मुझे भी पढ़ाओ / Mujhe Bhi Padhao । कविता । कुमार सरोज ।

         मुझे भी पढ़ाओ


                      कुमार सरोज 




मैं भी इस देश की वासी हूं,

हक मेरा भी है उतना,

जितना पैसे वालों का,

फिर मैं क्यों नहीं पढ़ सकती,

कोई मुझे भी पढ़ाओ।









बस अंतर है इतना सा, 

मैं एक गरीब की बेटी हूं,

और वो अमीर की बेटी है,

पर अधिकार तो समता का ही है,

फिर मुझे भी पढ़ाओ।



मैं कब तक यूं ,

कूड़े के बीच रहूंगी,

मैं कब तक यूं,

भूखे पेट हर रात सोऊंगी,

कोई मुझे भी पढ़ाओ।



देख मेरा भी नए कपड़े,

पहनने को जी मचलता है,

गद्देदार बिस्तर भर पेट भोजन,

पक्का घर को तरसता है,

इसीलिए मुझे भी पढ़ाओ।



मेरे भी हैं अरमान बहुत, 

मैं भी खुले आसमां में,

हूं पंख फैलाना चाहती, 

बात बादलों संग करना चाहती,

बस मुझे भी पढ़ाओ ।



                    कुमार सरोज 

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