मैं भी हूं / Mai Bhi Hoon । कविता । कुमार सरोज ।
मैं भी हूं
कुमार सरोज
कौन कहता है … कहता है कौन ,
मेरा कोई इस जहां में अपना नहीं ,
मेरा रहने का कोई ठिकाना नहीं ,
मेरे लिए न कोई रोता है न हंसता ,
मैं सबको बता दूं मेरा घर तो पुरा संसार है ,
माटी वृक्ष पानी और पवन सब अपने ही हैं ,
फुटपाट के सभी जीव भी मेरे अपने ही हैं ।
हमें तो न कभी धूप की तपिश का डर होता है ,
न ही कभी आंधी या बारिश का खौफ ,
न ही कभी बिजली या पानी गुल होने की शंका ,
न ही कभी पापी पेट के लिए भागम भाग ,
न ही कभी धन दौलत के लिए अपनों से धोखा ,
न ही किसी रिश्ते में छल या जज्बातों का खून ,
न ही सोने के लिए चाहिए मखमली सेज ।
मेरा प्यारा मित्र वृक्ष ही मुझे धूप से ,
और बारिश की बूंदों से बचाता है ,
खुद धरती मां मेरी भूख और प्यास ,
अपनी ममतामई आंचल से मिटाती है ,
मेरे प्यारे कुकुर दोस्त का मुलायम बदन ,
जो किसी नरम मखमली सेज से कम नहीं ,
वह मुझे हर रोज़ अपने आगोश में सुलाता है ।
न ही मुझे अपना कुछ खोने का डर ,
न ही मुझे ज्यादा कुछ पाने का लोभ ,
न ही किसी मतलबी रिश्तों की परवाह ,
न ही किसी से अहम का द्वेष या झगड़ा ,
बस धरती मां के आंचल के सानिध्य में ,
हम खुद ही हंसकर व खुद ही रोकर ,
जिए जा रहे हैं … बस जिए जा रहे हैं ।
कुमार सरोज
लाजवाब
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत शुक्रिया
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