सॉरी दीदी / Sorry Didi । कहानी । कुमार सरोज ।

                  सॉरी दीदी

                           कुमार सरोज 



        " दीदी , अभी तक आप तैयार भी नहीं हुई, मैं स्कूल जाने के लिए कब से तैयार होकर बैठा हूं। क्या हुआ ? " 

            जय अपनी बुआ के कमरे में प्रवेश करते हुए बोला। वह अपनी बुआ को दीदी कहता था। 

          जय अभी स्कूल ड्रेस पहने हुए था। वह शक्तिमान का फोटो वाला स्कूल बैग भी अपने पीठ पर टांगे था।


 " मैं ठीक हूं। बस आज मेरा मूड अच्छा नहीं है। " 

              जय की आवाज सुनकर उसकी बुआ काजल पलंग पर से उठती हुई बोली। वह अपने कमरे में अभी पलंग पर लेटी ही थी।







               जय काजल के बड़े भाई संजय का बेटा था। सभी पटना जिला के नौबतपुर शहर के पास के एक गांव तरारी में रहते थे। जय नौबतपुर के ही एक निजी विद्यालय में कक्षा प्रथम में पढ़ता था। काजल भी नौबतपुर के ही सरकारी विद्यालय में कक्षा दस में पढ़ती थी। दोनो का स्कूल पास में ही था। इसीलिए काजल ही प्रतिदिन जय को साईकिल से स्कूल ले जाती और लाती थी।

                  पिता के मरने के बाद काजल के बड़े भाई संजय के ऊपर ही परिवार की पुरी जिम्मेदारी आ गई थी। अब वही गांव के खेती का सारा काम संभालता था। घर में संजय की पत्नी पूजा भी थी। चार लोगों का बहुत ही खुशहाल परिवार था काजल का। 

               काजल ही जय की पुरी जिम्मेदारी संभालती थी। वह उसे स्कूल तो ले जाती और लाती ही थी , घर पर भी उसका सारा होम वर्क वही करवाती थी। दोनों का अधिकांश समय एक दूसरे के साथ ही बीतता था। काजल उसकी दीदी नहीं दीदी मां जैसी थी। 


 " मैं जानता हूं , आपको क्या हुआ है। आप उन बदमाश लड़कों के डर से स्कूल नहीं जा रही हैं न ?  " 


" ऐसा नहीं है जय। बस ऐसे ही । " 


 " दीदी आपने मुझे मना कर दिया है, नहीं तो मैं पापा को उन बदमाश लड़कों की सारी करतूत बता देता। आप आज मेरे साथ चलिए। आपको किसी ने कुछ कहा न तो मैं उसका सिर फोड़ दूंगा।  " 


 " तुम किसी को कुछ बताना भी नहीं। मैं अभी तैयार होकर स्कूल चलती हूं। " 

  

     काजल स्कूल जाने के लिए तैयार होती हुई बोली।


            कुछ ही देर के बाद काजल जय को साईकिल पर बैठाकर नौबतपुर की ओर चल पड़ती है। 


           नौबतपुर तरारी गांव से करीब 4 किलोमीटर दूर था। रास्ते में सरैया एक गांव भी पड़ता था। 

                काजल को सरैया गांव के ही कुछ बदमाश लड़का स्कूल आते जाते रास्ते में छेड़ता था। उसमें से एक लड़का नवल तो उसी के कक्षा में पढ़ता भी था। उन लोगों के कारण ही काजल आजकल बहुत परेशान रहती थी। उन लड़कों की हरकतें अब हद से ज्यादा बढ़ गई थी। नवल ने कुछ दिन पहले ही उसके साथ रेप करने की कोशिश भी किया था। मगर किसी तरह वह उस दिन बचकर भाग गई थी। काजल ने नवल की स्कूल में प्रधानाध्यापक से शिकायत भी की थी। मगर स्कूल वालों ने उल्टी उसे ही लड़कों से दूर रहने की सलाह देकर अपना पल्ला झाड़ लिया। इसीलिए काजल अब और ज्यादा डरी सहमी रहती थी। वह घर पर भी अपने भाई को सच्चाई नहीं बता सकती थी। क्योंकि नवल और उसके दोस्तों ने घर वालों को बताने पर उसके भतीजा जय को जान से मारने की धमकी दिया था। 

             काजल और जय के स्कूल की छुट्टी चार बजे होती थी। छुट्टी के बाद रोज के भांति उस दिन भी काजल जय को साईकिल पर बैठाकर अपने गांव की ओर चल देती है। 

               दोनों आपस में बातें करते हुए खुशी पूर्वक चले जा रहे थे। काजल अभी जय के साथ सरैया गांव से जैसे ही पार करके अपने गांव की ओर बढ़ती है कि अचानक एक मोड़ पर नवल सामने आ जाता है। वह अपने दोस्तों के साथ पहले से ही वही शायद उसी के इन्तजार में बैठा था।

             नवल काजल को पकड़कर पास के ही एक खेत की ओर जबरदस्ती ले जाने लगता है। यह देख जय गुस्से में नवल पर चिल्लाता हुआ उससे लिपट जाता है, एवं अपनी दीदी काजल को छुड़ाने की भरपूर कोशिश करने लगता है। 

                तब तक नवल का तीनों दोस्त भी पास आ जाता है। एक के हाथ में रस्सी , तो दूसरे के हाथ में चाकू था। चाकू वाला लड़का झट जय को पकड़कर उसके गर्दन पर चाकू रख देता है। 

            बेचारी काजल अपने भतीजे जय को बचाने के लिए नवल के आगे बिलख उठती है। मगर किसी के ऊपर कोई असर नहीं होता है। उलटे जिसके हाथ में रस्सी था वह लड़का काजल के गले में रस्सी डालकर उसे खेत की ओर खींचकर जानवरों की तरह ले जाने लगता है। 

                  चौथा लड़का हंसते हुए खुशियां मनाता पुरे घटना का अपने मोबाईल से वीडियो बनाने लगता है। 

               कैसा समय आ गया था। एक बेबस लाचार अबला की आबरू से खेलकर आज मर्द खुशियां मना रहा था। वह भूल गया था, कि उसे भी जन्म देने वाली वही अबला थी। वही अबला उसके घर में भी मां बहन के रुप में थी। 

                  नवल और उसके सभी दोस्त जय को ढाल बनाकर पास के ही खेत में बारी बारी से काजल साथ रेप का घिनौना खेल खेलते हैं। बेचारी वह अबला अपने भतीजे के जान की रक्षा के लिए सभी के आगे हार मानकर अपने जिस्म को उन दरिंदों को नोच खाने देती है। 

             सभी तब तक उसे नोचते रहते हैं जब तक उसकी सांस चलते रहती है। 

              अंत में बेचारी उन जालिम दरिंदों के हवस एवं यातना के आगे विवश होकर अपनी प्राण त्याग देती है।

               जय को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। उसे मानों सांप सूंघ गया था। वह तो अभी जीवन का सिर्फ छः बसंत ही देखा था। उस बेचारे को तो यह भी पता नहीं था कि उसकी दीदी के साथ आखिर ये बदमाश लड़के क्या कर रहे थे। उसे सिर्फ इतना पता था कि उसकी दीदी के साथ कुछ गलत किया जा रहा था। 

               अंत में नवल अपने दोस्तों के साथ जय को मुंह खोलने पर जान से मारने की धमकी देकर वहां से मजे से अपनी मर्दांग्नी पर इठलाता हुआ चला जाता है।

             सभी को देखने से ऐसा लग रहा था मानों वहां कुछ हुआ ही नहीं था ! आखिर चंद पल की खुशी के लिए कोई इन्सान इतना निर्दय और क्रूर कैसे हो सकता था ? 

              सभी के जाते ही जय तेजी से उस खेत की ओर दौड़ पड़ता है जिधर उसकी दीदी काजल को बदमाश लड़के ले गए थे। 

               जब वह दौड़ते हुए अपनी दीदी के पास पहुंचता है तब तक तो वह मर चुकी थी। 

               जय अपनी दीदी को मरा देख सन्न रह जाता है। उसके मुख से शब्द नहीं निकलता है। आंखे भी पथरा जाती है।

                 जय चुपचाप वही बैठकर आसमान की ओर देखने लगता है, मानों जैसे वह भगवान से अपनी दीदी को जिन्दा कर देने की विनती कर रहा हो। 

                कुछ देर तक उसी मुद्रा में वैसे ही बैठे रहने के बाद अचानक वह अपनी दीदी के सिर के पास आकर बैठ जाता है। 

   

   " दीदी, आपने मेरी जान बचाने के लिए अपनी जान दे दी। फिर भी मैं देखता रहा, आपके लिए कुछ न कर सका। आखिर करता भी क्या मैं ! अभी मैं दुर्बल और कमजोर जो हूं। मगर आप जहां भी रहोगी वहीं से देखना एक दिन मैं एक बहादुर इन्सान बनकर इन जैसे बदमाशों को कैसे सबक सिखाऊंगा। तुम्हारे दिए हुए इस जीवन को मैं यूं व्यर्थ नहीं जाने दूंगा। " 

  

           जय ऐसे बोल रहा था जैसे उसकी बात को सच में उसकी दीदी सुन रही हो। 


 " सॉरी दीदी ................  । " 

     

                जय काजल के सिर की ओर झुकते हुए बोला। वह आगे और भी कुछ बोलना चाह रहा था मगर उसके पहले ही वह बेहोश होकर अपनी दीदी पर ही लुढ़क जाता है।

             शायद अन्तह पीड़ा ने उस मासूम बच्चे की सहनशक्ति को छीनकर उसे निर्बल बना दिया था। 


            यह कोई सिर्फ एक काजल या जय की कहानी नहीं थी। आज देश में अनगिनत ऐसी घटनाएं आए दिन घटित हो रही थी, जो कभी किसी खेत में, कभी किसी बगीचा में, कभी किसी सुनसान रास्ते पर, तो कभी किसी पेड़ की डाली में लटकी हुई मृत अबला का जिस्म अपनी लुटी हुई अस्मत की कहानी बयां करती थी।

             आज मुफ्तखोर जनता, अपाहिज सरकार और भ्रष्ट प्रशासन में से किसी को भी इसकी जरा फिकर नहीं थी। आम आदमी सिर्फ मुफ्त की रोटियां खाने से मतलब रखने में , गठबंधन की सरकारें अपनी कुर्सी बचाने के जुगाड में, तो भष्ट प्रशासन अपनी तिजोरी भरने में ही व्यस्त था। तभी तो बिना किसी विशेष जांच पड़ताल या छानबीन के ही चंद हप्तों में काजल जैसी न जाने कितनी लड़कियों की फाईलें सदा के लिए बंद कर दी जाती थी। इंसाफ न मिलने के कारण ही आज समाज में नवल जैसे मनचलों का मनोबल बढ़ता जा रहा था। 

              आज देश में ऐसी घटनाओं के खिलाफ एक क्रांति, एक बदलाव की सच में जरुरत आन पड़ी थी। 



                           कुमार सरोज    

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