अपाहिज रिश्ते / Apahij Rishte । कहानी । कुमार सरोज ।
अपाहिज रिश्ते
कुमार सरोज
" आप बिस्तर पर मुझे संतुष्ट कर पाएंगे न ? "
कामिनी के इस प्रश्न को सुनकर पुष्कर दंग रह जाता है। उसने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि वह ऐसा सवाल पूछेगी।
पुष्कर कुछ देर के लिए सोच में डूब जाता है। उसके मन मस्तिष्क में कामिनी के ही प्रश्न घूमते रहते हैं। उसके शरीर के धमनियों का रक्त प्रवाह भी सोच भी डूब जाता है।
" आप ठीक से सोच लीजिए , उसके बाद ही जवाब दीजिएगा। मुझे जल्दी नहीं है। "
पुष्कर को सोच में डूबा देख कामिनी बोल पड़ती है।
कुछ देर के बाद एक लंबी सांस लेते हुए पुष्कर धीरे से बोलता है -
" हां ..... । "
" तब ठीक है। मैं आपसे शादी करने को तैयार हूं । "
पुष्कर का बिना जवाब सुने वह कहती हुई वहां से एक तरफ चली जाती है।
पुष्कर दूर तक कामिनी को जाते देखते रहता है। उसके ओझल होते ही वह भी कुछ सोचते हुए उसी ओर धीरे धीरे चल पड़ता है।
जहां अभी पुष्कर और कामिनी बैठे बात कर रहे थे वह दानापुर का एक बहुत बड़ा मंदिर था। पुष्कर और कामिनी के शादी की बात चल रही थी। अभी दोनों का परिवार कामिनी के जिद्द पर ही मंदिर में एक दूसरे से मिलने आए हुए थे। वह अपने होने वाले पति से शादी से पहले एक बार मिलना चाहती थी।
पुष्कर का इस दुनिया में कोई नहीं था। वह एक पैर से विकलांग भी था। लेकिन बैसाखी के सहारे आराम से चल लेता था। पटना सिटी के दीवान मोहल्ला में उसका अपना घर था। घर से किराए में ही उसे लाखों रुपये की आमदनी थी। वह अपने घर में ही एक जेनरल स्टोर की दुकान भी चलाता था। मिला जुलाकर पुष्कर की जिंदगी मजे से कट रही थी। बस दिक्कत यही था कि वह अपाहिज था। जिसके कारण ही इतना धन दौलत रहने के बाबजूद भी उससे कोई शादी करने को तैयार नहीं होता था।
पुष्कर का एक दोस्त था मनोज। वही पटना के पास के ही एक गांव सैदपुर में अपने जान पहचान के एक रिश्तेदार यमुना तिवारी की बेटी कामिनी से शादी की बात तय किया था। और आज सभी मन्दिर में एक दूसरे को देखने एवं समझने आए हुए थे।
कामिनी पुष्कर से शादी को राजी भी हो गई थी। उसके माता पिता तो पहले से ही राजी थे। कामिनी पांच भाई बहनों में सबसे बड़ी थी। उसका परिवार गरीब था। इसीलिए उसके माता पिता विकलांग होने के बाबजूद भी पुष्कर से शादी को पहले ही राजी हो गए थे। क्योंकि वह करोड़ों का मालिक था।
जैसे ही कामिनी सभी को अपनी राय बताती है सुनकर सभी खुशी से झूम उठते हैं। पुष्कर का दोस्त मनोज जो शादी करवा रहा था झट मिठाई मंगाकर सभी का मुंह मीठा करवा देता है।
पुष्कर के साथ उसके चाचा रामलेखा तिवारी एवं चाची प्रमिला भी रहती थी। इन दोनों का कोई औलाद नहीं था। इसीलिए पुष्कर को ही दोनों अपना बेटा मानते थे।
मंदिर से दोनों का परिवार खुशी खुशी वापस अपने अपने घर आ जाते हैं।
कुछ ही दिन के बाद तय तिथि को पुष्कर की कामिनी के साथ पटना के ही एक मंदिर में शादी हो जाती है।
कामिनी पुष्कर की पत्नी बनकर अपने गांव सैदपुर से पटना सिटी आ जाती है। वह अपने पति का आलीशान घर देखकर मन ही मन बहुत खुश होती है। पुष्कर से शादी करके वह अब करोड़ों की मालकिन बन गई थी।
उधर मन ही मन पुष्कर भी कामिनी जैसी खूबसूरत बीबी को पाकर बहुत खुश था। उसके वीरान जीवन में कामिनी जैसी हसीन एवं हुस्न की मल्लिका के आगमन से बहार आ गया था।
पुष्कर के चाचा चाची उसकी शादी के दूसरे ही दिन वैष्णो देवी माता का दर्शन करने कश्मीर चले जाते हैं। दोनों ने पुष्कर की शादी के लिए मन्नत मांगी थी।
चाचा चाची के जाने के ठीक अगले ही दिन सुबह में पुष्कर अपने घर के ड्राइंग हॉल में बैठा आज का अखबार पढ़ ही रहा था कि कामिनी वहां आ जाती है। उसके हाथ में कॉफी का मग था। पुष्कर कॉफी पी चुका था। वह कामिनी को वहां आते देख मुस्कुरा कर फिर से अखबार पढ़ने लगता है। वह बीच बीच में कामिनी को भी देख लिया करता था।
कामिनी भी वही सोफा पर बैठकर कॉफी पीने लगती है। पता नहीं क्यों आज उसके चेहरे पर तूफान आने के पहले जैसी खामोशी दिख रही थी।
कामिनी अभी दो तीन घूंट ही कॉफी पी थी कि पुष्कर उससे उसके उदासी के बारे में पुछ बैठता है।
" क्या हुआ कामिनी उदास लग रही हो। तबियत ठीक है न ? "
" आपने मुझसे झूठ क्यों बोला था ? "
कामिनी झट पुष्कर से पुछ बैठी।
" झूठ... । मैंने तुमसे झूठ कब और क्या बोला है ! "
" मंदिर में। मुझे बिस्तर पर खुश करने वाली बात। "
कामिनी बिना हिचकिचाए बोल पड़ी।
सुनकर पुष्कर के मुंह से बोल नहीं निकले। वह फिर सोचे में डूब गया।
" मुझे पहले से ही पता था, तुम्हारे जैसा अपाहिज मुझे वो आनंद नहीं दे सकता था जो एक औरत को अपने पति से चाहिए था। "
कामिनी आप से अब तुम पर आ गई थी। उसके बोलने का अंदाज भी बदल गया था।
पुष्कर कामिनी के बदले तेवर को देखकर दंग रह जाता है। फिर भी वह चाहकर भी कुछ नहीं बोल पा रहा था। आखिर कामिनी उसकी तुलना एक सामान्य इंसान के साथ कैसे कर सकती थी। वह तो एक अपाहिज इंसान था।
जब बहुत देर तक पुष्कर कुछ नहीं बोलता है तो कामिनी ही बोल पड़ती है -
" तुम अब हमेशा ऐसे ही चुप ही रहना। गांव से आज मेरा प्रेमी आ रहा है। वह अब इसी घर में मेरे साथ रहेगा। "
" ऐसा कैसे हो सकता है ! तुम मेरी पत्नी हो। हम दोनों ने भगवान को साक्षी मानकर एक दूसरे का साथ निभाने का वादा किया है। "
" मैं वादा तो निभा ही रही हूं, तुम्हारे नाम का मांग में सिंदूर डालकर। कहोगे तो उसे भी मिटा दूंगी। "
" जैसा तुम सोच रही हो वैसा मैं कुछ भी नहीं होने दूंगा। "
" अपाहिज हो अपाहिज की तरह कोने में पड़े रहना। नहीं तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। "
कहती हुई कामिनी वहां से तेजी सेउठकर बेड रूम की ओर चली जाती है।
पुष्कर वही बैठा रहता है। उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह करे तो क्या करे।
आखिर कोई पत्नी ऐसे कैसे कर सकती थी ! पति पत्नी का रिश्ता तो विश्वास के एक मजबूत डोर से ऐसा बंधा रहता है, जिसे लाख बाधाएं भी नहीं तोड़ पाती है। तो क्या आज पति पत्नी के रिश्ते इतने कमजोर और अपाहिज हो गए थे कि उसे चलाने के लिए बैसाखी की जरुरत आन पड़ी थी ? कामिनी ने पुष्कर से शादी ही क्यों की थी ? कहीं वह पति पत्नी के रिश्ते को शुरू से ही अपाहिज बनाकर रखने की मन में मंशा संजोए ही पुष्कर से शादी करने को तैयार तो नहीं हुई थी।
कैसा समय आ गया था। यह आधुनिकता का कैसा आडंबर था कि एक पत्नी अपने पति को अपने प्रेमी के साथ रात गुजारने की धमकी दे रही थी।
उस दिन पुष्कर दुकान पर नहीं जाता है। वह वैसे ही ड्राइंग हॉल में सोच में डूबा बैठा रहता है।
अब दोपहर हो गई थी। पुष्कर कॉफी के अलावा अभी तक कुछ खाया पीया नहीं था। वह अभी भी उधेड़ बुन में ही सोफे पर बैठा था।
तभी घर का डोरबेल बजता है। डोरबेल की आवाज सुनते ही बेडरूम से निकलकर कामिनी तुरंत दरवाजा खोलती है।
सामने उसके गांव के बगल के गांव का ही उसका प्रेमी प्रमोद खड़ा था। दोनों एक दूसरे को देखकर मुस्कुरा उठते हैं।
कामिनी प्रमोद को लेकर सीधे अपने बेडरूम में चली जाती है।
पुष्कर सब कुछ देखकर भी अंजान बना बैठा रहता है। आखिर वह कर भी क्या सकता था। बोलने पर मोहल्ले में उसकी ही बदनामी होती। अब उसे इतना तो समझ में आ गया था कि कामिनी ये सब पहले से ही पुरी योजना बना कर उसके साथ शादी की थी। गलती उसकी ही थी, वही सुंदर लड़की से शादी करना चाहता था। मगर अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।
पुष्कर इतनी जल्दी हार मानने वाला नहीं था। वह मन ही मन गुस्से में उबलता हुआ ड्राइंग हॉल से उठकर बेडरूम की ओर चल देता है जिधर कामिनी अभी गई थी।
पुष्कर जब बेडरूम में पहुंचता है तो देखता है कि दोनों एक दूसरे को बाहों में जकड़े बेड पर लेटे बाते कर रहे हैं। देखकर उसका खून खोल उठता है। वह भले अपाहिज था, मगर था बड़ा स्वाभिमानी। वह तुरंत प्रमोद को खींचकर दो तीन थप्पड़ जड़ देता है।
कामिनी या प्रमोद ने कभी सोचा भी नहीं था कि पुष्कर ऐसा कर सकता था। दोनों पुष्कर के इस अप्रत्याशित हरकत से गुस्से में आग बबूला हो उठते हैं। दोनों तुरंत गुस्से में पुष्कर को बेड पर पटककर तकिए से उसका मुंह दबाकर जान से मार देते हैं।
पुष्कर को जान से मारने के बाद दोनों बड़े ही इत्मीनान से बैठकर आगे की योजना पर विचार करने लगते हैं। कामिनी फ्रीज से कोल्डड्रिंक पीने के लिए निकालकर ले आती है। दोनों पीते हुए बाते करने लगते हैं।
दोनों पुष्कर को सीढ़ी पर से नीचे धकेलकर उसे दुर्घटना का शक्ल देने की योजना बनाते हैं।
कामिनी एक नम्बर की ड्रामेबाज भी थी। वह ऐसा चीखने - चिल्लाने एवं रोने - धोने की एक्टिंग करती है कि आस पास के सभी लोग उसकी बात पर विश्वास कर लेते हैं। विश्वास नहीं करने का कोई वजह भी नहीं था, क्योंकि इससे पहले भी एक दो बार पुष्कर सीढ़ी पर से गिर चुका था।
पुष्कर के चाचा चाची तो अभी बाहर गए हुए थे। इसका फायदा उठाकर कामिनी आस पास के लोगों को प्रमोद को अपना भाई बताकर उसी से पुष्कर का फटाफट दाह संस्कार करवा देती है।
अब कामिनी और प्रमोद मन ही मन बहुत खुश थे। कामिनी तो एक झटके में ही करोडों की इकलौती मालकिन बन गई थी। वह पुष्कर के चाचा चाची को अभी से ही वृद्धाश्रम भेजने की भी योजना बना ली थी।
प्रमोद भी बहुत खुश था। वह अब अपनी मासूका के साथ ही खुशहाल जिंदगी बिताने वाला था।
अपने दामाद के मरने की खबर सुनकर कामिनी के माता पिता भी वहां आ जाते हैं।
दिखावटी ही सही मगर कामिनी रो रोकर अपना बुरा हाल बना लेती है। पड़ोसी एवं और दूसरे रिश्तेदार उसे बहुत ढाढस बंधाते हैं। सभी कामिनी के फूटे नसीब को कोस रहे थे।
पुष्कर के मरने के दो दिन बाद ही उसके चाचा चाची भी वापस लौटकर घर आ जाते हैं।
पुष्कर के दसकर्म एवं भोज के बाद जैसे ही सभी मेहमान जाते हैं कि कामिनी अपनी मजबूरी बताती हुई पुष्कर के चाचा चाची को वृद्धाश्रम जाने को कह देती है।
मगर दोनों के जवाब सुनकर उसके पांव तले की जमीन खिसक जाती है। यह घर पुष्कर का नहीं था। वह तो सिर्फ़ किरायेदार था। दोनों उसके चाचा चाची नहीं बल्कि मकान मालिक थे। पुष्कर सिर्फ शादी करने के लिए ये सब झूट बोला था। सिर्फ़ दुकान उसका था, मगर अब वह भी शादी में हुए खर्च के उधार तले दबकर नीलाम होने वाला था।
तो क्या पुष्कर भी शुरू से ही पति पत्नी के पवित्र एवं अटूट रिश्ते को झूठ के बैसाखी पर अपाहिज बनाए हुए था।
वाह रे जमाना ! एक तरफ कामिनी शुरू से ही पति पत्नी के पवित्र रिश्ते को छल के बैसाखी पर अपाहिज बनाकर शादी के बंधन में बंधी थी, तो दूसरी तरफ पुष्कर भी शुरू से ही झूट और मक्कारी के बैसाखी पर रिश्ते को अपाहिज बनाए हुए था। आखिर बालू की भीत पर खड़े ऐसे अपाहिज रिश्तों की बुनियाद कितनी मज़बूत होगी।
दोनों ने अपने रिश्तों की नींव को शुरू से ही कमजोर कर रखा था। दोनों शूरू से ही एक दूसरे को नहीं बल्कि खुद को ठगने में लगे हुए थे। तभी तो आज दोनों का यह हश्र हुआ था। पुष्कर मरकर अपनी धूर्त और मक्कारी का फल पा चुका था तो कामिनी सफेद साड़ी में लिपटी विधवा बनकर अब एकांकी जीवन जीने को बाध्य हो गई थी, क्योंकि उसका प्रेमी प्रमोद पुष्कर की सच्चाई जानते ही चुपचाप अब फैक्ट्री में कमाने के लिए लुधियाना भाग गया था।
कुमार सरोज
लाज़वाब कहानी
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद
हटाएंWaah, badi dilchasp kahani...
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार 🙏
हटाएंSamaj ko aaina dikhati rachna 👏👏
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
हटाएंशि क्षा प्रद कहानी 👌🙏
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद
हटाएंAwesome 👍 This is reality of our society 👏
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार
हटाएंसुजज्जित तरीके से लिखें हैं।
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद
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