मां / Maa । कविता । कुमार सरोज ।

                           मां 

                              कुमार सरोज 



मां ... 
तू बता मेरा क्या था गुनाह ,
क्यों तुने लावारिस छोड़ दिया ,
यूं सड़कों पर भटकने को मुझे ।

तुम मुझे जैसे भी रखती ,
मैं रह लेती हंसी खुशी ,
कुछ न चाहत रखती तुमसे ।








मैं भूखे पेट भी रह लेती ,
फटे पुराने कपड़े पहन लेती ,
किसी चीज की जिद्द न करती तुमसे ।

मुझे रहने को नहीं चाहिए था घर ,
मैं तुम्हारी फटी आंचल में ही सो लेती,
बस अपने बाहों में लिपटकर तुमसे ।

कम से कम तुम तो नहीं पीटती ,
आज जो पाता है पीट देता है , 
बस एक बूंद ममता चाहिए था तुमसे ।

मरते दम तक यही मलाल रहेगा ,
तुझे देख पाती एक स्पर्श कर पाती , 
और एक रिश्ता जोड़ पाती तुमसे ।

किसी और के साथ ऐसा मत करना ,
अपनी ममता कमजोर मत होने देना ,
मां बस इतनी ही है आरजू तुमसे ।

सवाल तो बहुत है मेरे मन में , 
मगर तेरी भी मजबूरी रही होगी ,
मां इसीलिए शिकवा नहीं है तुमसे । 



                           कुमार सरोज

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