फ़ासला / Fasala । कहानी । कुमार सरोज ।

                            

             फ़ासला

                
                              कुमार सरोज 



               गया, भगवान विष्णु और गौतम बुद्ध की पावन नगरी । गया शहर से करीब 5 किलोमीटर दूर एक  बड़ा सा गांव है चाकंद। यह गांव गया पटना मुख्य सड़क मार्ग से कुछ ही दुरी पर है। 
              चाकंद गांव में ऊंची जाति के लोग ज्यादा रहते थे। जिसमे से अधिकांश बड़े किसान थे। 
          चाकंद गांव में दलितों का एक अलग ही टोला था। जहां सभी दलित गरीब परिवार ही रहते थे। रोज कमाना और खाना वाली सभी की जिंदगी थी। 
 



                    गांव को मुख्य सड़क से जोड़ने वाली सड़क पतली थी। जिस पर बड़ी गाड़ी नहीं आती जाती थी। 
                यह कहानी उसी गांव के दो परिवारों की है। अभी दोपहर के 1 बज रहे थे। चाकंद गांव को मुख्य सड़क से जोड़ने वाली पतली सड़क के किनारे पानी का एक गढ्ढा था। उसमें मछली बहुत थी। उसी गढ्ढा के पास दलित टोला का दो लड़का मोनू और लव बैठा मछली पकड़ने की योजना बना रहा था। मगर कोई उपाय सूझ नहीं रहा था। 
                   मोनू और लव गढ्ढे के पास बैठा अभी मछ्ली पकड़ने के लिए दिमाग ही लगा रहा था कि तभी उसके टोला के ही दो लड़के राजू और राजा पास के ही सरकारी स्कूल की ओर से हाथ में खुद का बनाया हुआ तिरंगा झंडा लिए आते दोनों को दिख जाता है। राजू और राजा दोनों सगा भाई था। दोनों गांव के ही सरकारी स्कूल में पढ़ने जाता था। 
                आज 26 जनवरी यानी की गणतंत्र दिवस था। इसीलिए स्कूल में आज झड़ा तोलन के बाद तुरंत छुट्टी हो गई थी। सभी को आज स्कूल में राष्ट्रीय मिठाई जलेबी भी खाने के लिए झंडातोलन के बाद मिला था। 
               राजू बड़ा भाई था। उसी के हाथ में झंडा था। दोनों भाई आज बहुत खुश थे। खुशी में अभी भी दोनों स्कूल में लगाए गए    " भारत माता की ....  जय..... ,   इंकलाब..... जिंदाबाद ,    वंदे मातरम् ..... ,  जैसे और बहुत से नारे लगा रहे थे। छोटा भाई राजा अपने हाथ में दो जलेबी लिए हुए था। दोनों भाई अपनी मां और बहन के लिए अपने अपने हिस्से से जलेबी एक एक बचा कर घर ला रहा था। 
               राजू और राजा भी गढ्ढे के पास अपने टोला के लड़कों को देखकर रुक जाता है। 

   " तू दूनो एहा का कर रहा है ?  "   राजू अपने भाई राजा के साथ पानी वाले गढ्ढे के पास आते ही दोनों से पुछ बैठा। 

 " मछली मारने के लिए सोच रहे हैं, तू भी मारेगा ?  "    मोनू अपना फटा हुआ शर्ट खोलते हुए बोला। 

  " राजू भईया, हम दूनों भी मछ्ली मारते हैं। बहुत दिन हो गया है मछ्ली खाए । "     राजा अपने भाई के बोलने से पहले ही बोल पड़ा। 

  " हां छोटे चलो हम दूनों भी मछ्ली मारते हैं। मईया भी बहुत खुश हो जायेगी। "    राजू अपने हाथ में लिए झंडा को पास में ही जमीन में गाड़ते हुए बोला। 

             सभी में राजू ही सबसे बड़ा था, उसके हां करते ही सभी अपना अपना शर्ट और गंजी खोलकर तुरंत पानी में मछ्ली पकड़ने के लिए कूद पड़ता है। 
                ठीक तभी मुख्य सड़क पर गया के एक बड़े प्राइवेट स्कूल का स्कूल बस आकर रूकती है। बस से चाकंद गांव के ही कुछ लड़के एवं लड़कियां उतरती है। सभी बस से ही गया पढ़ने जाते थे। सभी ऊंची जाति से थे। 
                    उन सभी के स्कूल में भी आज झंडातोलान एवं झांकी निकाली गई थी। एक लड़का जिसका नाम पीयूष था अभी भी गांधी जी के वेश में था। शायद स्कूल के झांकी में आज वह गांधीजी बना था। बाकी सभी जो स्कूल ड्रेस पहने हुए था, उसके शर्ट के पॉकेट पर तिरंगा झंडा का स्टीकर लगाए हुए था। 
सभी बस से उतरकर मोबाईल में खेले जाने वाला किसी गेम के बारे में आपस में बातें करते हुए अपने गांव की ओर चल देता है। 
                 उधर तब तक राजू एवं उसके टोला के और सभी लड़के गढ्ढे से पानी निकालकर मछली पकड़ने लगे थे। 
               सभी मछली पकड़ ही रहे थे कि बस से उतरकर आ रहे सभी लड़के एवं लड़कियां भी वहां आ जाते हैं।
             पीयूष सभी का पकड़ा हुआ मछली फिर से पानी में फेंक देता है। बाकी के सभी दलित टोला के लड़कों को मुंह चिढ़ाने लगते हैं। मुंह चिढ़ाते हुए सभी अपने पॉकेट पर लगाए हुए स्टीकर को निकाल कर सभी के ऊपर फेंक देता है। 
                     कुछ देर के बाद पीयूष और उसके साथ आ रहे सभी बच्चे वहां से अपने अपने घर की ओर चल पड़ते हैं। 
              इतना कुछ होने के बावजूद भी दलित टोला के बच्चे किसी पर कुछ नहीं बोलते हैं। आखिर कोई बोलता भी तो कैसे सभी उसके मालिक के लड़के लड़कियां जो थे।
               राजू उन लोगों का फेंका हुआ स्टीकर पानी से निकालकर अपने झंडा के पास रख देता है। 
               राजू के कहने पर ही सभी फिर से मछली पकड़ने लगते हैं। 
            कुछ ही देर में सभी दुबारा से फिर मछली पकड़ लेते हैं। उसके बाद सभी पकड़े हुए मछ्ली में से अपने अपने हिस्से का मछली लेकर घर की ओर चल पड़ते हैं।  
                उधर गांधीजी बना पीयूष खुशी से उछलता हुआ अपने घर पहुंचता है। वह यह सोचकर बहुत खुश हो रहा था कि उसे गांधीजी बना देख उसके घर वाले बहुत खुश होंगे एवं उसकी बहुत तारीफ करेंगे। 
              पीयूष के पापा धीरज सिंह उस समय अपने घर के बरामदे में गांव के ही 3 - 4 लोगों के साथ बैठे राजनीति के किसी ताजा मुद्दे पर आपस में बहस कर रहे थे। उन्होंने पीयूष की ओर जरा भी ध्यान नहीं दिया। 
                पीयूष अपने पापा का प्रतिक्रिया जानने के लिए कुछ देर तक सामने ही खड़ा रहता है, मगर उसके पापा अपनी ही धुन में सभी के साथ बहस में लगे रहते हैं। वो अपने बेटे की ओर जरा भी ध्यान नहीं देते हैं। 
              अंत में अपने पापा की ओर से अपने लिए किसी तरह का कोई प्रतिक्रिया नहीं देख चुपचाप पीयूष अपने घर के अंदर की ओर चल देता है। 
                घर के अंदर ड्राइंग रूम में उस समय उसकी मां शुशीला टीवी के सामने बैठी अपनी सबसे पसंदीदा सीरियल देख रही थी। इस समय उसका दिमाग सीरियल के कहानी की उलझनों में उलझा हुआ था।
            अपने पापा के पास से उदास पीयूष ड्राइंग रूम में आकर अपनी मां के पास खड़ा हो जाता था। उसे बहुत उम्मीद था कि मां जरुर उसे देखकर खुश होगी और खूब तारीफ़ करेगी। 
              मगर मां के पास भी ऐसा कुछ नहीं होता है। मां को भला अपने सिरियल से फुर्सत कहां था। वह तो सिरियल के कहानी में अभी चक्रवात की तरह उलझी हुई थी। 
            पीयूष से जब रहा नहीं जाता है तो वह अपनी मां से पुछ बैठता है - 

  " मम्मी, मैं कैसा लग रहा हूं ? " 

     " अरे बेटा मेरे पास अभी इतना समय नहीं है। तुम जाकर दीदी से पुछ लो। "     पीयूष की मां टीवी पर ही नजरें गड़ाए हुए बोली।
      
              पीयूष फिर भी उसके बाद  एक दो बार और मां से पुछता है। मगर मां के तरफ़ से कोई जबाव नहीं मिलता है।
             अंत में पीयूष गुस्से में वहां से भी अपनी बड़ी बहन श्रुति के कमरे की ओर चल पड़ता है। 
              पीयूष की बड़ी बहन उस समय अपने बेडरूम में पलंग पर लेटी लेपटॉप पर किसी से वीडियो कॉल पर बात करने में मशगूल थी। 
            पीयूष जब उसके पास आता है तो वह भी उसके तरफ़ ध्यान नहीं देती है। 
                 पीयूष से जब रहा नहीं जाता है तो वह जैसे ही कुछ बोलना चाहता है कि उसकी बहन उससे पहले ही उसे चुप रहने एवं वहां से जाने को इशारा करती है। 
                  बेचारा पीयूष न चाहते हुए भी चुपचाप वहां से उदास अपने कमरे की ओर चल देता है। 
               वह अपने कमरे में आकर अपना गांधीजी वाला ड्रेस खोलकर एक तरफ फेंक देता है और दुसरा कपड़ा पहनकर मोबाईल में गेम खेलने लगता था।
             पीयूष के घर में थे तो सभी फ्री मगर फिर भी किसी के पास एक दूसरे के लिए समय नहीं था। सभी सिर्फ अपनी बनावटी दुनिया में व्यस्त थे। किसी को घर, परिवार की फ़िक्र नहीं थी। बस सभी सिर्फ दिखावे की झूठी जिंदगी जी रहे थे। 
           शायद अब यही आधुनिक परिवार और समाज का चलन बनता जा रहा था। तभी तो आज लोग समाज की कौन कहे अपने घर में ही पराए बनते जा रहे थे।
                उधर सोनू की मां तेतरी अपनी मिट्टी के बने घर के आगे बने मिट्टी के चूल्हे के पास बैठी एक सूप में चावल लिए उसे फटक रही थी। पास ही सोनू की बड़ी बहन रानी भी बैठी चूल्हे में आग जलाने की कोशिश कर रही थी। सोनू के पिता फेकन भी कुछ ही दूरी पर बैठे बीड़ी पी रहे थे। 
               घर में बनाने के लिए कोई सब्जी नहीं था। जिसके लिए ही सोनू की मां तेतरी अपने पति को भला बुरा कह रही थी।

  " आप न जी कभी न सुधरिएगा। आज झंडा फहराने वाला दिन था। सोनू सुबह में ही बोलकर स्कूल गया था कि आज खाने में दाल, भात और तरकारी बनाना। मगर अभी तक तरकारी का कोई अता पता ही नहीं है। " 

 " सोनुआ की मां, तरकारी का दाम आजकल बहुत बढ़ गया है। पैसा उतना था नहीं, इसीलिए बाजार से नहीं लाए। दाल और भात बना दीजिए। अचार के साथे खा लेगा। हमको भी दाल खाए बहुत दिन हो गया है। "  
    फेकन अपनी पत्नी को समझाते हुए बोला। 

 " तवे तो बाबूजी हम कहते हैं कि हमको भी काम पर ले चलिए। कुछ पैसा आ ही जाता न। "  
      रानी अपने पिता जी के चुप होते ही बोल पड़ी। 
   
   " बेटी, तुमको अभी जमाना का पता नहीं है। तुम घर का ही काम करो। तुम्हारी मां तो काम करने जाती ही है। "  
  फेकन अपनी बेटी को प्यार से डांटते हुए बोला।
   
             ठीक तभी सोनू और राजा दोनों भाई वहां आ जाता है। सोनू अपने हाथ में तिरंगा झंडा और जलेबी लिए हुए था, तो राजा अपने हाथ में मछली लिए हुए था।

 " मईया, देखो आज हम दुनो भाई मछली पकड़कर लाए हैं। तुम खाना में दाल और तरकारी अब मत बनाना। आज मछली भात खाएंगे। "  
       सोनू अपने घर के पास आते ही बोला। 

                राजा के हाथ में मछली देखकर सभी बहुत खुश होते हैं। 

   " ई तो बहुत अच्छा किया बेटा। इस साल हम अभी तक मछली नहीं खाए थे। " 
     सोनू के पिता फेकन राजा से मछली अपने हाथ में लेते हुए बोले। 

 " तुम दोनों भाई कपड़ा बदल लो, हम जल्दी से खाना बनाते हैं। "  
       तेतरी सूप से चावल एक बर्तन में डालते हुए बोली। 

     "  मईया, मास्टर साहब बोले है कि कम से कम आज के दिन सभी देशवासी को तिरंगा झंडा को सलाम करना चाहिए। हम दोनों भाई तो स्कूल में कर लिए हैं। अब तुम सब को करना होगा। " 
    सोनू अपने हाथ का तिरंगा झंडा राजा को देते हुए बोला।
   
               सोनू राजा को झंडा पकड़ाकर खड़ा कर देता है, एवं स्वयं पिता जी, मां एवं बहन को झड़े की सलामी देने की अभ्यास कराकर सलामी दिलवाता है। उसके बाद अपने साथ लाया हुआ जलेबी में से एक जलेबी बहन को एवं आधा जलेबी मां एवं पिता को खाने के लिए देता है। 
                सभी सोनू एवं राजा के पढ़ाई के प्रति लगन को देखकर बहुत खुश होते हैं। दलित टोला से स्कूल पढ़ने जाने वाला में सोनू और राजा पहला लड़का था। आज उसके माता पिता को अपने बेटे पर गर्व हो रहा था। 
                इसके बाद सोनू की मां, बहन एवं पिता सभी मिलकर खाना बनाने लगते हैं। तेतरी पास में ही रखे पत्थर पर मशाला पीसने लगाती है। रानी चावल को पानी से धोकर चूल्हे पर पकाने लगती है। तो फेकन मछली को काटकर बनाने लगता है। 
              एक वो घर था पीयूष का, और एक ये घर है सोनू का। वहां सभी फुर्सत में थे फिर भी किसी के पास समय नहीं था, और यहां सभी दिन रात सिर्फ कमाने में व्यस्त थे, ताकि दो जून की रोटी मिल सके। फिर भी सभी के पास एक दूसरे के लिए समय ही समय था। यहां लोग एक दूसरे के लिए जी रहे थे। 
             यह सिर्फ पीयूष या सोनू के घर की कोई एक कहानी नहीं है। बल्कि यह तो आज के हर घर परिवार की वास्तविकता है। हम सभी आज अपनी व्यक्तिगत एवं सामुहिक उत्तरदायित्व को नहीं समझ रहे हैं, बल्कि उससे दूर भाग रहे हैं, जिसके कारण ही घर परिवार और समाज के लोगों में फासला बढ़ता जा रहा है। लोग एक दूसरों से दूर होते जा रहे हैं। आपसी रिश्ते भी सिमटते जा रहे हैं। हमें अपने आप को पहचानने का समय आ गया है। आखिर सच्चाई और यथार्थ से हम सब कब तक मुंह मोड़ते रहेंगे। हमारी खुद की अपनी संस्कृति महान है, हमें दूसरों की नकल करने की क्या जरूरत है।
        आज जरूरत आन पड़ी है कि हम सब भारत को भारत ही रहने दे,  जिसकी आत्मा गांवो में बसती है। जहां सभी एक दूसरे के सुख दुख के साथी होते हैं। नहीं तो आधुनिकता की अंधी दौड़ में दौड़ते हुए तो हमने अपनी आत्मा को क्लबों और मयखानों में गिरवी रख ही दिया हैं। 
  

                              कुमार सरोज 

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