बेटी बोझ नहीं लक्ष्मी होती है / Beti Bojh Nahin Lakshami Hoti hai । कहानी । कुमार सरोज ।
बेटी बोझ नहीं लक्ष्मी होती है
कुमार सरोज
मैं अभी हजारीबाग के सरकारी अस्पताल के बड़े से कमरे में लोहे के एक बेड पर लेटी थी। उस कमरे में और भी दूसरे मरीज थे। सुबह हो गई थी, मगर फिर भी पता नहीं क्यों मुझे आज उठने का मन नहीं कर रहा था। मैं पिछले पांच दिनों से इसी अस्पताल में भर्ती थी। दो दिनों तक तो मैं बेहोशी की हालत में ही थी, मगर अब स्वयं उठकर बैठ लेती थी। डॉक्टर मैडम अभी कुछ दिन और अस्पताल में ही रहने को बोली थी, इसीलिए मैं अभी यही थी। यहां की डॉक्टर मैडम डॉक्टर नहीं सच में भगवान का दुसरा रूप थी। शायद आज मैं डॉक्टर मैडम के कारण ही जिंदा थी। उन्हें ही मैं सड़क किनारे बेहोशी की हालत में मिली थी। मैं दूसरे के घरों में जा जाकर झाड़ू पोछा और बर्तन मांजने का काम करती हूं। उस दिन मैं अपने एक साहब के यहां से उनके घर का काम खत्म करके दुसरे साहब के यहां जा रही थी कि रास्ते में ही मैं अचानक गिरकर बेहोश हो गई। दो दिन बाद जब मुझे होश आया तो मैं अपने आप को इस अस्पताल के बैड पर लेटी पाई थी। पुछने पर हमारे बगल वाले बेड की महिला मरीज ने ही बताई थी कि डॉक्टर ज्योति मैडम ने ही मुझे सड़क किनारे से बेहोशी के हालत में उठाकर यहां लाकर इस अस्पताल में भर्ती करवाई थी। वो पेशे से डॉक्टर थी ही इसीलिए वही मेरा ईलाज भी कर रही थी। डॉक्टर मैडम अभी थी तो पच्चीस साल की ही, मगर वह अपना काम बहुत ही ईमानदारी, लगन एवं निष्ठा से करती थी।
मैं अभी अस्पताल के बेड पर लेटी सोच में डूबी हुई ही थी कि तभी कमरे में एक नवजात शिशु की किलकारी गूंज उठी। शिशु की किलकारी सुनकर मेरी तंद्रा भंग हो गई। पता नहीं क्यों उस बच्चे की किलकारी सुनकर मेरे पूरे बदन में एक अजीब सी सिरहन दौड़ने लगी। जिन्दगी के अंतिम पड़ाव पर थी मैं, फिर भी उस शिशु के किलकारी को सुनकर मुझे ऐसा लगने लगा जैसे वह मेरा ही बच्चा हो और मेरे ही बगल में लेटा वह इस धरा पर अपने पहले कदम रखने की खुशी में अपने मधुर ध्वनि से हमें आनंदित कर रहा था।
अपने दिलों दिमाग में उठ रहे मातृत्व के सुखद अनुभूति के साथ बहकर मैं भी पता नहीं कैसे अपनी छब्बीस साल पुरानी यादों के भंवर में डूबती चली गई।
मैं झारखंड राज्य के चतरा जिला में एक छोटे से गांव उरांव बस्ती में रहती थी। मेरा परिवार बहुत गरीब था। मेरे माता पिता किसी दिन अगर काम नहीं करते थे तो उस रात हमें भुखे पेट ही सिर्फ पानी पीकर सोना पड़ता था। पांच भाई बहनों में मैं अपने माता पिता की सबसे छोटी संतान थी। फिर भी बड़े ही लाड प्यार से मेरे माता पिता ने मेरा नाम चंदा रखा था। अशिक्षा और गरीबी के कारण मेरे माता पिता ने मेरी शादी 12 साल की उम्र में ही पास के ही एक गांव टुड्डू में दयाल बैठा से कर देते हैं। दयाल भी मेरे परिवार जैसा ही गरीब था। फिर भी वह जो कमाता था उसका अधिकांश पैसा दारू पीने में ही बर्बाद कर देता था। मैं जब कभी उसे पीने से मना करती तो वह उल्टे हमें ही मारने लगता था। पीना और पीकर मारना उसका रोज का धंधा बन गया था। इसी बीच में गर्भवती हो गई। दयाल को हर हाल में बेटा ही चाहिए था। आज तक उसके खानदान में कोई औरत लड़की जन्म नहीं दी थी। इसके लिए वह भी अब हमें रोज धमकी देने लगा था। ' बेटा हुआ तो ठीक है, नहीं तो अगर बेटी हुई तो उसे तुरंत जान से मार देना नहीं तो मैं उसे मार दूंगा। ' डर के कारण मैं भी भगवान से बेटा के लिए ही दुआएं मांगने लगी थी। मगर हम गरीब की भगवान भी कहां सुनते हैं ? मुझे बेटी ही हुई। मेरा पति अपनी कथनी को मेरे लाख रोने गिड़गिड़ाने के बाबजूद भी पुरा कर ही लेता है। वह दारू पीकर पहले मुझे बहुत मारा पीटा उसके बाद मेरे द्वारा जन्म दी हुई उस दूधमुंही बच्ची को भी मेरे ही सामने गला दबा कर मार दिया। मैं लाचार अभागन मां कुछ न कर सकी।
" कैसी हो चाची ? "
मैं अभी अपने ख्यालों में खोई ही थी कि किसी की आवाज सुनकर मेरी तंद्रा फिर भंग हो गई। मेरी आंखे नम हो गईं थी। मैं जब आवाज के दिशा में देखी तो सामने डॉक्टर मैडम खड़ी थी।
" चाची तुम आज अभी तक सोई हो। क्या हुआ तबियत ठीक है न ? "
डॉक्टर मैडम को सामने देख मैं झट से उठ बैठी।
" हां, अब मैं ठीक हूं। बस मुझे घर जाने दो मैडम। "
" मुझे तुम्हारे बारे में सब पता है। तुम घर जाते ही फिर से अपना बाई वाला काम शुरु कर दोगी। और फिर तुम तुरंत बीमार होकर सड़क किनारे गिर जाओगी। वो तो मैंने देख लिया था नहीं तो तुम मर जाती। इसीलिए अभी कुछ दिन और अस्पताल में ही रहो। "
" सच में तुम डॉक्टर नहीं भगवान हो मैडम। काश सभी डॉक्टर ऐसे ही होते । "
" चाची हाथ की पांचों उंगलियां बराबर है क्या ? नहीं न। फिर सभी इंसान बराबर या एक जैसे कैसे हो सकते हैं। तुम काम भले दाई की करती हो मगर दिमाग बहुत चलता है तुम्हारा। जाओ जल्दी से फ्रेस होकर नाश्ता करके दवा खा लो। मैं तब तक और दूसरे मरीज को देखकर आती हूं। "
कहती हुई डॉक्टर ज्योति उस कमरे से बाहर चली जाती है। ज्योति हजारीबाग के इस सरकारी अस्पताल में ही डॉक्टर थी। उसने एक साल पहले ही डॉक्टर की नौकरी ज्वॉइन की थी।
पता नहीं क्यों आज चंदा जाती हुई डॉक्टर ज्योति को अपलक देख रही थी। उसे देखकर उसके मन में बार बार एक ही ख्याल आ रहा था कि ' आज अगर उसकी बेटी भी जिंदा होती तो इतनी ही बडी होती। '
चंदा बेड से उठकर फ्रेस होने के लिए बाहर की ओर चल देती है।
चंदा फ्रेस होकर एवं नाश्ता करके बाहर से कमरे में अभी अपने बेड के पास आकर दवा ही खा रही थी कि ज्योति वहां फिर आ जाती है।
" चाची मुझे कुछ काम है आज मैं अभी ही घर जा रही हूं। तुम समय पर दवा खा लेना। मैंने नर्स को भी बोल दिया है वो भी समय समय पर आकर तुमको देख लेगी। "
" उसकी कोई जरुरत नहीं है डॉक्टर मैडम। मैं दवा समय पर खा लुंगी। वैसे उस मोटी नर्स को तो भेजना भी नहीं वह बात बात पर बहुत गुस्सा करती है। "
" ठीक है चाची । मैं दूसरे को बोल दूंगी। अब तुम खुश हो न ? "
" डॉक्टर मैडम पता नहीं क्यों आज तुम्हें गले लगाने का मन कर रहा है। बस जाते जाते एक बार गले लग जाओ न। "
" बस इतनी सी बात। आओ एक बार क्या कहोगी तो रोज गले लग जाऊंगी। "
कहती हुई ज्योति चंदा के पास आकर उसे गले लगा लेती है। चंदा भी ज्योति को कस कर बाहों में भर लेती है।
चंदा के गले में एक माला था और उसमें एक लॉकेट लगा हुआ था। ज्योति भी अपने गले में एक माला में लॉकेट पहने हुए थी। दोनों जब गले मिलते हैं तो दोनों का लॉकेट एक दूसरे में उलझ कर फंस जाता है।
ज्योति जैसे ही चंदा से गले लगने के बाद अलग होना चाहती है कि लॉकेट एक दूसरे में उलझे होने के कारण अलग नहीं हो पाती है। दोनों का ध्यान गले की ओर चला जाता है। और जैसे ही दोनों की नजर लॉकेट पर पड़ती है तो उसे देख दोनों आश्चर्यचकित रह जाती है। क्योंकि दोनों का लॉकेट हुबहु एक जैसा ही था।
" चाची यह लॉकेट तुम कहां से लाई। एकदम मेरे ही जैसा है ? "
ज्योति लॉकेट देखते ही पुछ बैठी।
" डॉक्टर मैडम मैं भी यही जानना चाहती हूं। "
चंदा लॉकेट को छुड़ाती हुई बोली।
" यह लॉकेट तो मैं जन्म से ही पहनी हुई हूं। मुझे जिस मां ने पाला था उसी ने बताया था कि यह लॉकेट मेरे गले में पहले से ही था। "
" तो क्या तुम्हारी कोई और मां थी ? "
" हां.... । मगर उसने मुझे जन्म देते ही फेंक दिया था। "
ज्योति एक लंबी सांस लेती हुई बोली।
" चाची जब कभी वो औरत मुझे मिलेगी न तो उससे मैं यह जरुर पूछूंगी कि ' मां तूने ऐसा क्यों किया ? "
ज्योति की बातें सुनकर पता नहीं क्यों चंदा के अन्दर एक भूचाल उठने लगा था।
" तुम अपनी मां से कभी पूछी नहीं कि तुम उसे कहां मिली थी। "
" मेरी मां भी एक डॉक्टर थी। वह एक बार चतरा अपने एक रिश्तेदार से मिलने गई थी। वही से वापस हजारीबाग अपने घर लौट रही थी। तभी रास्ते में एक जगह पर देखी कि एक औरत दौड़ती हुई आई और अपने दूधमुंहे बच्चे को एक पूल के नीचे रखकर तेजी से दूसरी ओर भाग गई। मां ने उसे बहुत आवाज भी थी दी मगर वह फिर भी अनसुना करके भाग गई। "
ज्योति की बातें सुनकर चंदा का कलेजा जोर जोर से धक धक करने लगा। उसके साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ था। जब वह दूसरी बार भी बेटी ही जन्म दी थी तो। वह चाहकर भी अब आगे कुछ बोल नहीं पा रही थी। उसका दिमाग जब कोई काम नहीं किया तो वह झट ज्योति का लॉकेट अपने हाथ में लेकर देखने लगी। और देखते ही वह पहचान गई कि ज्योति ही उसकी दूसरी बेटी है। जिसे उसने अपने पति के डर से पूल के नीचे छिपा दी थी।
लॉकेट देखकर जब चंपा पुरी तरह से विश्वास कर ली कि यही उसकी बेटी है तो खुशी के मारे उसके बोल तो नहीं मगर आंखों से लगातार अश्रु बहाने लगे।
यह देख ज्योति भी हैरान हो गई।
" चाची, क्या हुआ ? तुम इतनी रोने क्यों लगी ? "
" बेटी तुम्हें पूल के नीचे रखकर भागने वाली वो अभागन दुखियारी मां मैं ही थी। "
सुनते ही ज्योति शन रह गई । उसके मुंह से भी अब आवाज निकलना बंद हो गया ।
" मां तूने ऐसा क्यों किया ...... ? "
बहुत देर के बाद ज्योति सिर्फ इतना ही बोल पाई।
" बेटी मैं लाचार और मजबूर थी। अगर ऐसा नहीं करती तो तुम्हारे पिता तुम्हें भी तुम्हारी बड़ी बहन के जैसे ही जान से मार देते। "
कहते कहते चंदा जोर जोर से रोने लगी।
इधर अपनी जन्म देने वाली मां के हालत को देखकर ज्योति को भी अब खूब रोने का मन करने लगा था। मगर वह अपनी भावनाओं पर काबू किए हुए थी।
" मां मुझे पुरी बात बताओ तुम्हारे साथ हुआ क्या था ? "
ज्योति पहली बार अपनी मां के हाथ को स्पर्श करके बोली।
और पच्चीस साल बाद अपनी खोई हुई बेटी का स्पर्श पाकर चंदा का रोम रोम सिहर उठा और वह भाव विभोर हो उठी।
चंदा एक बार फिर से अपने पुराने दिनों को याद करके उसे अपनी बेटी को बताते बताते उसमें ही खोती चली गई।
बेटी तुम्हारे पिता ने बेटा पाने के जिद्द में तुम्हारी बड़ी बहन को तो जान से मार ही दिए थे। जब एक साल बाद मैं फिर से गर्भवती हुई तो फिर से तुम्हारे पिता बेटा के लिए मुझे धमकी देने लगे। मैं भी मन ही मन भगवान से इस बार फिर बहुत प्रार्थना की ' कि हे भगवान इस बार देना तो सिर्फ़ बेटा ही देना, नहीं तो बेटी देना तो उसे तुम ही जान से मार देना। ' मगर भगवान ने तो हम गरीबों की कहा न सुनने की कसम खा ली थी। इसीलिए इस बार भी बेटी ही होती है, और वो तुम ही थी। जब मैं तुम्हें जन्म देती हूं तो उस समय तुम्हारे पिता पास में ही दारू पीकर बेसुध पड़े थे। मैं इस बार अपने अंदर के मातृत्व को नहीं रोक पाई और जन्म देते ही तुम्हें बचाने के लिए अपनी गोद में लेकर उस घर को सदा के लिए छोड़कर उसी अवस्था में भाग खड़ी हुई। मगर मेरा दुर्भाग्य पीछा कहां छोड़ने वाला था। मुझे घर से निकलते ही तुम्हारे पिता भी होश में आ गए और लाठी लेकर हम दोनों को जान से मारने के लिए पीछा करने लगे। तभी मैं तुम्हें बचाने के लिए सड़क किनारे पूल के नीचे छिपा दी थी। ताकि बाद में मैं तुम्हारे पिता से बचकर तुम्हें वहां से ले जाती। मगर जब मैं दुबारा तुम्हारे पास आई तो तुम वहां नहीं थी । शायद तुम्हें तुम्हारी पालने वाली मां लेकर जा चुकी थी। मैंने उसी समय यह लॉकेट जो मेरे गले में था तुझे पहनाई थी। और बाद में मैं वैसा ही अपने लिए एक दुसरा लॉकेट बनवा ली थी। "
बात खत्म करके चंपा एक लम्बी सांस लेने के बाद चुपचाप ज्योति के चेहरे की ओर ही देखने लगी।
" मां आज भी कुछ लोगों को बेटी होने से कितनी नफरत है। एक तरफ लोग बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा बुलंद करते हैं तो दूसरी तरफ लोग अभी भी घर में बेटी को अपशकुन और बोझ समझकर उसे जन्म के साथ ही फेंक देते हैं या जान से मार देते हैं। "
" उसके बाद ही मैंने तुम्हारे पिता को सदा के लिए छोड़ दिया था। मैंने तुम्हारा बहुत तलाश किया मगर तुम कहीं नहीं मिली। उसके बाद मैं हजारीबाग आकर यहां दूसरे के घरों में दाई का काम करने लगी । लेकिन मुझे पुरा विश्वास था कि एक न एक दिन तुम मुझे जरूर मिलोगी। "
" अब तुम दूसरे के घरों का कोई काम नहीं करोगी। तुम्हारी बेटी तुम्हें मिल गई है। अब तुम मेरे साथ रहोगी। अब हम दोनों मिलकर समाज को बताएंगे कि आज बेटी बोझ नहीं बल्कि घर की लक्ष्मी होती है। "
कहती हुई ज्योति चंदा को गले लगा लेती है। दोनों मां बेटी एक दूसरे से लिपट जाती है ।
कुमार सरोज
Lajwab kahani
जवाब देंहटाएं