तू मेरा पति / Tu Mera Pati । कहानी । कुमार सरोज ।

              तू मेरा पति 

                              कुमार सरोज 



                गायत्री अभी अपने घर के आंगन में बैठी सूप से चावल फटक ही रही थी कि बाहर से उसका पति महेंद्र आ जाता है । उसके चेहरे पर ख़ुशी की मोटी मोटी लकीरें झलक रही थी। उसे देखने से ही ऐसा लग रहा था मानों वह अपनी जिंदगी की कोई बहुत बड़ी जंग फतह करके आ रहा हो। 
              वास्तव में महेंद्र जिंदगी का एक जंग ही तो जीत कर आ रहा था। आज के आधुनिक दौर में भी एक गरीब बाप को अपनी हैसियत के अनुसार बेटी के लिए योग्य और अच्छा वर खोजना किसी जंग जीतने से कम थोड़े न है ! 
             महेंद्र भी आज अपनी बड़ी बेटी शिम्पी के लिए एक हीरो जैसा कमाऊ दूल्हा ढूंढकर आ रहा था। आज उसकी दो साल की मेहनत रंग लाई थी। योग्य एवं लायक लड़का खोजने के चक्कर में महेंद्र कितनी जोड़ी जूते अबतक तोड़ चुका था। 
             महेंद्र के पसंद का लड़का जिसका नाम गौरव था, वह पूर्णिया में खुद की दवाई दुकान चलाता था। आमदनी अच्छी हो जाती थी। वह अपने पिता का इकलौता बेटा भी था। वह दिखने में भी सुन्दर था। वह अच्छा पढ़ा लिखा भी था, मगर जब कोई सरकारी नौकरी नहीं मिली तो थक हार कर दवा दुकान खोल लिया था। उसके घर में उसके माता पिता के अलावा कोई और सदस्य नहीं था। तीन लोगों का बड़ा ही खुशहाल परिवार था गौरव का । 

 







              गौरव का घर पूर्णिया से ही सटे एक गांव मंझोली में था। वह घर से ही दुकान चलाता है।
              महेंद्र के लिए सबसे अच्छी बात यह थी कि गौरव के माता पिता उतने दहेज के लोभी नहीं थे, जितने बाकि के और लड़कों के माता पिता उसे मिले थे। महेंद्र की जितनी दहेज देने की औकात थी उसने में ही वो राजी हो गए थे। 
            इसीलिए अभी जब महेंद्र घर आया तो वह अंदर से बहुत खुश दिखाई दे रहा था। वैसे उसकी बेटी शिम्पी भी पढ़ी लिखी सुंदर एवं सुशील लड़की थी। इंटर के बाद वह पटना में रहकर आगे की पढ़ाई कर रही थी। अभी वह स्नातक अंतिम साल में थी। इसीलिए उसके पिता चाहते थे कि बेटी के स्नातक पास करते ही उसकी हर हाल में शादी कर दें। 
                महेंद्र जब अपनी पत्नी गायत्री को सारी बात बताता है तो सुनकर वह भी खुशी के मारे झूम उठती है। एक माता पिता को अपनी बेटी के लिए अच्छा घर, सुन्दर और कमाऊ वर के अलावा और चाहिए ही क्या था। यहां तो लड़का घर में अकेला भाई भी था। दोनों पति पत्नी शिम्पी के भाग्य पर अभी से ही इठलाने लगे। 
           गौरव का गांव मंझोली और महेंद्र का गांव बाबरपुर दोनों पूर्णिया के पास ही था। बस अन्तर यही था कि मंझोली पूर्णिया से पूरब दिशा में था तो बाबरपुर पश्चिम में। दोनों की दुरी भी पूर्णिया शहर से करीब 3 किलोमीटर ही थी। 
               तभी महेंद्र की छोटी बेटी सुधा भी घर आ जाती है। महेंद्र की दो बेटी थी शिम्पी और सुधा। जहां अभी शिम्पी पटना में रहकर स्नातक कर रही थी, वही सुधा अभी पूर्णिया के हाई स्कूल से ही इस बार इंटर की परीक्षा देने वाली थी। वह अभी स्कूल से ही पढ़कर आ रही थी। दोनों बहनों के उम्र में दो साल का ही अंतर था। 
                सुधा को भी जब अपनी दीदी की शादी ठीक हो जाने के बारे में पता चला तो सुनकर वह भी खुशी से नाचने लगी। वह तो कल ही अपने होने वाले जीजाजी को देखने का मन भी बना लेती है। क्योंकि उसके पिता जी लड़के के जिस  ' गौरव मेडिकल हॉल '  के बारे में बता रहे थे वह उसके स्कूल के पास में ही था। 
               नियत समय पर शिम्पी की शादी गौरव से हो जाती है। सभी बहुत खुश थे। 
             शिम्पी पहली बार 7 दिन ससुराल में रहती है। उसके बाद वह अपनी मैके आ जाती है। 
               शिम्पी मैके आते ही तुरंत पढ़ाई का बहाना करके फिर पटना आ जाती है। उस समय तक उसका स्नातक का रिजल्ट भी निकल गया था।  
             इधर सुधा भी इंटर पास कर गई थी। महेंद्र उसे भी आगे की पढ़ाई के लिए पटना जाने को कहता है मगर वह अपने माता पिता को घर में अकेले छोड़कर कहीं बाहर जाने को तैयार नहीं होती है। वह घर पर ही रहकर पूर्णिया के कॉलेज से स्नातक करना चाहती थी। 
           अंततः सुधा के हठ के आगे उसके माता पिता भी मान जाते हैं। 
                समय बिताता रहता है। अब शिम्पी के शादी के आठ महीने हो गए थे। उसके ससुराल वाले उसे दुबारा घर लाने के लिए महेंद्र के पास ख़बर भेजवाते हैं। मगर शिम्पी अपनी पढ़ाई का बहाना करके घरआने से मना कर देती है। उसका पति गौरव भी ज्यादा दबाव नहीं देता है। 
               गौरव ही जब कभी अपनी दुकान के लिए दवा लेने पटना जाता था तो अपनी पत्नी शिम्पी से मिल लिया करता था। वह शिम्पी के पास रात में भी रुकना तो चाहता था मगर वही मना कर देती थी। बेचारा गौरव मन में मिलन की अधूरी प्यास लिए न चाहकर भी रात में ही बुझे मन बस पकड़कर पूर्णिया आ जाता था। 
                    इसी तरह गौरव और शिम्पी के शादी के एक साल हो जाता है। तभी शिम्पी को बिहार पुलिस में नौकरी लग जाती है। पटना में ही उसकी ट्रेनिंग भी शुरु हो जाती है।
              शिम्पी के नौकरी लग जाने से उसके माता, पिता, बहन एवं ससुराल वाले बहुत खुश होते हैं।
                  गौरव जो भले एक साल से अपनी पत्नी से दूर था फिर भी नौकरी की बात सुनकर वह भी बहुत खुश होता है। 
               शिम्पी को पुलिस ट्रेनिंग में ही एक लड़के दया से मुलाकात होती है , और यही मुलाकात धीरे धीरे प्यार का रुप ले लेती है। 
                   दया भागलपुर का रहने वाला था। शहर में ही उसका अपना घर था। उसके पिता सरकारी विद्यालय में शिक्षक थे। दया का परिवार गौरव के परिवार से ज्यादा खुशहाल और अमीर था। जहां गौरव बचपन से ही गांव के माहौल में पला बढ़ा था , वही दया शहरी माहौल में पला बढ़ा एक आधुनिक लड़का था।
               शिम्पी भी अपने पति के रुप में दया जैसा ही मॉडर्न लड़का चाहती थी। मगर वह सिर्फ अपने माता पिता के मान रखने के लिए ही गौरव जैसे नापसंद देहाती लड़के से शादी कर ली थी। 
               नौकरी लगने के बाद अब जब भी गौरव अपनी पत्नी शिम्पी से मिलने पटना आता तो वह मिलती भी थी तो बहुत ही कम समय के लिए या तो फिर किसी न किसी बहाने मिलने से ही मना कर देती थी। 
                इसी तरह एक साल और बीत जाता है। इन एक साल में शिम्पी कभी भी घर नहीं आती है। जब भी घर आने के लिए उसके माता पिता या गौरव बोलता तो वह ट्रेनिंग में छुट्टी नहीं मिलने का बहाना करके मना कर देती थी। 
                 इधर बेचारा गौरव पिछले दो सालों से पत्नी के इन्तजार में यूं ही तन्हां तन्हां राते काट रहा था। 
              अब महेंद्र अपनी छोटी बेटी सुधा की शादी के लिए भी उसके योग्य लड़के की तलाश शुरु कर दिया था। बदलते समय को देखते हुए वह जल्दी से जल्दी सुधा की शादी कर देना चाहता था। कुछ दिन पहले ही सुधा की एक सहेली पूर्णिया के एक लड़के के साथ घर छोड़कर भाग गई थी। जिसके कारण ही महेंद्र और उसकी पत्नी गायत्री जितना जल्दी हो सके उतना जल्दी अपनी बेटी की शादी करना चाह रहे थे। मगर कोई ढंग का सुधा के योग्य लड़का मिल नहीं रहा था। मिलता भी था तो इतना ज्यादा दहेज की मांग लड़के वाले करते थे कि उतना पैसा देना महेंद्र जैसा साधारण किसान के बस की बात नहीं थी। 
                 समय बिताता रहता है। उधर पटना में शिम्पी और दया के प्यार का परवान दिन प्रति दिन और चढ़ता ही रहता है।
                      और इधर पूर्णिया में गौरव मन ही मन यह सोचकर कि  ' ट्रेनिंग के बाद तो उसकी पत्नी कहीं स्थाई ड्यूटी ज्वाइन कर लेगी तो उसके साथ फिर उसका मिलन होगा ही होगा '  खुश रहता है।
              पुलिस ट्रेनिंग के बाद पटना शहर में ही शिम्पी की पोस्टिंग हो जाती है। वह रहने के लिए अब किराए पर एक फ्लैट भी ले लेती है। इस बात से सबसे ज्यादा गौरव खुश होता है। वह दवा लेने पटना तो जाता ही था, अब इसी बहाने उसे अपनी पत्नी शिम्पी से उसके फ्लैट पर मुलाकात होती रहेगी। 
                 मगर गौरव का सोचा हुआ भी सब उल्टा होता है। वह जब कभी भी पटना आता है तो शिम्पी शहर से बाहर ड्यूटी में रहने या जाने का बहाना करके अपने फ्लैट से हमेशा गौरव के आते ही चली जाती थी या तो फिर पहले से ही फ्लैट का ताला बंद रहता था। जबकि शिम्पी ड्यूटी के लिए कहीं नहीं जाती थी। वह तो गौरव से मिलना या उसके साथ समय बिताना ही नहीं चाहती थी, इसीलिए वह अपने प्रेमी दया के फ्लैट पर चली जाती थी। वह भी पास में ही एक फ्लैट किराए पर लेकर रहता था। दया और शिम्पी बिना शादी के ही अभी से ही पति पत्नी जैसा रहते थे। जबकि बेचारा गौरव एक पति होकर भी पत्नी के आगे एक गैर मर्द के जैसा रहने को मजबूर था।
                 गौरव हर बार की तरह मन मारकर रात में ही वापस पूर्णिया आ जाता था। वह किसी से चाहकर भी कुछ कह नहीं पाता था। बस अन्दर ही अन्दर अपनी पत्नी के मिलन के वियोग में जलते रहता था।  
                 इसी तरह फिर छः महीने बीत जाता है। महेंद्र अभी भी अपनी छोटी बेटी सुधा के लिए लड़का ढूंढने में लगा हुआ था , मगर कोई योग्य वर मिल नहीं रहा था। 
                 अचानक एक दिन शिम्पी बिना किसी को पहले से कुछ बताए अपने घर आ जाती है। उसे घर आया देख सभी बहुत खुश होते हैं। नौकरी लगने के बाद वह पहली बार घर आई थी। 
              मगर शिम्पी के घर आने का कारण सुनकर सभी के पैर तले की जमीन खिसक जाती है। वह अपने पटना वाले प्रेमी दया के साथ शादी करना चाहती थी, और अपनी छोटी बहन सुधा की शादी अपने पति गौरव से करवाना चाहती थी। वह यही बात अपने पिता को बताने घर आई थी। 
                सुन सभी दंग रह जाते हैं। शिम्पी को उसके माता पिता बहुत समझाते हैं । मगर दया के प्यार में वह इस कदर अंधी थी कि वह किसी की एक नहीं सुनती है। 
              सुधा भी अपनी बहन को समझाने की बहुत कोशिश करती है, मगर उसे डांट कर शिम्पी चुप करा देती है। 
                अपनी बीबी को घर आने की खबर सुनकर गौरव भी अपना मेडिकल हॉल बंद करके ससुराल शिम्पी से मिलने आ जाता है। मगर यहां के हालात को देखकर एवं सुनकर वह भी दंग रह जाता है। उसे अन्दर से शिम्पी पर गुस्सा तो बहुत आता है, मगर वह चाहकर भी कुछ  बोल नहीं पाता है। 
             अंत में शिम्पी के जिद्द के कारण गौरव और सुधा भी एक दूसरे से शादी करने को राजी हो जाते हैं। अंततः बेमन से दोनों के माता पिता भी राजी हो जाते हैं। 
                 शिम्पी यही तो चाहती ही थी । वह झट दोनों की पास के ही एक मंदिर में ले जाकर शादी करवा देती है।
             सुधा अपने जीजा गौरव की ही दूसरी बीबी बनकर उसके घर मंझौली चली जाती है। 
                 इधर शिम्पी भी सुधा की शादी अपने पति से करवाकर पटना आ जाती है। पटना आते ही वह भी दया से मन्दिर में शादी कर लेती है। 
                अब गौरव बहुत खुश था। उसके माता पिता भी सुधा जैसी शुशील बहू को पाकर बहुत खुश थे। उन लोगों को तो शिम्पी का व्यवहार पहले से ही पसंद नहीं था। 
                  अभी सुधा और गौरव के शादी के तीन महीने ही हुए थे कि एक दिन फिर अचानक शिम्पी अपने घर बाबरपुर आ जाती है। इस बार वह बहुत उदास थी। 
                 शिम्पी इस बार अपने माता पिता को घर आने की जो वजह बताती है उसे सुनकर दोनों उसी पर गुस्सा करने लगते हैं। आजतक महेंद्र ने शिम्पी को कभी डांटा तक नहीं था वह गुस्से में उसे घर से सदा के लिए चले जाने तक को कह देता है। 
               शिम्पी जिस दया को बहुत अमीर और हैंडसम समझकर शादी की थी वास्तव में वह पहले से ही शादी शुदा था। वह डेढ़ साल की एक बच्ची का बाप भी था। भागलपुर के जिस घर को वह अपना बताता था वह भी उसका अपना नहीं किराए का था। उसका घर तो भागलपुर से करीब 40 किलोमीटर दूर एक गांव में था। जहां जाने के लिए कोई पक्की सड़क भी नहीं थी। उसने सिर्फ शिम्पी से जिस्मानी रिश्ता कायम करने एवं टाईम पास के लिए ही झूठ मूठ के शादी का नाटक किया था। 
              आज जब शिम्पी को तीन महीने बाद दया की सच्चाई का पता चला तो वह उससे झगड़कर एवं उसे सदा के लिए छोड़कर घर आ गई थी। अब वह अपने पहले पति गौरव के साथ ही रहना चाहती थी। 
           गौरव के साथ दुबारा से शादी करने के नाम पर ही शिम्पी के माता पिता उस पर गुस्सा करने लगे थे। 
                     सच में शिम्पी जैसी आसमान में उड़ने वाली आधुनिक एवं महत्वकांक्षी लड़की ने शादी जैसे पवित्र बंधन को भी आज मजाक बनाकर रख दिया था। पहले जिस पति को वह छोड़ कर अपनी ही बहन के गले में अपना मंगलसुत्र बांध कर गई थी अब दुबारा उसे ही फिर वापस लेने आई थी। शिम्पी को शायद शादी कोई गुड्डे गुड़िया का खेल लग रहा था।
             अपने माता पिता के लाख समझाने पर भी शिम्पी नहीं मानती है। वह किसी भी हालत में दुबारा फिर से गौरव को ही अपना पति बनाने पर अड़ी थी। 
              उधर सुधा अपनी बहन का घर आने की खबर सुनकर वह भी उसी दिन शाम में अपने पति गौरव के साथ बाबरपुर आ जाती है। गौरव ने एक बाईक खरीद लिया था। जिसके कारण ही अब जब भी सुधा का अपने माता पिता से मिलने का मन करता था, वह उसे लेकर ससुराल तुरंत आ जाता था। 
               बाबरपुर अपने घर आकर सुधा को जैसे ही अपनी बड़ी बहन से उसे गौरव को छोड़ने की बात का पता चलता है तो वह सुनकर आग बबूला हो जाती है। 
              पहली बार गौरव भी शिम्पी को बहुत डांटता है। 
               शिम्पी आधुनिकता और दिखावटी दुनिया के चकाचौंध में पड़कर शायद अपनी संस्कार और सभ्यता भूल गई थी। तभी तो किसी के बातों का उसके ऊपर जरा भी असर नहीं होता है। 
               अंत में शिम्पी वो करने का फैसला कर लेती है जो किसी ने अभी तक सोचा भी नहीं था। 
             आखिर कोई लड़की इतनी संस्कारहीन कैसी हो सकती थी ? क्या सच में आज हमारी आंखों पर आधुनिकता और पश्चिमी सभ्यता का ऐसा परत चढ़ गया था कि हमें अपने माता पिता और भाई बहन को भी जलील करने में जरा भी संकोच नहीं हो रहा था। 
              शिम्पी सुधा से अपने पति को पाने के लिए उस पर थाने में केस करने का मन बना लेती है। 
         और फिर थाने में जाकर शिम्पी अपने पहले पति गौरव को पाने के लिए केस भी कर देती है। 
                 सुधा को अपने पति का भरपूर साथ मिलता है, इसीलिए वह शिम्पी की जरा भी परवाह नहीं करती है। 
   ' तू मेरा पति ' की लड़ाई में जीत आखिरकार सुधा की ही होती है। 
                  शिम्पी का तो पहले ही उसके माता पिता ने उसका परित्याग कर दिया था, अब पति पाने की उसकी अंतिम उम्मीद भी खत्म हो गई थी। इसीलिए वह उदास बुझे मन वापस पटना आ जाती है। 
                सुधा अब नए जोश और उमंग के साथ अपने ससुराल और मायके का घर संभालने लगती है। वह अपनी जिंदगी से बहुत खुश थी। अब तो उसके दो दो माता पिता थे, और हद से ज्यादा प्यार करने वाला उसका प्यारा दुलारा पति भी।
 

 
                              कुमार सरोज

टिप्पणियाँ

  1. शिक्षाप्रद कहानी, आधुनिकता का अर्थ संस्कारों से भटकना नहीं होता
    इसी भाव की मेरी एक कविता
    उन्मुक्त आकाश में
    रंग बिरंगी पतंग का
    स्वच्छंद उड़ना
    अच्छा है

    बहुत अच्छा है
    कभी दाएं कभी बाएं
    कभी ऊपर कभी नीचे
    मंद मंद बहती हवाओं के साथ
    अपनी कलाओं
    अपनी प्रतिभाओं का प्रदर्शन करना

    लेकिन
    आवश्यक है
    अनुशासन के पतले धागे से
    पतंग का बंधा रहना

    बुरा नहीं है परंपरा से जुड़ा रहना
    क्योंकि
    धागे से बंधा रहना
    प्रेम है
    अनुशासन है
    जीवन है
    और अधिक ऊंची उड़ने की ललक में
    पतंग का धागे से टूटना
    बिखराव है
    उच्चशृंखलता है
    पतन है ...

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    1. बेनामीमई 21, 2023 8:32 am

      जी बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार

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