दो दिन की चांदनी / Do Din Ki Chandani । कहानी । कुमार सरोज ।
दो दिन की चांदनी
कुमार सरोज
गांव बराड़, थाना चरपोखरी जिला आरा भोजपुर। रात के 7 बज रहे थे। शाम में मूसलाधार बारिश हुई थी जिसके कारण गांव से चरपोखरी जाने वाली एक मात्र पगडंडी रास्ता पर गढ्ढा में पानी अभी भी जमा था । दिलकेसर की पत्नी रेणु मां बनने वाली थी। बच्चे को जन्म देने का समय शायद नजदीक ही था। इसीलिए आज शाम से ही उसके पेट में दर्द बहुत बढ़ गया था। मगर मूसलाधार बारिश के कारण दिलकेसर शाम में चाहकर भी कुछ नहीं कर पाया था। क्योंकि चरपोखरी बाजार उसके गांव से 10 किलोमीटर दूर था जहां जाने के लिए एक मात्र यही ऊबड़ खाबड़ पगडंडी रास्ता ही था। गांव के बगल वाली नदी को पार करके जाने पर बाजार तो 4 किलोमीटर दूर ही था, मगर बरसात के कारण नदी में पानी आदमी के कमर से उप्पर तक भरा हुआ था। ऊपर से पानी की तेज धारा नदी को पार करने में मुश्किल पैदा कर देती थी। अभी 10 दिन पहले की ही बात है। इसी गांव के फेकन की दादी फगुनिया की तबियत अचानक खराब हो गई थी। फेकन जल्दी के चक्कर में अपनी दादी को नदी के रास्ते ही चरपोखरी ले जाने लगा। खाट पर लिटा कर फगुनिया को उसका पोता फेकन, साथ में रमण, दिलकेसर और विनय जैसे ही बीच नदी में पहुंचा कि अचानक फेकन का पैर पानी की तेज धार के कारण लड़खड़ा गया। जिसके कारण सभी खाट सहित नदी में गिर गए। फेकन, दिलकेसर, रमन, और विनय तो अभी जवान था बच गया। मगर फगुनिया दादी नदी के तेज प्रवाह में बह गई और डूब कर मर गई थी। दो दिन बाद चरपोखरी में नदी किनारे फगुनिया दादी की लाश मिली थी।
इसी डर से दिलकेसर अपनी पत्नी को पगडंडी वाले रास्ते से ही चरपोखरी के सरकारी अस्पताल में दिखाने के लिए अभी ले जा रहा था।
रात के सन्नाटे को बेधती हुई रेणु के प्रसव पीड़ा से चीखने की आवाज गूंज रही थी। आज भी खाट को दिलकेसर, फेकन, रमन और विनय ही अपने कंधे पर उठाकर चल रहा था। ये सभी ही गांव के सामाजिक कार्य में सबसे आगे रहते थे।
विनय दिलकेसर का ही छोटा भाई था। वह बहुत ही मजाकिया था। गांव के ही एक बुजुर्ग मंगल चाचा सभी के साथ सबसे आगे एक हाथ में एक लोटा लिए जिसमें पहले तो पानी भरा हुआ, मगर अब गिरकर आधा हो गया था चल रहे थे। उनके दूसरे हाथ में एक बड़ा सा झोला था, जिसमें कुछ कपड़ा और जरूरी सामान था। मंगल चाचा गांव के सबसे तेज तर्रार और अनुभवी थे। इसीलिए सभी उसे अपने साथ कहीं जरुर ले जाते थे।
रेणु के दर्द से कराहने और बीच बीच में दर्द से चिल्लाने की आवाज अभी भी रात के सन्नाटे को चीरती हुई फिजाओं में गूंज रही थी। विनय से जब रहा नहीं गया तो वह अपनी भाभी का ध्यान बांटने के लिए उनसे मजाक करने लगा। मगर मंगल चाचा उसे ऐसा नहीं करने के लिए बार बार मना कर रहे थे।
" भाभी, भईया को याद करके मन को शांत रखिए। हम लोग आधा रास्ता पार कर गए हैं। "
विनय मजाकिए लहजे में बोला।
" तू चुप रहेगा की नहीं। एकदम पागले है। "
मंगल चाचा उसे डांटते हुए बोले।
" अरे चाचा आप चुप चाप आगे देख कर चलिए। रात का समय है, रास्ता भी गीला है। ऊपर से जहां तहां गढ्ढा भी है। गिर गए न तो आपका भी फगुनिया दादी जैसा राम नाम सत हो जायेगा। "
" विनय एकदम सही कह रहा है मंगल चाचा। फेकन की दादी नदी में डूबी थी, और आप यहां गढ्ढा में डूब जाएंगे । "
रमन भी माहौल को और खुश गवार बनाने एवं मंगल चाचा को चिढ़ाने के लिए बोला।
यह सुन मंगल चाचा भड़क उठे। वे दोनों को भला बुरा कहने लगे। वो मजाक में भी बहुत जल्दी क्रोधित हो जाते , और तुरंत सभी से फिर बात भी करने लगते थे।
सभी आपस में हंसी मजाक करते हुए सावधानी पूर्वक रात के अंधेरे में उस कीचड़ वाले पगडंडी पर दिलकेसर की पत्नी रेणु को खाट पर टांगे सरकारी अस्पताल की ओर चले जा रहे थे।
सभी ने आधे से ज्यादा रास्ता तय कर लिया था। रेणु की प्रसव पीड़ा कमने का नाम नहीं ले रहा था। खाट के बीच में एक जलता हुआ लालटेन टंगा हुआ था। मगर अब ठंडी हवा के झोंको से वह भी बूझ गया था।
अचानक रेणु के चीखने एवं छटपटाने की आवाज बहुत तेज हो गई, और ठीक तभी एक नन्हें बच्चे की किलकारी रात के सन्नाटे को बेधती हुई गूंजने लगी। बच्चे की आवाज सुनकर सभी खुश हो जाते हैं।
" भईया, भाभी को लगता है बच्चा हो गया। "
बच्चे की आवाज सुनते ही विनय झट बोल पड़ा।
सभी रास्ते में एक चौड़ी जगह देखकर खाट को नीचे रख देते हैं।
अब रेणु की आवाज नहीं आ रही थी। सिर्फ बच्चे की किलकारी ही गूंज रही थी।
दिलकेसर पहली बार पिता बना था। चेहरे पर जमाने भर की खुशियां लिए वह बच्चे को देखने के लिए झट खाट की ओर जैसे ही झुकता है कि अचानक उसकी नजर अपनी पत्नी के निश्तेज मुख मंडल पर चली जाती है। वह बेसुध एक तरफ मृत पड़ी थी।
प्रसव वेदना ने बेचारी उस अबला की जान ले ली थी। अगर समय पर उसे उपचार मिल जाता तो शायद वह बच जाती। मगर पास कोई अस्पताल था भी तो नहीं। दूर अस्पताल, बरसात का मौसम और कीचड़ से सना गांव की ऊबड़ खाबड़ पगडंडी रास्ता ने मिलकर रेणु को उसके मातृत्व सुख से वंचित कर दिया था।
ऐसा नहीं था कि गांव वालों को इस तरह के माहौल एवं परिस्थिति में रहना अच्छा लगता था। गांव वालों ने बहुतों बार सड़क या नदी में एक पुल के लिए नेताओ एवं अधिकारियों के चक्कर लगा लगा कर थक चुके थे। कोई गांव वालों की समस्या सुनने को भी तैयार नहीं था। बस नेता सिर्फ वोट के लिए पांच साल में एक बार गांव आते थे। उसके बाद कोई नेता कभी दर्शन नहीं देता था। जबकि गांव से जिला मुख्यालय आरा मात्र 45 किलोमीटर दूर था।
अभी तक गांव में किसी भी तरह का कोई सरकारी सुविधा उपलब्ध नहीं था। उसका मुख्य कारण गांव की कम आबादी, गरीबी और शायद अशिक्षा था। जिनके पास पैसा था, या जिन्हें कुछ करने की चाहत थी वे लोग कब के गांव छोड़कर सदा के लिए शहर में जाकर बस गए थे। जिसके कारण ही शायद गांव और पिछड़ा होता जा रहा था। सभी तेज तर्रार एवं अमीर लोग तो गांव छोड़कर सदा के लिए शहर में जाकर बस गए थे।
रमन के चचेरे परदादा शालिग्राम बाबू पहले गांव के सबसे अमीर व्यक्ति थे। वे अंग्रेजों के समय में एक बड़े जमींदार थे। वे भी गांव का सारा खेत बेचकर किसी शहर में जाकर बस गए थे। गांव में अब उनका खंडहर नुमा एक घर सिर्फ याद दिलाने के लिए बचा हुआ था। वह भी इसीलिए बचा था क्योंकि वो जाते समय अपने घर को रहने के लिए अपने एक बाराहिल बुटन को दे दिए थे। बूटन उस समय कम उम्र का ही था। इसीलिए वह करीब 50 साल उस घर में रहा था। उसने शादी नहीं किया था। जिसके कारण बूटन के मरने के बाद यह घर भी खाली हो गया। रमन के अपने परदादा और शालिग्राम बाबू में पटती नहीं थी। जिसके कारण गांव छोड़कर जाते समय शालिग्राम बाबू ने कोई जमीन जायदाद उन्हें नहीं दिया था। जिसके कारण ही वे बूटन के मरने के बाद उनके घर का देख भाल नहीं कर सके। जिसके कारण ही आज वह घर खंडहर बन गया था।
गांव में ऐसे 5 - 6 घर और थे। जिसके मालिक उसे छोड़कर सदा के लिए शहर में जाकर बस गए थे। अब सभी खंडहर घर में गांव के लड़के दिन में ताश और जुआ खेलते थे, तो रात में दारू और गांजा पीने का अड्डा के रुप में इस्तेमाल करते थे।
दिलकेसर की पत्नी के मरने के ठीक अगले ही दिन सुबह गांव वाले गुस्से में रेणु की मृत शरीर को लेकर चरपोखरी के मुख्य सड़क मार्ग को अपने गांव में सड़क या पुल बनाने की मांग करते हुए जाम कर देते हैं।
सुबह से दोपहर हो जाती है मगर न ही स्थानीय विधायक और न ही कोई स्थानीय सरकारी पदाधिकारी ही आता है। फलस्वरूप सड़क जाम के कारण गाड़ियों की लम्बी लाईन लग जाती है।
और अंत में वह होता है जिसका उम्मीद किसी ने किया ही नहीं था। शाम में पुलिस आकर गांव वालों को बिना कुछ कहे बेरहमी से मारने लगती है। चारों तरफ भगदड़ मच जाती है। गांव वाले अपनी जान बचा कर भाग खड़े होते हैं।
गांव वाले मार के डर से शाम में भले गांव आ जाते हैं। मगर अगले ही दिन फिर से एकजुट होकर पुलिस जुर्म के खिलाफ और अपनी मांग को लेकर जिला मुख्यालय आरा में समाहरणालय के सामने धरना पर बैठ जाते हैं।
वहां भी एक बार फिर न स्थानीय विधायक मिलने आता है और न ही सांसद महोदय।
शाम में ऑफिस से निकलते समय डीएम साहब आकर सभी को सिर्फ संतावना देते हैं कि वो एक महीने के अन्दर गांव के लिए कुछ न कुछ करते हैं।
गांव वाले डीएम साहब के संतावना पर ही खुश होकर वापस गांव आ जाते हैं।
गांव में आने जाने के लिए कोई सड़क या ढंग का रास्ता नहीं था, जिसके कारण अब गांव के लड़को की शादी में बहुत दिक्कत होने लगी थी। कोई बराड़ गांव में अब अपनी बेटी व्याहना नहीं चाहता था। जिसके कारण ही रमन, विनय और फेकन के जैसे गांव में और भी बहुत सारे लड़के अभी तक कुंवारे थे।
डीएम साहब के संतावना से ही कुंवारे लड़कों में अपनी शादी को लेकर कुछ उम्मीदें जग जाती है। मगर डीएम साहब के आश्वासन दिए एक महीना से गुजरकर एक साल हो जाता है, फिर भी कोई गांव की खोज खबर लेने नहीं आता है।
अब गांव वालो को नेताओं एवं अधिकारियों पर से विश्वास ही उठ गया था। इसीलिए इस साल के चुनाव में गांव वाले वोट का बहिष्कार कर देते हैं।
" रोड नहीं तो वोट नहीं ..... । "
मगर उससे भी कोई फायदा नहीं होता है। बस इस बार गांव में कोई नेता वोट मांगने नहीं आता है। वैसे भी दस किलोमीटर पैदल चलकर आठ सौ वोट के लिए इस गांव में आज के ऐसो आराम में रहने वाले नेता आने वाले अब नहीं थे।
गांव वालों में एक बार फिर से निराशा और मायूसी छा जाती है।
एक दिन की बात है। गांव के पूरब दिशा में गांव से सटे एक बरगद का बहुत बड़ा पेड़ था। गांव के लोग दिन में अधिकांश समय उसी पेड़ के नीचे बैठकर आपस में गप्पे लड़ाते हुए बिताते थे। उस दिन भी मंगल चाचा, फकीरा बाबा, दिलकेसर, रमन, विनय के अलावा और भी बहुत सारे लोग वहां बैठकर आपस में बातें कर रहे थे कि चरपोखरी के तरफ से बहुत सारे लोग पैदल ही चलते हुए वहां आ जाते हैं। सभी बरसात के मौसम में भी पसीने से भींगे हुए थे।
आने वाले लोगो में से कुछ को गांव वाले तुरंत पहचान जाते हैं। पैदल चलकर आने वालों में स्थानीय विधायक, आरा के डीएम साहब, एसपी साहब एवं चरपोखरी के बीडीओ साहब थे। इसके अलावा भी कुछ हाकिम लोग और थे।
सभी को यूं अचानक आया देख गांव वालों को बहुत अचरज होता है। किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर एक साथ इतने हाकिम लोग गांव क्यों आए थे।
" शालिग्राम बाबू जो बहुत पहले गांव छोड़कर चले गए थे उनके बारे में कोई जानता है ? "
डीएम साहब बरगद के पेड़ के छांव में एक खाट पर बैठते हुए सभी से पुछते हैं।
गांव वाले सुनते ही आपस में एक दूसरे का मुंह देखने लगते हैं।
तभी फकीरा बाबा बोल पड़ते हैं। वे गांव के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति थे। उनकी उम्र सौ साल से भी अधिक थी। वो तो शालिग्राम बाबू के साथ कब्बड़ी और गुल्ली डंडा भी खेले थे।
" हां साहब, हम तो उनके साथ खेले भी थे। वे हमसे 5 साल बड़े थे। वे रमन के चचेरे परदादा थे। इसी के बगल में अभी भी घर टूटा फूटा घर है। कुछ हुआ है का हाकिम ? "
फकीरा बाबा लाठी के सहारे चलते हुए डीएम साहब के पास आकर बोलते हैं।
रमन भी अपने चचेरे परदादा का नाम सुनते ही पास आ जाता है।
" बाबा, शालिग्राम बाबू के पोता हरिद्वार सिंह अभी मॉरीशस के राष्ट्रपति हैं और वो अपने गांव बराड़ आने वाले हैं। "
सुनते ही वहां पर खड़े सभी लोगों में खुशी की लहर दौड़ पड़ती है।
रमण के साथ सभी शालिग्राम बाबू के खंडहर नुमा घर की ओर चल पड़ते हैं।
डीएम साहब, विधायक जी, एसपी साहब एवं साथ में आए और सभी अधिकारी पुरे गांव का घूम घूम कर निरीक्षण करते हैं। साथ में चल रहा इंजीनियर और ठिकेदार बताए अनुसार अपने डायरी में सब कुछ लिखते चल रहा था।
सभी नदी किनारे जाकर भी नदी का निरीक्षण करते हैं।
गांव वालों को अभी तक कुछ समझ में नहीं आ रहा था। बस सभी पीछे पीछे आपस में कानाफुसी करते हुए चल रहे थे।
सभी करीब 3 - 4 घंटे तक गांव के हर गली एवं खाली सरकारी जमीन का निरीक्षण करने के बाद वहां से चले जाते हैं।
सभी के जाने के बाद गांव वाले आपस में तरह तरह के अनुमान एवं अटकलें लगाने लगते हैं। सब को इतना तो पता चल गया था कि उनके गांव के शालिग्राम बाबू के पोता हरिद्वार बाबू यानी रमन के चाचा गांव जल्द ही आने वाले थे। उन्हीं के स्वागत सत्कार की तैयारी करने के लिए शायद आज सब लोग गांव देखने आए थे।
और अगले दिन तड़के सुबह करीब हजारों मजदूर गांव में आ जाते हैं। नदी के रास्ते नाव से एवं खेत में चलकर ट्रैक्टर से सीमेंट, बालू, छड़ एवं और दूसरे सामान भी आ जाता है। ये सब देख गांव वालों में खुशी का ठिकाना नहीं रहता है।
देखते ही देखते गांव में एक ही साथ युद्ध स्तर पर स्कूल, अस्पताल, सामुदायिक भवन, शालिग्राम बाबू का खंडहर वाला घर, सड़क एवं नदी में पुल का निर्माण कार्य प्रारंभ हो जाता है। गांव वालों को तो ये सब सपना जैसा लग रहा था।
ठीक 15 दिन बाद मॉरीशस के राष्ट्रपति हरिद्वार बाबू अपने पुरखों के गांव बराड़ आने वाले थे। उनके आने से दो दिन पहले ही गांव का काया पलट हो जाता है। जहां पहले गांव वाले एक कच्ची सड़क के लिए वर्षो से संघर्ष करते आ रहे थे, वही अब गांव में दो दो पक्की सड़क, नदी में पुल, हाई स्कूल, अस्पताल, एवं एक बड़ा सा सामुदायिक भवन बन गया था। गांव के हर गली में बिजली के खंभे भी गड़ गए थे। अभी आनन फानन में बिजली के लिए एक बड़ा सा जनरेटर गांव में लगा दिया गया था। विधायक जी के द्वारा अपने फंड से सबके घरों में तार और बल्ब भी लगा दिया गया था। गांव के करीब 10 - 15 अच्छे घरों में टेलीविजन भी विधायक जी के द्वारा लगा दिया गया था।
अब बराड़ गांव पहले वाला गांव नहीं रहा था, बल्कि अब शहर जैसा चका चक हो गया था।
मॉरीशस के राष्ट्रपति जी के आने से एक दिन पहले गांव के सभी छोटे बड़े लड़के लड़कियों को स्कूल ड्रेस, किताब और बैग देकर नए स्कूल में पढ़ाई भी शुरु कर दिया गया। स्कूल में बच्चों की संख्या दिखाने के लिए बहुत सारे बच्चों को चरपोखरी के हाई स्कूल से भी गाड़ी से लाया गया था। ताकि स्कूल अच्छा दिखे।
अस्पताल में डॉक्टर, नर्स और बहुत सारे कंपाउंडर भी आ गए थे। बीमार लोगों का आनन फानन में ईलाज भी शुरु हो गया था।
शालिग्राम बाबू का खंडहर नुमा घर भी अब एकदम चकाचक चमकने लगा था।
गांव वालों का खुशी के मारे पैर जमीन पर पैर नहीं टिक रहे थे। सभी को यह किसी चमत्कार से कम नहीं लग रहा था। 13 दिन में ही गांव का काया कल्प हो गया था। सरकारी मशीनरी के कारनामे को देखकर अभी अचंभित हो रहे थे। सबसे ज्यादा खुश गांव के वैसे लड़के थे, जिनकी शादी गांव की बदहाली के कारण अभी तक नहीं हो पाई थी। मगर अब सभी गांव की सूरत बदलते ही दहेज दुगना तिगुना बढ़ाने का मन अभी से ही बना लिया था।
अगले दिन ठीक दोपहर 1 बजे मॉरीशस के राष्ट्रपति हरिद्वार बाबू अपने गांव आते हैं। उस दिन गांव में उत्सव जैसा माहौल था। रमन तो बहुत खुश था ही गांव वाले भी बहुत आनंदित थे। फकीरा बाबा ही एक मात्र जीवित व्यक्ति थे जो शालिग्राम बाबू को देखे थे। जब हरिद्वार बाबू उनसे मिलते हैं तो वो अपने दादा का एक फोटो दिखाते हैं। फोटो देखते ही फकीरा बाबा तुरंत उन्हें पहचान लेते हैं।
फकीरा बाबा हरिद्वार बाबू को उन सभी जगहों पर ले जाते हैं जहां उनके दादा अकसर बैठा करते थे।
हरिद्वार बाबू करीब 3 घंटा अपने पैतृक गांव में रहते हैं। उसके बाद करीब 4 बजे वो गांव वालों से विदा लेकर पटना चले जाते हैं।
हरिद्वार बाबू का पटना में राज्यपाल के साथ उस दिन रात्रि भोज था। अगले दिन मुख्यमंत्री के साथ मीटिंग थी। फिर उसी दिन शाम में उनको दिल्ली जाना था। बस दो दिन का ही बिहार में उनका प्रवास था।
हरिद्वार बाबू के जाते ही गांव वाले पहली बार बिना होली के ही जमकर एक दूसरों को खूब रंग अबीर लगाते हैं। कुछ लड़के जमकर नचाते गाते भी है।
बरसात का मौसम तो था ही। शाम होते ही उस दिन खूब मूसलाधार बारिश होने लगती है। गांव मे बिजली तो आनन फानन में जनरेटर से सप्लाई कर दिया गया था। वह भी शाम होते ही बंद हो जाता है। शायद जनरेटर का तेल खत्म हो गया था। बारिश से गांव वाले अपने घरों में बंद हो जाते हैं।
इधर तब तक ठिकेदार जनरेटर, अस्पताल एवं स्कूल का सारा सामान लेकर चला जाता है। विधायक जी का आदमी जो सभी के घरों में टेलीविजन और बल्ब लगाया था, वह भी ले कर चला जाता है।
गांव वाले जब पूछते हैं तो उन्हे बताया जाता है कि यह सिर्फ इतना ही देर के लिए दिया गया था। कोई ज्यादा इसका विरोध नहीं करता है। सभी तो सड़क, नदी में पुल और गांव में स्कूल बन जाने से ही बहुत खुश थे।
बारिश दूसरे दिन भी लगातार होते ही रहती है। बारिश के कारण नदी उफान मारने लगा था। शाम होते होते नदी का पानी पुल के उप्पर चढ़ जाता है।
लगातार 2 दिन से हो रही मूसलाधार बारिश के कारण पुरा गांव जल मग्न हो जाता है।
अगले दिन सुबह में जाकर बारिश बंद हो जाती है। गांव वाले अपने अपने घरों से बारिश बंद हो जाने के बाद जब खुशी से अंगड़ाई लेते हुए निकलते हैं तो गांव का नजारा देख सभी के पैर तले की जमीन खिसक जाती है।
दो दिन पहले बना पुल नदी के पानी के तेज धार से टूटकर पुरी तरह बह गया था। अब सिर्फ निशानी के तौर पर किनारे का एक पिलर खड़ा सभी को मुंह चिढ़ा रहा था।
स्कूल का नया भवन भी पुरी तरह पानी में धराशाई हो गया था। अब वहां सिर्फ बालू और ईंट बिखरे हुए अपनी कहानी बयां कर रहे थे।
यही हाल अस्पताल और सामुदायिक भवन का भी था।
सभी दो दिन पहले निर्मित भवन बारिश के पानी में जमींदोज हो गया था। देखकर कोई कह ही नहीं सकता था कि यहां पहले कोई नया भवन भी होगा।
गांव वाले अपना सिर पकड़े उदास चेहरा लिए सभी आपस में बातचीत कर ही रहे थे कि एक तरफ से विनय दौड़ता हुआ वहां आता है।
" मंगल चाचा ....... मंगल चाचा पुरा सड़क बारिश के पानी से दहकर खेत में बह गया। हम पहिला बार पानी में सड़क बहते देखें। अब सड़क फिर से पहले ही जैसा ही ऊबड़ खाबड़ पगडंडी हो गया। "
विनय कहते कहते जमीन पर बैठकर रोने लगता है।
" सच में आज सिर्फ दिखावा करना ही सरकार और प्रशासन की नीति और नियत हो गई है। पहले सरकार जनता की, जनता द्वारा, जनता के लिए बनती थी, मगर अब सरकार दिखावा की, दिखावा द्वारा, दिखावा के लिए बनती है। हम जैसे जनता का अब कोई महत्व ही नहीं रहा। जिस 8 - 10 लाख के काम के लिए हम गांव वाले वर्षों से लाठी डंडा खा खाकर संघर्ष कर रहे थे, फिर भी वह काम नहीं हो रहा था। मगर हरिद्वार बाबू के गांव आने की बात सुनते ही तुरंत उनके दिखावे के लिए 100 करोड़ रुपया पानी में बहा दिया गया। उनके 3 घंटे के कार्यक्रम के लिए जितना खर्च इस गांव पर किया गया, उतना में कितने गावों की काया कल्प हो जाती। मगर अफसोस दिखावा में सारा पैसा स्वाहा कर दिया गया। वाह रे अंधरी लगड़ी सरकार और उसकी झूट मूठ की दिखावागिरी। "
मंगल चाचा आज के सरकार और उसकी सिस्टम की हकीकत बयां कर रहे थे, और गांव वाले उदास सुन रहे थे।
गांव के कुंवारे लड़कों का देखा संजोया शादी का सपना फिर टूट गया था।
" मगर तू रो क्यों रहा है ? "
अंत में मंगल चाचा विनय से पुछ बैठते हैं।
" चाचा, हमारे शादी के लिए आज ही एक अगुआ आने वाला था। मगर अब वह नहीं आयेगा। इस साल हम फिर कुंवारे रह जायेंगे। "
" क्या करोगे। हम गांव वालों की यही जिंदगी है। चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात। "
मंगल चाचा विनय को समझाते हुए कहते हैं।
" मगर चाचा यह चार दिन की चांदनी थी कहां, यह तो दो ही दिन की चांदनी थी। चार दिन की रहती तो आज मेरा शादी ठीक हो जाता, क्योंकि आज तीसरा ही दिन था। "
बेचारा विनय इतना भोलेपन से बोलता है कि न चाहकर भी गांव वाले उसके बात सुनकर हंसने लगते हैं।
सच ही तो विनय कह रहा था, दो दिन में ही तो 100 करोड़ का किया हुआ सारा काम पानी में मिल गया था।
कुमार सरोज
लाजवाब कहानी
जवाब देंहटाएंजी बहुत धन्यवाद
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