बाबू बिटिया / Babu Bitiya । कहानी । कुमार सरोज ।
बाबू बिटिया
कुमार सरोज
शीला अपने घर के हॉल में सोफे पर बैठी कान में हेडफोन लगाए मोबाइल में कोई वीडियो देख ही रही थी कि तभी डोर बेल बजता है। वह बगल में मोबाइल रख कर आगंतुक को मन ही मन कोसती हुई दरवाजा खोलने के लिए चल पड़ती है।
दरवाजा पर शीला की पड़ोसी और उसकी सबसे खास सहेली मंजू खड़ी थी।
" क्या बात है शीलू अभी घर में एकदम सन्नाटा है ? "
मंजू हॉल में कदम रखते ही शीला से जिसे ही प्यार से वह शीलू कहती थी से पुछ बैठती है ।
" अरे यार अभी मेरी बाबू बिटिया सो रही है। "
" सो रही है ! दोपहर के दो बजे तक। उसका तबियत ठीक है न ? "
" सब ठीक है मंजू। आजकल वह रात भर पढ़ाई करती है इसीलिए दिन में लेट तक सोई रहती है। "
" शीलू तुम बुरा मत मानना। सच में वह पढ़ाई ही करती है या किसी से चैटिंग या बाते करते रहती है। तुमने कभी इसकी खोज खबर ली है ? "
मंजू सोफा पर बैठती हुई मन में उत्पन्न शंका को कह देती है।
" देख तू दुबारा ऐसा मत बोलना। मेरी बाबू बिटिया ऐसी लड़की नहीं है। उसे सीमा की बेटी डॉली मत समझना। जो पढ़ाई के नाम पर नंगे होकर रात भर अपने बॉयफ्रेंड से बात करती थी। "
शीला मंजू को डांटती हुई मगर धीरे से बोली।
" अरे यार तुम तो बुरा मान गई। मैं तो बस जमाने की बात बता रही थी। अच्छा ये सब छोड़ो। तुम ये बताओ कि रात में मेहता जी वाली सीरियल देखी थी की नहीं। देखकर मजा आ गया। देखी वो कैसे अपनी बीबी को बाहर भेजकर अपने घर में ही अपनी गर्लफ्रेंड के साथ रोमांस करने लगा। "
मंजू शीला को गुस्सा में देख झट बात बदलते हुए उसके मन पसंद सीरियल के बारे में पुछ बैठी।
" हां यार। मेहता भी बहुत चालू आदमी निकला ....... । "
फिर क्या था। सीरियल की बात निकलते ही दोनों पैतालीस पार की जवान सखियां सीरियल की कहानी के चक्रव्यूह में ही फंस गई।
शीला की पच्चीस साल की एक बेटी थी शिम्पी। जिसे ही प्यार से वह बाबू बिटिया कहती थी। शीला का मन था कि उसे सबसे पहले लड़का हो। मगर लड़की हो गई। इसलिए वह अपने दिल को तसल्ली देने के लिए बेटी को बाबू बिटिया बुलाने लगी थी। जबकि बाद में एक बेटा भी हुआ था रोहन। जो अभी दिल्ली के एक कॉलेज से बीसीए कर रहा था। रोहन कॉलेज के ही हॉस्टल में रहता था। शिम्पी भी पटना के ही एक महिला कॉलेज से अभी स्नातक पास की थी और सरकारी नौकरी के लिए प्रतियोगी परीक्षाएं की तैयारी घर पर रहकर ही कर रही थी। 4 - 5 बार परीक्षा दी भी थी। मगर अभी तक किसी में उसे सफलता प्राप्त नहीं हुई थी।
शीला के पति श्रीकांत पटना के सचिवालय में ही क्लर्क की नौकरी करते थे। घर में बस यही चार लोग थे।
शीला और मंजू अभी अपने पसंदीदा सीरियल के बारे में ही बाते करने में व्यस्त थी कि श्रीकांत ऑफिस से घर आ जाते हैं। यह उनका किराए का घर था। अपना घर तो गांव में था। जहां परिवार के और बाकि सदस्य रहते थे।
शीला के पति के आते ही मंजू तुरंत अपने घर चली जाती है। सभी पटना के वृदावन कॉलेनी में रहते थे। मंजू के पति भी सचिवलय में ही नौकरी करते थे।
" क्या बात है जी आज चेहरे पर मुस्कान है। नहीं तो रोज तो आप ऑफिस से बुझे बुझे थके परेशान आते थे ? "
शीला अपने पति के चेहरे को देखती हुई पुछ बैठी।
" आज तुम्हारे भईया से बात हुई थी। उनके दोस्त दिनेश बाबू अपने बेटे मयंक की शादी अपनी बेटी शिल्पी से करने के लिए तैयार हो गए हैं। लड़का सुन्दर भी है और आर्मी में नौकरी करता है। "
श्रीकांत एक ही सांस में अपने मन की खुशी को प्रकट कर देते हैं।
" यह तो सच में बहुत खुशी की बात है जी। नहीं तो आजकल सरकारी नौकरी वाला लड़का जल्दी मिलता कहां है ! "
" तुम ठीक कह रही हो शीला। लड़का सरकारी नौकरी वाला मिलता ही कहां है और अगर मिलता भी है तो उसके मां बाप इतना दहेज मांगता है कि हम जैसे मिडिल क्लास वाले इतना दहेज दे ही नहीं सकते हैं। वो तो तुम्हारे भाई साहब का शुक्र है कि यह सब आसानी से और जल्दी फाइनल हो गया। "
" बाबू उठकर अभी बाथरूम गई है जैसे ही निकलती है मैं उसे यह खुशखबरी बता देती हूं। "
" मैं भी फ्रेस हो लेता हूं, तब तक तुम चाय बना दो । "
कहते हुए श्रीकांत एक तरफ चल पड़ते हैं।
शीला भी चेहरे पर प्यारी मुस्कान लिए किचेन की ओर चल पड़ती है। वह अंदर ही अंदर बहुत खुश थी, कयोंकि उसकी बाबू बिटिया को सरकारी नौकरी वाला दुल्हा मिलने वाला था।
श्रीकांत अभी घर के हॉल में बैठे चाय पीते हुए टेलीविजन पर न्यूज देख रहे थे। वो चाय पीकर जैसे ही कप रखते हैं कि शीला वहां गुस्से में आ जाती है। वह गुस्से में खुद ही बहुत बडबडा रही थी।
" क्या हुआ किस पर अपना गुस्सा निकाल रही हो ? "
श्रीकांत पत्नी को गुस्सा में देख झट पुछ बैठते हैं।
" अपनी ही बेटी पर। पता है वह उस लड़के से शादी करने को तैयार नहीं है। "
सुन श्रीकांत भी दंग रह जाते हैं।
" क्यों... ? ऐसा क्या कमी है उस लड़के में । "
" उस लड़के में कमी नहीं है। वह एक दूसरे लड़के से प्यार करती है। वह उसी से शादी करेगी। ऊपर से वह लड़का दूसरे जाति का है। "
" यह तुम क्या कह रही हो ! हमारी शिम्पी ऐसा नहीं कर सकती है। "
टेलीविजन बंद करते हुए श्रीकांत बोले।
मगर शीला झट फिर से टेलीविजन चालू कर देती है। इस बार साउंड भी और बढ़ा देती है, ताकि पड़ोसी दोनों की बाते नहीं सुन सके।
" हम भी यही सोचते थे। मगर हम गलत सोचते थे। वह हम लोगों के सोच से एकदम उल्टा ही निकली। "
" मैं उससे बात करता हूं। "
" नहीं, आप उससे बात नहीं कीजिए। नहीं तो बात और बिगड़ जाएगी। कहीं गुस्से में घर से भाग गई तो हम सब कहीं का नहीं रहेंगे। घर से निकलना दुभर हो जायेगा। "
श्रीकांत अपनी पत्नी की बात सुनकर चाहकर भी अपनी बेटी से बात करने नहीं जाते हैं।
" पता है शिम्पी परीक्षा देने के बहाने उसी लड़के के साथ सिर्फ घूमने जाती थी। तभी तो अभी तक उसका किसी परीक्षा का रिज़ल्ट नहीं निकला। हम दोनों के आंख में अभी तक वह सिर्फ धूल झोंक रही थी। रात भर वह पढ़ाई के बहाने उसी लड़के से ही बात करते रहती है। "
" तुमको ये सब कैसे पता चला ? "
" खुद बोली। और भी बहुत कुछ बोली है। पता नहीं आजकल के लड़कियों को क्या हो गया है। मुझसे ये सब कहते हुए उसे जरा भी शर्म महसूस नहीं हो रही थी। बोली है या तो वह अपने बॉयफ्रेंड से शादी करेगी या फिर जो लड़का एक लाख से ऊपर महीना में कमाता होगा उससे वह शादी करेगी। "
" उसके कहने से हम थोड़े न उसकी शादी करेंगे। एक लाख से ऊपर महीना का इनकम तो सिर्फ़ डॉक्टर और इंजीनियर का ही होगा। और वैसे लड़कों के दहेज़ की मांग चालीस पच्चास लाख से ऊपर ही रहता है। ऐसे में तुमको क्या लगता है हम लोगों की औकात इतना दहेज देने की है। "
" बात तो सही कह रहे हैं आप। मगर अब क्या होगा ? भागने की धमकी दी है। "
शीला उदास बुझी बुझी सोफे पर धम्म से बैठ जाती है।
" दूसरे जात के लड़के से शादी तो हरगिज नहीं कर सकते हैं। खानदान में नाक कट जायेगी। अपनी जात का रहता तो सोचते भी। "
श्रीकांत भी मायूस होकर धीरे से कह कर सोच में डूब जाते हैं।
आज दोनों की बाबू बिटिया ने वह कारनामा कर दिखाया था जिसकी कल्पना किसी ने सपने में भी नहीं किया था।
आखिर इसमें गलती किसकी थी। शिम्पी की या उसके माता पिता की ? आज माता पिता अपने बच्चों की परवरिश से ऐसे दूर रहने लगे हैं जैसे कि कोई बच्चा जन्म लेते ही सब कुछ सीख लेता है। बच्चों की सोच, व्यवहार, उसका बर्ताव सब उसके परवरिश पर ही तो निर्भर करता है। मगर शायद हम ये सब आज भूल गए हैं। बच्चों का बाल मन तो कच्चे धड़े की तरह होता है, जिसे आप जैसे ढालेंगे वह वैसा ही बनेगा। आज जरूरत है अपने बच्चों को समय देने का, उसके साथ मित्रवत व्यवहार करने का। ताकि घर में उसे अकेलापन का अहसास नहीं हो। अकेलापन का शिकार होकर ही आज बच्चे गलत रास्ते पर भटक जा रहे हैं। जब तक उन्हें कोई समझाने वाला पास में नहीं रहेगा तो उन्हें भला अच्छे या बुरे का ज्ञान कैसे होगा। ऐसे में दुसरा आदमी तो उसके भोलेपन का फायदा उठाएगा ही। जैसे शिम्पी के साथ अभी तक उसका प्रेमी करते आ रहा था।
आज शीला और श्रीकांत अपनी बाबू बिटिया के लिए बहुत परेशान हो रहे थे। मगर यह सिर्फ उनके एक घर की कहानी नहीं है। आज ऐसी स्थिति बहुतों घरों में देखने सुनने को मिल जा रही है।
घर की बेटियों को भी अपने परिवार के इज्ज़त का ख्याल रखना चाहिए। हर मां बाप अपने बच्चों का भला ही चाहते हैं। भले उन्हें उनका प्यार बंदिश लगे।
कुमार सरोज
बहुत ही शिक्षा प्रद कहानी
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद
हटाएंबहुत ही उत्तम kahani
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार
हटाएंआज के आधुनिकता की अंधी दौड़ में भाग रहे युवाओं की हकीकत बयां करती कहानी। आप की लिखी हरेक कहानी दिल को छू लेती है।
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार
हटाएंवाह
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद
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