यादों की गुल्लक़ / Yadon Ki Gullak । कविता । रुचि रूह ।

                         यादों की गुल्लक़

                                   रूचि रूह 



मेरी गुल्लक़ में आज फिर मैंने एक यादों का पिटारा डाला,
कुछ शाम की बातों का तो कुछ सुबह की ताज़गी का हिस्सा डाला । 


कागज़ की पुड़िया बना हर किस्सा यादों का गुल्लक़ में डाल रही,
कभी तुम भी ले आना यादों का कोई पिटारा जो मैं बुन रही ।







संग साथ में खोलेंगे किसी कोने में चुपके से ,
जहाँ जुगनूओं की रौशनी हो ,
और ठंडी ठंडी हवा के साथ होठों पर चाय की चुस्कीयाँ हो ।


कुछ एक मोह्बत के किस्से रूह की जुबानी ,
रूह के हिस्से फ़ना मोह्बत में सिर्फ , खोकर नहीं पाकर भी हुआ जाता है,
 कुछ कागज़ की पुड़िया इस बात की ग़वाही दे जाती है । 


कुछ फिर मैं मुस्कुरा कर भॅवर को गालों पर दिखाउंगी,
तो कभी अश्कों को खुद के ही गालों पर लुढ़काउंगी ।


तुम अपनी माथे की सिल्वटों को छुपाना मत ,
मैं उनको अपनी मुस्कुराहट की बूंदों के साथ हटाउंगी,
तो कोई एक किस्सा फिर जोड़ लुंगी ।


लोग कहेंगे बस किस्से है ये सब, 
मैं कहूंगी किस्से नहीं ये अब मेरे हिस्से हैं,
उन सब की बातों को भी की पुड़िया
बना गुल्लक़ में डाल दूंगी । 


 उस गुल्लक़ में कागज की पुड़ियों के
 संग मुस्कुराहटों और आंसुओं का
 समावेश होगा,
और सब की भी एक - एक पुड़ियों के संग बंधी कहानी होगी ।


गुल्लक़ भी बिल्कुल मुझ जैसी है
लोहे की नहीं माटी की है, 
कभी आओ फ़ुर्सत से यादों के घेरे में , एक गुल्लक़  तुम भी ले आना यादों के झरोखे मैं ।


                                रूचि रूह

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