लुकमान चाचा / Lukaman Chacha । कहानी । कुमार सरोज ।

                        लुकमान चाचा 

                              कुमार सरोज 


    
                कंसुआ गांव में जैसे ही एक जीप ने प्रवेश किया कि पहले से ही इन्तजार में खड़े बहुत सारे बच्चे लुकमान चाचा ....  लुकमान चाचा ... चिल्लाते हुए जीप के पीछे पीछे दौड़ने लगे।  
               जीप के ड्राइविंग सीट पर करीब 65 साल का एक बुजुर्ग व्यक्ति बैठा था। वह खुद ही जीप ड्राइव कर रहा था। उस बुजुर्ग व्यक्ति का नाम ही लुकमान खान उर्फ़ लुकमान चाचा था। 
                  एक घर के आगे जीप आकर जैसे ही रुकती है कि पीछे से दौड़ते आ रहे सभी बच्चे भी रुक जाते हैं। सभी की नजरें लुकमान चाचा पर जाकर टिक जाती है। 
            लुकमान चाचा जब भी गांव आते थे तो बच्चों के लिए बहुत सारे चॉकलेट एवं बिस्किट लेकर अपने साथ आते थे। इसीलिए गांव के बच्चे उनके आगमन के पहले से ही उनका बेसब्री से इंतजार करते रहते थे। 
 







              यह कंसुआ गांव लुकमान चाचा के खाला का गांव था। लुकमान चाचा तो खुद दरभंगा शहर में रहते थे। कंसुआ से दरभंगा करीब चालीस किलोमीटर दूर था। 
              लुकमान चाचा के खाला की अब इस दुनिया में कोई नहीं था। खाला के शौहर करीब दस साल पहले ही इंतकाल कर गए थे।
            लुकमान चाचा आज जो भी थे अपनी खाला की वजह से ही थे। उनकी खाला बहुत ही नेक दिल की औरत थी। लुकमान चाचा जब 5 साल के थे तभी उनके अब्बा एवं अम्मी एक दुर्घटना में अल्लाह को प्यारे हो गए थे। तभी से लुकमान की परवरिश एवं पढ़ाई लिखाई उनकी खाला ही करते आ रही थी। पढ़ाई खत्म करते ही लुकमान की दरभंगा में ही एक अच्छी सरकारी नौकरी लग जाती है। तभी से वे वही रहने लगे थे। नौकरी से सेवानिवृत के बाद वे दरभंगा में ही घर बना लिए थे। अब वे अपने पुर परिवार के साथ वही रहते थे। बस हप्ता दस दिन पर अपनी खाला से मिलने कंसुआ गांव आते थे। वे अपनी खाला को बहुत बार अपने साथ दरभंगा रहने को बोले, मगर वह अपने गांव को छोड़ना नहीं चाहती थी। उन्हें अपना गांव और यहां के लोगों से बहुत लगाव था। उनके लिए जाति या मजहब कोई मायने नहीं रखता था। वे होली और ईद पर गांव के सभी बच्चों को नए कपड़े देती थी। गांव के भोले भाले मासूम बच्चे भी खाला की बहुत इज्जत करते थे। ईद के दिन तो गांव के सभी बच्चे भी खाला के साथ ही ईद की नवाज़ पढ़ते थे। बड़ा ही सौहार्द एवं मधुर संबंध था खाला का सभी के साथ। 
                   वही लुकमान चाचा की खाला अब पिछले एक महीने से बीमार थी, उसी की देख भाल करने के लिए लुकमान चाचा अपनी खाला के यहां ही पिछले एक महीने से रह रहे थे। वो अचानक कल सुबह में ही अपनी बीमार खाला को छोड़कर दरभंगा चले गए थे, जो अभी गांव आ रहे थे।
               लुकमान चाचा का चेहरा अभी पता नहीं क्यों बुझा बुझा सा दिख रहा था। जबकि वो तो इस उम्र में भी बच्चों के जैसे ही हमेशा उछलते कूदते रहते थे। 
              लुकमान चाचा जब अपनी जीप से बाहर निकलते हैं तो उनका खाली हाथ देखकर सभी बच्चे उदास हो जाते हैं। लुकमान चाचा भी बच्चों की उदासी भांप लेते हैं। जिंदगी में आज पहली बार लुकमान चाचा अपनी खाला के गांव खाली हाथ आए थे। आज वो बच्चों के लिए कुछ नहीं लाए थे। ऐसा आज तक इससे पहले कभी नहीं हुआ था। आखिर लुकमान चाचा से आज ऐसी भूल कैसे हो गई थी ! 
                गांव के बाल मंडली का बबलू और लाड़ला प्रमुख था। लुकमान चाचा जब सभी बच्चों को देखते हैं तो उन्हें भी यह अहसास हो जाता है कि वे आज पहली बार बच्चों के लिए कुछ नहीं लाए। वे झट अपने पॉकेट से दो सौ रुपए का एक नोट निकालकर बबलू को देते हैं। पैसा बबलू को मिलते देख बच्चों के मुरझाए चेहरे पर ख़ुशी नाच उठती है।

              पैसा मिलते ही सभी बच्चे गांव के इकलौते मंगल चाचा के दुकान की ओर खुशी का इज़हार करते हुए दौड़ पड़ते हैं। 
             बच्चों को जाते ही लुकमान चाचा भी अपनी खाला की घर के अंदर चल पड़ते हैं। पता नहीं क्यों अभी भी उनके चेहरे पर मायूसी एवं उदासी के गहरे भाव छाए हुए थे। वे चाहकर भी चेहरे पर मुस्कान नहीं ला पा रहे थे। आख़िर लुकमान चाचा के दिलों दिमाग में अभी ऐसा क्या तूफान मचल रहा था कि उन्हें अंदर ही अंदर बहुत परेशान किए हुए था। 
            और उसी रात लुकमान चाचा के खाला की इंतकाल हो जाती है। पुरे कंसुआ गांव में मातमी सन्नाटा छा जाता है।
                क्या हिंदू क्या मुसलमान सभी मरहूम खाला की मैयत में शामिल होते हैं। 
              बबलू और लाड़ला का बाल मंडली भी खाला के जाने से गमगीन हो जाता है। सबों की एक प्यारा बुजुर्ग साथी छोड़कर सदा के लिए उन लोगों से बहुत दूर चली गई थी। 
                अभी गांव वाले खाला के जाने के सदमे से उबरे भी नहीं थे कि उसी दिन शाम में अचानक गांव में पुलिस आ जाती है और लुकमान चाचा को पकड़कर अपने साथ लेकर चली जाती है। लुकमान चाचा पर अपने ही बेटे के खून करने का इल्जाम था। 
              गांव वाले सुनते ही शन रह जाते हैं। किसी को बरवस विश्वास ही नहीं हो रहा था कि लुकमान चाचा जैसे नेकदिल इंसान भी किसी का खून कर सकते हैं। जबकि यहां तो उन पर अपने ही बेटा के कत्ल का इल्ज़ाम लगा था। 
               पुरे गांव में उस रात सिर्फ लुकमान चाचा की ही चर्चा होते रहती है। 
            बाल मंडली भी पहले खाला के गुजर जाने और अब लुकमान चाचा के अचानक पुलिस द्वारा पकड़कर ले जाने के कारण अचंभित एवं शोकाकुल थी। किसी को पुलिस की बातों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था, कि लुकमान चाचा जैसे इंसान ने मर्डर किया था, और वो भी अपने ही बेटे का। 
                   सभी गांव वाले सच्चाई जानने के लिए उतावले हो रहे थे। आखिर लुकमान चाचा ने बेटे का कत्ल किया था तो क्यों ? आखिर उनके जैसे इंसानियत एवं ईमान के रहनुमा को खून करने की क्यों जरूरत आन पड़ी थी ? 
             किसी तरह गांव वाले बैचैनी में उस रात काटते हैं। और अगली ही सुबह बबलू और लाड़ला को लेकर गांव के कुछ लोग लुकमान चाचा से मिलने थाना की ओर चल पड़ते हैं।
                लुकमान चाचा को अभी थाना में ही रखा गया था। आज दोपहर में पुलिस कोर्ट में पेश करने वाली थी। बबलू और लाड़ला को लुकमान चाचा बहुत मानते थे। इसीलिए गांव वालों ने दोनों को साथ ले लिया था। 
                    उधर लुकमान चाचा थाने के एक कमरे में अपने दोनों पैरों के बीच में सिर झुकाए कोने में बैठे थे। यह कमरा थाना का लॉकअप था। 
                 लुकमान चाचा अभी वैसे ही बैठे ही थे कि उन्हें एक आवाज सुनाई देती है - 

 " लुकमान चाचा ... । " 

     यह बबलू की आवाज थी। 

         वे पहले की मुद्रा में ही बैठे रहते हैं कि तभी फिर से एक साथ दो आवाज उभरती है - 

 " लुकमान चाचा ....... । "

              इस बार आवाज सुनकर वे धीरे से अपना सिर ऊपर करते हैं। सामने बबलू और लाड़ला को अकेले देखकर चौंक जाते हैं। गांव वाले अभी वहां पर नहीं थे। 

" तुम दोनों यहां क्यों आए हो, और वो भी अकेले ?  " 

             लुकमान चाचा दोनों के पास आकर धीरे से बोलते हैं। 

 " चाचा आपने अपने ही बेटा का खून क्यों किया ?  " 

    बबलू लुकमान चाचा के चुप होते ही एक ही सांस में पुछ बैठा। 

                जवाब में लुकमान चाचा सिर्फ कमरे की छत को निहारने लगे। 
       
             लाड़ला और बबलू के मुख से सिर्फ यही प्रश्न बार बार निकल रहा था। 

            और अंततः लुकमान चाचा एक लंबी सांस लेते एवं अपने धीर गंभीर चेहरे पर सकुन का भाव लाते हुए दोनों को पुरी कहानी जो हकीकत में थी बताने लगते हैं। 

            लुकमान चाचा का दो बेटा और एक बेटी थी। सबसे बड़े बेटे जमाल की शादी हो गई थी, और वह अभी अपनी पत्नी रूबी के साथ पटना में रहता था। वह वही एक कंपनी में जॉब करता था। लुकमान चाचा की बेटी फरजाना की अभी शादी नहीं हुई थी। वह साथ में ही दरभंगा रहती थी। सबसे छोटा बेटा सद्दाम था। जो दरभंगा कॉलेज से ही स्नातक कर रहा था। वह भी अपने अब्बा के साथ ही घर पर रहता था। लुकमान चाचा की पत्नी 8 साल पहले ही मर गई थी। 
             लुकमान चाचा के एक बहुत ही जिगरी दोस्त थे यमुना सिंह। दोनों की दोस्ती एक ही ऑफिस में साथ काम करने की वजह से हो गई थी। दोनों के पसंद एवं विचार एक जैसे ही थे जिसके कारण ही दोस्ती बहुत गहरी हो गई थी। संजोग से दोनों का रिटायरमेंट भी एक ही तिथि को था। लोग लुकमान और यमुना की दोस्ती की मिशाल दिया करते थे। छुट्टी के दिन जो जिसके घर पहले पहुंचता था, उसी के यहां दिन भर शतरंज की विसात बिछ जाती थी। शतरंज के साथ ही नाश्ता, खाना, चाय, शरबत का दौर दिन भर चलता रहता। जब सोने का वक्त हो जाता तो एक के घर की वापसी होती थी। मगर रात के कारण घर जो छोड़ने जाता था, वह भी उसी के यहां सो जाता था। दोनों के घर में सिर्फ एक किलोमीटर का ही फासला था।

               यमुना सिंह के परिवार में उनकी पत्नी शीला एक बेटा महेश उसकी पत्नी बबीता और एक बेटी थी ममता। महेश घर के पास ही एक रेडिमेड कपड़े का दूकान चलाता था। ममता अभी पास के ही एक कॉलेज में पढ़ रही थी। वह आस पास के बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाती थी। 
          दोनों का परिवार दो जाति धर्म का भले था, फिर भी दोनों में बहुत पटती थी। कभी किसी को लगता ही नहीं था कि दोनों का परिवार दो अलग अलग जाति धर्म को मानने वाला है। दोनों का परिवार एक साथ ही सभी पर्व त्योहार मनाते थे। 
            इधर समय के साथ आजकल के युवाओं की सोच और संस्कार में बहुत तेज़ी से परिवर्तन होते जा रहा था। लुकमान और यमुना के जमाने वाला शायद अब समय नहीं रहा था। तभी तो विश्वास का गला घोंटकर लुकमान चाचा का छोटा बेटा सद्दाम यमुना चाचा की बेटी ममता का एक दिन अपने ही घर में इज्जत लूट लेता है।
             एक दिन यमुना लुकमान के घर अपने यहां का बना खीर सद्दाम और फरजाना के लिए ममता के हाथों भिजवाते हैं। उस समय लुकमान कंसुआ गांव ही अपनी खाला की देख भाल के लिए गए हुए थे। उस दिन फरजाना भी घर पर नहीं थी। सद्दाम घर में अकेला था। तभी ममता अपने पिता के कहने पर लुकमान चाचा के घर खीर पहुंचाने आ जाती है। इससे पहले भी वह बहुतों बार कुछ न कुछ घर का बना चीज या सामान देने सद्दाम के घर आई थी। मगर उस दिन पता नहीं सद्दाम के मन में क्या चल रहा था वह ममता की इज्जत को तार तार कर देता है। 
               ममता घर आकर पंखा से लटककर अपनी जान दे देती है। शायद ममता को अपने पिता और चाचा की दोस्ती पर पुरा विश्वास था, जी आज चकनाचूर हो गया था। 

              उसी दिन यमुना लुकमान को अपने घर कंसुआ से तुरन्त बुलाते हैं। लुकमान अपने दोस्त के बुलावे पर अपनी बीमार खाला को छोड़कर तुरंत दरभंगा चले आते हैं। 
               जैसे ही लुकमान को अपने दोस्त से सद्दाम के बारे में सारी बातों की जानकारी मिलती है, तो सुनकर उनके पैर तले की जमीन खिसक जाती है। किसी ने सपने में भी ऐसा नहीं सोचा था। इतना घनिष्ठ परिवार में आखिर कोई ऐसा काम कैसे कर सकता था ! 
                 सुनते ही लुकमान चाचा गुस्से में सद्दाम को भी उसी तरह पंखे से लटकाकर जान से मार डालते हैं जैसे ममता मरी थी।
              लुकमान जैसे ईमान के सच्चे मुसलमान ने एक बेटे को नहीं बल्कि एक बलात्कारी को सजा देने में जरा भी देर नहीं किया था। 
               लुकमान चाचा अपने आप को स्वयं पुलिस के हवाले करना चाहते थे, मगर खाला की तबियत ज्यादा खराब रहने की वजह से उस दिन नहीं कर पाते हैं। 
           लुकमान चाचा अन्दर ही अन्दर झुलसते हुए फिर से कंसुआ गांव आ जाते हैं। उसी दिन लुकमान चाचा पहली बार गांव के बच्चों के लिए कुछ नही ले कर गए थे। 
             अपने बेटे को जान से मारने के बाद जब लुकमान चाचा गांव जाते हैं, तो उनकी खाला उसी रात मर जाती है। और फिर अगले ही दिन पुलिस भी गांव खुद आ जाती है। 

            लुकमान चाचा की पुरी बात सुनकर बबलू और लाड़ला उनके ऊपर गर्व महसूस करने लगता है। आज एक दोस्त ने अपनी दोस्ती और बाप का फर्ज अदा किया था। 

         जब गांव वालों को सच्चाई का पता चलता है, तो उन लोगों के दिलों में भी लुकमान चाचा के प्रति और प्यार उमड़ उठता है। सभी के हाथ खुद ही दुआओं के लिए उठ जाते हैं। 
               काश ! आज सभी बलात्कारी के बाप लुकमान चाचा के जैसे ही होते। 


                              कुमार सरोज 

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