। "
सभी वही पर बैठ कर ताश खेलने लगते हैं। मदन भी वहीं बैठ जाता है।
रंजीत इस बात से अंजान ताश खेलने में व्यस्त हो जाता है। उसे जरा भी यह आभास नहीं था कि उसके गांव वाले बैंड बाजे के साथ जिसकी स्वागत की तैयारी में लगे थे, वह वास्तव में उसकी दिलरुवा बिंदिया ही थी।
मंझार गांव में नदी के किनारे बबलू और उसकी शहरी पत्नी बिंदिया के स्वागत में बहुत से स्त्री पुरुष खड़े हैं। बबलू का भाई महेश गांव के सरपंच यमुना चाचा के बगल में हाथ में फूल का दो माला लिए खड़ा है। महेश के पिता मंगल भी पास में ही खड़े हैं। योगेश और सुजीत भी अपने हाथ में माला लिए सबसे आगे खड़ा है। सभी बहुत खुश दिखाई दे रहे हैं।
सभी नदी के उस पार बेशब्री से देख रहे हैं। बबलू नदी के उस पार शहर से आने वाली जीप से आने वाला है। शहर से गाड़ी नदी के उस पार तक ही आती थी। शहर से जो जीप आने वाली थी उसी में बबलू अपनी पत्नी बिंदिया के साथ आने वाला था। नदी में एक नाव भी उस किनारे खड़ी थी। शहर आने जाने वाले लोग उसी नाव से नदी पार करते थे।
बैंड बाजे वाला अभी रुक रुककर बाजा बजा रहा था।
ठीक तभी नदी के दूसरे किनारे पर शहर की ओर से एक जीप आकर रूकती है। जीप को देखते ही नदी के दूसरे किनारे खड़े सभी लोगों के चेहरे पर खुशी की लहर खिल उठती हैं। महेश, योगेश, सुजीत एवं गांव के कुछ और युवक खुशी के मारे नाचने लगते हैं। बैंड बाजे वाला भी जोर जोर से अब बाजा बजाने लगता है।
बबलू और बिंदिया जीप से उतरकर जैसे ही नदी किनारे आते हैं कि नाव वाला झट दोनों को नाव में बैठाकर दूसरे किनारे की ओर जिधर गांव वाले खड़े थे चल देता है। बबलू के हाथ में एक बड़ा सा सूटकेस था।
बिंदिया सुर्ख लाल रंग की साड़ी पहनी हुई थी, जिसमें वह और बहुत सुन्दर दिख रही थी। वह शहर की पढ़ी लिखी मॉडर्न लड़की थी, फिर भी अच्छी तरह से अपनी साड़ी के पल्लू से अपने सिर को ढके हुए थी।
महेश अपना मनपसंद का गाना बैंड वाले से बजवाकर अब मदमस्त होकर खुशी से नाचने लगा था। योगेश और सुजीत भी देखा देखी में उसके साथ नाचने लगा था। एकदम उत्सवी माहौल नदी के तट पर लग रहा था।
बबलू और बिंदिया जैसे ही नदी पार करके नाव से उतरते हैं कि गांव वाले बिंदिया को देखने के लिए उतावले हो जाते हैं। सभी देखने के लिए एक दूसरे से धक्का मुक्की करने लगते हैं।
सरपंच साहब पहले से ही दोनों को नदी किनारे से घर ले जाने के लिए एक रिक्शा वाले को बुलाये हुए थे।
आगे आगे बैंड बाजे वाला और उसके पीछे बबलू और बिंदिया रिक्शा पर बैठकर गांव की ओर चल पड़ते हैं। रिक्शा के पीछे गांव वाले आपस में बातें करते चलने लगते हैं। गांव के बच्चे अभी भी खुशी से रिक्शा के आगे नाच रहे थे। महेश, योगेश और सुजीत तो सबसे आगे नाचते हुए चल रहा था।
इधर गांव में रंजीत अभी भी अपने घर के आगे बैठा दोस्तों के साथ ताश खेल ही रहा था कि नदी की ओर से गांव वाले के साथ बबलू और बिंदिया आते हुए सभी को दिख जाते हैं।
गांव के लोगों द्वारा बबलू और उसकी पत्नी का इस तरह स्वागत करते देख रंजीत अन्दर ही अन्दर जल भुन उठता है। वह मन ही मन बबलू को कोसने लगता है।
जैसे ही बबलू और बिंदिया के साथ गांव के लोगों का हुजूम रंजीत के घर के सामने से गुजरने लगता है कि बिंदिया को देखकर रंजीत और उसके दोस्तों की आंखे फटी की फटी रह जाती है। अभी कुछ देर पहले रंजीत अपने कॉलेज वाली जिस दिलरुबा की फोटो दिखाया था, वह कोई दुसरी बिंदिया नहीं बल्कि बबलू की पत्नी बिंदिया ही थी।
रंजीत बबलू की पत्नी के रुप में अपनी दिलरुबा बिंदिया को देख कर चौंक जाता है। उसे तो अपने आंखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था।
" रंजीत भाई, आपकी कॉलेज वाली माशूका तो आपके सबसे बड़े दुश्मन की ही बीबी निकली। "
दिनेश बिंदिया को देखते ही रंजीत के कान में धीरे से कहा।
" यही तो समझ में नहीं आ रहा है कि बिंदिया की शादी बबलू से कैसे हो गई ! "
रंजीत बिंदिया की ओर देखते हुए धीरे से बोला।
" भाई, तुम्हारे लिए एक खुशखबरी है। तुम या पुरे गांव वाले जिस बबलू को बहुत पढ़ा लिखा और होनहार समझ रहे हैं वह जरा भी पढ़ा लिखा नहीं है। अनपढ़ है वह। "
" दिनेश यह तुम क्या कह रहे हो ? गांव में तो सभी यही जानते हैं कि बबलू बहुत पढ़ा लिखा है। मैं भी उससे बहुत बार बात किया हूं, मगर बात चीत करने से तो ऐसा कुछ नहीं लगा कभी। "
" रंजीत, यही तो उसमें खास कला है। जब उसके पिता उसके जालसाजी को नहीं पकड़ पाए तो हम तुम उसे क्या पकड़ पाओगे। "
" अगर ऐसा है तो मैं कल ही सच्चाई का पता लगा लूंगा। देखना दोनों मियां बीबी को कैसे पुरे गांव के सामने मैं जल्लिल करता हूं। "
कहते हुए रंजीत वहां से उठकर गांव की ओर ही चल पड़ता है। पीछे से उसके सभी दोस्त भी चल पड़ते हैं।
इधर तब तक बबलू अपनी पत्नी के साथ अपने घर के पास आ जाता है।
बबलू की चाची जानकी घर के आगे पहले से ही आरती की थाली सजाए खड़ी थी। बबलू जैसे ही रिक्शा से बिंदिया के साथ उतरता है जानकी बिंदिया की आरती उतारने लगती है। पास खड़ी कुछ औरते स्वागत गीत भी गाने लगती है। बैंड बाजे वाला भी शादी विवाह में बजने वाले गीत का धुन बजाने लगता है।
अपनी मां जानकी के आरती उतारने के बाद महेश अपने भईया भाभी को लेकर घर के अन्दर चला जाता है।
गांव वालों की भीड़ भी धीरे धीरे आपस में कानाफुंसी करते हुए वहां से अपने अपने घर की ओर जाने लगती है।
योगेश और सुजीत भी अपने दुकान पर जो बबलू के घर के ठीक सामने ही था आकर बैठ जाता है।
अगले दिन सुबह से ही गांव की औरतों का नई नवेली दुल्हन बिंदिया को देखने के लिए उसके घर तांता लग जाता है।
जानकी के कहने पर बिंदिया अपने घर के आंगन में ही एक चौकी पर बैठ जाती है। महेश अपनी बिंदिया भाभी के बगल में ही खड़ा रहता है।
जानकी गांव की औरतों को बारी बारी से बिंदिया को दिखाने के लिए बुलाने लगती है।
बिंदिया सभी की पैर छूकर आशीर्वाद लेते जा रही थी। गांव की औरते जिसे जितना बन पड़ रहा था उतना मुंह दिखाई बिंदिया को दे रही थी। मुंह दिखाई में मिल रहे पैसों को महेश ही अपने पास रख रहा था।
घर में उस समय बबलू नहीं था। वह सुबह उठकर ही गांव के लोगों से मिलने चला गया था।
तेतरी चाची भी बिंदिया को देखने आती है। वह मुंह दिखाई में बिंदिया को एक सौ रुपए देती है।
" महेश अब तू हमेशा अपनी भाभी के साथ ही रहना। इसका कुछ गुण तुमको भी मिल जाएगा। "
तेतरी चाची महेश को बिंदिया के बगल में खड़े देखकर बोली।
" चाची, हम अबही से ही भाभी के बॉडीगार्ड बन गए हैं। "
तेतरी चाची बिंदिया के मुंह दिखाई का रश्म पुरा करके जानकी के पास आकर खड़ी हो जाती है।
गांव की औरतों और बच्चों का बिंदिया को देखने आने का तांता अभी भी लगा हुआ ही रहता है।
उधर गांव में बबलू अभी सरपंच साहब के घर के आगे बैठा उन्हीं से बातें कर रहा है। आस पास गांव के लिए कुछ और लोग भी बैठे हैं।
" बबलू तुमको क्या बताएं। पिछले साल की तरह ही इस साल भी गांव के बहुत सारे लड़के मैट्रिक परीक्षा में फेल कर गए हैं। समझ में कुछ नहीं आ रहा है कि क्या करें। इससे गांव की बहुत बदनामी हो रही है। अब पढ़ने लिखने में कोई जरा भी ध्यान ही नहीं देता है। स्कूल में मास्टर साहब भी अब ठीक से नहीं पढ़ाते हैं। हमने गांव में बच्चों को पढ़ने के लिए ही पुस्तकालय बनवाया था। फिर भी वहां कोई पढ़ना ही नहीं चाहता है। "
" चाचा हम आ गए हैं न अब सब ठीक हो जाएगा। "
" तुम दो चार दिन ही न रहोगे फिर चले जाओगे। उससे क्या होगा। "
" चाचा, हम अब सदा के लिए गांव में ही रहने आए हैं। हम अपनी काबिलियत दूसरे के विकास के लिए नहीं लगाने वाले हैं। इसीलिए मैंने अब यही निश्चय किया है कि मैं अब जो भी काम करूंगा सिर्फ अपने गांव जेबार के लिए ही करूंगा। "
" तुम्हारा सोच तो बहुत अच्छा है बबलू। तुमको हमसे किसी भी चीज की जरुरत हो या कोई भी मदद चाहिए तो तुम बेझिझक मांग लेना। "
" चाचा, हम कल से ही गांव के बच्चों के लिए पुस्तकालय में निःशुल्क पढ़ाने की व्यवस्था करते हैं। आप आज ही शाम को गांव के लोगों की एक बैठक पुस्तकालय में बुलाइए। ताकि सभी बच्चों के अभिभावक को इसके लिए राजी किया जा सके। "
" तुम्हारा विचार एकदम दुरुस्त है। बच्चा से ज्यादा सबके मां बाप को ही समझाने की जरुरत है। वही सबको पढ़ाई लिखाई छोडाकर फालतू के काम में लगाये रहता है। "
उसके बाद बबलू सरपंच साहब से विदा लेकर अपने घर की ओर चल पड़ता है।
योगेश आज सुबह से ही नहा धोकर नया शर्ट पैंट पहनकर अपने गुमटी के आगे उदास बैठा हुआ था। वह बिंदिया भाभी को देखने के लिए बार बार बबलू के घर के दरवाजे के पास जाकर वही से से वापस आ जा रहा था। घर के अन्दर अभी भी गांव के औरतों की भीड़ लगी हुई थी। जिसके कारण ही योगेश को मौका नहीं मिल रहा था।
तभी योगेश का झोला छाप डॉक्टर दोस्त सुजीत अपनी साइकिल चलाता हुआ वहां आ जाता है।
" का हुआ इतना उदास काहे हो ? "
आते ही सुजीत पुछ बैठता है।
" अरे यार सुबह से ही सज धज कर बिंदिया भाभी को देखने के लिए बैठे हैं, मगर गांव की औरतों की भीड़ खत्म ही नहीं हो रही है। जिसके कारण मुझे मौका ही नहीं मिल रहा है। "
" तू चिंता मत करो हम आ गए हैं तो अब सब ठीक हो जाएगा। "
" तुमसे कुछ नहीं होगा। पहले मेरे आंख में पॉवर बढ़ाने वाला दवा डालो। नहीं तो मुझसे बुरा आज कोई नहीं होगा। "
" अरे भाई, मैं बाजार से तुम्हारे लिए स्पेशल आई टॉनिक लाया हूं। अभी आंख में डाल देता हूं । "
कहते हुए सुजीत अपने झोला में से एक आई ड्रॉप निकालकर योगेश के आंख में डाल देता है।
योगेश अपने आंख में दवा डलवाकर फिर बबलू के घर की ओर चल देता है। इस बार पीछे से सुजीत भी अपने आप को संवारते हुए चल पड़ता है।
दोनों जैसे ही बबलू के घर के पास पहुंचता है कि ठीक तभी बिंदिया को देखकर तेतरी चाची उसके घर से बाहर निकलती है। उसे देखते ही सुजीत झट बबलू के घर के बगल वाली देवी मंदिर के ओट में छिप जाता है।
कल सुजीत तेतरी चाची के पोती संजू को दवा नहीं दिया था तो ' वह जरुर जाकर अपनी दादी को बोल दी होगी ' यही सोचकर उसके डर से छिपा था।
मगर तेतरी चाची के बूढ़ी नजरों से भी भला कोई बच सका है क्या ? वह सुजीत को छिपते हुए देख लेती है। वह भी उसी के पास आकर खड़ी हो जाती है।
" का रे, तू डाक्टर मे फुला हुआ है। मेरी पोती को दवा काहे नहीं दिया था कल ? "
तेतरी चाची सुजीत को डांटते हुए बोलती है।
तेतरी चाची को पास देखकर सुजीत की बोलती बंद हो जाती है। फिर भी वह धीरे से बोलता है।
" चाची, हम तो दवा दे ही रहे थे, ई योगेश्बा जवरदश्ती हमको लेकर बबलू भईया और बिंदिया भाभी को देखने के लिए लेकर चला गया। "
योगेश भी पास ही खड़ा था। सुजीत द्वारा अपने ऊपर झूट का आरोप लगाते देख वह झट बोल पड़ता है।
" चाची ई स्साला झोला छाप डॉक्टर एकदम झूट बोल रहा है। हमको भी कल ई दवा नहीं दिया था। "
" तू दोनों गांव के हो इसीलिए छोड़ दे रहे हैं, अगली बार ऐसा किया न तो पैर हाथ मार के तोड़ देंगे। "
कहती हुई तेतरी चाची अपने घर की ओर चली जाती है।
उसके जाते ही योगेश सुजीत को उसके झूट बोलने के कारण गुस्से से मारने लगता है। सुजीत माफी मांगने लगता है। वह सिर्फ़ तेतरी चाची से बचने के लिए झूठ बोला था।
कुछ देर बाद दोनों फिर से अपने आप को संवारते हुए बिंदिया भाभी को देखने के लिए बबलू के घर की ओर चल देता है।
दोनों बबलू के घर के दरवाजे के पास जैसे ही पहुंचता हैं कि घर के अंदर से महेश बाहर निकलता है। सामने योगेश एवं सुजीत को देखते ही उसके दिमाग का पारा चढ़ जाता है।
" तू दोनों इधर का करने आया है ? "
" महेश भईया हम बिंदिया भाभी को देखने आए हैं। "
योगेश महेश से बहुत ही प्यार से बोला।
" आज हम बड़का तू दोनों के लिए महेशवा से महेश भईया हो गए। ई पोलिश हमरे पास नहीं चलेगा। याद है न उस दिन नया के नाम पर फ्यूज बॉल ( बल्ब ) दे दिया था, और कहने पर उसको बदला भी नहीं। "
" भईया उस दिन गलती हो गया था। अभी चलिए दुकान पर एक बॉल ( बल्ब ) के बदले में दुगो दे देते हैं। "
" हमको अब नहीं चाहिए। तू दोनों चुपचाप यहां से चल जाओ। और दुबारा इधर आया न तो हमसे बुरा कोई नहीं होगा। "
योगेश और सुजीत बिंदिया को बिना देखे जाना तो नहीं चाहता था, मगर महेश दोनों को जबरदस्ती वहां से भगा देता है।
दोनों बिंदिया भाभी को देखने की मन में अधुरी इच्छा लिए वहां से अपनी दुकान की ओर मन ही मन महेश को गली देता हुआ चल पड़ता है।
रोज की भांति रंजीत उस दिन भी नदी किनारे बैठ कर सुबह सुबह ही अपने दोस्तों के साथ गांजा पी रहा था। अपने कॉलेज की दिलरुबा बिंदिया को बबलू की बीबी के रुप में देखकर कल से ही उसका मन उखड़ा हुआ था। उसका दिमाग अभी भी बबलू को कैसे अनपढ़ साबित करें यही उपाय सोचने में लगा हुआ था। दिनेश भी पास में ही बैठा था।
" दिनेश भाई, आप ही कोई उपाय बताइए। मैं अपनी बिंदिया को बबलू के घर में नहीं देख सकता हूं। हम तो कभी सोचे भी नहीं थे कि हमारी बिंदिया मेरे आंखों के सामने ही मेरे दुश्मन के बाहों में रहेगी। "
" तुम चिंता मत करो। हम कल ही पटना जाकर सारी सच्चाई का पता लगाते हैं। बिंदिया तुम्हारी होकर रहेगी। "
सभी आपस में बातें करते हुए गांजा पी रहे थे।
तभी गांव के तरफ से मदन वहां आ जाता है। वही तो रंजित का नारद मुनि था। सारे गांव की खबर वह रखता था।
" रंजित भईया आपके लिए एक खुशखबरी है। "
मदन आते ही रंजित के हाथ से चिलम लेकर गांजा का एक लंबा कश लगाते हुए बोला।
" का हुआ, बबलू का भेद खुलने का उपाय मिल गया क्या ? "
" ऐसा ही समझिए। आज शाम में बबलू पुस्तकालय में गांव के लोगों को बुलाया है। वह गांव के सभी लड़कों को पुस्तकालय में ही निशुल्क पढ़ाने की व्यवस्था करने वाला है। "
" अरे यार तो इससे क्या होगा ? "
" होगा रंजित। तुम पढ़ाने वाले शिक्षक के रुप में बबलू का ही नाम सबसे पहले सभी के सामने मीटिंग में रख देना। नहीं तो वह किसी और को पढ़ाने के लिए कह देगा, और खुद बच जायेगा । "
" आप एकदम सही बोल रहे हैं दिनेश भाई। तब तो बबलू खुद ही अपने जाल में फंस जायेगा। "
सभी बबलू के पोल खुलने के अभी से ही सपना देखते हुए खुशियां मनाते फिर से नए जोश के साथ गांजा पीने लगता है।
महेश की मां जानकी अपने घर के आंगन में चूल्हे पर खाना बना रही है। तभी बाहर से वहां महेश खुशी से झूमता एवं गाना गाता हुआ आ जाता है। मगर अपनी मां को अभी सब्जी काटते देख उसका सारा खुशी उड़नछू हो जाता है।
" अरे मां अभी सब्जी ही काट रही हो। फिर तुम खाना कब बनाओगी। हमें अभी बिंदिया भाभी को खेत घुमाने के लिए ले जाना था। अब हम भूखे कैसे जाए ? "
महेश अपनी मां पर गुस्सा प्रकट करते हुए बोल पड़ता है।
" मेरे पास ज्यादा बिंदिया भाभी ... बिंदिया भाभी मत करो। जब दो चार दिन बाद वह चली जायेगी, तब सारा प्यार उतर जायेगा। "
" बिंदिया भाभी अब कहीं नहीं जाने वाली हैं। बबलू भईया अब सदा के लिए गांव में ही रहेंगे। "
" यह बात तुमको कौन बोला ? "
" आज सुबह ही बबलू भईया और पिता जी आपस में बात कर रहे थे। "
अपने बेटे की बात सुन जानकी उदास हो जाती है। अभी तक वह बबलू के खेत का पुरा अनाज अकेले ही रखते आ रही थी, मगर अब बबलू को भी आधा देना पड़ता। यही सोच वह उदास हो गई थी।
" मां, बबलू भईया गांव में रहेंगे तो बहुत अच्छा होगा। मैं भी उनसे दिमाग लेकर कुछ ना कुछ अच्छा काम करने लगूंगा। "
" ज्यादा इतराओ मत। जाओ बबलू को बोल दो, आज दोनों पति पत्नी का खाना हम बना रहे हैं। खाना अपने यहां ही खा लेगा। "
सुन महेश बहुत खुश हो जाता है।
" मां तुम उतनी खराब नहीं हो, जितना हम कभी कभी सोचते हैं। "
कहते हुए महेश तेजी से बिंदिया के घर की ओर जो की सिर्फ एक दीवार के अंतर पर था चल देता है।
बिंदिया अपने घर के आंगन में रस्सी पर धुले हुए कपड़े सूखने के लिए डाल रही थी, कि तभी महेश खुशी से झूमता हुआ अपने घर की ओर से आ जाता है।
" क्या बात है देवर जी, आज बहुत खुश दिखाई दे रहे हैं। "
" भाभी आज आपको हमारे घर खाना खाना है। इस लिए आप अभी खाना नहीं बनायेंगी। आप अभी ही मेरे साथ खेत देखने चलेंगी। "
" यह तो बहुत अच्छी बात है। मां जी को बोल दीजियेगा, रात में सबके लिए हम खाना बनाएंगे। "
" बोल देंगे, मगर आप पहले मेरे साथ चलिए। "
महेश बिंदिया को लेकर घर से बाहर की ओर चल देता है।
उधर योगेश अपने गुमटी पर बैठा बिंदिया के बारे में ही सुजीत से बाते कर रहा है। महेश द्वारा घर से भगा देने के कारण वह बहुत गुस्से में है।
" सुजीत अब चाहे जो भी हो, हम भी अपने लिए पत्नी गांव की सबसे सुन्दर लड़की खोजेंगे। हम कल ही पाई बिगहा के पारस पंडित जी से मिलकर उनसे कोई उपाय पूछते हैं। वे जरुर मेरा हाथ देखकर कुछ न कुछ उपाय बताएंगे। "
" सुंदर लड़की पाने के लिए सुंदर थोपड़ा भी होना चाहिए डेकोरेटर बाबू, जो तुम्हारे पास नहीं है। "
" तुम तो चुप ही रहो। तुम तो हमसे जलते हो। इसीलिए तो अभी तक तुम्हारा भी शादी नहीं हुआ है। बड़ा आया हीरो बनने झोला छाप डॉक्टर। "
दोनों डींगे हांकते हुए गप्पे लड़ाते ही रहता है।
उधर महेश बिंदिया को लेकर जैसे ही गांव से निकलता है कि सामने से रंजीत अपने दोस्तों के साथ आता बिंदिया को दिख जाता है। मगर उसके चेहरे पर किसी तरह की कोई बदलाव नहीं होता है। वह महेश के साथ अभी भी हंसी मजाक करती हुई जा रही थी।
रंजीत अपने दोस्तों के साथ नदी किनारे से अपने घर आ रहा था। बिंदिया को गांव की ओर से आते देख उसके चेहरे पर मुस्कान खिल उठती है। पहली बार गांव में बिंदिया से रंजीत का आमना सामना होने वाला था। इसीलिए मन ही मन रंजीत बहुत उत्साहित हो जाता है। वह बिंदिया के चेहरे की प्रतिक्रिया को देखने के लिए उतावला हो जाता है।
" दिनेश देखना बिंदिया मुझे देखकर कैसे चौंकेगी। वह तो कभी सोची भी नहीं होगी कि मुझसे उसकी मुलाकात इस गांव में होगी। "
" उसका उखड़ा चेहरा देखने में मजा आयेगा। "
इधर तब तक बिंदिया भी महेश के साथ बातें करती हुई रंजीत के पास आ जाती है। मगर उसके चेहरे पर रंजीत को देखकर भी किसी तरह का कोई बदलाव नहीं आता है। वह पहले से जैसे महेश से हंस हंसकर बाते करते आ रही थी अब भी वैसे ही बाते करती हुई रंजीत को घूरती आगे बढ़ती चली जाती है।
बिंदिया का इस तरह रंजीत को नजरअंदाज करके महेश के साथ हंसते बाते करते बगल से जाते देख सभी चौंक जाते हैं। बिंदिया को देखकर तो सभी को ऐसा लग रहा था जैसे वह रंजीत को पहचानती ही नहीं।
" रंजीत बिंदिया के चेहरे पर तुमको देखकर तो कोई प्रतिक्रिया ही नहीं हुआ। यह कोई दुसरी हमशक्ल लड़की तो नहीं है। "
" नहीं, ये वही बिंदिया है। यह भी उसकी कोई चाल है। बहुत नौटंकी बाज है ये। फिर भी कोई बात नहीं। मैं सच्चाई सामने ला कर रहूंगा। "
रंजीत अपने दोस्तों के साथ बाते करते हुए घर की ओर चल देता है।
उधर बिंदिया रंजीत को दूर से ही देख लेती है। वह तो रंजीत को कल उस समय भी देख ली थी जब वह नदी के किनारे से रिक्शा पर बैठी बबलू के साथ आ रही थी। रंजीत को इस गांव में देखकर वह कल चौंकी थी और उसके चेहरे पर भी शिकन भी आई थी, मगर वह तुरंत अपने आप को संभाल ली थी। इसीलिए शायद उस समय किसी ने बिंदिया के चेहरे की बदली हुई रंगत को नहीं देख पाया था। घर आते ही वह रंजीत से सामना के लिए अपने आप को हमेशा के लिए तैयार कर लेती है। क्योंकि वह जानती थी कि अब उसे हमेशा के लिए इसी गांव में रहना था। इसीलिए अभी रंजीत को देखने के बाद भी उसके चेहरे पर किसी तरह का कोई बदलाव नहीं आया था।
उधर रंजीत अपने दोस्तों के साथ जैसे ही अपने घर के पास पहुंचता है कि सामने से बबलू आ जाता है।
रंजीत बबलू को देखते ही तुरंत बोल पड़ता है -
" बबलू भईया, आप चुपके चुपके शादी भी कर लिए, और अभी तक पार्टी भी नहीं दिए। कम से कम शहर वाली भाभी के हाथ का बना चाय तो पिला दीजिए। "
" पार्टी भी मिलेगा, और चाय भी पिलाएंगे। कल सुबह घर आ जाना। बबलू आज तक कभी किसी को ना बोला है। "
" ठीक है, हम कल सुबह बिंदिया भाभी के हाथ का बना चाय पीने आपके यहां पक्का आयेंगे। "
कहते हुए रंजीत अपने घर के अंदर चला जाता है।
बबलू भी अपने घर की ओर चल देता है।
दोपहर का समय था। जानकी अपने घर के आगे बैठी तेतरी चाची से बिंदिया और बबलू के बारे में ही बाते कर रही थी। जानकी बबलू के गांव आ जाने से होने वाले नुकसान के बारे में तेतरी को बता रही है। तेतरी भी बहुत मजे ले लेकर जानकी को और नमक मिर्च लगाकर भड़का रही है। तेतरी चाची का यही तो काम था। आज हर गांव में तेतरी चाची जैसी कोई न कोई महिला मिल ही जाती थी। एक तो जानकी पहले से ही बबलू को लेकर चिंतित थी, ऊपर से तेतरी चाची की आग लगाऊं बात आग में घी का काम करता है। जानकी मन ही मन अब और परेशान हो उठती है।
उसी दिन शाम में ही योगेश भी पारस पंडित जी से जाकर मिलता है। पंडित जी उसे जल्दी विवाह होने एवं सुंदर पत्नी मिलने के लिए सात दिन लगातार देवी मां का पूजा करने की सलाह देते हैं।
योगेश पंडित जी से अपनी कामयाबी का उपाय सुनकर मन ही मन खुश होता हुआ अपने गांव की ओर वापस चल देता है। वह अभी से ही मन में ख्याली पुलाव पकाने लगा था।
योगेश पाई बिगहा से चलकर जैसे ही नदी के तट पर पहुंचता है कि उसकी नजर नदी किनारे ही खड़ी एक सुन्दर लड़की पर पड़ जाती है।
लड़की को देखते ही उसे पंडित जी का कहा एक एक शब्द कानों में गुंजने लगता है। उसका ख्वाब उसे सच होता दिखने लगता है।
योगेश झट लड़की के पास जाकर उससे बातें करने एवं जान पहचान बढ़ाने की कोशिश करने लगता है।
लड़की भी बहुत खुले विचार की थी। वह भी योगेश से खुलकर बाते करने लगती है।
दोनों वही बैठकर आपस में बाते करने लगते हैं। दोनों को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे दोनों पुराने परिचित थे।
कुछ देर के बाद योगेश उस लड़की के साथ ही बगल के गांव कोरमाथु की ओर चल देता है। शायद वह लड़की कोरमाथू की ही थी। लड़की ने योगेश को अपना नाम पुष्पा और घर कोरमाथू बताई थी। उस समय तक कुछ कुछ अंधेरा भी हो चला था।
योगेश कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि इतनी आसानी से इतनी सुंदर लड़की पट जायेगी। वह मन ही मन खुशी से फूले नहीं समा रहा था।
नदी के तट से कोरमाथू जाने के रास्ते में एक बहुत बड़ा बगीचा था। शाम होने के कारण बगीचा को पार करने में लड़की को डर लग रहा था। इसीलिए पुष्पा को गांव तक छोड़ने योगेश उसके साथ जा रहा था।
योगेश बगीचा में अभी कुछ ही दूर गया था कि लड़की उससे लिपट कर जोर जोर से बचाओ..... बचाओ .... चिल्लाने लगती है। योगेश डर जाता है। वह अपने आप को लड़की के पकड़ से छुड़ाने की कोशिश करने लगता है। मगर सफल नहीं होता है।
योगेश के बहुत गिड़गिड़ाने पर पुष्पा उसके पास का सभी पैसा लेकर उसे छोड़ देती है।
योगेश आजाद होते ही तेजी से गिरते पड़ते बदहवास अपने गांव जाने के लिए नदी की ओर भाग खड़ा होता है।
उसी दिन शाम में बबलू के कहने पर सरपंच साहब पुस्तकालय में गांव के लोगों का एक सभा बुलाते हैं। उसमें बहुत से लोग आए हुए थे। रंजीत भी सबसे पहले आकर बबलू के बगल में ही बैठा था। सरपंच साहब के पास गांव के कुछ और बुजुर्ग बैठे हुए थे।
" हम लोगों के लिए यह बहुत खुशी की बात है कि हमारे गांव का सबसे ज्यादा पढा लिखा एवं होनहार युवक बबलू अब हमेशा के लिए अपने गांव में ही रहेगा। यह हम सब के लिए बहुत ही गर्व की बात है। इसकी सोच की हम दाद देते हैं, यह सिर्फ अपने गांव की भलाई के लिए ही यहां रहना चाहता है। नहीं तो इसके लिए शहर में भी कोई काम की कमी नहीं थी। "
सरपंच साहब बोलते जा रहे थे, और गांव के लोग उनकी बातों को सुनकर बीच बीच में ताली बजा रहे थे। सभी बहुत खुश थे।
" बबलू के पास गांव के बच्चों एवं बुजुर्गों को भी पढ़ाने के लिए एक योजना है। इसीलिए सभी को यहां बुलाया गया है। अपनी योजना बबलू अब आपको बताएगा। "
सरपंच साहब जैसे ही बबलू को बोलने के लिए आमंत्रित करते हैं कि गांव के युवा खुशी से तालियां बजाने लगते हैं।
" मैं चाहता हूं कि गांव के पढ़े लिखे वैसे लड़के जो अभी किसी कारण से गांव में ही रह रहे हैं, वे यहां के बच्चों को पढ़ाने के लिए थोड़ा समय दें। ताकि गांव के बच्चे अच्छे नंबर से मैट्रिक परीक्षा पास कर सके। तभी हमारे गांव का नाम भी रौशन होगा। "
बबलू के बात सुनकर गांव के दो तीन लड़के पढ़ाने के लिए तुरंत तैयार हो जाते हैं।
मगर तभी रंजीत बोल पड़ता है -
" सरपंच साहब बबलू भईया से ज्यादा इस गांव में कोई पढ़ा लिखा तो है ही नहीं इसीलिए बच्चों को बबलू भईया ही खुद पहले दो तीन महीना क्यों नहीं पढ़ाते हैं, फिर गांव के लड़के पढ़ाएंगे। "
रंजीत बबलू के बैठते ही बोल पड़ता है। उसे तो बबलू को उसी के जाल में फंसाना था।
रंजीत की बात सुनते ही बबलू उसके मन की बात समझ जाता है। वह तो पहले से ही इसके लिए भी उपाय सोच रखा था।
" रंजीत भाई का विचार एकदम ठीक है। मगर मेरे मन में इससे भी अच्छी योजना है। आज नारी शक्ति का युग है। हमें नारी को अपने बराबरी का हक देना चाहिए। हम अपने गांव के बच्चों को ही नहीं बल्कि सभी स्त्री पुरुष को भी साक्षर बनाना चाहते हैं। इसी लिए सभी को मैं नहीं बल्कि मेरी पत्नी बिंदिया पढ़ाएंगी। बिंदिया से गांव की औरते भी आसानी से पढ़ लेंगी। गांव के जो लड़के पढ़ाने को इच्छुक थे वो सिर्फ़ बिंदिया को मदद करेंगे। "
बबलू की बात सुनते ही गांव के सभी लोग खुशी से उछल पड़ते हैं।
महेश भी पढ़ा लिखा तो था नहीं। इसीलिए बबलू की बात सुनते वह खुशी से नाचने लगा था। देखा देखी गांव के कुछ और लड़के नाचने लगते हैं। सभी के मन में एक ही बात नाच रहा था कि उन्हें बिंदिया भाभी पढ़ाएंगी।
रंजीत अपनी पहली चाल में ही नाकामयाब हो गया था। वह अब चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता था। वह तुरंत वहां से चुप चाप अपने घर की ओर चल देता है। पीछे से उसके सभी दोस्त भी चल पड़ते हैं।
रंजीत घर आकर अपनी हारे हुए चाल से परेशान होकर बबलू को मन ही मन कोसने लगता है।
" रंजीत बबलू तो सारा खेल ही उल्टा कर दिया। हमको भी लगा था कि आज वह फंस जाएगा। मगर उलटे कितने चालाकी से खुद वाहवाही बटोर कर गांव का हीरो बन गया। "
रंजीत का मोसेरा भाई दिनेश एक कुर्सी पर बैठते हुए बोला।
" मगर वह कब तक बचेगा। अभी तो शुरुआत हुई है। देखना हम एक न एक दिन उसका पोल खोलकर ही रहेंगे। बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी। "
" हम भी कल सुबह में ही पटना जाकर बबलू और बिंदिया का पुरा कहानी पता करते हैं। "
" कल हमको बबलू अपने घर चाय पीने के लिए भी बुलाया है। देखते हैं कल बिंदिया क्या करती है। "
तब तक मदन गांजा का चिलम तैयार कर चुका था। वह चिलम सुलगाकर रंजीत को दे देता है।
सभी गांजा पीते हुए आपस में फिर से नए सिरे से बबलू के पोल खोलने की योजना बनाने में लग जाते हैं।
योगेश सुबह उठते ही सबसे पहले पंडित के बताए अनुसार पूजा करने के लिए गांव के देवी मंदिर की ओर चल देता है। देवी मंदिर बबलू के घर के ठीक बगल में ही था।
योगेश को पता नहीं ऐसा क्यों लग रहा था कि उसे मंदिर में पूजा करते समय आज बिंदिया भाभी से मुलाकात जरुर होगी। बिंदिया भी प्रतिदिन सुबह मंदिर में पूजा करने आती थी।
मंदिर से अभी योगेश दूर ही था मगर मंदिर के लाउडस्पीकर पर बज रहे देवी माता की आरती सुनकर वह ऐसे थिरकने लगा था मानों वह बाराती के डीजे पर नाच रहा हो।
वह अपने लिए एक सुंदर सुशील लड़की को पाने की कल्पना मात्र से ही इतना खुश था कि उसे देवी माता का भजन भी आज उसे उसका मनपसंद फिल्मी गीत लग रहा था।
देवी माता के मन्दिर के बगल में ही एक बड़ा सा कुआं भी था। गांव के लोग उस कुआं पर नहाते भी थे। योगेश भी मजे से फिल्मी गाना गुनगुनाता हुआ कुआं पर नहाकर सिर्फ शरीर में एक गमछा लपेटकर मंदिर में पूजा करने चला जाता है। वह बाकि का अपना सभी कपड़ा कुआं के पास ही छोड़ देता है। गांव के अधिकांश मर्द ऐसा ही करते थे। वे पूजा करके फिर अपना पहले वाला खोलकर रखा हुआ कपड़ा पहनकर घर आ जाते थे।
योगेश अपने साथ लाए पीतल के लोटा में पानी और मन्दिर के पास के अड़हुल के पेड़ से तोड़े फूल से देवी माता को बारी बारी से स्नान कराने लगता है।
योगेश जैसे ही पूजा करके मंदिर से बाहर निकलता है कि ठीक तभी बिंदिया भी पूजा करने के लिए अपने घर से निकलकर मन्दिर के आगे आ जाती है। बिंदिया को देख योगेश के दिल में खुशी के मारे तूफान उमड़ने लगता है। वह पहनी बार बिंदिया भाभी को इतने करीब से देख रहा था। उसकी पूजा सफल होते अभी से ही दिख रही थी।
योगेश बिंदिया को अचानक सामने देख अभी खुशी के भंवर में गोता ही लगा रहा था कि बिंदिया उसे मंदिर में देख बोल उठती है -
" योगेश भईया आप और मंदिर में। आजकल आपका काम धंधा मंदा चल रहा है क्या ? "
बिंदिया की प्यारी आवाज सुनकर योगेश तो और भाव विभोर होकर खयालों में खो जाता है। वह कुछ बोल नहीं पाता है।
" क्या हुआ योगेश भईया। कहां खोए हैं ? "
" भाभी, हम आपको का बताएं कि हम आज केतना खुश हैं। आपको देखने के लिए हम का का न जतन किए हैं। फिर भी बढ़िया से इतना नजदीक से कभी नहीं देखे थे। आज मेरा पूजा सफल हो गया। "
" आप मेरे घर आ जाते। "
" भाभी इस पागल को आप घर बुला रही हैं। कल ही यह लड़की के चक्कर में मार खाया है। "
योगेश कुछ बोल पाता उससे पहले ही बोलते हुए अपने घर की ओर से महेश वहां आ जाता है।
" भाभी ये झूठ बोल रहा था। खुद तो निक्कमा है इसीलिए हमसे जलता है। "
महेश आगे कुछ बोलता तभी उसे चुप रहने को बोलकर बिंदिया पूजा करने मंदिर के अंदर चली जाती है।
पीछे से महेश भी योगेश को घूरता हुआ मंदिर के अंदर चला जाता है।
योगेश सारी बातें भुलाकर बिंदिया भाभी से मिलने की खुशी में ही इठलाता हुआ अपना रखा कपड़ा पहनने के लिए कुआं की ओर चल देता है।
तभी एक तरफ से हांफता हुआ सुजीत वहां आ जाता है।
" अरे तुम यहां मंदिर में घंटी डोला रहे हो और हम तुमको कहां कहां ढूंढ़ रहे थे। "
" सुबह सुबह ऐसा हमसे का काम आन पड़ा की इतना परेशान हो ? "
" बात ही इतनी खुशी की है कि का बताएं। पहले तुम यह बोलो कि तुम शाम में बबलू भईया जो मीटिंग बुलाए थे उसमें तुम काहे नहीं आया था। कहां शाम से ही तुम गायब हो ? "
सुजीत कुआं के पास ही बैठता हुआ बोलता है।
" तुमको तो हम बोले थे कि पंडित जी से मिलने जाना है। हम पण्डित जी से ही मिलने गए थे। घर आते आते शाम हो गया। मेरा मिजाज भी थका हुआ था इसीलिए घर जाकर तुरंत सो गए थे। अब बोलो तुम इतना परेशान क्यों है ? "
" बिंदिया भाभी गांव के सभी अनपढ़ों को पढ़ाएंगी। तुम भी तो अनपढ़ हो ही पढ़ लेना। यही तुमको बताने के लिए मरे जा रहे थे। पढ़ने का मन तो मेरा भी था, मगर हम अनपढ़ नहीं हैं, हम मैट्रिक फेल हैं। "
सुन योगेश खुशी के मारे सुजीत को अपने बाहों में उठाकर नाचने लगता है। वह इतना मग्न होकर नाचता है कि नाचते नाचते कपड़े के नाम पर पहना हुआ एक मात्र गमछा भी खुल जाता है। वह एकदम नंगा हो जाता है। वह तो शुक्र था कि अभी आस पास कोई तीसरा आदमी नहीं था।
सुजीत के कहने पर वह झट से गमछा लपेटकर अपना रखा बाकि का सभी कपड़ा पहनने लगता है।
वह जैसे ही अपना फुलपैंट पहनता है कि उसके अंदर घूंसा हुआ चींटी उसे जोरों से काट लेता है। वह चींटी निकालता उससे पहले ही मंदिर से बिंदिया महेश के साथ निकलती उसे दिख जाती है।
योगेश झट वैसे ही एक तरफ भाग खड़ा होता है। सुजीत भी उसके पीछे ही तेजी से चल देता है।
इधर बिंदिया जैसे ही पूजा करके महेश के साथ अपने घर के आगे पहुंचती है कि वहां बबलू के साथ रंजित को बैठा देख चौंक जाती है। मगर वह तुरंत सामान्य हो जाती है।
कल बबलू रंजीत को चाय पीने के लिए बुलाया था, जिसके कारण ही आज रंजीत सुबह सुबह ही चाय पीने आ गया था।
" बिंदिया, ये मेरा बचपन का लंगोटिया यार और गांव के सबसे बड़े किसान हरिहर सिंह का इकलौता बेटा रंजीत है। कल तुम्हारे हाथ का चाय पीने का जिद्द किया तो मैंने इसे आज चाय पर बुला लिया। "
" अच्छा किए। इसी बहाने कम से कम आपके गांव के दोस्तों से जान पहचान भी हो जायेगी। "
रंजीत तो यह सोचकर अन्दर ही अन्दर खुश हो रहा था कि आज बिंदिया अपने सामने अचानक मुझे देखकर जरूर चौकेगी। और बबलू को उसके बारे में पता चल जायेगा। मगर यहां तो एकदम उल्टा हो रहा था। बिंदिया एकदम उससे अनभिज जैसा व्यवहार कर रही थी। उसके चेहरे पर किसी तरह का कोई बदलाब या चिंता की लकीरें भी नहीं दिख रही थी।
" बिंदिया हम तो सोच रहे हैं, गांव के सभी दोस्तों को एक ही दिन टी पार्टी दे देते हैं। कितना का रोज मजाक सुनेंगे। "
" यही अच्छा रहेगा। आप लोग तब तक बातें कीजिए मैं चाय बनाकर लाती हूं । "
कहती हुई बिंदिया घर के अंदर चली जाती है।
पीछे से रंजीत को खा जाने वाली निगाहों से घूरता हुआ धीरज भी चल देता है।
" बबलू भाई मेहरारू तो एकदम झकास खोजे हो। पढ़ी लिखी उपर से शहरी। कहां से फंसा लिया यार ? "
" यह सबके बस की बात नहीं है। पैसा और डिगरी रहने से ही सबकुछ नहीं मिल जाता है। उसके लिए दिमाग लगाना पड़ता है। "
" हमको भी अब विश्वास हो गया कि तुमसे ज्यादा तेज इस गांव में कोई और नहीं है। "
दोनों अभी बातें ही कर रहे थे कि तभी वहां पर हाथ में चिठ्ठी लिए तेतरी चाची आ जाती है। यह भी रंजीत का ही एक योजना था।
" बबूल बेटा, देखो न संजू के ससुराल वाले एक चिठ्ठी भेजे हैं। जरा पढ़कर बताओ तो कि इसमें क्या लिखा है। "
तेतरी चाची आते ही अपने हाथ का लिफाफा बबलू को देती हुई बोली।
बबलू रंजीत का प्लान तुरंत समझ जाता है। वह किसी के चेहरे क्या उसके मन को भी पढ़ने में महारत हासिल की हुए था।
" चाची इसमें इतना परेशान होने की क्या जरुरत है, मैं अभी पढ़ कर सुना देता हूं। वैसे यह चिठ्ठी तो कोई भी पढ़कर सुना देता। "
" शादी की बात है बेटा। गांव में सब पर विश्वास नहीं कर सकते हैं। मगर तुम पर हमको पुरा विश्वास है। "
" तेतरी चाची ठीक कह रही है, बबलू। पढ़ दो बेचारी की चिठ्ठी । "
बबलू लिफाफा में रखा चिठ्ठी निकालकर पढ़ने लगता है।
रंजीत को जरा भी विश्वास ही नहीं हो रहा था कि आखिर बबलू इतना धाराप्रवाह पढ़ कैसे रहा था। जबकि उसके भाई दिनेश के अनुसार तो वह अंगूठा छाप था।
तेतरी भी मन ही मन अब रंजीत को कोस रही थी। वह उसी के कहने पर तो उसी का लिखा हुआ चिठ्ठी लेकर आई थी।
वास्तव में यह सब कारनामा बबलू ने अपने मोबाइल और ब्लूटूथ वाला वायरलेस हेडफोन से किया था। बबलू हमेशा अपने हाथ में फोन और कान में वायरलेस हेडफोन लगाए रहता था। वह रंजीत को बातों में उलझाकर चिठ्ठी का फोटो बिंदिया को भेज दिया था, और उस चिठ्ठी को बिंदिया ही पढ़कर बबलू को घर के अंदर से फोन पर सुना रही थी। यह सब बबलू इतनी सफाई से किया था कि रंजीत जैसा धूर्त इंसान के पकड़ में भी नहीं आ सका। यही तो बबलू की कलाकारी थी। तभी तो बिंदिया जैसी पढ़ी लिखी शहरी लड़की भी उसकी असलीयत नहीं पकड़ पाई थी।
तेतरी चाची अंत में चिठ्ठी लेकर चली जाती है। इधर तेतरी चाची जाती है और उधर घर के अन्दर से चाय लिए बिंदिया वहां आ जाती है।
रंजीत का चेहरा अब पहले जैसा खिला हुआ नहीं था।
बिंदिया दोनों को चाय देकर घर के अन्दर चली जाती है।
रंजीत भी जल्दी जल्दी चाय पीकर वहां से चल देता है।
बिंदिया अभी अपने कमरे में आकर बैठती ही है कि बाहर से बबलू भी कमरे में आ जाता है। अभी पता नहीं क्यों बिंदिया के चेहरे पर सोच की लकीरें उभरी हुई थी।
" क्या हुआ, तुम कुछ परेशान दिख रही हो। "
बबलू बिंदिया के उदास चेहरे को देखते ही पुछ बैठा।
" मैं आपको एक बात बताना चाह रही थी। उसी बात को लेकर मैं थोड़ी परेशान हूं। "
" रंजीत को तुम पहले से जानती थी। यही बताना चाहती हो न। "
" आपको कैसे पता ? "
" बिंदिया जी, मैं बबलू हूं। जो किसी का सिर्फ चेहरा देख कर उसके दिल की बात समझ जाता है। तुम्हें परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है। रंजीत जैसे लोग हमें या तुम्हें कुछ नहीं बिगाड सकते हैं। बैसाखी के सहारे चलने वाला इंसान कभी दौड़ते हुए इन्सान का मुकाबला नहीं कर सकता है। "
" मगर आपको कैसे पता चला। मैंने तो कभी कुछ बताया ही नहीं ? "
" जिस दिन तुम गांव में कदम रखी थी, और तुम पहली बार रंजीत को देखी थी तो कुछ देर के लिए तुम्हारे चेहरे का रंग फीका पड़ गया था। मैं तभी समझ गया था कि कुछ न कुछ बात है। बाद में जब रंजीत से उसके कॉलेज के बारे में पुछा तो वह भी अपना कॉलेज का नाम तुम्हारे कॉलेज का ही बताया। फिर मैं सारा माजरा समझ गया। "
" आप सच में बहुत जीनियस हैं। "
कहती हुई बिंदिया खुशी के मारे बबलू से लिपट जाती है।
" बिंदिया तुम साथ हो तो हम अंगूठा छाप बबलू पुरी दुनिया भी जीत सकते हैं। "
कहते हुए बबलू भी बिंदिया को बाहों में भर लेता है।
उधर बबलू के घर से रंजीत उदास बुझे मन हारे हुए खिलाड़ी की तरह अभी अपने घर की ओर जा ही रहा था कि सामने से सरपंच साहब हाथ में एक कागज लिए आ जाते हैं।
" अरे बेटा रंजीत जरा यह डीएम साहब का चिठ्ठी पढ़ कर सुनाओ तो। अधिकारी लोग भी न एकदम बकलोले होते हैं, अंगरेजी में लिख कर चिठ्ठी भेजते हैं। "
सरपंच साहब की बात सुनते ही रंजीत का उदासी तुरंत छूमंतर हो जाता है।
" सरपंच चाचा आपको तो पता है, अंग्रेजी मेरा भी खराब ही है। आप बबलू से पढ़ा लीजिए न। अभी हम उसी के यहां से आ रहे हैं। वह घर पर ही है। "
सरपंच साहब कुछ बोल पाते की तभी दूर से बबलू इसी ओर आता दिख जाता है।
" लो, बबलू तो इधर ही आ रहा है। "
बबलू को आता देख रंजीत का तो खुशी का ठिकाना ही नहीं रहता है। इस बार बबलू का पक्का पोल खुलने वाला था।
" पता है सरपंच चाचा बबलू के गांव में आने से गांव की रौनक बढ़ गई। "
" तुम एकदम सही बोला। "
तब तक बबलू भी पास आ जाता है।
" रंजीत क्या सही बोला चाचा ? "
" तुम्हारे बारे में ही बोल रहा था। बबलू जरा यह डीएम साहब का चिठ्ठी पढ़ कर सुनाओ तो । लगता है कोई नया स्कीम आया है सरकारी । "
चिठ्ठी पढ़ने की बात सुनते ही बबलू का दिल अन्दर ही अन्दर जोर जोर से धड़कने लगता है। बिंदिया तो बबलू के सामने ही नहाने के लिए बाथरूम में चली गई थी। फिर अब वह चिठ्ठी पढ़ेगा कैसे ? वह भी अंग्रेजी में लिखा हुआ।
" लाइए चाचा। मैं पढ़कर समझा देता हूं। रंजीत नहीं पढ़ा क्या ? "
बबलू सरपंच साहब से चिठ्ठी लेते हुए बोला।
" रंजीत सिर्फ नाम का पटना कॉलेज में पढ़ा है। ठीक से हिन्दी भी नहीं पढ़ने लिखने आता है। और यह चिठ्ठी तो अंग्रेजी में है। "
बबलू 5 दिन पहले ही डीएम साहब का प्रेस कांफ्रेंस का वीडियो मोबाइल पर देखा था। वह जानता था कि यह कागज पक्का सरकार की नई योजना जल जीवन हरियाली के बारे में ही होगा। फिर क्या था वह हाथ में चिठ्ठी लेकर पढ़ने का नाटक करते हुए डीएम साहब का बोला हुआ एक एक शब्द सरपंच साहब को भी बता देता है। उसे पता था कि रंजीत को तो अंग्रेजी खुद नहीं आती है इसीलिए वह उसे नहीं पकड़ सकता था।
बबलू सरपंच साहब को सरकारी योजना जल जीवन हरियाली जिसमें प्रत्येक गांव में सूखे तालाब एवं कुआं को फिर से उसका साफ सफाई एवं मरम्मत करवाकर उपयोग में लाने के लायक बनाना था के बारे में विस्तार से बताता है।
बबलू के गांव मंझार में भी एक पुराना तालाब था, जो अब विलुप्त के कगार पर आ गया था।
बबलू की पुरी बात सुनकर सरपंच साहब बहुत खुश होते हैं।
जबकि रंजीत के दिमाग का फ्यूज फिर से उड़ जाता है। उसे अभी तक समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर बबलू पढ़ कैसे रहा था !
उसी दिन शाम में बिंदिया बबलू द्वारा गांव में शुरु किए गए रात्रि पाठशाला में गांव के सभी अनपढ़ स्त्री पुरुष एवं सभी स्कूली बच्चों को पढ़ाती है।
योगेश एवं महेश के अलावा और भी बहुत से बुजुर्ग स्त्री पुरुष पढ़ने आते हैं।
सुजीत तो पढ़ा लिखा था इसीलिए वह बिंदिया के साथ मिलकर सभी को पढ़ाने का काम करता है। उसके साथ ही गांव के कुछ और लड़के पढ़ा रहे थे।
सुजीत बार बार महेश को ही पढ़ाई के बहाने डांटते रहता है। जबकि योगेश बार बार किसी न किसी बहाने बिंदिया के पास ही आते रहता है।
अगले दिन सुबह रंजीत फिर से अपने दोस्तों के साथ मिलकर बबलू के अनपढ़ होने की पोल खोलने की नई योजना बनाने में लग जाता है। अब वह साम दाम दंड भेद रूपी सभी अस्त्र का उपयोग करने का मन बनाता है।
लाजवाब कहानी, गांव की हकीकत
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद
हटाएंKahani bahut hi Sundar tha Bhagwan ka Aashirwad hai aap per Shukriya sar
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार आपको भी
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