नारी हूं मैं / Nari Hoon Main । कविता । निधि नितिमा ।

           नारी हूं मैं 

                        निधि नितिमा



 नारी हूं मैं ,
 हां नारी हूं मैं ।

कभी बेटी बनकर ,
 कभी पत्नी बनकर, 
निभाती सारी जिम्मेदारियां हूं मैं ।

ममता के आंचल से ,
 बच्चों को वात्सल्य की छांव देती ,
कभी शिक्षिका बनकर ,
 संस्कार की नीव रखती ,
अपने सारे कर्तव्य निभाती ,
कभी विमुख नहीं होती निर्वहन से ।






 कभी राधा कभी सीता बनकर ,
कभी यशोदा कभी कौशल्या बनकर ,
 कभी वेदों कभी ॠचाओ में ,
 ज्ञान की गंगा बहाती ,
कर्तव्य पथ से कभी ना हटती ।

राम की अर्धांगिनी बनकर ,
कृष्ण की प्रेमिका बनकर , 
हर कदम पर साथ निभाती ,
 फिर भी वह स्थान न पाती ,
जिसकी मैं हकदार हूं ।

क्यों अधिकारों से वंचित रखते ,
क्यों वह सम्मान ना देते ,
जिसकी मैं हकदार हूं ,
 हां नारी हूं मैं ,
लेकिन अबला नहीं ।

क्यों वो अपना हक जताते, 
मैं कोई दासी नही ,
 एक नारी कुछ नहीं चाहती ,
सिर्फ चाहती है ,
 प्यार के दो मीठे बोल, 
और वह सम्मान ,
जो उसका अधिकार है ।



                   निधि नितिमा

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अधूरी यात्रा /। Adhoori Yaatra । हिमांशु कुमार शंकर ।

उसकी मां / Usaki Maa । कहानी । कुमार सरोज ।

लव डे / Love Day । गजल । कुमार सरोज ।