एक टुकड़ा प्यार / Ek Tukada Pyar । कविता । चंद्रबिंद सिंह ।

            एक टुकड़ा 'प्यार'

                               चंद्रबिद सिंह



क्या हर बार की भांति
इस बार भी
मेरा शब्द   'प्यार'
हवा में घुल जाएगा?
या फिर
गूंज उठेगा उद्घोष की तरह
'प्यार'   'प्यार'   'प्यार' ....।







क्या हर बार की भांति
इस बार भी
उछाला गया
चुंबन का एक टुकड़ा
ले लेगा रोटी की शक्ल ?
या फिर
चिपक जाएगा
चौराहे की दीवारों पर
इश्तेहार की तरह।


क्या हर बार की भांति
इस बार भी
मेरा मौसम
धुल  जाएगा ?
बारिश की बौछारों से
और फिर
सोख लेगी
खिलखिलाती धूप 
बची हुई नमी को।


क्या हर बार की भांति
इस बार भी
इंतजार में बैठा मंटू
लौट आएगा ?
उसी गुलाब के साथ
जिसे लेकर गया था
और रख देगा
दिल की किताब में
खत की तरह ।


और फिर वर्षों बाद ....
 जब मुस्कुरा देगा  
वह अपने आप पर
उन पंखुड़ियों के निशान देख
तब
उसके भीतर....
अनायास ही बजने लगेगी
एक लोक गीत की धुन ।


झरने लगेगा
पत्थरों से पानी
और खिल उठेगा उसका चेहरा
उस गुलाब की तरह
जिसे खरीदा करता था वह
जुम्मन चाचा की दुकान से।



                          चंद्रबिंद सिंह

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