हुकूम मेरे आका / Hukoom Mere Aaka । कहानी । कुमार सरोज ।
यह कहानी नेहाल, मयंक, विवेक, और गौरव नाम के चार ऐसे दिलेर नौजवानों की है, जो भारत के चार विभिन्न शहरों में तो रहते थे, मगर सभी के मन में कुछ अलग करने की मंशा हिलौरें मार रही थी। लेकिन सभी के सामने गरीबी, परिवार की बंदिशे या फिर आस पास का माहौल रोड़ा बनकर बार बार खड़ा हो जा रहा था। चारों ने भी हर हाल में अपनी मंजिल को पाने की जिद्द मन ही मन ठान लिया था।
नेहाल बिहार के किशनगंज में रहता था। उसके अब्बा सरफराज आलम एवं अम्मी रजिया खातून अपने बेटे को पढ़ा लिखा कर कोई अच्छा सरकारी नौकरी करवाना चाहते थे। जबकि नेहाल का मन पढ़ाई लिखाई में कम और डांस में ज्यादा लगता था। यही कारण था कि उसकी अपने अब्बा अम्मी से नहीं पटती थी।
मयंक बिहार के ही पटना शहर में रहता था। उसके पिता सतेन्द्र सिंह एवं सौतेली मां रंजना भी उसे पढ़ा लिखा कर सरकारी नौकरी ही करवाना चाहते थे, मगर उसे नेतागिरी एवं समाज सेवा में ज्यादा मन लगता था। वह कॉलेज नहीं जाकर किसी न किसी धरना प्रदर्शन में प्रतिदिन शामिल हो जाता था। वह अपने चहेते नेता का ही पूजा करता था। वह उन्हीं के जैसा बनना भी चाहता था। इसी कारण से मयंक की भी अपने माता पिता से नहीं बनती थी।
तीसरा विवेक उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिला के एक गांव में रहता था। उसके पिता एक गरीब किसान थे। उसकी मां बचपन में ही मर गई थी। पिता ही अब उसके लिए सब कुछ थे। उसके पिता उसे पढ़ाने के लिए बैंक एवं सूदखोरो से कर्ज लेकर खेती करते थे, ताकि उसके बेटा के पढ़ाई में कोई दिक्कत नहीं आए। वे अपने बेटा को इंजीनियर बनाना चाहते थे। विवेक भी मन लगाकर पढ़ाई करता था। वह भी अपने पिता के अरमानों को हर हाल में पुरा करना चाहता था।
वही चौथा गौरव मणिपुर राज्य के शिलौंग शहर का रहने वाला था। उसके पिता दीपक एक बिजनेस मैन थे। मां ऐना हाउस वाइफ थी। गौरव को उसके पिता अपने साथ ही कारोबार में लाना चाहते थे, जबकि वह डॉक्टर बनना चाहता था। इसी वजह से बाप बेटे में नहीं पटती थी।
सभी का समय बस किसी तरह बीत रहा था। सभी अपने अपने मंजिल को किसी भी कीमत पर पाने का ख्वाब दिन रात देखने में लगे हुए थे।
विवेक के गरीब किसान पिता हिम्मत करके अपने बेटे को आगे की पढ़ाई करने के लिए दिल्ली भेजने की योजना बनाते हैं।
उधर नेहाल भी घर से ऊब कर मुम्बई भागने की मन ही मन योजना बना लेता है।
मयंक भी अपने चहेते नेता से मिलने एवं वैसा ही बनने का मन में सपना संजोए घर छोड़कर दिल्ली जाने का दृढ़ निश्चय कर लेता है।
उधर डॉक्टर बनने का ख्वाब पाले गौरव भी थक हार कर अपने घर से भागकर दिल्ली जाने की योजना बना लेता है।
मयंक, गौरव दिल्ली जाने वाली ट्रेन में, तो नेहाल भी जल्दबाजी में गलती से मुम्बई के जगह पर दिल्ली जाने वाली ट्रेन में बिना टिकट के ही चढ़ जाता है।
संयोग से सभी एक ही दिन घर से भगाते हैं।
जौनपुर से विवेक भी उसी दिन आगे की पढ़ाई करने के लिए दिल्ली जाने के लिए ट्रेन में चढ़ता है।
विवेक के पास पास टिकट तो था, मगर दिल्ली स्टेशन पर उतरते समय कोई उसका पॉकेट मार लेता है। पर्स में ही उसका टिकट और पैसा भी था।
संयोग से चारों को दिल्ली स्टेशन पर टी टी पकड़ लेता है, और सभी को एक ही हाजत में बंद कर देता है।
इन चारों की पहली मुलाकात बिना टिकट के पकड़े जाने पर दिल्ली स्टेशन के हाजत रूम में ही होती है।
किसी के पास फाइन देने के लिए पैसे तो था ही नहीं, इसीलिए सभी को 24 घंटे के लिए हाजत में बंद कर दिया जाता है।
रात में सभी हाजत में बंद अपनी अपनी कहानी एक दूसरे को बताते हैं। सभी एक दूसरे की कहानी सुनकर इतने प्रभावित होते हैं कि सभी एक ही रात में अच्छे दोस्त बन जाते हैं।
अगले दिन शाम में सभी को हाजत से छोड़ दिया जाता है।
गौरव के अलावा किसी के पास कोई सामान भी नहीं था। सभी तो दोस्त से मिलने को बोलकर बिना कोई सामान के ही घर से भाग आए थे। पास में कुछ पैसा भी था तो उसे टी टी ही स्टेशन पर ले लिया था।
सभी दिल्ली रेलवे स्टेशन के बाहर सड़क किनारे खड़े होकर आगे अब क्या करना है यही आपस में सोच विचार कर ही रहे थे कि तभी वहां पर एक प्रचार गाड़ी आकर रूकती है। गाड़ी में उस समय एक बहुत ही फेमस फिल्मी गाना बज रहा था।
बेचारा भोला भाला नेहाल गाना सुनते ही अपनी सारी टेंशन को भुलाकर उस फिल्मी गाने पर सड़क किनारे ही डांस करने लगता है।
अभी वह अपनी धुन में नाचते ही रहता है कि वहां से गुजरती हुई एक गाड़ी अचानक उसे देखकर रुक जाती है।
उस गाड़ी में से परमीत नाम का एक आदमी बाहर निकलता है। वह एक डांस ग्रुप चलाता था। उसके डांस ग्रुप के मैन डांसर का आज ही एक्सीडेंट हो गया था। वह अभी कोई दुसरा डांसर के खोज में ही अपने ऑफ़िस से निकला था। उसे आज रात में ही एक इवेंट में किसी भी हालत में डांस शो करवाना था।
परमीत नेहाल को तुरंत अपने साथ चलने को कहता है। नेहाल साथ चलने को तैयार तो हो जाता है, मगर वह अपने साथ गौरव, मयंक और विवेक को भी ले चलने को कहता है। परमीत को एक डांसर की सख्त जरूरत थी इसीलिए वह तुरंत तैयार हो जाता है।
सभी परमीत के साथ ही एक तरफ चल पड़ते हैं।
नेहाल को परमीत के उस रात के शो से 10 हजार रूपए मिलता है। वह उसी पैसे से रहने के लिए एक फ्लैट किराए पर ले लेता है।
सभी उसी फ्लैट में एक साथ ही रहने लगते हैं।
नेहाल को परमीत अब अपने हर शो में डांस करने के लिए बुलाने लगता है।
परमीत के ग्रुप में रूबी नाम की एक लड़की भी डांस करती थी। कुछ ही दिनों में नेहाल और रूबी अच्छे दोस्त हो जाते हैं।
गौरव मेडिकल कॉलेज में एडमिशन लेना चाहता था, मगर उसके पास पैसे नहीं थे। एक दिन वह नहीं चाहते हुए भी अपने पिता को कॉल करके सारी बात बता देता है। पहले तो उसके पिता उसे बहुत भला बुरा कहते हैं, मगर अंत में बेटे के मोह में पड़कर वो उसे पैसा भेजने को राजी हो जाते हैं।
विवेक तो पैसा के लिए अब अपने गरीब पिता को कॉल भी नहीं कर सकता था, क्योंकि वह जानता था कि पहली बार ही उसके पिता बहुत कोशिश करके पैसा व्यवस्था कर पाए थे।
विवेक की घरेलू परेशानी को देखते हुए नेहाल और गौरव किसी तरह उसके लिए पैसे की व्यवस्था करके उसका एडमिशन जेएनयू में करा देता है।
मयंक को तो नेतागिरी का शौक था ही इसीलिए वह भी जेएनयू के एक छात्र संगठन में शामिल हो जाता है। कुछ ही दिनों में वह जेएनयू का फेमस स्टूडेंट्स लीडर हो जाता है।
सभी अपने अपने मंजिल की ओर मजबूती से बढ़ने लगते हैं। सभी आपस में बहुत खुश थे।
समय बीतता रहता है। इसी बीच नेहाल रूबी के साथ मिलकर खुद का अपना डांस ग्रुप खोल लेता है। उसकी आमदनी भी अब अच्छी होने लगी थी।
अभी भी सभी एक ही फ्लैट में रह रहे थे। सभी साथ मिलकर ही सारे पर्व त्योहर भी मनाते थे।
गौरव का भी अब मेडिकल की पढ़ाई का एक साल ही और बचा था।
विवेक भी इंजीनियरिंग के फाइनल ईयर में पहुंच गया था। मगर पिछले साल से ही खेती में ऊपज अच्छी नहीं हो रही थी जिसके कारण उसे पैसे की तंगी हो गई थी। उसे कॉलेज का फीस भी जमा करना था। मगर उसके पास पैसा नहीं था, जिसके कारण ही उसे चिंता सताने लगी थी। वह अपने पिता को पैसे के लिए भी नहीं बोल सकता था, क्योंकि घर में दो साल से फसल नहीं होने के कारण खाने पर भी आफत आया हुआ था।
तभी नेहाल को डांस के एक बड़े शो का कांटेक्ट मिलता है। उससे जो पैसा मिलने वाला था, उसी से वह विवेक का फॉर्म भरने के लिए पैसा देने को भी सोच लेता है। अभी तक वही तो जरुरत पड़ने पर विवेक की मदद करते आ रहा था।
गौरव के साथ ही मेडिकल कॉलेज में दिल्ली के एक मंत्री श्रीधर सहाय का बेटा मोहित भी पढ़ता था। वह हमेशा गौरव के कामयाबी से जलते रहता था। वह उसी के कारण कभी कॉलेज में टॉप नहीं किया था।
मोहित फाइनल एग्जाम होने के कारण इस साल हर हाल में टॉप करना चाह रहा था। इसीलिए वह एग्जाम से पहले ही गौरव को किडनैप करवाने की योजना बनाता है, ताकि वह एग्जाम ही नहीं दे सके।
और एक्जाम के ठीक एक दिन पहले गौरव को मोहित और उसके आदमी किडनैप जैसे ही करना चाहते हैं कि गौरव बचकर एक तरफ भाग खड़ा होता है, मगर भगाते समय एक गाड़ी के नीचे आकर वह मर जाता है।
ठीक उसी दिन दिल्ली के तिहाड़ जेल से दो आतंकवादी भागने में सफल हो जाते हैं।
पुलिस इंस्पेक्टर भावेश आतंकवादी को पकड़ने के लिए जी जान से लग जाता है। उसके लिए आतंकवादी को पकड़ना करो या मरो जैसा था।
उसी रात नेहाल और रूबी का वह शो भी था, जिससे उसे अच्छा पैसा मिलने वाला था। उसी पैसे से नेहाल विवेक का कॉलेज फीस जमा करना वाला भी था।
मगर नियती को तो कुछ और ही मंजूर था। नेहाल शो के बाद अपनी मारुति वैन से रूबी के साथ फ्लैट पर लौट रहा था, तभी पुलिस झूठी वाहवाही के लिए नेहाल को ही आतंकवादी समझकर उसके वैन के उपर फायरिंग कर देती है। पुलिस फायरिंग में किसी तरह नेहाल तो बच जाता है, मगर रूबी मारी जाती है।
पुलिस इंस्पेक्टर भावेश को जब अपनी गलती का अहसास होता है तो वह अपने आप को बचाने के लिए उल्टे नेहाल के म्यूजिकल इंस्ट्रुमेट के जगह पर बंदूक और गोला बारूद रखकर उसे ही आतंकवादी बताकर गिरफ्तार कर लेता है।
उधर फ्लैट पर विवेक और मयंक बैठा नेहाल का इंतजार कर रहा था। आज विवेक बहुत खुश था, क्योंकि कल उसके कॉलेज का पुरा फीस जमा हो जाने वाला था। उसके पिता भी गांव से कुछ पैसा भेजने को बोले थे।
ठीक उसी रात जौनपुर में विवेक के गरीब पिता अपने बेटे के लिए पैसे की व्यवस्था नहीं कर पाने के बोझ तले दबकर आत्महत्या कर लेते हैं। उनसे अपने बेटे के फीस के लिए पैसे की व्यवस्था नहीं हो पाई थी। उपर से कर्जदार एवं बैंक वाले भी उसपर रोज पैसा लौटने के लिए दबाव बनाये हुए थे। शायद इन्हीं सब से तंग आकर विवेक के पिता ने आत्महत्या कर लिया था।
इधर इन सब बातों से बेखबर विवेक और मयंक बैठा नेहाल के फ्लैट पर उसका इंतजार कर ही रहा था कि पहले गौरव के एक्सीडेंट में मरने, उसके बाद रूबी की पुलिस एनकाउंटर में मारे जाने एवं उसके बाद विवेक के पिता के आत्महत्या करने का एक के बाद एक लगातार तीन बुरी खबर मिलती है।
दोनों अचानक आए इस मुसीबत के बारे में सोचते हुए अभी कुछ करना ही चाह रहे थे कि वहां पुलिस आ जाती है।
पुलिस नेहाल जो अब पुलिस के नजर में आतंकवादी था, को सहयोग करने के जुर्म में दोनों को गिरफ्तार करने आई थी।
दोनों अपने आप को एवं नेहाल को निर्दोष साबित करने की लाख कोशिश करते हैं मगर पुलिस किसी की एक नहीं सुनती है। दोनों को भी जेल में बंद कर दिया जाता है।
वैसे भी भला उन दोनों के बात को वहां सुनता भी कौन ? यह सारा काम तो सोची समझी साजिश के तहत ही किया जा रहा था। पुलिस तो सिर्फ अपने आका के हुक्म को आंख बंद किए कर रही थी।
क्या सच में आज पुलिस राजनेताओं और पूंजीपतियों की गुलाम बनकर रह गई है। जो बेगुनाह युवकों को यूं झूट मूठ के केस में फंसा रही थी। अपने आका के हुक्म को बिना सोचे समझे गुलाम की तरह चंद पैसों की खातिर मानने को मजबूर थी।
इंस्पेक्टर भावेश दिल्ली के पुलिस कमिश्नर का दामाद था। भावेश से जो अंजाने में गलती से नेहाल की गर्लफ्रैड रूबी का मर्डर हो गया था, उसी पर पर्दा डालने एवं अपने आप को बचाने के लिए ही वह नेहाल को आतंकवादी सिद्ध करने में लगा हुआ था।
उधर गौरव के मर्डर में मोहित का नाम नही आए इसके लिए उसके मंत्री पिता का पुलिस कमिश्नर पर भी दवाब था।
मंत्री का बेटा मोहित जनता था कि चारों आपस में अच्छे दोस्त थे। इसीलिए उसी के कहने पर इंस्पेक्टर भावेश गौरव और नेहाल को आतंकवादी दिखाकर एवं विवेक और मयंक को दोनों का सहयोग करने के जुर्म में फंसाना चाहता था। आज के भ्रष्ट तंत्र ने एक ही तीर से सभी जगह निशाना लगाया था।
पुलिस की झूठी कहानी एवं दलील में सभी पुरी तरह से फंस चुके थे। सभी का देखा सपना एक ही पल में चकनाचूर हो गया था।
चुंकि मयंक छात्र नेता था, इसीलिए उसे जेल जाते ही उसके छात्र संगठन के बहुत सारे लड़के लड़कियां सभी के बेगुनाही एवं पुलिस के झूठे दलील को लेकर प्रदर्शन शुरु कर देते हैं।
मगर मंत्री एवं पुलिस कमिश्नर के दबाव के कारण सरकार भी कुछ नहीं कर पाती है। सिर्फ खानापूर्ति करने एवं प्रदर्शन को बंद कराने के लिए एक दिखावे के लिए जांच कमिटी का गठन कर दिया जाता है।
आखिर नेताओं के झूठे अहंकार और मनमर्जी के आगे कब तक हमारा प्रशासन यूं आंख बंद किए चिराग के गुलाम की तरह अपना सिर झुकाए हुकूम मेरे आका कहती रहेगी, और कब तक यूं बेबस लाचार बेरोजगार नौजवानों का शोषण करती रहेगी।
कुमार सरोज
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